June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

एक सफल पीड़ित कौन है।

दरअसल इस पूरी व्यवस्था का पीड़ित कोई है ही नहीं. चेहरे उतने ही हैं. देहाड़ी पर ईंट और गारा उठाते मजदूर हों, बैलों वाले हों या ट्रैक्टर वाले किसान हों, या रेलवे के कुली; या फिर वर्दी में टशन से पेश आते पुलिसिये, इन्टरनेट पर आँखें गढ़ाए आयकर रिटर्न दाखिल करते सूट-बूट वाले नई पीढ़ी के पेशेवर, नोटबंदी की झुलसती कतारों में अपने सप्ताह भर के लेन-देन की जद्दोजहद करते छोटे व्यापारी, नौकरशाही के बड़े अफसर, नेता, मंत्री चपरासी सब के सब…. इन सब चेहरों में एक भी चेहरा पीड़ित नहीं है. फिर भी पीड़ा दिखती है. अस्पताल में दवाओं के अभाव में दम तोड़ते मरीजों के चेहरों पर दिखती है, डॉक्टर की लाइलाज लापरवाही से बीमार के खौफ़ज़दा चेहरे में दिखती है, डॉक्टरों के अपर्याप्त कमीशन में दिखती है, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के अधूरे रह गए टारगेट में दिखती है, दवा कम्पनियों के गिरते शेयर भाव में दिखती है, वसूली करती बैंकों की बैलेंस शीट में दिखती है.

हर उस जगह, जहाँ-जहाँ सूरज नियम से रोजाना व्यर्थ रोशनी बिखेरने चला आता है, जिसके लिए न कहीं अज़ान पढ़ी जाती है और न आरती उतारी जाती है, पीड़ित चेहरे दिखाई देते हैं. पर पीड़ित कोई नहीं है. हर चेहरा इसे अपने रुआब की सलवटों में दबाए घूमता रहता है, इसलिए दिखाई नहीं देती. इन सलवटों की परतें सहूलियत के हिसाब से खोली जाती हैं. एक अवसर देखकर, जैसे कि मुहूर्त निकाला जाता है, चेहरे के रंग उतरते दिखाई देते हैं. सलवटों के बीच गुथी हुई गन्दगी को पीड़ा की शक्ल देकर प्रस्तुत किया जाता है क्योंकि सामने कोई है जो इसे खरीदने में दिलचस्पी रखता है. जैसे दरवाजे पर आए रद्दी खरीदने वाले के साथ पुराने बेज़ार अखबारों का मोल-तोल होता है, वैसे ही इस गन्दगी का भी एक भाव होता है. जिस दिन, जिस जगह किसी खरीदार की बोली सही मिल जाती है, अखबारों की सलवटें खोल दी जाती हैं. पीड़ा उघड़ जाती है और वह इश्तिहारों का, खबरों का हिस्सा बन जाती है. शब्दकोष की परिभाषा के अनुसार एक सफल ‘पीड़ित’ वह है जो अपनी चालाकियों के हुनर अनुसार सलवटों की गन्दगी का अधिकतम मूल्य वसूलने में सफल हो जाता है. सच, यही पीड़ा की सही परिभाषा है. बाकी सब कोरी बकवास है.

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You may have missed

Copyright © All rights Reserved with Suchkesath. | Newsphere by AF themes.