October 3, 2022

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आरक्षण एक कोढ़ है, जिसे ख़त्म करना जरुरी है, आरक्षण का काला चिटठा पढने के लिए क्लिक करें

भारत की राजनीती में आरक्षण एक अहम् मुद्दा बन चूका है। आरक्षण को लेकर सबका मत अपने स्वार्थ अनुसार है। जिसका जिस पक्ष में अपना हित दिख रहा होगा, वह उसी का पक्ष ले लेता है। वैसे आरक्षण तो देश में समानता लाने के लिए बनाया गया था, लेकिन आज यह सिर्फ विवाद का रूप ले रहा है। आज हम आरक्षण के बारे में वो सारी जानकारी देंगे, जो आपको जरुर जानना चाहिए।
क्या है आरक्षण

भारत में लोगों के बिच समानता लाने के लिए आरक्षण लाया गया, जिसके अंतर्गत उन छोटी जाति के लोगों को ऊपर लाने के लिए सरकारी सेवाओं और संस्थानों में नौकरी, शिक्षा एवं अन्य क्षेत्र में अतिरिक्त विशेष छूट दी जाती है। आरक्षण का मुख्य उद्देश्य पिछड़े समुदाय,अनुसूचित जाति और जनजाति के सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करना था। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार किसी भी जाति को 50% से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता, लेकिन राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने 68% आरक्षण का प्रस्ताव रखा है, जिसमें अगड़ी अर्थात सामान्य जातियों के लिए 14% आरक्षण भी शामिल है। हर राज्य और हर क्षेत्र में आरक्षण के लिए अलग अलग कोटा है।

आरक्षण का इतिहास

देश में अस्पृश्यता का चलन जोरों पर था। सन 1882 में हंटर आयोग की नियुक्ति हुई। ज्योतिराव फुले ने नि:शुल्क अनिवार्य शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आनुपातिक आरक्षण की मांग की। सन 1891 ब्रिटिश सरकार द्वारा मूल निवासियों की अनदेखी करके विदेशियों को नौकरी देने के खिलाफ प्रदर्शन किया गया और इसके साथ ही त्रावणकोर के सामंती रियासत द्वारा सरकारी नौकरी में आरक्षण मांगी गयी। सन 1902 में महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महराज ने आरक्षण अधिनियम लागू कर दिया था, जोकि पहला सरकारी आदेश है।
सन 1942 में बी आर अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की। इसके साथ ही सरकारी सेवाओं और शिक्षा क्षेत्र में दलितों के लिए आरक्षण की मांग की। आजादी के बाद डॉ॰ अम्बेडकर को भारतीय संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष बनाया गया। सन 1953 में कालेलकर आयोग स्थापित हुआ। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण को स्वीकार किया गया, जबकि ओबीसी के सिफ़ारिशो को अस्वीकृत कर दिया गया। इसके बाद समय समय पर बहस और मुद्दा गरमाता रहा और सन 2005 तक आरक्षण में 93 संशोधन हो चूका है। सन 2006 में ओबीसी को भी आरक्षण मिलने के बाद कुल आरक्षण 49 से भी उपर हो गया है।

इन्हें भी मिलने लगा आरक्षण

सामान्य वर्ग के लोगो को भी अब १०%आरक्षण मिल गया है। जातिगत आरक्षण के योग्य उन व्यक्तियों को भी आरक्षण से बाहर रखा गया है, जिनकी सलाना आय 8 लाख या उससे अधिक है। साथ ही डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, अभिनेता, सलाहकारों, मीडिया कर्मी, लेखकों, कर्नल और समकक्ष रैंक या उससे ऊंचे पदों पर आसीन रक्षा विभाग के अधिकारी, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, सभी केंद्र और राज्य सरकार के ए और बी वर्ग के अधिकारियों के बच्चों को भी आरक्षण से बाहर रखा गया है। लेकिन ये सब कहने को है।

आरक्षण से क्या हुआ परिवर्तन

आरक्षण के तहत लोगो में समानता लाने वाले कथन के साथ धोखा हुआ है। आरक्षण से कोई समानता नहीं आयी, अपितु असमानता का एक अन्य रूप ने जन्म ले लिया। कोई अत्यंत गरीब होने के बावजूद भी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाता है, तो कोई इसका अनावश्यक दुरुपयोग करता है। मैं किसी भी दृष्टि से आरक्षण को बुरा नहीं कह सकता हूँ, लेकिन जो नीतियाँ बनायीं गयीं, वो कहीं ना कहीं अपूर्ण रह गयी या राजनीति का शिकार हो गयीं। अगर ऐसा नहीं है तो आजादी के 70 साल बाद तक आरक्षण लेते रहने के बाद अभी भी दलित पीछे क्यों रह गए हैं? कोई जवाब दे सकता है? 70 साल कम नहीं होते हैं।

आरक्षण का राजनीतिकरण

 

अब तो देश के लोगों में खुद को पिछड़ा कहने की होड़ सी लग गयी है। जो चीजें सम्भव नहीं है, उसकी मांग करने का मतलब है कि इसके पीछे राजनीती का हाथ है। महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा में सबसे संपन्न माने जाने वाले मराठा, पटेल और जाट को आरक्षण चाहिए। यह राजनीती नहीं तो और क्या है। कुछ समय में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी आरक्षण की मांग पर जोर देने लगेंगे। हमारे नेताओं को समझ में नहीं आ रहा है कि यह जो अंग्रेजो वाली चाल वे चल रहें हैं, वो कितना खतरनाक हो सकता है। घटिया राजनीति की वजह से ही आरक्षण एक जहर बन चूका है, जिसे ना निगला जा सकता है और ना ही उगला जा सकता है।
क्या है विवादित आरक्षण का समाधान

यहाँ मैं अपना व्यक्तिगत राय देना चाहता हूँ। आरक्षण लोगों में समानता लाने के लिए बनाया गया था, लेकिन यह दूसरी दृष्टि से असमानता को बढ़ावा दे रहा है। इसका विकल्प निकलना चाहिए। मेरा एक ही उद्देश्य है कि देश एकता और अखंडता के साथ विकास की तरफ बढे। मेरी यह राय किसी को सही तो किसी को बुरा भी लग सकता है, लेकिन अगर आप सभी स्वार्थ से परे होकर देश की भलाई के लिए सोचेंगे तो आपको मेरी राय से शायद कोई आपत्ति ना हो। सबसे पहले तो देश में राजनीती का तरीका बदलना होगा। अब समय आरक्षण को ख़त्म करने का आ गया है। आरक्षण देश के हित में नहीं है। आरक्षण रूपी इस जहर को ख़त्म करना जरुरी हो गया है।
हम जो बेकार बनकर चुनाव के दौरान किसी भी रैली में जाते हैं, उस पर काबू करना होगा। बल्कि रैली के विरुद्ध प्रदर्शन करना चाहिए। नेताओ को जो भी कहना है वो इन्टरनेट, सोशल मीडिया, न्यूज़ टीवी चैनल या न्यूज़ पेपर के माध्यम से कह सकते हैं। ऐसा करके रैली के माध्यम से लोगों का समय ख़राब करना, अनावश्यक नारा, भड़काऊ बयान बाजी, ट्रैफिक, फिजूल खर्ची आदि सब बंद हो जायेगा।

हमें आपस में मिलजुल कर रहना चाहिए। लोगों का नजरिया है, मुस्लिमो का और दलितों का शोषण हो रहा है, जोकि अर्ध सत्य है। देश पहले की तरह आज भी टुकडो टुकडो से मिलकर बना हुआ है। मतलब जिस क्षेत्र में जिस समुदाय की संख्या अधिक है, वही वहां पर दबंग है। इसलिए हम सभी को मिलजुल कर रहने की आदत डालनी चाहिए। एक दुसरे के रीतियों और परम्पराओ का मजाक उड़ाने के बजाय सम्मान करना चाहिए।

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