September 19, 2021

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

अमेरिकन गोबर , मानसिक गुलामी का परिणाम

कहानी पढ़िए और फिर आत्म मनन कीजिए, कार्य में परिणित….?

अमेरिकन गोबर के पैकेट:-

अमेरिकन गोबर दो रुपये, अमेरिकन गोबर दो रुपये की आवाज़ सुनकर कर्नाट प्लेस की भीड़ ऊधर ही दौड़ पड़ी.
यह आवाज़ पैकेटों से लदे हुए ट्रक से आ रही थी.
ट्रक पर चार सजे-धजे सेल्समैन कुछ पैकेट लिए खड़े थे, और यह आवाज़ उस पर बज रहे टेप प्लेयर से आ रही थी. उन चार कर्मचारियों ने पैकेट फाड़कर, सुंदर सजीली माचिस के आकर की डिब्बियां हाथ में ले ली थी.
अमेरिकन गोबर के नाम पर भीड़ उन डिब्बियों को खरीदने के लिए टूट पड़ी थी. आनन फानन में ही ट्रक खाली हो गया.

 

लोग डिब्बियां खरीदते हुए कह रहे थे, `आजकल दो रुपये में आता ही क्या है, चलो दो रुपये में अमेरिकन गोबर ही देखलें.’
ट्रक पर डिब्बी बेच रहे सेल्समैनों का व्यवहार, और बोलचाल इतनी शालीन थी कि हर कोई उनकी तारीफ कर रहा था. इन डिब्बियों के बिकने से आठ लाख से भी ज्यादा
रुपये इकट्ठे हो गये थे.

 
साथ ही खड़े बरगद के पेड़ के पास छिपे खड़े नेता जी, और वह पच्चीस साल का युवा यह सब देख रहे थे. नेता जी युवा के कायल हो गये थे, उसने जो कहा था करके दिखला दिया
था. नेता जी की आँखों के सामने अतीत तैरने लगा:
नेता जी पुद्दूलाल संसद से निकलकर अपने घर की ओर जा रहे थे. कर्नाट प्लेस के भीड़ भरे इलाक़े में पटरी पर जुटी भारी भीड़ को देखकर उन्होंने ड्राइवर से गाड़ी रोकने को
कहा. ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी. नेता जी गाड़ी से उतारकर उस मजमें की ओर बढ़ गये.

 
एक पच्चीस साल के लगभग की आयु का, सुंदर सजीला युवक उस मजमे को लगाए था. युवक के बोलने में इतना माधुर था कि जिसके कान में भी उसकी आवाज़ पड़ जाती, वह उस ओर खींचा चला जाता था. युवक बाजिगरी दिखा रहा था.
खेल ख़त्म हुआ. खेल देखने वाले दर्शकों ने अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उस बाज़ीगर युवक को पैसे दिए. युवक पैसे बटोर रहा था. सफेद खद्दरधारी नेता जी उसके पास जा पहुँचे.
युवक के कंधे पर प्यार भरा हाथ रखकर बोले, `बड़ी भीड़ जुटा रखी थी?’

 
युवक ने उस ओर ध्यान दिया. उसे समझते देर न लगी कि वह व्यक्ति कोई बड़ा नेता है. युवक ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, `मान्यवर, यह क्या है, अगर मौका मिल
जाए तो गोबर को सोने के भाव बेच दूं. लेकिन भाग्य फूटा हो तो कोई क्या करे?’
युवक का कॉन्फिडेन्स और भाव भंगिमा देखकर नेता जी के चेहरे पर चमक आ गयी थी. वे युवक से बोले, `ऐसा है?’
`जी महोदय, ऐसा ही है.’
`तो अपना सामान बटोरो और मेरे साथ चलो.’
`कहाँ?’
`मेरे घर.’
`किस लिए?’
`गोबर को सोने के भाव बेचने वाली, मैं तुम्हारी कूव्वत परखूंगा,’
`क्यों?’
`अगर तुम अपनी बात के खरे निकले तो फिर मैं तुम्हारा भाग्य बदल दूँगा. आज से तुम्हारा सारा जिम्मा मेरा है.’
युवक ने अपना बाजिगरी का सारा सामान बटोरा, नेता जी की डिग्गी में डाल दिया, और उनके साथ चलने के लिए आगे बैठने लगा. नेता जी ने उसे पकड़कर अपने साथ पीछे बैठाते हुए कहा, `नहीं वहाँ नही, तुम्हारा स्थान मेरे साथ है. तुम मेरे साथ बैठोगे.’

 
नेता जी युवक को लेकर अपने घर पहुँचे. अपने साथ डाईनिंग टेबल पर बैठाकर तबियत से भोजन कराया. युवक ने ऐसा भोजन, और वह भी पेटभर, जीवन में पहली बार खाया था.
उसने सपने में भी न सोचा था कि जीवन में ऐसा भोजन,एक महल में डाईनिंग टेबल पर बैठकर, और वह भी पेटभर मिलेगा.
भोजन करने के बाद युवक के चेहरे पर तृप्ति के भाव थे.
नेता जी हर पल युवक की भाव भंगिमा देख रहे थे. नेता जी ने कहा, `थके हो, थोड़ी देर आराम करो, फिर बात करेंगे.’
`सर, ग़रीब, अभाव ग्रस्त को थकान नहीं होती है. जिसे थकान होती है वह ग़रीब नहीं होता है.’
`फिर भी कुछ देर आराम करो?’

 
घंटा दो घंटा आराम से लेटने के बाद युवक जाग बैठा था.
नेता जी उसके कक्ष में आए और उसे जगा हुआ देखकर बोले,
`अरे तुम तो पहले ही जगे बैठे हो.’
`जी, मुझे नींद ही कब आई?’
`अब यह बतलाओ कि तुम गोबर को सोने के भाव कैसे बेचोगे?’
`सर, इसमें बतलाने की कोई ज़रूरत नहीं है, जैसा मैं कहूँ करते जाओ, और उसे देखते जाओ. स्वयम् ही अपनी आँखों से देखोगे कि मैं यह सब कैसे करता हूँ?’
नेता जी ने युवक की बात पर सहमति की मुंडी हिलाई. उसे आराम से ठहरने के लिए एक कक्ष दे दिया गया, और खाने पीने का उचित प्रबंध कर दिया गया.

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युवक ने एक 100 मीटर के प्लॉट में अपनी योजना को आकार देना प्रारंभ कर दिया. करीब एक ट्रक गोबर मंगाया गया. गोबर को पाँच ढ़ेरियों में बाँट दिया. इन पाँच ढ़ेरों में अलग-अलग लाल, नीला, हरा, गुलाबी और पीला रंग मिला दिया गया. पाँचों ढ़ेरियों में पाँच तरह की बेहतरीन खुशबू मिला दी गयी. इन पाँच प्रकार के रंगीन, खुशबुदार गोबर को पाँच तरह की माचिस के आकार की सुंदर, रंगीन पेपर की सजीली डिब्बियों में, करीने से एयर टाइट पैक कर दिया गया, और इन डिब्बियों के बारह-बारह दर्जन के पैकेट बना दिए गये.
शालीन और मधुर आवाज़ में एक टेप तैयार कराई गयी,`अमेरिकन गोबर दो रुपया, अमेरिकन गोबर दो रुपया…………’ चार सलीके के, सजीले सेल्स मैंन अपायंट किए गये, और उन्हें उस युवक ने खुद व्यवहारिक ट्रैनिंग दी.

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नियत तिथि को, कर्नाट प्लेस पर, नियत की गई जगह पर,ट्रक भरकर अमेरिकन गोबर की डिब्बीयों बेचने के लिए भेज दी गयी थी.
यह सब तमाशा देखकर नेता जी विस्मित थे. उन्होंने ऐसा कर्मठ, और बात का धनी युवा अभी तक न देखा था. गोबर बिकने से इकट्ठा हुआ आठ लाख से ऊपर रुपया लेकर वे नेता
जी के घर आ गये. नेता ने पूछा, `बेटा तुम्हारा नाम क्या है?’
`सर, जो भी आप पुकारे वही मेरा नाम है.’
`क्या मतलब?’
`कभी माँ नहीं देखी, बाप नहीं देखा. फुटपाथ पर बचपन बीता है, और अनाथ आश्रम में शिक्षा दीक्षा हुई है. कौन नाम रखता मेरा?’
यह सुनकर नेता जी आँखें सजल थी. बोले, `न-न, ऐसा न कह?’
`सच तो यही है, कहूं कि न कहूं. कोई कालिया कह देता है, कोई लम्बू.’
`तेरे जैसे गोरे यूवक को कालिया?’

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`सर, कालिया रंग से नहीं तकदीर से पुकारा जाता है. काली तकदीर लेकर पैदा हुआ हो, सो कालिया ही तो हुआ?’
`नहीं कतई नहीं?’
`आप बड़े हैं, कहते हैं सो मान लेता हूँ.’
`कहाँ तक पढ़े हो, और स्कूल में क्या नाम लिखा था?
`दसवीं तक शिक्षा पाई है, और स्कूल का नाम दलबीर है.’
`तुम्हें सोने के भाव गोबर बेचने का विचार कैसे आया?’
`इस देश के लोगों की मानसिकता देखकर.’
`कैसे?’
`जिस देश में मानसिक गुलाम जनमानस रहता हो, वहाँ इस तरह के कारनामें करना सहज है.’
`बड़े बुद्धिमान हो.’
`सर, बुद्धिमान काहे का, गलियों में,फुटपाथ पर धक्के खाते-खाते यह सब देखा और गुना है.’
`तुम तो हमारे बड़े ही काम के हो, हमारी पार्टी में शामिल होवोगे?’
और इस पर दलबीर ने अपनी सहमति की मुंडी हिला दी.
विशेष: चित्र, कहानी को रोचक बनाने के लिए हैं, इन्हें अन्यथा न लें.

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कहानी क्रमश:—–उक्त व्यंग यथार्थ पर आधारित है, यूं तो घटनाएं अनेक है, जातियों की गुलामी, धर्मों की गुलामी आदि.


मानसिक गुलामी को बनाए रखने वाले तंत्र के रूप में अंग्रेजी

1. एक भाषा के रूप में अंग्रेजी सीखने में अपने-आप में कोई बुराई नहीं है, पर व्यवस्था के रूप में अंग्रेजी देश के 95% लोगों को मुख्यधारा से काटे रखने का ही काम करती है। व्यवस्था के रूप में अंग्रेजी का यह वर्चस्व ही है जिसने लोगों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की तरफ भागने को विवश किया है। लोगों का अंग्रेजी-प्रेम पतंगे और शमां का प्रेम है। शमां के प्रेम में अंधा पतंगा नहीं जानता कि शमां उसे जला देगी। प्रेम में अंधा पतंगा शमां पर लपकता है और जल जाता है। इसी प्रकार लोग भी अंग्रेजी के मोह में अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की तरफ भागते हैं और भूल जाते हैं कि अंग्रेजी के वर्चस्व वाली शिक्षा उन्हें कभी आगे बढ़ने नहीं देगी। परिणाम भी अपेक्षित ही निकलता है। देश के ग़रीब वर्ग (90%) के 99.99% लोग बीच रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। जो .01% यदि गलती से कामयाब हो जाते हैं वे शेष 99.9% के आदर्श के रूप में स्थापित हो जाते हैं। इस प्रकार देश की 3% अमीर , एलिट आबादी की सत्ता सुरक्षित रहती है।


2. जी हाँ ! इंग्लिश मीडियम केवल स्कूल ही नहीं होते, इंग्लिश मीडियम अदालतें भी होती हैं। इंग्लिश मीडियम संसद के कानून भी होते हैं, सम्पूर्ण नौकरशाही का ढाँचा इंग्लिश मीडियम ही है। स्कूल तो बेचारे इसलिए इंग्लिश मीडियम खुलते हैं क्योंकि हमारे देश और समान के ये सभी संस्थान इंग्लिश मीडियम हैं। इन सबको पालने-पोसने का काम इंग्लिश मीडियम विश्वविद्यालय, युपीएससी, डीएसएसएसबी, एसएससी आदि करते हैं। यही अल्प तंत्र ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ है। यह ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ ही शोषण और गैर-बराबरी के ‘अल्पतांत्रिक-पंगु-पूँजीवादी’ किले को बनाए रखने वाली ‘अंग्रेजीदा साँस्कृतिक दीवार’ को पुख्ता करने का काम करता है। सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रख कर, यह सिस्टम उस किले के चारों तरफ़ भ्रष्टाचार की सड़ांध वाली दलदली जमीन निर्मित करता है।


3. इस ‘इंग्लिश मीडियम तंत्र’ को नेस्तनाबूद किए बिना न तो भ्रष्टाचार की गंदगी दूर की जा सकती है और न ही सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी को बनाए रखने वाले किले की दीवार को ही ढहाया जा सकता है। आम जनता की समझ से परे की भाषा का अल्पतंत्र ही आम जनता को भ्रम और असमंजस की स्थिति में रखता है।


4. संवैधानिक संस्था यूपीएससी, डीएएसएसएसबी, राज्‍यों की पीसीएस एवं गैर संवैधानिक संस्था यूजीसी, आईआईटी,आईआईएम (UPSC, DSSSB, State’s PCS, UGC, IIT, IIM) आदि ‘बैरिकेटर एजेंसी’ भर हैं, जो इस सिस्टम को बनाए रखने का काम करती हैं। इनके द्वारा आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता इसलिए रखी जाती है कि उस अंग्रेजी के सहारे ग्रामीण कस्बाई गैर-अंगेजीदा-एलिट पृष्ठभूमि के अभ्यार्थियों को सत्ता के गलियारे से दूर रखा जा सके और राजसत्ता के स्वरूप को अंग्रेजीदा वर्ग के अनुरूप बनाए रखा जाए। सरकार‘ऑपरेटिंग एजेंसी’ के रूप राजसत्ता के स्वरूप की रक्षा करते हुए, उसे चलाने भर का काम करती है । शायद इसी कारण सत्ता में आते ही राजनेताओं के सुर-ताल बदल जाते है ।


5. वर्तमान में सिविल सेवा चयन हेतू आयोजित की जाने वाली परीक्षा में 2011 से सी-सैट (CSAT) लागू कर प्रारंभिक परीक्षा के स्वरूप में जो परिवर्तन किया गया है वह भी इसी कड़ी का हिस्सा है। ऐसा नही है कि यू.पी.एस.सी. के द्वारा 2011 से पहले ली जाने वाली परीक्षा भेद-भाव से मुक्त थी। यदि हम 2011 से पूर्व के ग्राफ को भी देखें तो पाते हैं कि प्रारंभिक परीक्षा में बेशक हिन्दी समेत अन्य भाषा माध्यमों से औसतन 45% प्रतिशत अभ्यार्थीं पास होते होते थे, पर साक्षात्कार के बाद का आँकड़ा 10-12 % तक का ही रह जाता था। समस्त भारतीय भाषा माध्यमों से भारतीय सिविल सेवा में चयनित होने वाले उम्मीदवारों की संख्या शायद ही कभी 20 % के आकड़े को पार कर पायी हो। अतः इस परीक्षा के पुराने पैटर्न में भी अंग्रेजीदां वर्ग का ही दबदबा बना हुआ था। यूपीएससी (UPSC) की शेष परीक्षाओं में से अधिकतर अंग्रेजी में ही संपन्न होती हैं। चाहे वह भारतीय आर्थिक सेवा परीक्षा हो या भारतीय वन सेवा परीक्षा, सभी परीक्षाओं में अंग्रेजीदां वर्ग का दबदबा बना हुआ है। (स्रोत्र – यूपीएससी (UPSC) रिपोर्ट)


6. NDAऔर CDS की परीक्षा में बेशक ग्रामीण पृष्टभूमि के उम्मिदवारों की संख्या अधिक हो, पर अंततः चयनित होने वाले अभ्यार्थी, शहरी उच्च मध्यम वर्गी पृष्टभूमि के ही होते है । उसमें से भी अधिकतर वे उम्मीदवार होते है, जिनकी पारिवारिक पृष्टभूमि आर्मी के अफसर की होती है । आर्मी में तो भारत और इंडिया का विभाजन साफ दिखता है । जहाँ नीचले क्रम के सैनिक देहाती परिवेश के होते है, वही लगभग सभी अफसर अंग्रेजीदा पृष्टभूमि के ही होते है । ..और अफसरों की ‘एंट्री’ कहा से होती है ? ? इन सब उदाहरणों के आधार पर हम कह सकते है कि UPSC अंततः इंग्लिश के वर्चस्व वाले सिस्टम को ही बनाए रखने का काम करती है ।


7. ऊपर दिए गए उदाहरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि यूपीएससी (UPSC) अंततः इंग्लिश के वर्चस्व वाले सिस्टम को ही बनाए रखने का काम करती है। इसी प्रकार जब हम आईआईटी, आईआईएम, एआईआईएमएस (IIT, IIM, AIIMS)जैसी संस्थाओं की बात करें तो पहला सवाल यही उठता है कि इन संस्थाओं में अंग्रेजीदां शहरी पृष्ठभूमि के लोग ही क्यों चयनित हो पाते हैं? क्या ग्रामीण या भारतीय भाषाई पृष्ठभूमि के लोगों में कोई भी तकनीकी या वैज्ञानिक योग्यता नहीं होती?? सच्‍चाई तो यह है कि अनुभवजन्य तकनीकी एवं जैविक ज्ञान में ग्रामीण एवं वनवासी लोग ज्यादा दक्ष होते हैं। पर, जब अकादमिक की बात आती है तो किताबी तोते ही बाजी मार जाते हैं।


8. यदि इन संस्थाओं में गलती से भी ग्रामीण या भारतीय भाषाई पृष्ठभूमि का विद्यार्थी पहुँच भी जाए तो उसके पास ‘बैक-बैंचर’ (जो महज खानपूर्ति करने भर के लिए क्लास में बैठते हैं) बनने के आलावा कुछ भी शेष नहीं रहता। अंग्रेजीदां शिक्षक उन्‍हें ऐसे देखते हैं मानों वे जंगली और असभ्‍य हों। दिल्ली स्थित एम्‍स (AIIMS) के विद्यार्थी अनिल मीणा तथा तमिलनाडु स्थित अन्ना विश्वविद्यालय की इंजिनरिंग छात्रा एस. धार्या लक्ष्मी का उदाहरण इसका ज्वलंत उदाहरण है । ये मामले स्पष्ट करता है कि किस प्रकार अंग्रेजीदां व्यवस्था ने ग्रामीण प्रतिभाशाली छात्रों को आत्महत्या करने हेतु विवश किया था । पर यह अकेला मामला नहीं है। अंग्रेजी माध्यम वाली व्यवस्था की वजह से जितनी आत्महत्याएँ उत्तर भारत में हुईं, उससे कम दक्षिण में नहीं हुईं। हमने जब इंटरनेट खंगालने का प्रयास किया तो अंग्रेजी वर्चस्व की वजह से आत्महत्या के मामले सबसे ज्यादा तमिलनाडु से ही मिले । वह राज्य जिनके तथाकथित राज नेताओं को अंग्रेजी का प्रवक्ता माना जाता है।


9. अंग्रेजी के वर्चस्व वाली व्यवस्था में न तो मौलिक ज्ञान संभव है न ही रचनात्मक चिंतन।(‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’, दैट इज़ ‘अंग्रेजी राज’ में स्पष्ट) अतः अंग्रेजीदा वर्ग के वर्चस्व के खिलाफ़ भारतीय जन-भाषाओं के अधिकार की लड़ाई अखिल भारतीय स्तर पर लड़े जाने की जरूरत है। इसमें तमिल, तेलगू , गुजराती,बंगला, संथाली आदि सभी भारतीय भाषा-भाषियों को ‘एक मंच’ / ‘एक प्लेटफार्म’ पर लाने की भी जरूरत है।


10. यूरोपीय यूनियन में जब 24 भाषाओं में काम चल सकता है तो भारत के सरकारी कार्यालयों, बैंकों, निगमों आदि को भारत की 22 भाषाओं में काम करने में क्या समस्या आएगी? यूरोप का छोटे-से-छोटा देश भी अपनी भाषा में शासन एवं शिक्षा तंत्र को चला सकता है तो भारत क्‍यों नहीं। उदाहरण के तौर पर, बैलज़ियम जैसा छोटे से देश की शासन और शिक्षा व्यवस्था अपनी दो भाषाओं में आसानी से चलती है तो भारत का शासनतंत्र और शिक्षा व्यवस्था भारत की समस्त भाषाओं में क्यो नहीं चल सकती? पूर्व सोवियत संघ में 52 भाषाओं को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था । उन सभी भाषाओं में कामकाज भी होता था। आज सोवियत संघ से अलग हुआ प्रत्‍येक देश अपनी भाषा में ही काम-काज और शिक्षा व्यवस्था का संचालन करता है। तो भारत में राजभाषा का दर्जा सभी 22 भाषाओं को क्‍यों नहीं दिया जा सकता?


11. सच्चाई तो यह है कि स्‍वतंत्रता के बाद से ही, भारतीय भाषा-भाषी लोगों को ही आपस मे लड़ाया जा रहा है । कहने के लिए अनुच्छेद 351 में संघ के द्वारा हिन्दी के प्रसार की बात कही है । पर पिछवाड़े के चोर दरवाजे से संविधान के अनुच्छेद 348, 343(2) और 348 का अनुच्छेद 120, 210 पर जो प्रभाव है वह अंततः अंग्रेजी का ही वर्चस्व स्थापित करता है। कहने को संविधान का अनुच्छेद 350 (ख) भाषाई अल्पसंख्यकों की रक्षा की बात करता है पर यहाँ तो अंग्रेजीदा-एलिट वर्ग की भाषा भारत की सभी भाषाओं को लील रही है । संविधान का अनुच्छेद 350(A) राज्य को निर्देश देता है कि राज्य प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था करे । पर जैसा कि ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’, दैट इज़ ‘अंग्रेजी राज’ की केस स्टडी स्पष्ट करती है कि लोग उस माध्यम में बच्चों को पढ़ाना चाहते है, जो राजकाज और उच्चशिक्षा की भाषा होती है । माननीय सुप्रीमकोर्ट ने भी पिछले दिनों English Medium Students Parents … vs State Of Karnataka on8 December, 1993, 1994 AIR1702, 1994 SCC (1) 550 इस बात को और पुख़्ता करता है । संविधान संसद और विधानसभाओं में हमारे जनप्रतिनिधियों को अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में बोलने एवं विचार रखने की छुट देता है । पर संविधान का अनुच्छेद 348 ही वास्तव में संसद और विधानसभाओं के काम काज की भाषा को निर्धारित करती है । अनुच्छेद 348 (न्‍यायालयों की भाषा अंग्रेजी रखे जाने संबंधी) ही हमारी अंग्रेजीदां व्यवस्था की वास्‍तविक सच्चाई है । इसी के आधार पर किसी भी विवाद की स्थिति में अंग्रेजी में लिखी गयी बात ही अंतिम सत्य होती है। अनुच्छेद 348 के आधार पर ही तमाम परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों पर लिखा होता है कि किसी भी विवाद की स्थिती में अंग्रेजी में लिखी गयी बात ही सत्य होगी। परिणाम यह निकलता है कि मूल काम अंग्रेजी मे होगा, फि़र उसका अनुवाद भारतीय भाषाओं में होगा। संसद और विधानसभाओं द्वारा कानून भी मूल रूप से अंग्रेजी में में पास होता है । भारतीय भाषाओं में तो अनुवाद भर होता है । यदि भारतीय संसद या विधान सभा मूल कानून को भारतीय भाषाओं में पास करे तो भी उसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए अंग्रेजी वर्जन तैयार करेगा । संविधान के अनुच्छेद 348 की वजह से, माननीय सर्वोच्च न्यायालय की नज़र में, वह अंग्रेजी वर्जन ही अंतिम सत्य है । इस प्रकार भारत की भाषाओं की उपयोगिता इस व्यवस्था में सजावट के फूलों भर की रह जाती है, जिनके काँटों का प्रयोग एक दूसरे को तोड़ने के लिए किया जाता है।


12. हिन्दी को राज भाषा बनाने वाली संविधान की धारा 343(1) एक तरफ तो हिन्दी बैल्ट माने जाने वाले क्षेत्र के लोगों में तत्सम प्रधान तथाकथित हिन्दी के राष्ट्र भाषा होने का भ्रम पैदा करती है और दूसरी तरफ गैर-हिन्दी-भाषी माने जाने वाले क्षेत्रों में हिन्दी-भाषी लोगों के वर्चस्व का भय जगाती है। फलस्वरूप ‘तथाकथित हिन्दी-भाषी’ और‘तथाकथित गैर हिन्दी-भाषी’ एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। इस प्रकार 343(1) की आड़ में ही अनुच्छेद 343(2),348, और 147 ही नहीं 343 से लेकर 351 के सभी अनुच्छेद अंततः इंग्लिश के वर्चस्व को ही कायम रखते हैं। हम भारत के लोगों के सामने अनुच्छेद 350, 350A, 350B और 351 के माध्‍यम से भारतीय भाषाओं के संरक्षण की वकालत की गयी है, संविधान की ये धाराएं संविधान के सजावटी दांत भर है । अनुच्छेद 351 ने तो अनुवाद की हिन्दी को ही पैदा किया है । हकीकत में अनुच्छेद 348 343(2), 344 अंग्रेजी के वर्चस्व को ही बनाये रखते है । अंग्रेजी का वर्चस्व विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित कर, अवसर को अंग्रेजी-भाषी तबके तक सीमित रख, भारत के लोगों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय से वंचित रखता है।


13. अतः देश के भारतीय भाषा भाषी लोगों की आपसी बंधुता को खत्‍म करने का महान काम अनुच्छेद 343(1) ही करता है।


14. लेटिन अमेरिका, यूरोप-युरेशिया, को जब अंग्रेजी का मोह नहीं है, तो भारत को इस तथाकथित अंतरराष्ट्रीय भाषा (अंग्रेजी) का का मोह इतना क्यों बाँधे हुए है ? आज हमारे देश में अंग्रेजीदां वर्ग द्वारा यह भ्रम भी एक षडयंत्र के तहत फैलाया जाता है कि अंग्रेजी अंतररा‍ष्‍ट्रीय भाषा है, इस कारण इंग्लिश मीडियम जरूरी है। यह मात्र एक भ्रामक तथ्‍य है। अंग्रेजी तो केवल उन्‍हीं मुल्‍कों के लिए तथा‍कथित रूप से अंतरराष्‍ट्रीय भाषा बना कर रखी गई है, जो कभी अंग्रेजों के गुलाम थे, हमारा देश भी इनमें शामिल है और इन गुलाम देशों के अलावा, और किसी-भी देश में अंग्रेजी को एकमात्र अंतरराष्‍ट्रीय भाषा नहीं माना जाता। बाकी देश जैसे- चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि देशों में यह भ्रम नहीं है, वे संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की पांचों भाषाओं को अंतरराष्‍ट्रीय भाषा मानते हैं, केवल अंग्रेजी को नहीं। और इसी आधार पर इन सभी सार्वभौम देशों में उनकी शिक्षा-व्‍यवस्‍था और राजतंत्र उनकी अपनी भाषाओं में चलता है। आज समय आ गया है कि हम इस मानसिक गुलामी संबंधी तथ्य को समझ लें।


15. लोकतंत्र में शासन में जनता की सहभागिता तभी आ सकती है जब शासन व्यवस्था जन-भाषाओं में हो। यूरोप में लोकतंत्र के विकास के साथ वहाँ की जनभाषाएं शासन प्रशासन और शिक्षा का हिस्सा बनीं। भारत में कहने के लिए लोकतंत्र है। पर ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ की वजह से शासन प्रशासन के स्तर पर क्या घोल-मेल होता है यह जनता के समझ के बाहर है। जनता न तो मूलतः अंग्रेजी में लिखे कानून को समझ पाती है और न ही उसके आधार पर चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया को और न ही उसके कलिष्ट हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में अनुवाद को ही।


16. राज-व्यवस्था और जन-सधारण में अन्तर को बनाये रखने के लिए ही ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ को हमने आज तक संभाल कर रखा हुआ है। यह सिस्टम ही सत्ता को चंद हाथों तक समेटे रख भ्रष्टाचार की संस्कृति को पैदा करता है। 90% आबादी को सत्ता और अधिकारों से दूर रख गैर-बराबरी को कायम रखता है, शोषण को स्थायित्व प्रदान करता है। यह इंग्लिश प्रधान व्यवस्था ही है जो इस देश को भारत और इंडिया में विभाजित करता है। 1947 के सत्ता हस्तांतरण के बाद जो आजादी मिली वह इंडिया के हिस्से में आयी। भारत तो आज भी इंडिया का उपनिवेश है। इंडिया ही उस वक्त शिक्षा शासन-प्रशासन और सत्ता के तमाम केन्द्रों पर काबिज़ था। उसकी सुविधा की भाषा ही अंग्रेजी थी। यहाँ तक कि मूल संविधान भी अंग्रेजी में ही बना था। भारतीय भाषा में तो उसका अनुवाद ही हुआ था। अंग्रेजीदां वर्ग की सुविधा के लिए ही 15 वर्ष तक अंग्रेजी को बनाए रखने का सांवैधानिक मार्ग रचा गया। ये 15 वर्षों की अवधि हमेशा आगे ही बढ़ाई जाती रही और आज भी सब जगह अंग्रेजी का ही राज चल रहा है।
17. सच्चाई तो यह है कि 1947 के बाद भारतीय भाषाओं के प्रसार के लिए कोई ईमानदार और गंभीर प्रयास ही नहीं किया ही नहीं गया । स्वतंत्रता प्राप्ति‍ के बाद भी यूपीएससी (UPSC) द्वारा आयोजित की जाने वाली समस्त परीक्षा अंग्रेजी में ही ली जाती रही है। भारतीय सिविल सेवा (आई.सी.एस.) की परीक्षा के लिए भी भारतीय भाषाओं के दरवाजे 1979 में ही खोले गये। वह भी अंग्रेजी की अनिवार्यता और वर्चस्व के साथ। युपीएससी के द्वारा ली जाने वाली तमाम दूसरी परीक्षाएं अब भी अंग्रेजी में ही ली जा रही है । माननीय सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के जज तो अनिवार्य रूप से अंग्रेजीदां वर्ग से ही होगे । 1947 से पूर्व हम राजनैतिक रूप से गुलाम थे पर मानसिक रूप से आजाद थे। आज स्थिति‍ उसके ठीक उलट है। अंग्रेजीदा वर्ग ने हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाया है । आज भारत(90%लोग) अंग्रेजीदां-एलिट-इंडिया(3%) के गुलाम है ।शेष 7%गुलामी के तंत्र को बनाए रखने में इस्तेमाल किए जाते है ।
18. प्रो. प्रोमेश आचार्य का अध्ययन भी यह कहता है भारतीयों का अंग्रेजी के प्रति मोह आजादी के बाद के वर्षों में बढ़ा है। आज देश का अधिकांश युवा अपने आप को ‘विटामिन-ई’(इंगिलिश) की कमी ‘डेफिशियेंसी’ की वजह से कमजोर मानने लगा है। युवाओं में कमजोरी का यह भ्रम एक षड़यंत्र के जरिए स्‍थापित किया जाता रहा है, जो कि ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ की ही देन है। किसी भी परीक्षा या शिक्षण संस्थान में अंग्रेजी की अनिवार्यता ग्रामिण, वनवासी, कस्बई, गैर-अंग्रेजीदा शहरी लोगों को 20% से 100% तक पीछे धकेलती है । साथ ही मानसिक रूप से हीन भावना से ग्रसित करती है ।( प्रयोग के आधार पर प्रमाणित बात ।)
19. अतः भारत को मानसिक गुलामी की गैर-बराबरी, शोषण और भ्रष्टाचार को बनाए रखने वाली व्यवस्था से मुक्ति के लिए भारत की भाषाओं को एक मंच, एक प्लेटफार्म पर आने की जरूरत है। अंग्रेजीदां वर्ग ने संविधान के कुछ अनुच्‍छेदों की आड़ में भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ा कर अंग्रेजी के माध्यम से राज-काज को अंग्रेजीदां वर्ग तक ही समेटे रखने की चाल चली है। अभी तक एक तरफ हिन्दी को राजभाषा बनाने और उसका प्रसार करने की मात्र खानापूर्ति की जाती रही है, दूसरी तरफ़ हिंदी सहित अन्‍य सभी भारतीय भाषा-भाषी वर्गों को अंग्रेजी के मुकाबले दोयम दर्जे पर ला कर खड़ा कर दिया गया है।
20. कार्टूनिस्ट आर. के. लक्ष्मण के कार्टून(साथ संलगन) भी इस बात को स्‍पष्‍ट करते हैं कि अंग्रेजीदां वर्ग ने ही हिन्दुस्तानी भाषियों को आपस में लड़वाया। अंग्रेजी के माध्यम से अंग्रेजी परस्त एलिट तबके ने सत्ता (नौकरशाही, न्याय, ज्ञान, पूँजी) को अपने तक ही सीमित रखा। इसी का परिणाम है कि विश्व ज्ञान क्रम में भारत पिछड़ता रहा है।(देखे पुस्तक) आज हमारे देश के सभी स्कूल तोते तैयार करने की फैक्ट्रियों में तब्दील हो चुके हैं। मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग का कोई भी अभिभावक खुशी से अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिल नहीं करवाता है। यह तो सिस्टम के साथ‘एडजस्ट’ होकर चलने की मजबूरी है, जो उसे ऐसा करने को बाध्य करती है।

21. इस संबंध में, माननीय सुप्रीमकोर्ट ने पिछले दिनों अंग्रेजी माध्‍यम छात्र अभिभावक बनाम कर्नाटक राज्‍य (English Medium Students Parents vs State Of Karnataka on 8 December, 1993, 1994 AIR1702, 1994 SCC (1) 550) वाद पर दिया गया निर्णय भी विचारणीय है।( इस फैसले के खिलाफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय में PIL ‘व्यवस्था बोझ बच्चों के सर’ साथ संलग्न है। उसकी एक कॉपी पहले भी भेज चुका हूँ ।) अभिभावक भी जानता है कि उसका बच्चा उसी बोली में सहज है जो उसके परिवेश में बोली जाती है, पर उसके बावजूद वह सिस्टम के दबाव में इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेड-बकरियों की तरह अपने बच्चे को ठूँसता जाता है। यह इंग्लिश मीडियम सिस्टम का दबाव है, जिसकी वज़ह से अभिभावक इंग्लिश मीडियम स्कूलों को चुन रहा है। अभिभावकों द्वारा मजबूरी में लिए गये निर्णय को उनका मौलिक अधिकार नहीं कहा जा सकता है। जब तक यू.पी.एस.सी. और इस जैसी तमाम संस्थाएं अंग्रेजी भाषा/माध्यम विभिन्‍न पदों पर चयन का पैरामीटर/मानदंड बनाती रहेंगी, तब तक संविधान की धारा 350A एक प्रभावहीन अपैंडिक्स मात्र ही बना रहेगा।

22. इंग्लिश मीडियम सिस्टम का प्रभाव ही है कि इंग्लिश बोल पाने की योग्यता को ही लोगों ने भ्रमवश ज्ञान और व्‍यक्तित्‍व–निर्माण समझ लिया है। बच्चे ही नहीं व्यस्कों की मौलिक समझ भी अपनी मातृभाषा (परिवेश की भाषा-बोली) में ही प्रस्‍फुटित होती है। पर यह सिस्टम का ही दबाव है कि लोग अंग्रेजी में रटी-रटाई बात को उगलने को ही ज्ञान समझ बैठते हैं। अतः इंग्लिश मीडियम सिस्टम को बनाए ऱखने में संविधान की धारा 348, 343(1) &(2), 147 और धारा 348 का धारा 210 और 120 पर प्रभाव की अहम भूमिका है। अंग्रेजी माध्यम व्यवस्था रूपी रावण की नाभि अनुच्छेद 348 और 147 छुपी है। अतः इन धाराओं को तत्‍काल प्रभाव से बदलने की जरूरत है। यू.पी.एस.सी., डी.एस.एस.एस.बी., एम्स, आई.आई.टी. विश्वविद्यालय, जैसी संस्थाएं तो आम जनता के विरुद्ध ‘बैरिकेटिंग एजेंसी’ का काम कर रही हैं। इनका स्वरूप भी तब बदलेगा जब सत्ता का स्वरूप बदलेगा।


23. बच्चे की मातृभाषा बच्चे के परिवेश पर निर्भर करती है न कि उसके मजहब़, माता-पिता-वंश आदि पर। बच्चा ही नहीं, बड़ा व्यक्ति भी अपने परिवेश की बोली को बड़ी सहजता के साथ अपना लेता है (देखे- ‘इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ दैट इज‘अंग्रेजी राज’ के अध्याय 15-भाषा एवं संस्कृति को समझने हेतु किये कुछ विशेष अध्ययन, एवं 16- हिन्दुस्तानी – औरंगाबाद शहर में हिन्दुस्तान की मिली जुली संस्कृति का अध्ययन)। संविधान के अनुच्छेद 350A के तहत बच्चे की मातृबोली (मातृभाषा कहना गलत है) पता लगाने के लिए बच्चे के परिवेश का अवलोकन करने की जरूरत है। पुस्तक के अध्याय-17 ‘मातृभाषा का अर्थ माँ-बाप की भाषा नहीं होती’ में स्पष्ट किया है कि मातृ-परिवेश की बोली ही मातृ-बोली होती है। मातृ-बोली पूर्ण संरचित नहीं होती परन्तु मिश्रित प्रकृति की मिली जुली भाषा होती है। यह प्रक्रिया स्थाई रूप से चलती रहती है। अतः इसे किसी भाषा विशेष में विभाजित करके नहीं देखा जा सकता।

7 thoughts on “अमेरिकन गोबर , मानसिक गुलामी का परिणाम

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