June 26, 2022

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सच के साथ

उद्धव ठाकरे के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी से ज्यादा जरूरी शिवसेना को टूटने से बचाना है

न्यूज डेस्क |महाराष्ट्र में आए सियासी भूचाल से उद्धव ठाकरे सरकार एक बार फिर मुश्किल में घिर गई है। अबकी बार संकट शिवसेना विधायक दल के नेता और नगर विकास मंत्री एकनाथ शिंदे ने खड़ा किया है। अभी शिवसेना के बत्तीस विधायकों को लेकर वे गुवाहाटी में सुरक्षित डेरा डाले हुए हैं। शिंदे की मांग है कि उद्धव अब कांग्रेस और राकांपा का साथ छोड़ें और भारतीय जनता पार्टी के साथ मिल कर सरकार बनाएं।

गौरतलब है कि ये वही एकनाथ शिंदे हैं जो हाल तक उद्धव ठाकरे के बेहद करीबी बने हुए थे। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि महाविकास आघाडी सरकार कितने दिन टिक पाएगी? एकाध या कुछ विधायक होते तो समझ आता, लेकिन पचपन में से बत्तीस विधायक अगर शिंदे के खेमे हैं तो इसका मतलब साफ है। बल्कि शिंदे तो छियालीस विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं। अगर इतने सारे विधायकों को लेकर शिंदे दलबदल कर भाजपा में शामिल हो गए, जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा भी हैं, तो उद्धव ठाकरे कर क्या करेंगे? या शिंदे अपने समर्थक विधायकों के साथ इस्तीफा दे देते हैं तब भी सरकार अल्पमत में तो आ ही जाएगी। जाहिर है, इस बार संकट कहीं ज्यादा बड़ा है।

 

 

अगर मौजूदा संकट को शिवसेना के अंदरूनी मामले के संदर्भ में ही देखा जाए तो इसका मतलब यह है कि शिवसेना पर उद्धव ठाकरे की पकड़ कमजोर पड़ने लगी है। ताजा घटनाक्रम से लग रहा है कि पार्टी पर उनका नियंत्रण नहीं रह गया है। वरना कैसे विधायक मुंबई से वाया सूरत गुवाहाटी पहुंचते रहे और उद्धव को पार्टी के भीतर खदक रही इस खिचड़ी के बारे में हवा तक नहीं लगी।

 

आखिर यह सब एक दिन में तो हो नहीं गया होगा! यह कवायद लंबे समय से चल रही होगी। यानी मुख्यमंत्री और शिवसेना का खुफिया तंत्र नाकाम रहा इन सब चीजों को भांपने में! एकनाथ शिंदे भले शिवसेना को नुकसान न पहुंचाने की बात कह रहे हों, लेकिन उन्होंने पिछले दो दिनों में जितना और जो कर दिखाया है, उससे ज्यादा वे शिवसेना को और नुकसान क्या पहुंचाएंगे?

सत्ता हासिल करने के लिए पार्टियां जिस तरह के हथकंडे अपनाती रही हैं, उनसे लोकतंत्र को भारी नुकसान पहुंचा है। मामला सिर्फ महाराष्ट्र या शिवसेना तक ही सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश का उदाहरण तो कोई बहुत पुराना नहीं है। विधायकों को तोड़ने और बहुमत जुटाने के लिए पार्टियां क्या-क्या नहीं कर डालतीं, यह अब छिपा नहीं रह गया है। सवाल है कि आखिर क्यों शिंदे भाजपा के साथ गठजोड़ करने पर जोर डाल रहे हैं?

 

अभी ही उनकी अतंरात्मा क्यों जागी? यह सवाल भी उठता ही है कि विधायकों को अपने पाले में सुरक्षित रखने के लिए विमानों से एक जगह से दूसरी जगह लाने-ले जाने, महंगे रिजार्टों में रखने और उनकी सुख-सुविधाओं पर भारी-भरकम खर्च के लिए पैसा कहां से आता है? हाल में राज्यसभा चुनावों के दौरान भी पार्टियां विधायकों को बाड़ाबंदी में रखने के लिए पानी की तरह पैसा बहाती दिखीं। हालांकि यह सब नया नहीं है, पहले से चलता आ रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीति में ऐसा चलन ज्यादा ही बढ़ गया है। जिन राज्यों की माली हालत संतोषजनक नहीं है, जो कोविड महामारी की मार से उबरे भी नहीं हैं, लोग गरीबी में जीने को मजबूर हों, वहां सत्ता के नुमाइंदों पर इस तरह पैसा बहा कर सरकारें गिराने और बनाने के खेल चलते रहें तो इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है?

एकनाथ शिंदे ने गिराया ‘लेटर बम’, जानिए चिट्ठी की 7 बड़ी बातें…

आइए जानते हैं एकनाथ शिंदे के ‘लेटर बम’ की 7 बड़ी बातें…

– शिवसेना का मुख्यमंत्री होने के बावजूद मुख्यमंत्री आवास ‘वर्षा’ में पार्टी के विधायकों को ही प्रवेश नहीं मिल पाता था. मंत्रालय में मुख्यमंत्री सभी से मिलते हैं. पर आपने मंत्रालय में भी हमसे कभी मुलाकात नहीं की. और, इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि आप कभी मंत्रालय गए ही नहीं. मुख्यमंत्री आवास ‘वर्षा’ के दरवाजे ढाई साल में पहली बार असलियत में शिवसेना विधायकों के लिए खुले हैं. वरना विधायक बनकर भी हमें आपके आसपास वाले लोगों से विनती करके इस सीएम हाउस में प्रवेश मिलता था.

– निर्वाचन क्षेत्र के काम के लिए, व्यक्तिगत परेशानियों के लिए और अन्य कामों के लिए भी अनेक अवसरों पर आपसे मिलने की बार-बार विनती की गई. मुख्यमंत्री आवास ‘वर्षा’ के गेट पर कई-कई घंटों इंतजार के बावजूद मुलाकात के लिए प्रवेश नहीं मिला. कई बार फोन किया गया, पर फोन भी रिसीव नहीं किया गया. मेरा सवाल है कि क्या यह निर्वाचन क्षेत्र से जीतकर आने वाले पार्टी विधायक का अपमान नहीं है? ‘ये जो कथित चाणक्य रूपी क्लर्क आपके आसपास जुटे हैं, उन्होंने हमें दूर रखकर विधान परिषद चुनाव और राज्यसभा चुनाव की रणनीति बनाई और नतीजे पूरे महाराष्ट्र ने देखे.’

– हम सभी विधायक लंबे वक्त से कई तरह के अपमान सहन कर रहे हैं. हमने कभी भी इधर-उधर नहीं देखा और चीजों को बर्दाश्त करते रहे. इस बार पहली मर्तबा हम लोग अपने सवालों को लेकर एकनाथ शिंदे के दरवाजे पहुंचे. शिवसेना विधायकों के निर्वाचन क्षेत्र के साथ भेदभाव, विधायक निधि के साथ भेदभाव, अधिकारी वर्ग का असहयोग और कांग्रेस-एनसीपी की तरफ से लगातार अपमान को लेकर शिंदे साहब ने हम सभी विधायकों के अनुरोध पर न्याय और हक के लिए यह निर्णय (एमवीए से बगावत) लिया.

– हिंदुत्व, अयोध्या और राम मंदिर क्या शिवसेना के मुद्दे नही हैं? आदित्य ठाकरे हाल ही में अयोध्या गए. फिर हम लोगों को (शिवसेना विधायकों) को आपने अयोध्या जाने से क्यों रोका? आपने खुद फोन करके कई विधायकों को अयोध्या जाने से रोका. यहां तक कि मैंने कई साथी विधायकों के साथ मुंबई एयरपोर्ट से अयोध्या जाने के लिए लगेज चेक इन करवा लिया था. लेकिन, आपने एकनाथ शिंदे साहब को फोन कर हमें अयोध्या जाने से रोकने का दबाव डाला. हमें वापस लौटना पड़ा. राज्यसभा चुनाव में शिवसेना के एक भी विधायक ने क्रॉस वोटिंग नहीं की. लेकिन, विधान परिषद चुनाव में आपने हम पर इतना अविश्वास दिखाया. हमें रामलला के दर्शन तक करने नहीं दिया गया.

– साहेब (उद्धव ठाकरे) आपने हमसे (पार्टी विधायकों) वर्षा में मुलाकात नहीं की. लेकिन, कांग्रेस और एनसीपी के लोग आपसे नियमित मिलते रहे और अपने निर्वाचन क्षेत्रों का काम करवाते रहे. आपसे भूमि पूजन और उद्गाटन करवा रहे थे, सोशल मीडिया पर आपके साथ की फोटो लगाकर वायरल कर रहे थे. इस दौरान हमारे निर्वाचन क्षेत्र के लोगों को लग रहा था कि मुख्यमंत्री तो हमारा है. फिर हमारे विरोधियों को कैसे निधि मिल रही है. उनके काम कैसे हो रहे हैं.

– इस तरह की तमाम मुश्किल परिस्थितियों में माननीय बालासाहेब, धर्मवीर आनंद दिघे साहेब के हिंदुत्व पर चलने वाले एकनाथ शिंदे साहब का साथ हम लोगों ने दिया. हमारे मुश्किल से मुश्किल वक्त में भी हमेशा शिंदे साहेब का दरवाजा खुला रहा. शिंदे साहब का जैसा व्यवहार आज है, कल भी रहेगा. यह भरोसा हम सभी लोगों को है.

– कल आपने जो कुछ भी कहा (उद्धव ठाकरे का संबोधन) वह बहुत भावनात्मक था. लेकिन, उसमें हमारे किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया गया था. इसी वजह से हम अपनी भावनाओं को आप तक पहुंचाने के लिए पत्र लिख रहे हैं.

उद्धव ने खुद अपने पैरों पर मारी कुल्हाड़ी

एकनाथ शिंदे द्वारा शेयर की गई चिट्ठी को देख आसानी से कहा जा सकता है कि शिवसेना की फिलवक्त हालात के लिए उद्धव ठाकरे ही जिम्मेदार हैं. अपनी ही पार्टियों के विधायकों को मुख्यमंत्री आवास के बाहर इंतजार कराना, सीएम होने के बावजूद मंत्रालय नहीं जाना, सेकुलर छवि बनाने के लिए शिवसेना के सियासी आधार रहे हिंदुत्व के मुद्दों को खूंटी पर टांग देना, सीएम की कुर्सी बचाए रखने के लिए शिवसेना से ज्यादा एनसीपी और कांग्रेस के विधायकों का ख्याल रखना जैसे बातों को हवा देकर उद्धव ठाकरे ने खुद अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली. महाविकास आघाड़ी सरकार बनाकर उद्धव ठाकरे भले ही अपनी जिद को पूरा कर सीएम बन गए हों. लेकिन, इस सरकार का रिमोट एनसीपी चीफ शरद पवार के ही हाथ में था. और, बागी विधायकों ने साफ कहा है कि उनकी नाराजगी की वजह भी एनसीपी और कांग्रेस के साथ किया गया महाविकास आघाड़ी गठबंधन ही है.

 

उद्धव ठाकरे ने खेला बड़ा दांव: बहरहाल, उद्धव ठाकरे ने अपनी तरफ से सबसे बड़ा दांव खेल दिया है – सोशल मीडिया लाइव के जरिये सरेआम कह चुके हैं कि वो मुख्यमंत्री पद कौन कहे, वो तो शिवसेना प्रमुख की गद्दी तक छोड़ने को तैयार हैं.

हालांकि, उद्धव ठाकरे ने ऐसा करने से पहले एक शर्त भी रखी है – शिवसैनिकों को उनके सामने आकर खुद बोलना होगा, न कि किसी होटल से मीडिया के जरिये और बीजेपी या किसी अन्य राजनीतिक दल के प्रभाव में ऐसा कोई प्रदर्शन करना होगा.

मुश्किल ये है कि फिलहाल उद्धव ठाकरे के पास ऐसा करने के अलावा कोई चारा भी नहीं बचा है. शिवसेना के 55 विधायक हैं और एकनाथ शिंदे का दावा है कि करीब 40 विधायक उनके साथ हैं – साथ में कुछ निर्दलीय विधायकों के सपोर्ट का भी एकनाथ शिंदे ने दावा किया है.

1. उद्धव ठाकरे का सवाल है, ‘एकनाथ शिंदे को सूरत जाकर बात करने की क्या जरूरत थी?’ उद्धव ठाकरे ने का कहना है कि कुछ विधायक फोन करके कह रहे हैं कि वो लौटना चाहते हैं.

ये कहते हुए कि वो अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं और निभाते भी हैं, उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘मैं सीएम पद छोड़ने के लिए तैयार हू… मेरे बाद कोई शिवसैनिक मुख्यमंत्री बने तो मुझे खुशी होगी…’

एकनाथ शिंदे सहित महाराष्ट्र से बाहर चले गये विधायकों से उद्धव ठाकरे की अपील है कि वो उनके पास आयें, बात करें और साथ राज भवन जाकर इस्तीफा देते वक्त उनके साथ रहें.

2. नेतृत्व के सवाल पर उद्धव ठाकरे का कहना है, ‘जो शिवसैनिक ये सोचते हैं कि मैं शिवसेना का नेतृत्व नहीं कर सकता… ऐसा कहने के लिए आपको किसी विरोधी की नहीं, एक शिवसैनिक की जरूरत है – मैं शिवसैनिकों के लिए प्रतिबद्ध हू.’

3. नेताओं की पहुंच से बाहर रहने को लेकर अपनी सफाई में उद्धव ठाकरे ने कहा है, ‘लोग कह रहे थे कि मुख्यमंत्री मिलते नहीं हैं. शिवसेना कौन चला रहा है? मेरा ऑपरेशन हुआ था… मैं लोगों से मिल नहीं पाया… वो वक्त बहुत मुश्किल था. मैं अस्पताल से ऑनलाइन काम कर रहा था.’

4. और हिंदुत्व छोड़ने के मुद्दे पर भी उद्धव ठाकरे कहते हैं, ‘शिवसेना और हिंदुत्व एक दूसरे से जुड़े शब्द हैं… शिवसेना हिंदुत्व से दूर नहीं हो सकती – क्योंकि हमे मंत्र मिला है कि हिंदुत्व हमारी सांस है.’

अपने लाइव संबोधन आखिर में उद्धव ठाकरे ने बागी शिवसेना विधायकों से अपील की कि वे जहा कहीं भी हैं उनकी बात सुनें और वापस लौटकर उनसे बात करें. सही बात है. बात करने से ही बात बनती है, बशर्ते – बहुत देर न हो चुकी हो.

 

 

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