November 26, 2020

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

पूंजीवादी समाज में संपत्ति और संपदा की असमानता; जानिए

अगर देश की सबसे अमीर एक फ़ीसदी आबादी पर ही उत्तराधिकार कर और संपदा कर लगाए जाएं, तो इससे 14.67 लाख करोड़ रुपये हासिल होंगे।

सच के साथ ●आमतौर पर यह माना जाता है कि अपनी संतानों को संपत्ति देना पूंजीवाद का जरूरी तत्व है, इसके बिना पूंजीवादियों का प्रोत्साहन कमजोर हो जाएगा और उनकी व्यवस्था अपनी गति खो देगी। लेकिन यह बात सच से बहुत दूर है। बल्कि उत्तराधिकार से संपत्ति के अधिग्रहण की व्याख्या, बुर्जुआ प्रवक्ताओं की पूंजीवादी संपत्ति को न्यायसंगत ठहराने के लिए दिए गए तर्कों से बिलकुल विपरीत है।

पूंजीवादी संपत्ति/संपदा को न्यायसंगत ठहराने के क्रम में यह दावा किया जाता है कि पूंजिवादियों के पास कुछ खास गुण होते हैं, जो बेहद दुर्लभ होते हैं। उनके रोज़गार से राष्ट्र में संपन्नता आती है और इसके चलते पूंजीवादियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए। लेकिन बुर्जुआ प्रवक्ताओं में इस बात पर एकमत्ता नहीं है कि आखिर यह खास गुण है क्या?

यह गुण उत्पादन प्रक्रिया की देखरेख नहीं हो सकता, क्योंकि यह काम वैतनिक कर्मचारी करते हैं, जो आमतौर पर सबसे कुशल कर्मचारी होते हैं। उन्हें वेतन मिलता है, मुनाफ़ा नहीं (बशर्ते उनका संपत्ति में किसी तरह का शेयर ना हो)। इसी तथ्य के चलते जॉन केनेथ गालब्रैथ ने कहा है कि कारखानों या उद्यमों को पूंजीवादी नहीं, बल्कि “टेक्नोस्ट्रक्चर” चलाते हैं।

ना ही इस खास गुण को “एनिमल स्प्रिट्स” (जैसा जॉन मेनार्ड ने बताया) कहा जा सकता है। जैसा जॉन मेनार्ड केनेस का विश्वास है- एनिमल स्प्रिट की मजबूती, निवेश की मात्रा तय कर सकती है, लेकिन यह पूंजीवादी आय और संपत्ति/संपदा के इस दुनिया में मौजूद होने की व्याख्या नहीं कर सकती।

पूंजीवादी आय और संपत्ति को सही ठहराने के लिए दिए जाने वाले दूसरे तर्कों में भी भरोसे की कमी है। ऐसा ही एक तर्क है, जिसमें कहा जाता है कि पूंजीवादी “ज़ोखिम उठाने” वाले होते हैं। बल्कि ज़ोखिम तो वो लोग उठाते हैं, जिनका निवेश बैंकों की मध्यस्थता के चलते इन पूंजीवादियों के प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पूंजीवादियों के हाथों में सौंप दिया गया होता है। अगर कोई उद्यम ढह जाता है, तो इन्हीं का पैसा गायब होता है।

इन दिनों जरूर पूंजीवादी देशों में बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों की मदद करने के लिए सरकारें आगे आती हैं। इसका मतलब वे ख़तरे का समाजीकरण कर रही हैं। लेकिन इससे ज़्यादा बेहतर तरीके से पूंजीवादियों की वह बात ख़ारिज हो जाती है, जिसमें कहा जाता है कि वे ‘ज़ोखिम’ उठाने वाले हैं।

इसी तरह यह भी एक विचार है कि पूंजीवादी, संपत्ति के मालिक होते हैं और उस पर आय प्राप्त करते हैं, क्योंकि उन्होंने इसके लिए ‘बचत’ की होती है, मतलब उन्होंने खपत नहीं की होती और इस त्याग के बदले उन्हें पुरस्कृत किया जाना जरूरी होती है, यह विचार अब ख़ारिज हो चुका है।

अगर हम ‘त्याग’ के दार्शनिक तर्कों को अलग कर दें, तो इस तर्क का बहुत सीधा और स्वाभाविक खंडन मिलता है। खंडन के मुताबिक़, निवेश से बचत तय होती है, ना कि बचत से निवेश तय होता है। जब निवेश होता है, तब जो बचत उत्पादित होती हैं, वे ज़्यादा बेहतर “कैपसिटी यूटिलाइजेशन (उपयोग)” की वज़ह से होती है। यह बचत, उस मुद्रास्फीति की वज़ह से भी उत्पादित होती है, जो कामग़ार भत्तों को कम कर देती है और कामग़ारों की खपत करने की क्षमता को भी गिरा देती है।

लोगों का कोई समूह अपनी खपत या बचत के विकल्प में से चुनकर अपने निवेश को तय करता है। फिर जो लोग बचत का विकल्प तय कर रहे हैं, उन्हें उनके त्याग के लिए पुरस्कृत किए जाने की बात कहते वक़्त इतना ध्यान में रखना चाहिए कि पूंजीवाद इस तरीके से काम नहीं करता।

फिर अंतिम तौर पर यह विचार है कि पूंजीवादी “उद्यमी” होते हैं, जो नवोन्मेष (नए तरीके) को सामने लाते हैं और इस तरह अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करते हैं। चूंकि यह उद्यमशीलता का गुण समाज में बहुतायत में नहीं पाया जाता, इसलिए जिन लोगों के पास इसका स्वामित्व है, उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इस तर्क के साथ दिक्कत यह है कि पूंजीवादी संपत्ति अस्तित्व में है और इस पर तब भी मुनाफ़ा कमाया जाता है, जब नवोन्मेष नहीं हो रहे होते हैं। मतलब साधारण पुनर्उत्पादन के ज़रिए।

लेकिन यहां मेरी आपत्ति संपत्ति और मुनाफ़े के अस्तित्व वाले बुर्जुआ सिद्धांतों को लेकर नहीं है। बात यह है कि अगर पूंजीवादी संपत्तियों की इन व्याख्याओं को हम मान भी लेते हैं, तो भी यह व्याख्याएं इस तर्क की व्याख्या नहीं करतीं कि किसी ऐसे आदमी, जिसके पास ‘कोई विशेष गुण’ नहीं है, जिसके ज़रिए ‘पूंजीवादी का संपत्ति पर अधिकार’ बना होता है, फिर भी उस आदमी को क्यों संपत्ति मिलनी चाहिए? मतलब उसके पास संपत्ति का उत्तराधिकार क्यों होना चाहिए?

बल्कि इस बात को मानना कि किसी पूंजीवादी की संतानों द्वारा संपत्ति का उत्तराधिकार होना चाहिए, भले ही संतान ने कोई विशेष गुण का प्रदर्शन ना किया हो, यह पूरी व्याख्या ही उस सिद्धांत के खिलाफ़ जाती है, जिसमें कहा जा रहा है कि संपत्ति या संपदा किसी खास गुण का पुरस्कार है। इस तरह कहा जा सकता है कि संपत्ति का उत्तराधिकार के ज़रिए अधिग्रहण, बुर्जुआ प्रवक्ताओं द्वारा पूंजीवादी संपत्ति को न्यायसंगत ठहराने का खंडन है।

फिर हम तब “प्रोत्साहन” वाले तर्क का इस्तेमाल क्यों करते हैं। मतलब कि पूंजीवादियों का यह खास गुण (जिसके लिए कथित तौर पर समाज उन्हें पुरस्कृत करता है) अगर उन्हें संशय हो कि उनकी संपत्ति उनके बच्चों को दी जाएगी या नहीं, तो यह गुण उनमें आता ही नहीं।
यह तर्क उत्तराधिकार को तो न्यायसंगत नहीं ठहराता, लेकिन यह पूंजीवादियों द्वारा समाज को जबरदस्ती मोड़ने, मतलब पूंजीवादियों द्वारा समाज की ‘खास प्रतिभाओं’ को रोजगार देने के बदले, ‘उनके बच्चों को संपत्ति का उत्तराधिकार’ सौंपने जैसी ‘ब्लैकमेलिंग’ न्यायसंगत जरूर ठहराता है।

इस दोगले नैतिक आधार पर आधारित होने के अलावा, यह तर्क, तार्किक तौर पर भी सही नहीं है। इस बात की कोई वज़ह ही नहीं है कि जिस समाज में उत्तराधिकार नहीं होगा, वहां नवोन्मेष क्यों खत्म हो जाएंगे। अगर उत्तराधिकार ना रहने से कोई एक आदमी नवोन्मेषी नहीं रहता है, तो दूसरा आदमी नवोन्मेष का प्रदर्शन करेगा। जबकि उस समाज में उत्तराधिकार तो मौजूद होगा ही नहीं। इसलिए बुर्जुआ तर्कों से ही जाएं, तो समाज में उत्तराधिकार के रहने के पक्ष में कोई मजबूत दलील नहीं है।

इसलिए ज़्यादातर पूंजीवादी देश, यहां तक कि पूंजीवादियों के सामने झुकने वाले नवउदारवादी दौर में भी, इन देशों में ऊंचा उत्तराधिकार कर लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, जापान में उत्तराधिकार कर 50 फ़ीसदी है, जबकि अमेरिका में यह 40 फ़ीसदी है। ज्यादातर यूरोपीय देशों में यह कर 40 फ़ीसदी के आसपास है। इस बात में कोई शक नहीं है कि बड़े पैमाने पर लोग इस कर से बचते होंगे, लेकिन उत्तराधिकार करारोपण के सिद्धांत को यह सभी देश मानते हैं।

भारत में ना तो कोई संपदा कर है और ना ही कोई नाम भर का उत्तराधिकार कर, जबकि यहां तेजी से असमता बढ़ रही है। ऊपर से हमारे देश में तो इस पर कोई सार्वजनिक विमर्श भी नहीं होता। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि मौकों में समता का अधिकार भी ज्यादातर लोगों को अवास्तविक सपना दिखाई देता हो और यह लोग अपनी तकलीफदेह जिंदगी में थोड़े से सुकून से ही संतुष्ट हों।

लेकिन लोकतंत्र, जो मौकों की समानता की जरूरत महसूस करता है, उसमें ना केवल संपदा की असमानता से पार पाना होता है, बल्कि उस लोकतंत्र में उत्तराधिकार से मिलने वाली संपदा के सिद्धांत का भी खात्मा किया जाता है।

यह चीज क्या हासिल कर सकती है, उसे आंकड़ों के ज़रिए बताया गया है। 2019 में अनुमान लगाया गया कि हमारे देश में कुल निजी संपदा 12.6 ट्रिलियन डॉलर मूल्य या करीब 945 लाख करोड़ रुपये की है। जिसमें से शुरुआती एक फ़ीसदी के पास 42.5 फ़ीसदी संपत्ति है। इसका आंकड़ा करीब 400 लाख करोड़ रुपये पहुंचता है। यहां तक कि रकम पर अगर दो फ़ीसदी संपदा कर भी लगाया जाता है, तो हमें कुल 8 लाख करोड़ रुपये हासिल हो सकते हैं। यह 2 फ़ीसदी वह दर है, जिसे अमेरिका में सीनेटर एलिजाबेथ वारेन 50 मिलियन डॉलर या ज़्यादा की संपत्ति वालों पर लगाने की सलाह दे रही थीं। इस दर पर सलाह उन्होंने तब दी थी, जब वे राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी थीं। बाद में बर्नी सैंडर्स 1 फ़ीसदी से लेकर 8 फ़ीसदी तक प्रगतिशील संपदा कर लेकर आए।

साथ में, अगर हम मानें की भारत के एक फ़ीसदी लोग, जो सबसे अमीर हैं, उनकी हर साल 5 फ़ीसदी संपत्ति की वसीयत लिखी जाती होगी, अगर हम इसके एक तिहाई पर भी उत्तराधिकार कर लगा दें, तो हमें 6.67 लाख करोड़ रुपये हासिल होंगे। अगर इन करों (उत्तराधिकार और संपदा कर) को देश के सबसे अमरी एक फ़ीसदी लोगों पर ही लगाया जाए, तो इससे 14.67 लाख करोड़ या मौजूदा GDP (महामारी का जीडीपी पर प्रभाव शामिल नहीं किया जा रहा है) के करीब 7 फ़ीसदी के बराबर की आय होगी।

भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने के लिए पांच बुनियादी आर्थिक अधिकारों की जरूरत है- ऊचित कीमतों पर खाद्यान्न का अधिकार, रोज़गार का अधिकार (अगर रोज़गार नहीं मिल सकता, तो पूरे भत्ते का अधिकार), सरकारी मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, बुजुर्ग पेंशन अधिकार और पर्याप्त दिव्यांगता फायदे। इनके लिए हमें मौजूदा GDP का करीब 10 फ़ीसदी ज़्यादा खर्च करना होगा। अगर ऊपर बनाए अनुमान को ध्यान में रखें, तो हमें इस खर्च के लिए पैसे को हासिल कर सकते हैं।

जब सरकार इतने मूल्य का ज़्यादा खर्च करेगी, तो इससे GDP भी “मल्टीप्लायर” प्रभाव से बढ़ेगी और इस GDP का करीब़ 15 फ़ीसदी सरकार के पास कर के तौर पर वापस आता ही है। इन सरकारों में केंद्र और राज्य दोनों शामिल होते हैं। हमारे खर्च को 10 फ़ीसदी ज़्यादा करने के लिए जिन नए करों (उत्तराधिकार और संपदा) की जरूरत होगी, उनकी कीमत हमारी पूरी GDP का 7 फ़ीसदी ही होगी।

मतलब अगर हम हमारे देश की एक फ़ीसदी सबसे अमीर आबादी पर ही यह दो कर लगा दें, तो भारत में कल्याणकारी राज्य का वित्तपोषण हो जाएगा। अब कोई यह नहीं कह सकता कि देश के पास अपनी बड़ी आबादी की खस्ता हालत को सुधारने के लिए संसाधनों को कमी है।

loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

loading...
Copyright © All rights Reserved with Suchkesath. | Powered By : Webinfomax IT Solutions .
EXCLUSIVE