September 27, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

क्या आपके मन में यह सवाल कभी आया है कि मानव द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए सैटेलाइट जब खराब हो जाते हैं या उद्देश्य की पूर्ति के बाद उनका क्या होता होगा..!

ये सैटेलाइट आखिर जाते कहां हैं?

आपको जानकर हैरानी होगी कि ये सैटेलाइट अंतरिक्ष में ही कचरे के रूप में घूमते रहते हैं. इन्हें सदियां हो जाती हैं और ये अंतरिक्ष के अंधेरे में गुमनाम हो जाते हैं.

कई बार तो इनमें विस्फोट भी हो जाता है, जिससे यह छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट कर बिखर जाते हैं. अंतरिक्ष में घूमते हुए ये छोटे-छोटे सैटेलाइट के टुकड़े हमारे अंतरिक्ष यान और संचार उपग्रहों को खराब या उन्हें तबाह करने की ताकत रखते हैं.

ऐसे में जरूरी है कि हम मानव प्रगति के साथ दिन-प्रतिदिन बढ़ते अंतरिक्ष कचरे को समझें और इस समस्या को जानें –

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1957 से हुई शुरूआत:-

1957 में जब दुनिया के पहले कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक-1 को सोवियत रूस ने अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया, तब से आज तक हजारों उपग्रह, अंतरिक्ष यान, अंतरिक्ष शटल, अंतरिक्ष स्टेशन विभिन्न देशों द्वारा अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए जा चुके हैं.

एक अनुमान के अनुसार, अभी तक विभिन्न  देश 23,000 से अधिक उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचा चुके हैं. जानकर हैरानी होगी कि इसमें से लगभग 12,00 सैटेलाइट ही सक्रिय हैं, यानी कुल छोड़े गए उपग्रहों में से मात्र 5 प्रतिशत ही वर्तमान में चालू अवस्था में हैं, जबकि बाकी 95 प्रतिशत उपग्रह कचरे का रूप ले चुके हैं.

बेकार हो चुके ये 95 प्रतिशत कृत्रिम उपग्रह अभी भी अपनी कक्षाओं में निरंतर चक्कर लगा रहे हैं और अंतरिक्ष में कचरा को बढ़ा रहे हैं.

ये बेकार सैटेलाइट फिर अन्य किसी सक्रिय सैटेलाइट से टकराते हैं और इससे कई हजार छोटे-छोटे टुकड़े अंतरिख में फैल जाते हैं. ये नए टुकड़े फिर किसी अन्य सैटेलाइट से टकराते हैं और इससे दोबारा नए टुकड़े बनते हैं.

ऐसे ही अंतरिक्ष में इन टुकड़ों की लगातार टक्करें हो रही हैं, जिससे हजारों नए टुकड़े हर रोज उत्पन्न हो रहे हैं. अब जैसे-जैसे टुकड़ों की संख्या बढ़ रही है, इससे टक्करों की संख्या भी बढ़ रही है. इस तरह यह प्रक्रिया सतत रूप से चलती हुई एक श्रृंखला अभिक्रिया (चेन रिएक्शन) का रूप धारण कर लेती है. इस अवस्था को ही ‘कैस्लर सिंड्रोम‘ कहते हैं.

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इस समस्या को समझने के लिए कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का सहारा लेना उचित होगा.

सन 1996 की बात है, जब फ्रांस का एक सैनिक उपग्रह अपनी कक्षा का चक्कर लगाते समय फ्रांस के एक ऐसे रॉकेट से टकराया था, जो दस साल पूर्व एक विस्फोट से फट गया था.

इससे भी अंतरिक्ष में नए कचरे का निर्माण हुआ.

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ठप हो सकता है संचार नेटवर्क

इसी तरह 2007 में चीन ने एक ‘एंटी सैटेलाइट मिसाइल‘ का परिक्षण किया, जिससे उसने अपने ही एक मौसम उपग्रह को अंतरिक्ष में ही नष्ट कर दिया, इससे पैदा हुए कचरे के हजारों टुकड़े अंतरिक्ष में आज भी तैर रहे हैं.

इस तरह सैटेलाइट के आपस में टकराने से या इनके टुकड़ों, पिंडों के सैटेलाइट, स्पेस स्टेशन आदि से टकराने से धात्विक टुकड़ों के रूप में अंतरिक्ष कचरा बढ़ता ही जा रहा है.

यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ईएसए) का कहना है कि यदि उपग्रहों और रॉकेटों से होने वाले अंतरिक्ष के कचरे को पृथ्वी की कक्षा से साफ नहीं किया गया तो दुर्घटनाओं का खतरा और अधिक बढ़ता जाएगा. इससे उपग्रह ऑपरेटरों को करोड़ों का नुकसान हो सकता है, इसके साथ ही मोबाइल और जीपीएस नेटवर्क भी ठप पड़ सकते हैं.

उपग्रहों की सहायता से देश संचार के साधनों का लाभ ले पाते हैं. उपग्रहों पर ही किसी देश के मोबाइल ,टीवी , इंटरनेट और अन्य संचार व्यवस्थाओं के साथ-साथ दूर शिक्षा (टेली एजुकेशन), दूर चिकित्‍सा, ग्राम संसाधन केंद्र (वीआरसी) व आपदा प्रबंधन प्रणाली (डीएमएस) कार्यक्रम, डिफेंस सिस्टम निर्भर हैं.

ऐसे में अगर हमारी महत्वपूर्ण सैटेलाइट किसी कारण से इस अंतरिक्ष कचरे से टकरा जाती है, तो सोचिए कि धरती पर मानव का क्या होगा? खासकर किसी भयानक प्राकृतिक आपदा के समय..!

अगर उपग्रह आपस में टकराकर नष्ट हो जाएंगे या किसी अंतरिक्ष कचरे के टकराने से खराब हो जाएंगे तो इससे आम जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का का अंदाजा लगाया जा सकता है. वहीं, अगर अंतरिक्ष कचरे का कोई बड़ा पिंड किसी घनी आबादी वाले शहर पर गिरता है, तो स्वाभाविक है इससे बड़ी जनहानि भी हो सकती है.

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24 मैक की गति से तैरता कचरा

एक अनुमान के अनुसार, वर्तमान समय में अंतरिक्ष में करीब 700 टन से अधिक कचरा तैर रहा है. अंतरिक्ष वैज्ञानियों के अनुसार, अंतरिक्ष में परिक्रमा करते कचरे के पिंडों में 30,000 किलोमीटर प्रति घंटे तक की अकल्पनीय गति मौजूद होती है.

मतलब ध्वनि की गति से लगभग 24 गुना ज्यादा तेजी के साथ ये कचरा अंतरिक्ष में घूता रहता है. नतीजतन ये टुकड़े किन्हीं भी उपग्रहों, अंतरिक्ष शटलों, अंतरिक्ष स्टेशनों, अंतरिक्ष में चहलकदमी ( स्पेसवाक) करते हुए स्पेस शूट को भी चीरता हुआ निकल सकता है.

इस रफ्तार पर छोटे से छोटा टुकड़ा भी विमान या उपग्रह जैसी चीज को नष्ट कर सकता है.

उदाहरण के लिए लगभग एक मिलीमीटर का एक टुकडा बेहद तेजी के साथ जनवरी 2017 में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की खिड़की से टकराया था, जिससे खिड़की चटक गई थी. इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए विश्व की तमाम स्पेस एजेंसियां भी मिलकर काम कर रही हैं.

हाल ही में यूरोपीय वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष कचरे को साफ़ करने के लिए एक सिस्टम विकसित करने का दावा किया है, जिसे उन्होंने ‘रिमूव डेबरिस मिशन‘ नाम दिया है. इसमें एक जाल के साथ भालानुमा यंत्र लगा है, जो कचरे को एकत्र करने का काम करेगा. यह उपकरण पिछले 4 अप्रैल को ही स्पेस एक्स के रॉकेट ‘फालकन-9’ के साथ अंतरिक्ष में भेजा गया था.

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कहां जाते हैं खराब सैटेलाइट!

दरअसल जब इन उपग्रहों का उद्देश्य पूरा हो जाता है, उसके बाद भी ‘कॉस्मिक वेग’ के कारण यह उपग्रह अपनी उस कक्षा में ही चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन वायुमंडलीय ‘कर्षण बल’ के कारण इनकी गति में धीरे धीरे कमी आने लगती है.

और नतीजतन ये उपग्रह सर्पिलाकार (स्पाइरल-शेप्ड) पथ का अनुसरण करते हुए पृथ्वी की ओर गिरने लगते हैं. जहां यह उपग्रह वायुमंडल के अपेक्षाकृत सघन हिस्से में प्रवेश करते हैं.

वायुमंडलीय घर्षण के कारण इतने अधिक ताप की उत्पत्ति होती है कि धातु के इन कचरों में पृथ्वी पर गिरने से पहले ही आग लग जाती है.

अंततः एक राख के रूप में बदलकर ये पृथ्वी की ओर गिरते हैं, लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि पिंड बड़ा होने के चलते पूरा नहीं जल पाता और पिंड या उपग्रह के ये अधजले टुकड़े धरती वासियों के लिए संकट पैदा कर देते हैं.

इसका एक उदाहरण है अमेरिकी अंतरिक्ष स्टेशन ‘स्काई लैब‘. इसके कुछ अवशेष सन 1979 में हिंद महासागर और ऑस्ट्रेलिया के ऊपर आकर गिरे थे, हालांकि संयोग से उस समय कोई हताहत नहीं हुई. ऐसे ही सोवियत संघ का ‘मीर अंतरिक्ष स्टेशन‘ न्यूजीलैंड और चिली के बीच प्रशांत महासागर में 23 मार्च 2001 को अपना जीवनकाल पूरा करने के बाद पृथ्वी पर आ गिरा.

इसी साल 2 अप्रैल को चीन के स्पेस स्टेशन ‘द तियांगोंग-1‘ के अवशेष जब दक्षिणी प्रशांत में आकर गिरे तो एक बार फिर उपग्रहों के कचरे से होने वाले खतरे की ओर धरती वासियों का ध्यान गया.

ध्यातव्य हो कि चीन का स्पेस स्टेशन ‘द तियांगोंग-1’ दो साल से अंतरिक्ष में बेकार घूम रहा था. चीन की स्पेस एजेंसी ‘चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन’ ने मई 2017 में ही बयान जारी कर कह दिया था कि उसका स्पेस स्टेशन से मार्च 2016 से संपर्क टूट गया है और यह अंतरिक्ष में ऐसे ही चक्कर मार रहा है, किसी भी वक्त धरती पर गिर सकता है.

इस स्पेस स्टेशन के धरती पर गिरने की आशंका जताई जा रही थी, लेकिन गनीमत रही कि सोमवार सुबह 00:16 बजे पर यह स्पेस स्टेशन धरती के वायुमंडल में पहुंचते ही जल गया और दक्षिण प्रशांत महासागर में गिरा, जिससे किसी भी प्रकार की हताहत करने वाली घटना नहीं घटी.

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एक ओर जहां विभिन्न देशों की स्पेस एजेंसी अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को लेकर अंतरिक्ष में उपग्रहों के समूह स्थापित करने की योजना बना रही हैं, तो दूसरी ओर बेकार उपग्रहों से उत्पन्न अंतरिक्ष कचरा इन अभियानों पर पानी फेरने को तैयार है. ऐसे में जरा सोचिए अगर इस स्टेशन के अवशेष आबादी वाले किसी शहर पर गिरे होते तो क्या होता..?

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