June 27, 2022

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सच के साथ

आखिर आजादी के 71 वर्षों बाद भी ओबीसी समाज अपना हक क्यों नहीं प्राप्त कर पाया?

ओबीसी का बहुलांश हिस्सा न केवल सामाजिक-शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा है, बल्कि संपत्ति और साधन विहीन भी है। इस समुदाय के एक बडे हिस्से के पास कोई हुनर भी नहीं है। आजादी के बाद निरंतर इसकी उपेक्षा हुई, इसके कारण क्या हैं? ये एक बड़ा सवाल है।

 

 

सामाजिक समता और सामाजिक न्याय के पक्षधर सभी व्यक्तियों के मन में यह प्रश्न कौंधता है कि आखिर आजादी के 70 सालों बाद भी पिछड़ा वर्ग अपना हक क्यों नहीं प्राप्त कर सका। आज का पिछड़ा वर्ग ही मनुवादी व्यवस्था के भीतर शूद्र वर्ग है। हमेशा यह देश की आबादी का बहुसंख्यक वर्ग रहा है। मंडल आयोग के अनुसार भी यह तबका कुल आबादी का 52 प्रतिशत है। आज की जनसंख्या के आधार पर देखा जाए, तो इसकी कुल संख्या कम से कम से कम 75 करोड़ है। पिछड़ा वर्ग क्यों अपना हक नहीं प्राप्त कर सका, और आज इस वर्ग की स्थिति क्या है?

 

आजादी के तुरंत बाद यह वर्ग अपने हक के लिए संघर्ष में चूक गया। संविधान की धारा 340 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछ़डे वर्ग के रूप में इस तबके का जिक्र तो हुआ, इसके लिए विशेष प्रावधान और उपाय करने की चर्चा तो हुई, लेकिन वास्तव में हुआ कुछ नहीं। इस धारा में यह प्रावधान था कि राष्ट्रपति एक कमीशन नियुक्ति करेंगे। यह कमीशन ओबीसी जातियों की पहचान करेगा। कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर ओबीसी जातियों को प्रतिनिधित्व के लिए उचित कदम सरकार उठायेगी।

23 जनवरी 1953 को पिछड़ी जातियों की पहचान और विविध क्षेत्रों में उनको उचित प्रतिनिधित्व देने की सिफारिश करने के लिेए काकाकालकेर आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट दी। आयोग की सिफारिशों को लागू करने से नेहरू की सरकार ने इंकार कर दिया। असंगठित और नेतृत्वविहीन पिछड़ी जातियां कोई कारगर प्रतिरोध नहीं कर पाईं।

जनता पार्टी की सरकार आने पर जब पिछड़ी जातियों के नेताओं ने दबाव डाला तो, बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल के नेतृत्व में एक नया आयोग बना। जिसे मंडल आयोग कहा गया। इसने 31 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट पेश किया। इस रिपोर्ट को भी ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। लगभग 10 सालों बाद 7 अगस्त 1990 को वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू करने का निर्णय लिया। कथित उच्च जातियों की ओर से ऐसी प्रतिक्रिया आई, जैसे कोई भूचाल आ गया हो। दो वर्षों तक इसे लागू होने से सर्वोच्च न्यायालय ने रोके रखा। आखिरकर 16 दिसंबर 1992 को सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ। इस प्रकार लगभग 42 वर्षों तक ओबीसी समुदाय आरक्षण से पूर्णतया वंचित रहा। उच्च शिक्षा संस्थानों ओबीसी के लिए आरक्षण 2006 में जाकर लागू। पिछड़ों जातियों के लिए संवैधानिक दर्जा प्राप्त आयोग अभी तक नहीं बन पाया।

आखिर पिछड़ा वर्ग अपना बाजिब हक क्यों नही प्राप्त कर सका? उसे बहुत थोड़ा हक, इतनी देर से क्यों प्राप्त हुआ, क्यों वह इस मामले में दलितों से भी पीछे छूट गया?

 

पहली बात यह कि उत्तर भारत में आजादी के पहले और बाद कोई ऐसा सशक्त नेता नहीं था, जो सभी पिछड़ी जातियों को एकजुट कर उनके हक-हकूक के लिए आवाज उठा सके। संगठन और नेतृत्व का अभाव ही वह मुख्य कारण है, जिसके चलते इस वर्ग की जातियां अपने बाजिब हक प्राप्त नहीं कर सकी। वे याद दिलाते हैं कि दक्षिण भारत में स्थिति इससे भिन्न थी। वहां प्रभावकारी नेतृत्व और आपसी एकता दोनों थी। जिसके चलते वहां पिछड़ों के लिए आरक्षण आजादी के काफी पहले ही लागू हो गया। कोल्हापुर ने 1902 मेें ही पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू कर दिया था। बाद में बाम्बे प्रेसीडेंसी में भी आरक्षण लागू हुआ। इस बात-चीत के दौैरान वह यह भी कहना नहीं भूलते हैं कि जो लोग कहते हैं कि आरक्षण से काम की गुणवत्ता गिरती है, उन्हें दक्षिण के राज्यों के अनुभव पर ध्यान देना चाहिए, जहां आजादी के बहुत पहले से आरक्षण लागू है, आजादी के बाद 50 प्रतिशत आरक्षण दक्षिण के कई राज्यों में (तमिलनाडु में 50 प्रतिशत से भी अधिक) उत्तर भारत से काफी पहले लागू हो गया था। दक्षिण के राज्य हर मामले में उत्ततर भारत से आगे हैं।

कृष्णनन चेताते हैं कि एकता, संघर्ष और सशक्त नेतृत्व के बिना पिछड़ी जातियां अपना वाजिब हक प्राप्त नहीं कर पायेंगी, उच्च जातियों के बराबर नहीं उठ पायेगीं। वे यह भी कहते हैं कि पिछड़ी जातियों के उत्थान और सशक्तीकरण के बिना भारत में न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

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राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग : उम्मीदें और आशंकाएं

पिछड़े वर्गों के संदर्भ में अभी हाल के महीने में दो आयोगों का गठन हुआ है। पहला संवैधानिक दर्जा प्राप्त राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, दूसरा पिछड़ी जातियों के वर्गीरण के लिए आयोग। इन दोनों आयोगों के संदर्भ में क्या सोचते हैंं, पी.एस. कृष्णनन (पूर्व सचिव भारत सरकार)। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट :

 

केंद्र सरकार ने मार्च 2017 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की घोषणा की। इसके लिए 123 वां संविधान संशोधन करने का निर्णय लिया गया। संविधान में एक नया अनुच्छेद 338 बी जोड़ने का निर्णय लिया गया। पांच सदस्यीय इस आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को बनाने का निर्णय लिया गया। इसके लिए लोकसभा में विधेयक पास भी हो गया है। अभी राज्यसभा से मंजूरी बाकी है। इसके बाद बीते 23 अगस्त 2017 को केंद्र सरकार ने एक अन्य पांच सदस्यीय आयोग बनाया, जिसकी अध्यक्षता दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी को सौंपी गई। 3 अक्टूबर 2017 को यह आयोग अस्तित्व में आया। इस आयोग को 12 हफ्ते में अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। नवगठित आयोग को तीन बिंदुओं पर विचार करना है। इसे यह देखना है कि ओबीसी के अंदर केंद्रीय सूची मे शामिल जातियों को क्या उनकी संख्या के अनुरूप सही मात्रा में आरक्षण का लाभ मिल रहा है? अगर नहीं तो इनका वर्गीकरण कैसे किया जा सकता हैै? आयोग इसके मापदंडों पर भी विचार करेगा। ध्यान रहे कि पिछड़ा वर्ग आयोग ने तीन वर्गों में वर्गीकरण का सुझाव दिया था। पहला वर्ग जो पिछड़ा है। दूसरा वर्ग जो ज्यादा पिछड़ा है और तीसरा जो अतिपिछड़ा है। यह आयोग उन जातियों की संख्या और पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर नई सूची तैयार करेगा। ध्यान रहे कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, झारखंड समेत दस राज्यों में पहले ही ऐसी व्यवस्था है। अब केंद्रीय सूची में यह होगा।

इन आयोगों के गठन के साथ ही उम्मीद और आशंकाएं दोनों पैदा हुई हैं। जहां एक ओर संवैधानिक दर्जा प्राप्त राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का यह कह कर इसका स्वागत किया गया कि आजादी के बाद पहली बार संविधान के भावना के अनुकूल एक ऐसा पिछड़ा वर्ग आयोग बन रहा है, जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की तरह संवैधानिक दर्जा प्राप्त होगा। दूसरी ओर आयोग के कार्यों की सीमाओं और इसकी संरचना को लेकर प्रश्न भी उठने लगे। सबसे ज्यादा आंशका नवगठित वर्गीकरण आयोग को लेकर थी। आंशका इस बात की भी पैदा हुई कि कहीं केंद्र सरकार पिछड़े वर्गों के हित के नाम पर पिछड़ी जातियों को आपस में लड़ाना तो नहीं चाहती है, उनमें स्थायी फूट तो नहीं पैदा करना चाहती है,जिसका फायदा वह अपने वोट बैंक के लिए करे। आयोग संबंधी इन उम्मीदों और आशंकाओं से उपजे सवालों के साथ हम पी.एस.कृष्णन से मिले।

कृष्णन भारत सरकार में काम करने वाले एक ऐसे आईएएस अधिकारी रहे हैं, जो इस मामले के सबसे बड़े विशेषज्ञों में से एक हैं। जब हमने आयोगों के संदर्भ में अपनी उम्मीदें और आशंकाएं रखीं, तो उन्होंने माना कि वर्तमान आयोग उम्मीदें और आशंकाएं दोनों पैदा करते हैं।

इस पूरे परिदृश्य को सामने रखने के बाद कृष्णन कहते हैं कि आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह कौन से कदम सुझाये, जिससे सामाजिक-शैक्षणिक तौर पर पिछड़ी और आर्थिक तौर पर विपन्न या कमजोर जातियां उच्च जातियों के बराबर आ सकें। साथ ही वह यह कहना भी नही भूलते कि पिछड़ी जातियों के ही बहुलांश हिस्से की आजादी के बाद सबसे अधिक उपेक्षा हुुई है।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की के संदर्भ में कृष्णन सबसे पहले इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि आजादी के बाद पहली बार पिछड़े वर्गों के लिए स्थायी आयोग बना है, साथ ही जिसे संवैधानिक दर्जा भी प्राप्त है। वे याद दिलाते हैं कि इसके पहले दो तरह के आयोग बने थे। पहला काकाकालेकर और मंडल आयोग। ये दोनों आयोग अस्थायी थे। रिपोर्ट सौंपने के बाद उनका अस्तित्व खत्म हो गया। दूसरा आयोग सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के बाद 14 अगस्त 1993 को बना। यह अस्थाई आयोग तो नहीं था, लेकिन इसकी हैसियत सिर्फ कानूनी थी। इसे संवैधानिक दर्जा नहीं प्राप्त था। इसकी सिफारिशों की आसानी से अवहेलना की जा सकती थी। वर्तमान आयोग की सबसे बड़ी विशेषता,यह है कि यह स्थायी और संवैधानिक दर्जा प्राप्त आयोग है। इसकी सिफारिशों की अवहेलना करना आसान नहीं होगा। इस आयोग की दूसरी विशेषता यह है कि इसे इस बात का अधिकार प्राप्त है कि वह पिछड़े वर्गों के आर्थिक उत्थान और सशक्तीकरण के लिए कदम उठाने का भी सुझाव दे सकता है।

वर्गीकरण आयोग के सामने सबसे चुनौती भरी जिम्मेदारी यह सौंपी गई है कि वह पिछड़े वर्गों का वर्गीकरण करे। इस वर्गीकरण में पिछड़े वर्ग की सूची में पिछड़ी जातियों को शामिल करने के साथ ही, उन जातियों को बाहर करना भी शामिल है,जो पिछड़ी जाति के पैमाने पर खरी नहीं उतरती हैं। इसके साथ ही आयोग को यह भी काम सौंपा गया है कि वह पिछड़ी जातियों के बीच भी वर्गीकरण करे, उनकी सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति के साथ उनकी आर्थिक स्थित और उनके हुनर को ध्यान में रखते हुए और इस आधार पर उनके उत्थान और सशक्तीकरण के लिए सुझाव दे, लेकिन वर्गीकरण का यह काम संवैधानित दर्जा प्राप्त विशेषज्ञों के आयोग को सौैंपने की जगह नवगठित आयोग को सौंप दिया गया। इसने आंशकाओं को जन्म दिया।

पिछड़ी जातियों में से कुछ जातियों को निकालना और कुछ जातियों को शामिल करना और पिछड़ी जातियों के बीच वर्गीकरण करना राजनीतिक और सामाजिक तौर पर अत्यन्त संवेदनशील मुद्दा है। विभिन्न सरकारें यह काम वास्तविक पिछड़ी जातियों के सामाजिक-शैक्षिक उत्थान को ध्यान में रखकर करने की जगह अपने वोट को ध्यान में रखकर करती रही हैं। इस संदर्भ में जब पी.एस.कृष्णन से हमने बात किया तो, उनका कहना था कि पिछड़ी जातियों में कुछ ऐसी जातियां शामिल हो गई हैं, जो पिछड़ेपन के पैमाने पर खरी नहीं उतरती हैं। ऐसी जातियां भले ही आर्थिक और शैक्षिक तौर पर पिछड़ी हो सकती हैं, लेकिन वे सामाजिक तौर पर पिछड़ी नहीं हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि ऐसी जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। हां उनके आर्थिक और शैक्षिक उत्थान और सशक्तीकरण के लिए अलग से योजनाएं बनाई जानी चाहिए है। इसके अलावा पिछड़े वर्ग में अन्य जातियों के शामिल करने का प्रश्न भी अत्यन्त संवेदनशील प्रश्न है, ऐसी कई जातियां पिछड़े वर्ग में शामिल होने का दावा पेेश कर रही हैं, जो संविधान की धारा 340 के आधार पर सामाजिक-शैक्षणिक तौर पर पिछड़ी नहीं कही जा सकती हैं। इस बात की आशंका है कि राजनीतिक कारणों से इनको इसमें शामिल कर लिया जाय। कृष्णनन का मानना है कि ऐसी जातियों को पिछड़ वर्गों में शामिल करने से उन जातियों को गंभीर नुकसान पहुंचेगा, जो वास्तविक रूप में पिछड़ी है, जिनको जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व और समानता की जरूरत है। इस बिन्दु पर कृष्णनन सबसे ज्यादा आशंकित हैं और कहते हैं कि इस आयोग में कोई ऐसी दीवार नहीं बनाई गई है, जो उन जातियों के पिछड़े वर्ग में शामिल होने से रोक सके, जो इसमें शामिल होने की हकदार नहीं हैं।

 

पिछड़ी जातियों के बीच वर्गीकरण के प्रश्न पर कृष्णन की दो टूक राय है। वे वर्गीकरण के पक्ष में हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि सामाजिक-शैक्षणिक तौर पर पिछड़ी जातियों के बीच बीच काफी अन्तर है। पिछड़ी जातियों को मोेटा-मोटी चार हिस्सों में बांटा जा सकता है, भले ही अधिकांश पिछड़ी जातियां सामाजिक-शैक्षणिक तौर पर पिछड़ी हों। सर्वाधिक पिछड़ी, अत्यन्त पिछड़ी, अधिक पिछड़ी और सापेक्षिक तौर पर अगड़ी। सर्वाधिक पिछड़ी वे जातियां हैं, जिनके पास न तो संपत्ति है, न जमीन, न कोई अन्य साधन, यहां तक कि उनके पास कोई हुनर भी नहीं है। इनमें से अनेक घुमंतु जातियां हैं,या वे जातियां हैं, जिन्हें अंग्रेजों ने आपराधिक जातियां ठहरा दिया था। अत्यन्त पिछड़ी जातियां वे हैं, जो सामाजिक-शैक्षणिक तौर पर तो पिछड़ी हैं,ही, साथ ही उनके पास कोई संपत्ति और साधन नहीं हैं। उनके पास एक चीज है, हुनर। जैसे नाई, बढ़ई ,लोहार आदि। अधिक पिछड़ी जातियां वे हैं, जिनके पास थोड़ी जमीन तो है, लेकिन उनकी सामाजिक-शैक्षिक स्थिति अत्यन्त बदतर है, जमीन भी इतनी नहीं है कि वे अपना जीविकोपार्जन कर सकें। इन तीनों के अलावा पिछड़ी जातियों में एक अगड़ा तबका है, जो भूस्वामी है, संपत्तिशाली है। इसके अलावा कृष्णन का यह भी कहना है कि पिछड़ी जातियों में कुछ एक ऐसी जातियां भी शामिल हो गई हैं, जिन्हें सामाजिक तौर पर पिछड़ी जाति नहीं कहा जा सकता है। जो जातियां सामाजिक तौर पर पिछड़ी नहीं हैं, भले ही आर्थिक-शैक्षिक तौर पर कमजोर हों, उनके संदर्भ में कृष्णन का कहना है कि उन्हें आरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

कृष्णन वर्गीकरण के पक्ष में दक्षिण के राज्यों का उदाहरण देते है। वे कहते हैं कि केरल में पिछड़ी जातियों को 8 वर्गों में बंटा गया है, आंध्रप्रदेश में 4, तमिलनाडु में 3 वर्गो में। उनका कहना है कि यह बंटवारा जरूरी है, ताकि सर्वाधिक पिछड़ी, अत्यधिक पिछड़ी और अधिक पिछड़ी जातियों को उनका वाजिब हक मिल सके। सभी को एक साथ रखने में पिछड़ों के बीच की अगड़ी जातियों को आरक्षण का फायदा मिल मिल जाता है, लेकिन शेष जातियां वंचित रह जाती हैं। दक्षिण के राज्यों में इसी कारण से यह वर्गीकरण किया गया। यह वर्गीकरण उचित तरीके से होगा? इस पर भी कृष्णन को शक है।

कृष्णनन वर्गीकरण आयोग की संरचना को लेकर भी चिन्तित दिखते हैं। उनका कहना है कि आयोग में पिछड़े वर्ग के विशेषज्ञों को कम जगह दी गई है।

कृष्णन से जब यह प्रश्न पूछा गया कि यह आयोग कितना पिछड़ों के हित में काम कर पायेगा? क्या सरकार इसका इस्तेमाल पिछड़े के वास्तविक हितों को पूरा करने के जगह अपने राजनीतिक फायदे के लिए नहीं करेगी? कृष्णन ने इसका सीधा उत्तर दिया, उनका कहना था कि सभी पार्टियां सत्ता के लिए काम करती हैं। आयोग और सरकार पिछड़ों के लिए कितना सार्थक और कारगर होंगें, यह आयोग, सरकार और पार्टियों पर निर्भर तो करता है, लेकिन उससे ज्याद पिछड़ी जातियों की जागरूकता, सक्रियता, एकजुटता, संगठन और नेतृत्व पर निर्भर करता है। उनका कहना है कि यदि पिछड़ी जातियां अपने हक-हुकूक के लिए एकजुट होकर संघर्ष नहीं करती है और सरकारों को बाध्य नहीं करती है, तो उन्हें उनके हक मिलने वाले नहीं हैं।

इन सब बातों के साथ ही कृष्णन एक बात पर विशेष जोर देते हैं, वह यह कि भूमिहीन पिछड़ों और दलितों को जमीन मिलनी जरूरी है, इसके बिना वे कथित उंची जातियों के बराबर नहीं आ पायेगें। इस संदर्भ में वे भूमि सुधारों की बात करते हुए कहते हैं कि जापान, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, चीन और सिंगापुर आदि सभी जगहों पर भूमि सुधार हुआ। भूमिहीनोंं को भूमि वितरित की गई,तभी इन देशों में बराबरी और संपन्नता आई है। भूमिहीन पिछड़ों और दलितों को जमीन देने के लिए है या नहीं , इस संदर्भ में कृष्णन विभिन्न आयोगों के आंकडों का हवाला देकर कहते हैं कि सरकार के कब्जे में ही इतनी जमीन है कि यदि उसे ही वितरित कर दिया जाय, तो भूमिहीन पिछड़ों और दलितों को जमीन मिल जायेगी.

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अन्त में कृष्णन यह कहते है कि पिछड़ों को कथित उंची जातियों के बराबर लाकर खड़ा करने का पूरा रोड़ मैप तैयार है, मैंने यह रोड़ मैप सभी पार्टियों और नेताओ को मुहैया करा दिया है। कोई यह नहीं कह सकता है कि

उसे पता नहीं है कि क्या करना है, पिछड़ों के उत्थान और सशक्तीकरण के उपाय क्या हैं? अन्त में वह यह कहना नहीं भूलते कि लोकतंत्र में एकजुट होकर संघर्ष करने और दबाव बनाने से ही हक-हुकूक हासिल होते हैं। पिछड़े पहले ही इसमें चूक गए हैं, अब उन्हें चूकना नहीं चाहिए।

 

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