November 24, 2020

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जब पटेल ने नेहरू से कहा- लोकतंत्र में PM सबसे बड़ा नहीं, बल्कि…

ये वाक्या गांधी की हत्या के कुछ हफ्ते पहले दिसंबर 1947 का है. देश में कई जगह सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए थे. प्रधानमंत्री नेहरू तथा गृह मंत्री सरदार पटेल की तमाम कोशिशों के बावजूद स्थिति पूरी तरह काबू में नहीं आ पा रही थी.

लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की  143वीं जयंती 31अक्टूबर 2018को है  कृतज्ञ देश ने उन्हें याद किया जायेगा सरदार पटेल की विरासत को लेकर राजनीतिक घमासान के बीच उनके देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ लेकर रिश्तों का जिक्र भी अक्सर होता है. 1947 में नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने तो सरदार पटेल को गृह मंत्री जैसा अहम ओहदा मिला, नेहरू और सरदार पटेल के रिश्तों के संदर्भ में ही वो किस्सा जानना बहुत दिलचस्प है जब दोनों के बीच मतभेद इस कदर बढ़ गए थे कि दोनों ने इस्तीफा देने की पेशकश कर दी थी. विवाद इतना बढ़ गया था कि दोनों ने महात्मा गांधी से कह दिया कि अब उनका एक दूसरे के साथ काम कर पाना मुमकिन नहीं है.

ये वाक्या गांधी की हत्या के कुछ हफ्ते पहले दिसंबर 1947 का है. देश में कई जगह सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए थे. प्रधानमंत्री नेहरू तथा गृह मंत्री सरदार पटेल की तमाम कोशिशों के बावजूद स्थिति पूरी तरह काबू में नहीं आ पा रही थी. राजस्थान का अजमेर भी इसी तरह सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था. कुछ दिनों पहले वहां बड़ा सांप्रदायिक दंगा हुआ था. मामले की तह तक जाने के लिए गृह मंत्री पटेल ने गृह मंत्रालय की तरफ से एक जांच दल को वहां भेजा था. इसी बीच प्रधानमंत्री नेहरू ने यह घोषणा कर दी कि वो दिसंबर के आखिर में खुद अजमेर जा कर स्थिति को देखेंगे. पटेल को यह बात अच्छी तो नहीं लगी लेकिन नेहरू का लिहाज करते हुए वो चुप रहे.

मगर अजमेर यात्रा के ठीक पहले प्रधानमंत्री नेहरु ने ऐलान कर दिया कि अब वह अजमेर नहीं जाएंगे बल्कि उनकी जगह उनका पर्सनल सेक्रेटरी अजमेर जाएगा. सरदार पटेल को यह बात बहुत नागवार गुजरी. उन्हें लगा कि जब गृह मंत्रालय की जांच समिति पहले से ही अजमेर जा चुकी है तब प्रधानमंत्री द्वारा अपने पर्सनल सेक्रेटरी को वहां भेजने का मतलब यह हुआ कि उन्हें गृह मंत्रालय के कामकाज पर भरोसा नहीं है.
लौह पुरुष सरदार पटेल भला कहां चुप रहने वाले थे! उन्होंने सीधे नेहरू से इस बारे में आपत्ति जताई और कहा कि अगर वह खुद अजमेर जाते तो बात और थी लेकिन अपने पर्सनल सेक्रेटरी को वहां भेजने पर उन्हें सख्त आपत्ति है.

कई मामलों पर पटेल से मतभेद होने के बावजूद नेहरू उनका बहुत सम्मान करते थे. उन्होंने पटेल को समझाने की कोशिश की. कहा कि परिवार में किसी की मृत्यु हो जाने के कारण वह अजमेर खुद नहीं जा पा रहे हैं. उन्होंने दलील दी कि वह अपने सेक्रेटरी को अजमेर इसलिए भेज रहे हैं क्योंकि जो लोग उनसे मिलने का इंतजार कर रहे थे वो मायूस ना हो.

लेकिन साथ में नेहरू ने यह भी कह दिया कि प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है और जहां चाहे जा सकता है और जिसे चाहे कहीं भी भेज सकता है. नेहरू की इस बात पर पटेल भड़क गए. उन्होंने नेहरू से कहा कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री सबसे बड़ा नहीं होता बल्कि सिर्फ ‘First Among The Equals’ यानी बराबरी के लोगों में पहले नंबर पर होता है. पटेल ने यह भी कह दिया कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह अपने मंत्रियों पर अपना हुक्म चलाएगा.

नेहरू द्वारा अपने सेक्रेटरी को अजमेर भेजने को लेकर विवाद बढ़ता चला गया. बात इतनी बिगड़ गई कि नेहरू और पटेल दोनों ने महात्मा गांधी से कहा कि वह एक दूसरे के साथ काम नहीं कर सकते और अपना इस्तीफा देना चाहते हैं. महात्मा गांधी ने दोनों से कहा कि वे इस मामले पर दोनों से बातचीत करेंगे और फिलहाल दोनों अपना अपना काम करते रहें क्योंकि देश को उनकी जरूरत है.

नेहरू और पटेल दोनों गांधी के साथ बैठकर इस मामले पर बातचीत करने का इंतजार करते रहे. लेकिन ऐसा मौका ही नहीं बन पा रहा था कि तीनों लोग एक साथ बातचीत कर सकें. पहले पटेल को कुछ दिनों के लिए दिल्ली से बाहर जाना पड़ा और उसके बाद गांधी अनशन पर बैठ गए.

तीनों के साथ बैठकर बातचीत करने का मौका आया तो ठीक उसी दिन जिस दिन गांधी की हत्या हो गई. 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी ने दिल्ली में शाम को अपनी प्रार्थना से पहले सरदार पटेल को बातचीत के लिए बुलाया. गांधी और पटेल दोनों गुजरात के थे और उनके बीच संबंध बहुत आत्मीय था. दोनों अक्सर गुजराती में बात करते थे. उन्होंने पटेल को समझाया कि देश के सामने बहुत चुनौतियां हैं, नेहरू और उनका साथ मिलकर काम करना जरूरी है. उन्होंने पटेल से कहा कि वे अगले दिन नेहरू को बुलाकर साथ बैठकर बातचीत करेंगे ताकि यह विवाद हमेशा के लिए खत्म हो सके.
लेकिन गांधी, नेहरू और पटेल की ये बैठक कभी नहीं हो सकी. क्योंकि उसी दिन यानी 30 जनवरी 1948 की शाम को प्रार्थना सभा के समय नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर गांधी जी की हत्या कर दी. लेकिन गांधीजी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया.

गांधी की हत्या के तीन दिन बाद जवाहरलाल नेहरू ने वल्लभ भाई पटेल को पत्र लिखकर कहा कि गांधीजी के नहीं रहने के बाद अब परिस्थितियां बहुत बदल गईं हैं और अब पुराने विवाद भूल कर हमें साथ काम करना होगा क्योंकि देश के सामने बहुत बड़ी चुनौतियां हैं. उतना ही बड़ा दिल दिखाते हुए सरदार पटेल ने नेहरू को लिखा कि सचमुच गांधी की हत्या से सब कुछ बदल गया है. पटेल ने कहा कि यह बात सही है कि हाल के कुछ विवादों से वह बहुत परेशान थे और अपना इस्तीफा देने की पेशकश भी कर चुके थे. लेकिन अब नई  परिस्थितियों में देश के सामने जो चुनौतियां हैं उसका मुकाबला करने के लिए वह नेहरू के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी पूरी ताकत लगाने को तैयार हैं.
देश के सरदार
सरदार बल्लभ भाई पटेल

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