August 4, 2021

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उच्चतम न्यायालय का फेसबुक प्रमुख को जारी समन को रद्द करने से इनकार

उच्चतम न्यायालय का फेसबुक प्रमुख को जारी समन को रद्द करने से इनकार
न्यायालय ने फेसबुक की याचिका खारिज करते हुए कहा कि दिल्ली विधान सभा को समन जारी करने का अधिकार है। हालांकि पीठ ने यह भी साफ किया कि फेसबुक के पास समिति द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर देने से इनकार करने का अधिकार भी है यदि वह ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ से संबंधित विषयों में अतिक्रमण करते हैं।

नयी दिल्ली:  उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि दिल्ली फरवरी 2020 जैसे दंगे दोबारा नहीं झेल सकती है। न्यायालय ने इस बात पर भी बल दिया कि भारत की ‘विविधता में एकता’ को बाधित नहीं किया जा सकता और इस संदर्भ में फेसबुक की भूमिका पर शक्तियों (समुचित प्राधिकार) द्वारा गौर किया जाना चाहिये।

न्यायमूर्ति एसके कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “इस घटना पर कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टिकोण से विचार करने की आवश्यकता को कम करके नहीं आंका जा सकता है। विधानसभा ने इसी पृष्ठभूमि में शांति एवं सद्भाव बनाने का प्रयास किया।’

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह देखते हुए कि फेसबुक दुनिया भर में समाज के विभिन्न वर्गों को आवाज देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। लेकिन, इसके साथ ही इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि उनके मंच पर गलत सूचनाओं से भरी विघटनकारी सामग्री को जगह न मिले।

फेसबुक जैसी क‍ंपनियों को जवाबदेह होना चाहिये, दिल्ली विधान सभा को समन जारी करने का अधिकार

उच्चतम न्यायालय ने साफ तौर पर कहा कि दिल्ली विधानसभा और उसकी समिति के पास अपने विशेषाधिकार के आधार पर अपने सदस्यों और बाहरी लोगों को पेशी के लिये सम्मन जारी करने का अधिकार है। साथ ही फेसबुक जैसी कंपनियां विचारों को प्रभावित करने की क्षमता के दम पर शक्ति का केन्द्र बन गई हैं और उन्हें जवाबदेह होना होगा।

न्यायालय ने कहा, “हमारे देश की विशाल आबादी के कारण फेसबुक के लिए यह एक महत्वपूर्ण स्थान है। हम संभवत: स्थानीय संस्कृति, भोजन, वस्त्र, भाषा, धर्म, परंपराओं में पूरे यूरोप की तुलना में अधिक विविधता हैं और इसके बावजूद हमारा एक इतिहास है, जिसे आमतौर पर ‘विविधता में एकता’ कहा जाता है।’’

पीठ ने कहा कि इसे (विविधता में एकता को) किसी भी कीमत पर बाधित नहीं किया जा सकता। अज्ञानता का दावा करके अथवा कोई केंद्रीय भूमिका नहीं होने की बात कहकर फेसबुक जैसी विशाल संस्था किसी स्वतंत्रा के नाम यह नहीं कर सकता है। पीठ में न्यायमूर्ति दिनेश महेश्वरी और न्यायमूर्ति हृषिकेश राय शामिल हैं।

दिल्ली विधानसभा की समिति सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस के विषयों में दखल नहीं दे सकती

हालांकि न्यायालय ने फेसबुक की जवाबदेही तय करते हुए यह भी साफ किया कि दिल्ली विधानसभा की शांति और सद्भावना समिति ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ से संबंधित किसी विषय में ‘अतिक्रमण’ नहीं कर सकती है और सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक को इन विषयों पर सवालों के जवाब नहीं देने का अधिकार है।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि समिति के पास मुकदमा चलाने की शक्ति नहीं है। दिल्ली विधानसभा द्वारा स्थापित शांति और सद्भावना समिति एक अभियोजन एजेंसी की भूमिका नहीं निभा सकती है। न्यायालय की दोनों टिप्पणी से यह साफ है कि समिति को फेसबुक के सामने पेश होने का पूरा अधिकार है, किन्तु उसके पास समिति द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर देने से इनकार करने का अधिकार भी है यदि वह ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ से संबंधित विषयों में अतिक्रमण करते हैं।

पीठ ने कहा कि विधानसभा के पास कानून-व्यवस्था के विषय पर कानून बनाने की शक्ति नहीं है। यह विषय संविधान में संघीय सूची के अंतर्गत आता है। हालांकि, शांति और सद्भाव का मामला कानून-व्यवस्था और पुलिस से परे है।

दिल्ली विधानसभा के समिति अध्यक्ष ने फेसबुक की याचिका खारिज किए जाने का किया स्वागत

दिल्ली विधानसभा की शांति एवं सद्भाव समिति के अध्यक्ष राघव चड्ढा ने समिति के सम्मन को चुनौती देने वाली फेसबुक भारत के अधिकारी अजीत मोहन की याचिका खारिज करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले का बृहस्पतिवार को स्वागत किया और कहा कि फैसले का अध्ययन करने के बाद समिति की कार्यवाही जारी रहेगी।

दरअसल, विधानसभा की समिति ने पिछले साल उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से संबंधित एक मामले में फेसबुक भारत के उपाध्यक्ष तथा प्रबंध निदेशक मोहन को गवाह के तौर पर पेश होने के लिये कहा था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बाद उन्हें सम्मन भेजे गए थे।

चड्ढा ने शीर्ष अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए एक बयान में कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए यह माना कि दिल्ली विधानसभा की समितियों के विशेषाधिकार और शक्तियां संसदीय विशेषाधिकारों और अन्य विधानसभाओं के विशेषाधिकारों के समान हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘यह महत्वपूर्ण है कि अदालत ने यह भी पुष्टि की है कि इन विशेषाधिकारों के तहत शांति और सद्भाव समिति ‘गैर-सदस्यों’ को शासन के उन मामले में उसकी सहायता करने के लिए अपने समक्ष पेश होने के लिए बुलाने की हकदार है जो उसके दायरे में आते हैं।’’

चड्ढा ने कहा कि न्यायालय ने राय रखी कि मोहन के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई है और नागरिकों की भलाई से संबंधित वृहद सामाजिक मुद्दों की समीक्षा में उनकी सहायता लेने के लिए उन्हें नोटिस जारी किया गया है, इसलिए ‘‘फेसबुक इंडिया के किसी प्रतिनिधि को समिति के सामने पेश होना चाहिए’’।

उन्होंने कहा, ‘‘निर्णय की पूरी प्रति का इंतजार है। हम फैसले का अध्ययन करेंगे और उसके बाद उसके अनुसार कार्यवाही जारी रखेंगे।’’

चड्ढा ने कहा कि विधानसभा के अन्य विधायी पैनल की तरह शांति और सद्भाव समिति सभी संबंधित पक्षों की पूर्ण भागीदारी के साथ दिल्ली से जुड़े मुद्दों पर एक वास्तविक ‘‘विचार-विमर्श’’ प्रक्रिया जारी रखना चाहती है।

क्या है पूरा मामला?

न्यायालय ने दिल्ली विधानसभा की शांति एवं सौहार्द समिति की ओर से जारी सम्मन के खिलाफ फेसबुक भारत के उपाध्यक्ष तथा प्रबंध निदेशक अजित मोहन की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणियां की।

दरअसल, विधानसभा ने पिछले साल उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से संबंधित एक मामले में मोहन को गवाह के तौर पर पेश होने के लिये कहा था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बाद उन्हें सम्मन भेजे गए।

उन्होंने समिति द्वारा पिछले साल दस और 18 सितंबर को जारी नोटिस को चुनौती दी थी। समिति दिल्ली में हुए दंगों के दौरान कथित भड़काऊ भाषण फैलाने में फेसबुक की भूमिका की जांच कर रही है।

याचिका में कहा गया था कि समिति के पास यह शक्ति नहीं है कि वह अपने विशेषाधिकारों का उल्लंघन होने पर याचिकाकर्ताओं को तलब करे। यह उसकी संवैधानिक सीमाओं से बाहर है।

दिल्ली विधानसभा ने शीर्ष अदालत में दायर एक हलफनामे में कहा था कि मोहन को विशेषाधिकार हनन के लिए कोई समन जारी नहीं किया गया है।

फेसबुक अधिकारी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा था कि शांति समिति का गठन दिल्ली विधानसभा का मुख्य कार्य नहीं है क्योंकि कानून – व्यवस्था का मुद्दा राष्ट्रीय राजधानी में केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आता है।

विधानसभा समिति का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी ने कहा था कि विधानसभा को समन जारी करने का अधिकार है।

हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विधानसभा के समन का विरोध करते हुए कहा था कि कानून-व्यवस्था पूरी तरह से दिल्ली पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आती है, जो केंद्र सरकार के प्रति जवाबदेह है।

(भाषा इनपुट के साथ)

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