June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

अगले जन्म में किस जाति में पैदा होने की इच्छा जताई थी गांधी ने?

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कल बाइक की चाभी छिटक कर नाली में गिर गई. मैंने बगल में पड़ी पॉलिथीन दस्ताने की तरह हाथ पर चढ़ाकर अपनी चाभी निकाली.

 
भरोसा कीजिए, नाली में हाथ डालकर चाभी ढूंढना और निकालना उतना आसान था नहीं जितनी आसानी से मैंने अभी बता दिया.

 

इस घटना के बाद जब से मेरा दिमाग एक्टिवेट हुआ है, तभी से मैं उन तमाम लोगों के बारे में सोच रहा हूं जिनको मैंने कभी गटर या नालों में उतरकर सफाई करते देखा है. मैं खुद को उन मैला ढोने वालों यानि मैन्युअल स्कैवेंजर्स के बारे में सोचने से भी नहीं रोक पा रहा. जिनका पुश्तैनी काम ही सूखे शौचालयों से मानव-मल टोकरी में उठाकर ले जाना है.

 

यहां मैं आपको बता देना चाहता हूं कि आगे मैं जो कुछ भी लिखूंगा, उसे पढ़ कर आपको न ही किसी तरह का मजा मिलेगा, न ही आपका मनोरंजन होगा. संभव है समाज की ये सच्चाई आपका मूड खराब कर दे. क्योंकि आगे की कहानी उन लोगों की कहानी है जिनके बारे में न हम सोचना चाहते हैं न ही बात करना.

 

यहां मैं बात करुंगा उन लोगों की, जिनसे समाज ने सैकड़ों सालों तक अपना मल साफ करवाया है और फिर उनसे मल की तरह ही बर्ताव भी किया है. इन लोगों ने इंसान के सबसे भयानक और विद्रूप सपने को न सिर्फ जिया है, बल्कि उसमें डूबकर मरे भी हैं. गांवों में ये लोग शुष्क शौचालयों से टोकरी में मल एकत्र करते हैं और सिर पर रखकर ले जाते हैं. शहरों में यही लोग गटर और सीवेज पाइपों में घुसकर सफाई करते हैं और मर जाने पर अखबारों के बारहवें पन्ने पर तीन लाईन की खबर बनते हैं.

 

 

समझने की बात है कि अगर ये घृणित प्रथा सैकड़ों सालों से जारी है, तो इसकी जिम्मेदारी उन सफेदपोश इज्जतदार लोगों को लेनी ही पड़ेगी जिन्होंने समाज सुधारक बन कर अपनी जय-जयकार तो करवाई लेकिन इसका विरोध नहीं किया.

 

 

आलोचना और नाराजगी के तमाम जोखिमों के बावजूद मैं मोहनदास गांधी को इसका बड़ा जिम्मेदार मानता हूं. जिन्होंने सिर पर मैला ढोने की इस अमानवीय प्रथा को पुण्य का कार्य कहकर इस मुद्दे पर समाज को बरगलाने की कोशिश की और कहा, “बच्चों का मल-मूत्र तो माता-पिता साफ करते हैं, यह तो पुण्य का काम है. इस कार्य में लगे लोगों को यह पुण्य का कार्य करते रहना चाहिये. मैं कामना करता हूं कि मेरा अगला जन्म भंगी के घर हो.” (मोहन दास के गांधी, डॉ अंबेडकर्स इंडिक्टमेंट. 1936 के हरिजन में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में.)

 

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जाति-व्यवस्था पर गांधी जी के विचार जानने के बाद से मेरी व्यक्तिगत समझ और विवेक मुझे गांधी जी को अहिंसक समझने की भी इजाजत नहीं देते. खैर, मैला ढोने वाले समाज का यह भयानक सच आपके रोंगटे खड़े कर सकता है कि इस समुदाय की औरतें हल्दी का इस्तेमाल बहुत कम करती हैं. पीली दाल, कढ़ी या किसी भी तरह का पीले रंग का खाना खा पाना उनके लिये बेहद मुश्किल होता है. (वजह तो आप समझ ही गये होंगे!)

 

 

इसी समुदाय पर फील्ड वर्क करने वाली वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह की किताब ‘अदृश्य भारत’ में गुजरात में सिर पर मैला ढोने वाली महिला जीतू बेन का भाषा सिंह से तल्ख संवाद सुनिये – “माथे मैला उठाकर देखो, तब बीमारी का पता चलेगा. जो मैला ढोएगा, वो ठीक रहेगा क्या? तुम्हारे लिये और बाकी समाज के लिये तो खोजने की बात यह भी है कि इतना गन्दा काम करने के बाद भी हम जिंदा कैसे रहते हैं? बच्चा कैसे जनते हैं, क्यों जनते हैं? कुछ समय पहले एक विलायती डॉक्टर ने यहां आकर बहुत आंसू बहाये और कहा कि यहां सबको नसबंदी करा लेनी चाहिये ताकि बच्चे न हों. समझी! बाहर की दुनिया को हम आवारा कुत्ते और सूअर नज़र आते हैं कि सबको पकड़ कर नसबंदी करा दो…..(एक गंदी सी गाली देकर थूक दिया जीतू बेन ने)” पृष्ठ 89-90.

 

सच्चाई तो ये है कि इस समुदाय को ठगने में कोई पीछे नहीं रहा है. कम्युनिस्ट, मजदूरों और दलितों के सबसे बड़े हितैषी बनते हैं; लेकिन पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के 29 साल के शासनकाल के बाद (2006 तक) भी वहां इंसान का मल इंसान के सिर पर ढोया जाता रहा.

 

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सोचने की बात है कि एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश में हाथ से मैला उठाकर जीवन गुजारने वालों की मौजूदगी सरकार की सहमति (मूक या अप्रत्यक्ष) के बिना कैसे सम्भव है? सच्चाई तो ये है कि सवर्ण हितों को प्राथमिकता देने वाली सरकारें जहां इस मुद्दे में कोई सीधा लाभ नहीं देख पा रही हैं, वहीं दलित हितों की रक्षक और हितैषी बनने वाली सरकारें इस कुप्रथा को बनाए रखने में अपने राजनीतिक लाभ देखती हैं. सिर पर मैला ढोने वालों की समाज में मौजूदगी दलित हितों की राजनीति करने वाली पार्टियों का एक बड़ा मुद्दा है जिसको ये खोना नहीं चाहतीं. और इसके लिये समाज में मैला ढोने वालों का बना रहना बहुत जरूरी है.

 

 

चाहे अन्य दलित स्वयं इन मैला ढोने वालों को अछूत समझते हों, और इन्हें अपने से निम्न श्रेणी में घोषित कर खुद की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाते हों. और चाहे इनके हिस्से के आरक्षण पर भी हाथ साफ कर जाते हों, लेकिन जरूरत पड़ने पर खुद को इनके साथ गिने जाने पर कोई संकोच नहीं करते.

 

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हर बार जब कोई मजबूर दलित गटर और सीवर की सफाई के दौरान मारा जाता है, तो इन्हीं दलित हितैषी राजनीतिक पार्टियों को ही इसका सीधा फायदा मिलता है. अन्यथा क्या कारण है कि प्रतीकों और स्मारकों पर सैकड़ों करोड़ खर्च कर देने वाली सरकारें सीवर सफाई के लिये आधुनिक मशीनें नहीं मंगवातीं. आज भी सीवेज सफाई के उपकरणों के नाम पर रस्सा और बाल्टी खरीदती हैं?

 

 

मैं पूछूंगा कि दलित आन्दोलनों ने अपने ही भीतर के इस तबके की पीड़ा को कभी अपना मुख्य मुद्दा क्यों नहीं बनाया?

 

 

दरअसल सफाई कामगार समुदाय अपनी ही जाति में अलग-थलग, शोषित और ठगे गये हैं. ये पूरे देश में अलग-अलग नामों से बिखरे हुए असंगठित समूह हैं. न ही इनका अपना कोई प्रेशर ग्रुप है, न ही ये कोई संगठित वोट बैंक हैं. प्राय: इनका एकमुश्त वोट वहीं जाता है जहां इनका सर्वाधिक शोषण करने और हक़ मारने वाले ऊंचे दलित तय करते हैं. और इस तरह ये महादलित शोषण के दुश्चक्र में फंसे रह जाते हैं.

 

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