July 7, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

आखिर नेहरू और गांधी क्यों नहीं गए सेलुलर जेल

एक जिसे राष्ट्रपिता का दर्जा प्राप्त है और दूसरे जिन्हे हम चाचा के नाम से जानते है जो की भारत के पहले प्रधानमंत्री भी रहे है, इसलिए हमारे लिए ये सोचना लाज़िमी हो जाता है की शायद यही दो “महापुरुष” ऐसे थे जिनसे ब्रितानी हुकूमत थर थर कांपती रही होगी और शायद यही वो महान हस्तिया थी जिनके कारण ब्रिटिश हुकूमत को देश छोड़ कर जाना पड़ा और भारतवर्ष ने आजादी पाई। भारत वर्ष का इतिहास भी ऐसे ही लिखा गया और राष्ट्रपिता और चाचा की गाथाओ का ज़िक्र जोर शोर से करते हुए उन्हें महिमामंडित भी किया गया।

 

लेकिन सच्चाई इसके बिलकुल विपरीत है, अगर हम इतिहास की गहराइयों में झाँकने का प्रयास करे तो पाएंगे की ब्रितानी हुकूमत सदैव इन दोनों के प्रति नरम रुख ही अपनाती रही है, वहीं ब्रितानी हुकूमत ने और कई नेताओ जैसे वीर सावरकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, स्वर्गीय चंद्रशेखर आज़ाद इत्यादि की तरफ बहुत ही क्रूर रवैया अपना रखा था।

जहाँ वीर सावरकर पर अमानवीय अत्याचार किये गए, नेताजी का पीछा देश के अंदर और बाहर तक किया गया, आजाद को स्वयं को गोली मारनी पड़ी, बिस्मिल और भगत सिंह जैसे नेताओ को जेलों में प्रताड़ित किया गया और फांसी तक दे दी गई, वही देश के इन दो “बड़े नेताओ” की तरफ अंग्रेज़ो का रुख सदैव बदला बदला सा रहा। ऐसे में ये सवाल उन लोगो के मन में जरूर उठता होगा जो सच्चाई पर भरोसा करते है ना की परी कथाओ पर, जैसा की इतिहासकारो ने हमें बताया है। आज के युग में जब दुनिया सिमटती चली जा रही है और सूचनाओं का आदान प्रदान बहुत आसान हो चूका है, विश्व की पुस्तके जिन्हे किसी ज़माने में हमारे देश में प्रतिबंधित कर दिया गया था वो भी आसानी से उपलब्ध हो जा रही है, ऐसे में सच्चाई सामने आना लाज़िमी है और सच वो नहीं है जो हमें आज तक पढ़ाया गया।

 

जहाँ भगत सिंह को मौत की सजा सुनाई गई, सुभाष बाबू के साथ जेल में अमानवीय व्यवहार किया गया और बाद में उन्हें निर्वासित कर दिया गया, औरोबिन्दो को अपनी मातृभूमि छोड़नी पड़ी, लाला लाजपत राय की पीट पीट कर हत्या कर दी गई, सावरकर को जेल में बंद कर उनपर आमनवीय अत्याचार किये गए, ऐसे में आखिर ऐसा क्या था जो नेहरू और गाँधी को उन्ही अंग्रेज़ो ने विशेष अतिथि बना कर रखा जबकि वही अंग्रेजी हुकूमत और सारे स्वत्नत्रता सेनानियों के साथ क्रूरता दिखाती रही और हमारे उन स्वात्रंत वीरो के साथ अमानवीय व्यवहार करती रही, उनसे सालों मजदूरों की तरह काम कराया गया, वही नेहरू को जेल में किताब लिखने की छूट प्राप्त हो गई जेल से कई बार लम्बी छुट्टिया प्रदान की गई, आखिर क्या कारण था की इतने क्रूर ब्रितानियों ने नेहरू और गांधी का नाम आते ही ऐसा दोहरा रवैया अपना लेते थे?

 

जैसा की हमारे इतिहासकार बताते है की वीर सावरकर एक छोटे कद के क्षेत्रीय नेता थे और उनका वर्चस्व पूरे भारत वर्ष में नहीं था, उसके बावजूद भी उन्हें सेलुलर जेल में बंद कर गुलामो की तरह रखा गया और अमानवीय यातनाये दी गई, फिर ऐसा क्या था की इतने बड़े “जन नेता” नेहरू और गाँधी के साथ अलग ही व्यवहार होता रहा, होना तो ये चाहिए था गांधी और नेहरू को अगर सावरकर से ज्यादा नहीं तो कम से कम उनके बराबर की यातनाओ से तो गुज़रना ही पड़ता, लेकिन आश्चर्य की ऐसा कुछ नहीं हुआ। कई साहित्यकारों और इतिहासकारो का ऐसा मानना है की नेहरू और गाँधी ब्रितानियों के मोहरे थे, जिनका इस्तेमाल उन्होंने देश से सुरक्षित निकलने के लिए किया, नेहरू और गांधी के कारण ही ब्रितानियों ने देश को लूटने में कोई कसार नहीं छोड़ी, क्या ब्रितानी हुकूमत वीर सावरकर, नेताजी या किसी और स्वतंत्रता सेनानी को ऐसे खुला छोड़ने का सहस दिखा सकी? जिस समय भगत सिंह और उनके साथियो की फांसी की सजा को गांधी रुकवा सकते थे लेकिन तब वो ब्रितानी हुकूमत के साथ खड़े नज़र आये और ये कहा की उनके किये की सजा उन्हें मिलनी चाहिए अहिंसा का कोई तोड़ नहीं है और हिंसक लोगो को यथाशीघ्र फांसी हो जानी चाहिए, क्या फांसी की सजा उनके अहिंसा की व्याख्या पर सही उतरती थी?

 

 

कई इतिहासकारो की दलील है की सेलुलर जेल का निर्माण उन स्वतंत्रता सेनानियों को रखने के लिए किया जाता था जो की सच में ब्रिटिश हुकूमत के लिए खतरा होते थे, न की ऐसे कृतिम स्वतंत्रता सेनानियों के लिए जिहोने जानबूझकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को पटरी से उतारने का काम किया, इसलिए इतिहासकारो का मानना है की ब्रितानी हुकूमत ने न केवल इन दोनों नेताओ को एक अलग दर्जा और सुविधाएं प्रदान कर रखी थी अपितु इनके निष्ठावान कठपुतलियों के हाथो में सत्ता के अधिकार भी दे रखे थे।

 

 

हालांकि उदारवादी हमें ये समझाने की कोशिश करते नज़र आते है की नेहरू और गाँधी राजनैतिक बंदी हुआ करते थे इसलिए अंग्रेजी हुकूमत उनसे वो व्यवहार नहीं कर सकती थी जो अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ किया जाता था। सच्चाई ये है की इन दोनों “महान” नेताओ ने ब्रितानी हुकूमत के पक्ष में काम किया और उनके मोहरे बन कर देश को लूटने में अंग्रेज़ो की मदद करते रहे, उसके बाद जब अंग्रेज़ो ने भारत छोड़ने का फैसला किया (जिसकी कई वजहें थी गांधी और नेहरू नहीं) तो सत्ता की चाभी इन दोनों नेताओ के हाथ में दे दी ताकि ये बचे खुचे देश को भी लूट सके। आज के दिन ये सर्वविदित है की नेहरू – गाँधी खानदान ने देश को लूटने में कोई कसार नहीं छोड़ी, अपितु उन्होंने देशवासियो के कल्याण के विरुद्ध कार्य किया।

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