June 25, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

भारत की स्वाधीनता से पहले अमेरिका में भारत का जितना अध्ययन होता था, उसके मुकाबले अब यह अध्ययन कुछ कम हो गया है. सन् 1939 में महान् संस्कृतविद डब्ल्यू नॉर्मन ब्राउन ने विचार व्यक्त किये थे कि “किसी दैविक वरदान के बिना भी यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि [बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में] सशक्त भारत, संभवतः स्वाधीन होकर विश्व की बिरादरी में शामिल हो जाएगा और संभवतः एक प्रमुख और महत्वपूर्ण प्राच्यदेश होगा. और निश्चय ही बौद्धिक रूप में संपन्न और उत्पादक देश होगा. इन्होंने ही अमेरिका में दक्षिण एशिया अध्ययन के शैक्षणिक विभाग की स्थापना की थी. यह कैसे संभव है कि अमेरिका, जिसने अभी तक भारत के शैक्षणिक अनुभवों को परखा नहीं है, ऐसी बदली हुई दुनिया में बौद्धिक शक्ति के रूप में अपनी जगह बना सके?”

वास्तव में द्वितीय विश्वयुद्ध में इस क्षेत्र में सैनिक अभियान चलाते हुए अमेरिकी सेना को इस क्षेत्र के अध्ययन की ज़रूरत महसूस हुई और आनन-फ़ानन में इसकी शुरुआत हो गई. पचास और साठ के दशक में, जब शीतयुद्ध के कारण अमेरिका ने विश्व के अनेक क्षेत्रों में अध्ययन के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों में केंद्र स्थापित किये और विद्यार्थियों को अपनी भाषाओं में प्रशिक्षित करना शुरू किया तो इस क्षेत्र के अध्ययन में और भी तेज़ी आ गई. इस अवधि के दौरान भारत को बड़ी मात्रा में अमेरिका से विदेशी सहायता-राशि मिलने लगी, जिसकी मदद से मुख्यतः इस छात्रवृत्ति को वित्तपोषित किया जाने लगा. इस छात्रवृत्ति की प्रमुख विशेषता यह थी कि यह द्विपक्षीय सहयोग और विनिमय पर आधारित थी. एक ऐसे दौर में जब भारत की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और संसाधन बेहद सीमित थे और संचार व्यवस्था भी ढुल-मुल थी, अनेक अमरीकी शिक्षा संस्थाएँ आगे बढ़कर भारत में रहकर शिक्षण और शोधकार्यों में सहयोग कर रही थीं. यह निश्चय ही बहुत महत्वपूर्ण बात थी. आज के हालात बिल्कुल अलग हैं.

सहयोग के ये कार्यक्रम विभिन्न ज्ञान-क्षेत्रों में फैले हुए थे. इसके पहले दशक में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर इंडो-अमेरिकन प्रोग्राम से लाभान्वित हुआ था. इस संस्थान में नौ अमरीकी विश्वविद्यालयों का एक कंसोर्शियम था, जिसकी मदद से अनेक अनुसंधान प्रयोगशालाएँ स्थापित की गई थीं और अनेक शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू किये गए थे. अहमदाबाद और कोलकाता में अमेरिका के अग्रणी बिज़नेस स्कूलों के सहयोग से भारतीय प्रबंधन संस्थान शुरू किये गए थे. सहयोग के इन सभी प्रसंगों में संकाय सदस्यों का प्रशिक्षण और प्रोग्राम डिज़ाइन सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व था.

साठ के दशक में और सत्तर के दशक के आरंभ में भारतीय कृषि उच्च शिक्षा संस्थाओं के विकास में अमेरिका की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही. हालाँकि इसे कम प्रचारित किया गया, लेकिन अमरीकी सहयोग की यह भूमिका बहुत सफल रही. अमेरिका के भूमि अनुदान विश्वविद्यालयों के मॉडल के अनुरूप पाँच अमरीकी विश्वविद्यालयों ने नौ नव-स्थापित राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के साथ भागीदारी की और इन विश्वविद्यालयों में दो या अधिक वर्षों के लिए लगभग 300 प्रोफ़ेसर अनुबंध के आधार पर भेजे. परंतु सत्तर और अस्सी के दशकों में भारत-अमेरिकी संबंधों में गिरावट आने के कारण भारत आत्मनिर्भर होने की दिशा में आगे बढ़ने लगा और अमरीकी शिक्षाविदों के लिए भारत में अनुसंधान करना बेहद मुश्किल होता चला गया और इसके परिणामस्वरूप भारत अमरीकी शिक्षाविदों के लिए अध्ययन का गौण क्षेत्र बन गया.

परंतु पिछली सदी के अंतिम चतुर्थांश में अमेरिका में भारत पर अध्ययन के लिए छात्रवृत्तियों की बाढ़-सी आ गई. जब कोई देश आर्थिक और सुरक्षा की दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय जगत् में महत्वपूर्ण होने लगता है तो अमरीकी शिक्षाविदों की दिलचस्पी भी बढ़ने लगती है, लेकिन भारत के संदर्भ में इसके दो अतिरिक्त कारण भी थे, भारतीय अमरीकी प्रवासियों की संख्या में वृद्धि और इस क्षेत्र के लिए पाठ्यक्रमों की उनकी माँग, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कारण था, धन के नये स्रोत. पहले के अच्छे दिनों के विपरीत अब यह नया धन समृद्ध भारतीयों के निजी स्रोतों से आ रहा है. ये भारतीय भारत, यू.के., सिंगापुर, दुबई या खास तौर पर अमेरिका में बसे भारतीय हैं. अब वित्तपोषण का एक नया और भारी स्रोत उभर रहा है.

 

बैंक के एक डाकू स्लिक विली सटन से जब यह पूछा गया कि वह बैंकों को क्यों लूटता है तो उसका उत्तर था, “क्योंकि यही तो वह जगह है, जहाँ पैसा है.” और यही प्रमुख कारण है कि अमरीकी विश्वविद्यालयों के डीन और प्रोफ़ेसर ज़ोरों से यह प्रचारित करते नहीं थकते कि भारत का कितना महत्व है और इसको लेकर वे इतने प्रतिबद्ध हैं कि अगर उन्हें पैसे न मिल पाने की ज़रा भी आशंका होती है तो वे परेशान हो उठते हैं.
जहाँ एक ओर विश्वविद्यालय के प्रशासक दानकर्ताओं से भारी-भारी वायदे करते हैं ताकि उनसे पैसा लिया जा सके, वहीं शोधकर्ताओं की वही पुरानी बीमारियाँ सामने आने लगती हैं जिसके कारण वे ऐसे भारी-भरकम विषयों पर बहस में फँसे रहते हैं जिनका संबंध कदाचित् उनके अलावा किसी से नहीं होता. इसके विपरीत भारत-केंद्रों को वित्तीय मदद देने वाले दानकर्ता यह चाहते हैं कि ये शोधकर्ता उन तमाम चुनौतियों पर शोधकार्य करें जो समकालीन भारत के सामने हैं और विश्वविद्यालय के प्रशासक भी यही वायदे करते हैं. इन प्रशासकों के सामने यही एकमात्र चुनौती रहती हैः अमेरिका में होने वाले भारत संबंधी अधिकांश शोध-कार्य मानविकी या समाजविज्ञान में न होकर विज्ञान से संबंधित होते हैं और यही प्रवृत्ति इन केंद्रों पर भी हावी रहती है.

विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े भारत संबंधी शोध कार्य अनेक वैज्ञानिक विषयों से जुड़े होते हैं और इनकी दो प्रमुख विशेषताएँ होती हैं, पहली बात तो यह है कि ऐसे शोधपरक कार्य अक्सर भारत में सहयोगी स्वरूप के होते हैं और दूसरी बात यह है कि इस प्रकार के अधिकांश वैज्ञानिक शोध कार्यों की मीडिया में कोई चर्चा नहीं होती. बहरहाल जातिगत आनुवंशिक संबंधों या भारत में मानसून से जुड़े अध्ययन संबंधी शोधकार्य अपवादस्वरूप होते हैं.

अमेरिका में होने वाले मानविकी और समाजविज्ञान से जुड़े भारत संबंधी शोधकार्यों के दो और पहलू होते हैं. मानविकी से जुड़े विषयों पर प्रमुखतः प्रवासी भारतीय शिक्षाविद ही हावी रहते हैं. तत्संबंधी क्षेत्रों के अध्ययन के घटते समर्थन के कारण अंशतः उनका भाग्य भी क्षीण हो गया है,लेकिन खुद ही किये गए अपने घावों के कारण और गहन बौद्धिकता में डूबे रहने से और अक्सर रहस्यमय पर्दों में लिपटे होने के कारण उनका लाभ केवल उनके गुर्गों तक ही सीमित रहता है.

इसके विपरीत समाज विज्ञान से जुड़े भारत संबंधी शोधकार्यों में काफ़ी वृद्धि होती रही है. इस क्षेत्र में और भी प्रयोग होने लगे हैं और भारत की ओर से शोधकर्ताओं को अनेक प्रकार के लाभ मिलने लगे हैं: नमूने के आकार में वृद्धि होने लगी है, अनेक आयामों में विविधता आने लगी है, आँकड़े इकट्ठे करने की लागत में अपेक्षाकृत कमी होने लगी है और आधिकारिक निरीक्षणों में भी कमी आने लगी है (जो भी हो, इसे लागू करने की संभावना भी कम है). इस तरह के विविध प्रयोग अमेरिका और चीन में करना बहुत मुश्किल होगा. इसके परिणामस्वरूप बने-बनाये घरेलू सर्वेक्षणों और बेतरतीब नियंत्रण के प्रयोगों में भारी वृद्धि हो गई है. इनमें से अधिकांश का तो बाहरी वित्तपोषण ही होता है और इसके कारण अपने देश के बारे में नई समझ विकसित हुई है, लेकिन इस कार्य का नीतिगत प्रभाव क्या रहा है?

 

यह कहना काफ़ी होगा कि भारत की तुलना में अमेरिका-आधारित शोधकर्ताओं के कैरियर पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है. यह भी विडंबना ही है कि पहचान बनाने के दबाव और कारण संबंधी अनुमान जैसी विशेषताएँ भी कमज़ोरी पड़ गई हैं. प्रासंगिकता और सामयिकता की कीमत चुकाकर ही “स्वर्णिम मानक” जैसे उपायों पर दबाव पड़ता है. इन प्रविधियों को अपनाने से पहले कुछ खास तरह के सवालों के जवाब खोजे जा सकते हैं. हम यह नहीं कहना चाहेंगे कि महत्वपूर्ण नीतिगत प्रश्नों को हल करने के लिए गंभीर अध्ययन की सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं. लेकिन अक्सर होता यही है कि अगर हम उनका हल खोज भी लें तो भी इस प्रकार के अध्ययनों की लागत और अवधि को देखकर लगता है कि वे नीति के बजाय उद्धरणों के रूप में अधिक उपयोगी हैं.

जब उनसे यह पूछा गया कि इस प्रकार के महँगे RCTs का भारत की मूलभूत नीति-व्यवस्था की प्रगति पर क्या प्रभाव पड़ा तो भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियम कोई एक ऐसा उत्तर नहीं खोज पाए जिसकी मदद से उनके सामने आने वाले दर्जनों नीतिगत प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकते हों. इसके विपरीत भारतीय एनजीओ प्रथम द्वारा शिक्षा के परिणामों से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के संकलन का शिक्षा में नीतिगत विमर्श पर गहरा असर पड़ा था, क्योंकि इसे विशिष्ट ज्ञान और व्यवहार का भी कुछ हद तक समर्थन मिला है, जो अपने-आप में कहीं अधिक विश्वसनीय और प्रबोधक है. कोई यह सवाल भी कर सकता है कि क्या “प्रासंगिकता” या “सामयिकता” अच्छे शोधकार्य के लिए सही मानक हैं. इसका उत्तर है कि हाँ, ये तभी सही मानक हैं जब इन परियोजनाओं के वित्तपोषकों के सामने ये तर्क इसी रूप में रखे गए हों.

हमें यह मानना होगा कि अमेरिका के बिज़नेस स्कूलों में समाज विज्ञान जैसे अनेक विषय हैं, जनसांख्यिकी है और विकासमूलक अर्थव्यवस्था भी है,जो भारत संबंधी ज्ञान निकाय में जुड़ते रहे हैं. फिर भी शीर्ष जर्नलों में प्रकाशित कुछ शोधपरक लेखों में कुछ तथ्यों की अनदेखी हो जाती है या फिर वे भारत के बारे में लिखने वाले पुनरीक्षकों के अज्ञान पर ही भरोसा करके सिर्फ़ उन तथ्यों की चुनींदा रूप में व्याख्या मात्र कर देते हैं. आम तौर पर उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन प्रतिष्ठित जर्नलों में प्रकाशित होने के कारण इससे प्रभावी रूप में “नये तथ्यों” का उदय होता है और उस क्षेत्र में वे ज्ञान के प्रवेश द्वार बन जाते हैं.

अमेरिका में समाज विज्ञान के संबंध में भारत पर जो भी शोध-कार्य होते हैं, उनका कष्टदायक पहलू है उनका गैर-सहयोगी स्वरूप. मैं समाज विज्ञान पर इसीलिए ज़ोर देता हूँ कि विज्ञान संबंधी विषयों में यही एक ऐसा विषय है, जिस पर कम कार्य होता है. एक स्तर पर, जिसे लेकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए; NSF द्वारा प्रकाशित आँकड़ों के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि भारत इंजीनियरिंग, कंप्यूटर विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे विषयों में अपेक्षाकृत अधिक मज़बूत है और चिकित्सा विज्ञान में कमज़ोर है, लेकिन मनोविज्ञान और समाज विज्ञान में तो सबसे अधिक कमज़ोर है. जहाँ एक ओर अमेरिका के सह-लेखक भारत से प्रकाशित होने वाले सभी अंतर्राष्ट्रीय सह-लेखकीय लेखों में एक-तिहाई हैं, वहीं अमेरिका के अंतर्राष्ट्रीय सह-लेखकीय लेखों में भारत का स्थान मात्र 3.5 प्रतिशत है, जबकि इसके मुकाबले चीन का स्थान 22.9 प्रतिशत है.

और विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के सभी क्षेत्रों के अंतर्गत अमेरिका में समाज विज्ञान ही एक ऐसा विषय है, जो सबसे अधिक संकीर्ण है. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के क्षेत्रों में सबसे कम आलेख समाज विज्ञान के ही होते हैं. लेकिन यहाँ भी समाज विज्ञान में अमेरिका-आधारित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के मामले में समाज विज्ञान के लेखों की संख्या 2006 और 2016 के बीच 11.4 प्रतिशत से बढ़कर 15.4 प्रतिशत हो गई है, लेकिन इसमें बहुत कम ऐसे लेख थे, जिनका सहलेखन भारत से हुआ हो.

 

बड़े डेटा वाली कई परियोजनाओं के लिए लिखे जाने वाले लेख इस संबंध में उल्लेखनीय अपवाद भी हैं. भारत-आधारित लोग कुली मज़दूरों के समकक्ष बौद्धिक लोग हैं जो असंतुष्ट होते हुए भी काम तो करते हैं, लेकिन सोच-विचार का काम बोस्टन के विद्वान् ब्राह्मणों पर छोड़ देते हैं. बौद्धिक पदानुक्रम की रेखा साधन संपन्न और साधन विहीन लोगों के बीच खिंच गई है, जहाँ वित्तपोषण के चैनल काम के लिए fly-in-fly-out अर्थात् हवाई उड़ान भरके काम पर जाने वाले और काम करके वापसी उड़ान से लौटकर आने वाले शिक्षाविदों के ऐसे मॉडल को मज़बूती प्रदान करते हैं, जहाँ वे इस तरह से अपनी बात रखते हैं मानो ये सब वे भारत की मदद के लिए कर रहे हैं.
इस तरह के हालात के लिए भारत भी बहुत हद तक ज़िम्मेदार है, क्योंकि भारत ने अनेक ऐसे काम किये हैं जिनके कारण पिछले कुछ दशकों में भारत के विश्वविद्यालयों और बौद्धिक संस्कृति की गरिमा घटी है. हम व्यक्तिगत स्तर पर ऐसे कई मामलों से परिचित हैं, जब सरकारी विभागों ने भारतीय स्नातक छात्रों को आँकड़े देने से इंकार कर दिया था, जबकि वही आँकड़े विदेशी शोधकर्ताओं को सरलता से दे दिए थे. बराबरी की प्रतिस्पर्धा का यह विचित्र उदाहरण है.

हालात में बदलाव आ रहा है, खास तौर पर विज्ञान में, जहाँ वैज्ञानिक प्रकाशनों के विशालतम स्रोत के रूप में भारत का स्थान अब तीसरा (चीन और अमेरिका के बाद) हो गया है. 2006-16 से विज्ञान और इंजीनियरिंग (S&E) के वैश्विक लेखों में भारत का हिस्सा लगभग दुगुना (2.45 प्रतिशत से बढ़कर 4.8 प्रतिशत) हो गया है, जबकि प्रकाशनों की कुल संख्या बढ़कर तिगुनी हो गई है. यह माना जा सकता है कि इनमें गुणवत्ता का बहुत बड़ा अंतर भी है,कुछ लेख साधारण हैं और कुछ लेख बिल्कुल उदासीन, फिर भी यह कहानी गतिरोध या गिरावट की नहीं है, लेकिन समाज विज्ञान के क्षेत्र में स्थिति ऐसी नहीं है, लेकिन इसका भी असर पड़ता है, क्योंकि इससे सार्वजनिक धारणा पर और खास तौर पर सार्वजनिक नीति पर तो सीधा असर होता ही है.

भारत की यह भारी भूल होगी अगर इसने अपने ही देश में समाज विज्ञान की विषयवस्तु को नियंत्रित करने का प्रयास किया. भारत के शोधकर्ताओं को इसका तुलनात्मक लाभ मिलना चाहिए और अमरीका-आधारित शोधकर्ताओं से आग्रह किया जाना चाहिए कि वे भारत-आधारित शोधकर्ताओं के साथ गहरे संबंध बनाएँ और उन्हें अपने आलेख में संयुक्त लेखक बनाएँ और भारत के अधिक से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित करें. यह शर्म की बात है कि अमेरिका की संभ्रांत संस्थाएँ भारत से एकत्र किये गये डेटा के आधार पर लिखे गए अनेक आलेखों की छँटनी कर देते हैं और उन्हीं विभागों में भारत से सीधे डॉक्टरेट के लिए आने वाले छात्रों को प्रवेश दे देते हैं. यह उनका विशेषाधिकार ज़रूर है, लेकिन भारत के पास इस मामले में लिप्त होने का भी कोई कारण नहीं है. यही इसका विशेषाधिकार भी होना चाहिए.

 

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3 thoughts on “अमेरिका में भारत का अध्ययन

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