June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

आरक्षण क्यों जरूरी है ? यदि नहीं तो क्या होगा उचित उपाय ?

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आरक्षण पिछडो के लिए जरूरी ? आरक्षण का आधार सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक पिछड़ापन क्यों कहा ? आरक्षण हटे तो सरकार को क्या करने होंगे प्रबंध ? इन्ही मुद्दों पर एक समग्र चिंतन ।

 

आरक्षण : एक स्वस्थ समाज का आधार ?
मैं शुरुवात करता हूँ – “ सुप्रीम कोर्ट के तमाम उन वक्तयों से जिनमें माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का आधार सामाजिक पिछड़ापन है , इसे आर्थिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता है । “
सुप्रीम कोर्ट के इस प्रकार के वक्तयों से क्या सभी सामाजिक वर्ग संतुष्ट हैं / हो सकते हैं ? जवाब स्पष्ट और सरल है – बिलकुल नहीं । समाज की किसी भी व्यवस्था में हर वर्ग सन्तुष्ट नहीं रहता है । इसके पीछे के कारणों में मुख्यतः वैयक्तिक भिन्नता , वैचारिक वैविध्य और निजी स्वार्थ ( मनुष्य का स्वार्थी होना उसकी प्रकृति है ) हैं । इसको और अधिक सरल तरीके से कहूँ तो –
आरक्षण समर्थक गुट में अधिकांशतः वही जनसमूह हैं जो इससे लाभान्वित हो रहें हैं ।
आरक्षण विरोधी गुट में अधिकांशतः वहीं जनसमूह हैं जो इससे लाभान्वित नहीं हो रहे या औरों का लाभान्वित होना इनसे देखा नहीं जा रहा ।
तो इन आधारों पर , वर्तमान में समाज मुख्यतः दो वर्गो में विभाजित होता जा रहा है – आरक्षण समर्थक गुट व आरक्षण विरोधी गुट । और आये दिन इन वर्गों में परस्पर संघर्ष होता भी दिखता है । संघर्ष विविध रूपों में हो रहा है – स्वस्थ एवं तार्किक बहस , पान की दूकान पर बहस , नाइ की दुकान पर बहस , अस्पतालों में बहस , शिक्षण संस्थाओं में बहस , संसद / विधानमण्डल में बहस और अदालतों में बहस । अंत की अदालती बहस सर्वोपरि है जो संविधान के मूल ढाँचे ( मूल भावना ) को बड़ी ही निष्ठा से सहेजकर लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना साकार करता है ।
वर्तमान में जो सर्वाधिक ज्वलंत मुद्दा बन गया है – वह है कि “ आरक्षण का आधार आर्थिक ” बनाया जाय । सवर्णों का तर्क है कि गरीबी कहीं भी डेरा डाल सकती है और सवर्ण भी गरीब होते है । गरीबी सम्बन्धी तर्क सर्वथा उचित है । गरीबी हर वर्ग/ परिवार को प्रभावित कर सकती है । गरीब व्यक्ति के लिए जीवन- पालना बड़ा बोझिल हो सकता है ।
लेकिन ये बोझ तब और अधिक हो जाता है जब गरीबी के साथ- साथ समाजिक ढांचा और वर्ग- विभाजन ( वर्ग विभाजन का आधार जाति, धर्म , वंश , नस्ल इत्यादि कुछ भी हो ) भी जीविका में दखलंदाज़ी करने लगते हैं । आये दिन समाज में अनेक ऐसे उदाहरण मिल ही जाते हैं जहां सामाजिक ढाँचे की चोट से हारकर व्यक्ति गलत कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाता है ।

 

शायद इसी रुग्णता ( सामाजिक ढांचा ) को बाबा साहब ने बहुत ही करीब से देखा । इसीलिये बाबा साहब अम्बेडकर ( जिन्हें कुछ अल्पज्ञ संविधान के लेखक कहते हैं , बताना चाहूँगा कि संविधान निर्माण की एक समिति-प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे बाबा साहब ) ने अपना सम्पूर्ण जीवन इस सामाजिक रुग्णता को दूर करने में न्योछावर कर दिया । अपने स्वस्थ तर्कों के माध्यम से उन्होंने संविधान सभा ( जिसमे अधिकाँश सवर्ण बुद्धिजीवी ही थे ) को इस बुराई का अंत करनें के लिए राजी कर लिया ।
इसी कारण से आरक्षण की एक व्यवस्था का जन्म हुआ और इसका आधार सामाजिक पिछड़ापन (सामाजिक ढाँचे की रुग्णता ) दिया गया । जो कि संविधान की मूल भावना में व्याप्त है । इसी मूल भावना को आधार बनाकर माननीय सुप्रीम कोर्ट ( जहां कोई भी अनुसूचित जाति/ जनजाति का जज है ही नहीं । यदि हैं तो संख्या एक या दो से अधिक नही होगी ) समय समय पर अपनी प्रतिक्रिया देता रहता है ।

 

सामाजिक ढांचा कैसे हमें प्रभावित करता है ?

एक रेखाचित्र के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ । एक सवर्ण ( क्षत्रिय ) और दलित ( उदाहरण के लिए ‘ चमार ’ जाति का व्यक्ति ) , दोनों ही बेहद गरीब और किसान है और मुश्किल से अपने परिवार का भरण- पोषण कर पा रहे हैं । उन्हें मदद की जरुरत पड़ गयी और एक अन्य क्षत्रिय से मदद की गुहार लगानें जाना पड़ा । दोनों के साथ इस तीसरे क्षत्रिय के व्यवहार में बड़ी भिन्नता आती है । यह क्षत्रिय गरीब क्षत्रिय को भी सम्मान पूर्वक बैठाता है और समस्या पूछता है और जहां तक सम्भव होगा मदद का आश्वाशन देता है । किन्तु वहीं चमार जाति के व्यक्ति को बैठने के लिए भी नहीं कहता , बैठना तो दूर घर के बाहर ही मिलने के लिए कहता है और पीठ पीछे कुछ ऐसे कहते हैं । इसके विपरीत यदि कोई अभिजात/सम्भ्रांत भी दलित के पास जाकर उससे मदद की गुहार करता तो वह उसके घर नहीं जाता बल्कि उसे घर से बाहर बुलाकर उससे अपने मुद्दे की बात करता है और दलित द्वारा चाय/पानी पूछे जाने पर इंकार कर देता है या किसी बहाने टाल देता है । तो कहाँ हटा जाति का दिली निवास , जाति तो अभिजातों के दिल में बैठी है ।
हमारे सामाजिक ढाँचे ( जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित हो रहा है ) ने कैसी विसंगतियों को जन्म दिया । आपने देखा कि यह चमार जाति का व्यक्ति पेशे से किसान ही था लेकिन उस क्षत्रिय ने भेदभाव कर उसे स्वयं की नजरों में पिछड़ा और घ्रणित बना दिया । तो क्या आरक्षण उचित व्यवस्था नहीं है ?
तो क्या सामाजिक पिछड़ापन आरक्षण का उचित आधार नहीं है ? कमेंट बॉक्स में जरूर अपने विचार रखें ।

सवर्णों का तर्क है कि आरक्षण खत्म होना चाहिए क्योकि पिछड़ों ने अपनी प्रगति सुनिश्चित कर ली है । लेकिन जनगणना और तमाम सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट है कि जिस गति से उनका सामाजिक पिछड़ापन दूर करके उन्हें मुख्य धारा में शामिल करना था , वह आजादी के छः दशकों में भी न हो सका । किन्तु फिर भी यदि सरकार आरक्षण से छेड़खानी कर अभिजातों/संभ्रांतों को लाभान्वित करना चाहती है तो उसे कुछ सुझाव मानने होंगे । इन सुझावों में, मैं दावा करता हूँ कि जाति/ वर्ग संघर्ष समाप्त हो जाएगा । बस सरकार इन सुझावों को लागू करने के प्रबंध करे –

 

सभी निजी शिक्षण संस्थानों को समाप्त कर , सबकी शिक्षा ( कोई भी वर्ग हो ) को सरकारी संस्थानों में पूर्ण करना सुनिश्चित करें ।
सभी सरकारी शिक्षण संस्थानों को आवासीय बनाया जाय ( जिससे हर बालक को पढ़ने के समान अवसर के साथ साथ संसाधन भी एक ही जैसे मिल सके ) ।
दलितों/गरीब छात्रो को स्कॉलरशिप की व्यवस्था की जाय । इसका आधार आर्थिक होगा ।
ऐसे संस्थानों के सभी विद्यार्थी अपना सरनेम अपने पिता के नाम का पहला भाग लगाएंगे ।
ऐसे छात्र स्वस्थ प्रतिष्पर्धा के लिए तैयार रहेंगे ।
इस दौड़ में जो अव्वल होगा… वही होगा सिकंदर । फिर न कोई अभिजात होने की वजह से खुद को वंचित पायेगा और नही पिछड़ा या दलित होने की वजह से।

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इन अनुशंसाओं ( Recommendations ) का विरोध करने वाले सबसे ज्यादा अभिजात ही होंगे । जो तमाम मौलिक अधिकारो और स्वतंत्रता की दुहाई देकर इन्हें लागू करने से रोकेंगे । पहले जातिवाद समाप्त करें, दावा है मेरा आरक्षण खत्म करने की पहल पिछड़े/दलित ही करेंगे। अगर आप सहमत हैं तो लाइक करें और शेयर करना न भूलें ।

1 thought on “आरक्षण क्यों जरूरी है ? यदि नहीं तो क्या होगा उचित उपाय ?

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