June 27, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

असमानता पर चोट करने का समय आ गया है!!

मौजूदा वक्त में हर कोई जानता है या हर किसी को जानना चाहिए कि दुनिया भर के कई देशों में असमानता बढ़ रही है। हाल ही में दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच पर ब्रिटिश संस्था ऑक्सफैम ने एक रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट भारत में सुर्खियों में है, तो इसलिए, क्योंकि इसने भारत के अमीर और गरीबों के बीच वित्तीय असमानता को सुर्खियों में ला दिया है।
यह असमानता दरअसल तेजी से बढ़ रही है और मौलिक अधिकारों तथा सामाजिक संतुलन पर प्रतिकूल असर डाल रही है।

ऑक्सफैम रिपोर्ट से बेतरतीब ढंग से चुने गए कुछ तथ्य यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं : भारत में पिछले साल 17 नए अरबपतियों के नाम जुड़ गए हैं और ऐसे अरबपतियों की संख्या बढ़कर अब 101 हो गई है। भारतीय अरबपतियों की संपत्ति में 4,891 अरब रुपये की बढ़ोतरी हुई, जो 15,778 अरब रुपये से बढ़कर 20,676 अरब रुपये हो गई है।

इस संदर्भ में यहां इस पर विचार किया जा सकता है कि सभी राज्यों के स्वास्थ्य और शिक्षा बजट के 85 फीसदी वित्तपोषण के लिए 4,891 अरब रुपये पर्याप्त हैं।

ग्रामीण भारत में न्यूनतम मजदूरी कमाने वाले एक श्रमिक को एक प्रमुख भारतीय परिधान कंपनी में शीर्ष भुगतान पाने वाले कार्यकारी अधिकारी की एक वर्ष की कमाई के बराबर धन अर्जित अर्जित करने में 941 वर्ष लग जाएंगे। भारत की शीर्ष 10 फीसदी आबादी का देश की 73 फीसदी संपत्ति पर कब्जा है।

इस वर्ष आक्सफैम का आंकड़ा ऑक्सफैम सहित अन्य रिपोर्टों के उस तथ्य की पुष्टि ही करता है, जिसमें भारत के राज्यों, क्षेत्रों, लिंगों, वर्गों, जातियों इत्यादि में अतीत में भारत की बहुआयामी असमानताओं के बारे में कहा गया है। संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक ने रेखांकित किया है कि भारत में 64 फीसदी पुरुषों की तुलना में मात्र 39 फीसदी वयस्क महिलाएं ही कम से कम माध्यमिक शिक्षा तक पहुंची हैं।

लैंगिक पैमाने पर भारत का सबसे खराब प्रदर्शन श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी से संबंधित है, जहां 78.8 फीसदी पुरुषों की भागीदारी की तुलना में महिलाओं की भागीदारी मात्र 27.2 फीसदी है, जबकि वैश्विक स्तर पर 75 फीसदी पुरुषों की तुलना में कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी 49 फीसदी है।

पारिश्रमिक वाले कामों में भारतीय महिलाओं की भागीदारी इतनी कम क्यों है? इसके बहुत से कारण हैं, लेकिन एक प्रमुख कारण यह है कि यहां महिलाएं बड़ी मात्रा में ऐसा काम करती हैं, जिनका उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता। भारत में महिलाएं प्रतिदिन करीब पांच घंटे देखभाल से संबंधित ऐसा काम करती हैं, जिनका उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता, जबकि भारतीय पुरुष औसतन मुश्किल से आधे घंटे ऐसा काम करते हैं।

रिपोर्ट बताती है कि ‘महिलाओं द्वारा अवैतनिक देखभाल के काम के इस अनुपातहीन बोझ का मतलब है कि वे भुगतान किए जाने श्रम में भाग लेने के अवसरों से चूक जाती हैं अथवा वे कम पारिश्रमिक वाला काम करने के लिए मजबूर होती हैं, जिसके कारण वे गरीबी में फंस जाती हैं और उनके कल्याण का नुकसान होता है।’

राष्ट्रीय आंकड़ा कई मोर्चों पर अंतरराज्यीय और अंतर-जिला असमानताओं पर पर्दा डालता है। उदाहरण के लिए, केरल में पांचवीं कक्षा के तीन चौथाई छात्र दूसरी कक्षा के पाठ पढ़ सकते हैं, जो राष्ट्रीय औसत (51 फीसदी) से काफी ज्यादा है, जबकि झारखंड में इसका अनुपात 34 फीसदी से ज्यादा नहीं है।

पठन और गणित के परीक्षणों में भारी अंतर भविष्य में वयस्कता की समस्याओं का संकेत देते हैं। यह जानना आसान है कि किस राज्य के बच्चों के भविष्य में बेहतर प्रदर्शन और रोजगार की उभरती दुनिया में अवसरों को पकड़ने की ज्यादा संभावना है।

क्या असमानता कोई मुद्दा है? जैसा कि कई लोग तर्क देते हैं कि कई भारतीय पांच, दस या बीस साल की स्थितियों से आज बेहतर स्थिति में हैं और यदि संतुलन है, तब भी क्या यह मुद्दा होना चाहिए?
मैं कहूंगी कि हां। अत्यधिक असमानता, जैसा कि हम भारत में देखते हैं, मुद्दा है, क्योंकि यह सिर्फ आय की असमानता नहीं है।

यह अवसरों की भी असमानता है। उच्च असमानता प्रभावी रूप से लाखों लोगों को अर्थव्यवस्था में पूर्ण भागीदारी और उनकी पूरी क्षमता का एहसास करने से उन्हें रोकती है।

इसके कारण यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की गतिशीलता को भी प्रभावित करती है। अपेक्षाकृत गरीब लोग भी, भले ही वे पूर्ण अर्थ में गरीब न हों, अपने बच्चों को शिक्षा और विरासत से लेकर सामाजिक पूंजी के लाभ का हिस्सा देने में सक्षम नहीं हैं, जो कि अमीर लोग अपने बच्चों को देते हैं। यानी असमानता पीढ़ी-दर पीढ़ी बनी रहती है। इसका अर्थ यह है कि पिरामिड के शीर्ष और निचले स्तर पर रहने वाले लोगों के लिए अवसर बहुत भिन्न हैं।

उच्च असमानता का राजनीतिक प्रभाव भी होता है। अमीर लोगों के संपर्क और उनकी राजनीतिक शक्ति ज्यादा होती है और वे अपना हित साधने और समाज में अपनी स्थिति स्थापित करने के लिए उस राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल करते हैं। बहिष्कार का उस तबके के बीच नकारात्मक असर पड़ता है, जो अवसरों की कमी के कारण मजबूत और स्थायी बन जाता है।

यह प्रतिकूल राजनीति की ओर ले जाता है और सामाजिक सामंजस्य को नष्ट कर देता है, जैसा कि हम आज भारत में देख रहे हैं।

जैसा कि मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर कहते हैं, भारत में असमानता की चुनौतियां एक नए किस्म के रूढ़िवाद के ताकतवर उभार से जुड़ी हैं और अल्पसंख्यक समूहों तथा समुदायों के प्रति राज्य की शत्रुता का सबूत हैं।

दक्षिणपंथी राजनीति की मध्यवर्ग के बीच एक बढ़ती अपील है, जो अक्सर अल्पसंख्यकों और भारत के पड़ोसियों के साथ शत्रुता के साथ बाजार की कट्टरता को जोड़ती है।

जाहिर है कि यह किसी के भी हित में नहीं है।

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