August 9, 2022

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उद्धव के इस्तीफे के बाद लड्डू खाते नजर आए देवेन्द्र फडणवीस, क्या हैं इसके मायने?

मुम्बई 29 जून |’वक्त बदलता है’ यह वाक्य सतत् सत्य है, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) ने ढाई साल पहले अपने सरकार के अंतिम सत्र के आखिरी दिन यही बात दोहराई थी. उन्होंने कहा था, ‘मैं वापस आऊंगा’ और आज वह दिन नजदीक आ गया है, जब बीजेपी महाराष्ट्र (Maharashtra) के सत्ता में फिर से काबिज होने वाली है. उद्धव ठाकरे की कुर्सी छोड़नी पड़ी उसका सबसे बड़ा कारण हैं एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) जो कभी उद्धव के बेहद करीबियों में गिने जाते थे. आज उनके साथ लगभग 39 विधायक बीजेपी की सरकार बनवाने को तैयार बैठे हैं.

हालांकि, ये सब कुछ इतनी जल्दी नहीं हुआ, इसके पीछे देवेंद्र फडणवीस की चाणक्य बुद्धि महीनों से काम कर रही थी. यही वजह थी कि पहले राज्यसभा चुनाव के दौरान महाराष्ट्र में बीजेपी ने बढ़त बनाई और उसके तुरंत बाद विधान परिषद के चुनावों में भी उसने आश्चर्यजनक रूप से कामयाबी हासिल की. इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर बीजेपी की सरकार बनती है तो उसमें देवेंद्र फडणवीस का रोल अहम होगा और ज्यादा उम्मीद इस बात की है कि सरकार की बागडोर भी उन्हीं के हाथों में होगी. उसके पीछे का कारण है कि अगर हम दूसरी राजनीतिक पार्टियों से बीजेपी में आए लोगों की लिस्ट पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि भारतीय जनता पार्टी उन्हें तुरंत सत्ता की कमान नहीं सौंपती, चाहे वह ज्योतिरादित्य सिंधिया हों या फिर हेमंत बिस्व सरमा, सब ने पहले अपनी वफादारी साबित की फिर उन्हें सत्ता की मलाई मिली.

दूसरी बार में उद्धव ठाकरे की सरकार गिराने की कोशिश कामयाब हुई

महाराष्ट्र में इस तरह का नाटक एक बार ढाई वर्ष पहले भी हो चुका है. हालांकि उस वक्त इस नाटक के सूत्रधार थे शरद पवार के भतीजे अजीत पवार. उस समय भी लग रहा था कि उद्धव ठाकरे की कुर्सी चली गई. मामला इतना गंभीर हो गया था कि एनसीपी के कुछ विधायकों के साथ अजीत पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ हाथ भी मिला लिया था और उप मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली थी. लेकिन मामला ज्यादा दिन तक चल नहीं पाया, शरद पवार ने ऐसी चाल चली कि अजित पवार को वापस घर लौट कर आना पड़ा और देवेंद्र फडणवीस को इस्तीफा देना पड़ा. हालांकि इस बार मामला उससे ज्यादा गंभीर था क्योंकि एकनाथ शिंदे के पास 39 शिवसेना के बागी है. इसके साथ ही 7 निर्दलीय विधायक भी शामिल थे और सबसे बड़ी बात की शिवसेना चाह कर भी उन तमाम विधायकों से संपर्क नहीं कर पा रही थी. इसलिए इस बात की पूरी गारंटी है कि महाराष्ट्र में बीजेपी वापसी कर रही है.

ऑपरेशन लोटस कामयाब हुआ

राज्यसभा चुनाव से ही महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और महाराष्ट्र बीजेपी अध्यक्ष सीआर पाटील ऑपरेशन लोटस चला रहे थे, जिसके चलते संख्या बल कम होने के बावजूद उन्होंने अपने एक अतिरिक्त उम्मीदवार संजय महाडिक को राज्यसभा में जीत दिलवा दी. वहीं उसके तुरंत बाद विधान परिषद के चुनाव में भी अपने एक अतिरिक्त उम्मीदवार प्रसाद लाड को जिता दिया. लेकिन यह सब तो हल्की चीजें थीं, ऑपरेशन लोटस का मेन मकसद तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी थी, जो अब बीजेपी के बहुत करीब दिखाई दे रही है. ऑपरेशन लोटस के सबसे बड़े सिपाही बने एकनाथ शिंदे जिन्होंने शिवसेना में रहते हुए ऐसी सेंध लगाई कि उसके विधायकों का एक पूरा जखीरा लेकर पहले सूरत फिर गुवाहाटी पहुंच गए.

शरद पवार थी सबकी निगाहें

इस पूरे उठापटक में शरद पवार का खेल समझ में नहीं आया है. पवार बहुत मंझे हुए खिलाड़ी हैं, इतनी जल्दी वह अपने पत्ते खोलते भी नहीं हैं. वैसे भी बीते दिनों जिस तरह से उनकी पीएम मोदी से मुलाकात हुई थी उसे लेकर भी राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा हुई. इस बार दिल्ली में अमित शाह से लेकर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, नितिन गडकरी जैसे तमाम बड़े नेता पूरी तरह से चौकन्ने थे. वह किसी भी कीमत पर हाथ में आए इस मौके को छोड़ना नहीं चाहते हैं. और जिस तरह से बीजेपी ने एकनाथ शिंदे की सहायता से तमाम विपक्षी विधायकों को इकट्ठा कर लिया है उससे पूरी उम्मीद है कि महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार बन जाएगी.

शिवसेना ने इतनी बड़ी बगावत नहीं देखी

शिवसेना में इस बगावत से पहले कई बार कई बड़े नेताओं ने बगावती सुर अपनाए हैं और पार्टी से अलग हुए हैं. लेकिन हर बार वह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की वजह से होती थी. चाहे बात छगन भुजबल की हो, नारायण राणे की हो, गणेश नायक की हो या फिर उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई राज ठाकरे की. इन सब की बगावत एक सीमित दायरे में थी और सबसे बड़ी बात कि व्यक्तिगत थी. लेकिन एकनाथ शिंदे ने तो सीधे-सीधे पार्टी को ही तोड़ दिया है. और इसकी सबसे बड़ी वजह है शिवसेना के विधायकों में सामूहिक असंतोष का विस्फोट है. पुत्र मोह के चलते उद्धव ठाकरे सिर्फ आदित्य ठाकरे और संजय राऊत के इर्द-गिर्द ही घूमते रहे. बालासाहेब ठाकरे की तरह सब को एक साथ लेकर चलने वाले नेतृत्व की क्षमता उनमें नहीं थी, यही वजह है कि अब एकनाथ शिंदे गुट के जितने भी विधायक थे सब ने शिवसेना से अपने संपर्क तोड़ दिए हैं.

 

दरअसल, एक वक्त था जब शिवसेना में उद्धव ठाकरे के बाद दूसरे नंबर के नेता एकनाथ शिंदे थे. लेकिन कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने के बाद धीरे-धीरे शिंदे का कद छोटा होने लगा और उनकी जगह लेते संजय राऊत दिखे. संजय राउत की वजह से एकनाथ शिंदे की इतनी ज्यादा उपेक्षा हुई कि वह इसे बर्दाश्त नहीं कर सके. शिंदे तो पहले से ही कहा करते थे कि संजय राऊत निजी बातचीत में कुछ और कहते हैं और मीडिया के सामने जाकर दूसरी बात कहते हैं.

 

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