September 27, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

यह सारे संशय इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि हम अपने आपको बाकी विश्व से अलग समझते हैं | हम समझते हैं कि हमारे मन के विचार हमने उत्पन्न किये हैं जबकि सच्चाई ये है कि आपके मन के विचार भी विश्व ने ही उत्पन्न किये हैं | आपने यह प्रश्नं यहाँ पर अंकित किया है उससे पहले भी आपने बहुत कुछ सोचा होगा | क्या वो विचार आपने उत्पन्न किये हैं या आपके जन्म के समय ही यह निर्धारित हो गया था कि आप इस दिन यह सवाल सेतु एशिया को भेजेंगे ?

(1 ) अब मान लीजिये हम यहाँ कुछ ऐसा जवाब तर्क सहित लिख देते हैं जिससे आपको यह विश्वास हो जाता है कि सब कुछ कर्म प्रधान है | आपमें अपना भाग्य बदलने का एक नया जोश जग जाता है | आप निर्णय लेते हैं कि आप किसी दुसरे शहर में जाकर अपना भाग्य आजमाएंगे | आप कर्म प्रधान मानसिकता के साथ दुसरे शहर के लिए रवाना हो जाते हैं और नए सिरे से अपना काम वहां शुरू करते हैं | वहां पर आप नया मोबाइल नंबर ले लेते हैं | अपना ईमेल ID भी नए काम के लिए नया बना लेते हैं | इसी तरह एक साल गुजर जाता है | नए शहर में कुछ दिन उत्साह से काम करने के बाद आपका उत्साह ठंडा पड़ने लग जाता है | फिर एक दिन आप अपनी पुराने वाली ईमेल ID खोलकर चेक करते हैं | आपको मालुम पड़ता है कि 6 महीने पहले एक बहुत बड़ी कंपनी ने आपको जॉब ऑफर की थी लेकिन आपने ईमेल चेक नहीं की और आपको पुराना नंबर भी बंद था इसलिए आपके हाथ से वह जॉब निकल गई |

आपके हमारा जवाब पढ़कर कर्म प्रधान बन जाने से आपका फायदा हुआ या नुक्सान ?

(2) अब मान लीजिये कि हम यहाँ पर एक ऐसा जवाब तर्क सहित लिख देते हैं जिससे आपको विश्वास हो जाता है कि सब कुछ भाग्य प्रधान है | आप यह जवाब पढने के बाद सब कुछ छोड़कर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाते हैं | आप सोचते हैं कि जो होना है सो होगा फिर हाथ पैर मारने से क्या लाभ ? कुछ दिन ऐसे ही पड़े रहते हैं और कुछ नहीं होता है | आप उबकर फिर घर से बाहर निकलते हैं | आपको पता चलता है कि आपका एक मित्र जिसका रिज्यूमे आपसे कमजोर है उसको एक बहुत अच्छी जॉब मिल गई है | अगर आप हाथ पर हाथ बैठकर यु ही न पड़े रहते और उस जॉब के लिए अप्लाई करते तो पक्का आपको ही वो जॉब मिलनी थी |

आपके हमारा जवाब पढ़कर भाग्य प्रधान बन जाने से आपका लाभ हुआ या हानि ?

देखिये , आपका इस समय प्रश्न करना और हमारा उत्तर लिखना भी आपके भाग्य का एक अंग है | अगर आप किसी और से यह सवाल पूछेंगे तो वह अपने हिसाब से आपको उत्तर देगा | लेकिन हम किसी भी सवाल का उत्तर, हमारे उत्तर का प्रश्न पूछने वाले के भाग्य में क्या रोल है यह जानकर देते हैं | और हमारा उत्तर यही है कि आप इधर उधर की बाते सुनकर निष्कर्ष मत निकालिए | सिर्फ प्रभु की सुनिए | प्रभु की सुनने के बाद निष्कर्ष निकालिए , खुद का निष्कर्ष निकालकर उसे प्रभु पर मत थोपिए |

कुछ लोग कर्म प्रधान नीति से जीवन जीते हैं | हो सकता है उन्हें उस नीति के कारण नुक्सान उठाना पड़ा हो लेकिन उन्हें इस बात का पता नहीं चलता न ही उन्हें इस बात का अफ़सोस होता है क्योंकि वे इस बात पर अडिग विश्वास रखते है कि जो कुछ उनके जीवन में हुआ है वह उनके अपने कर्मों के कारण हुआ है |

कुछ लोग भाग्य नीति से जीवन जीते हैं और उन्हें भी कोई अफ़सोस नहीं होता क्योंकि उनका विश्वास अडिग होता है कि उनके जीवन में सब कुछ भाग्य के कारण हुआ है |

कुछ लोग दोनों को मिला देते है | वे अपने आपको प्रभु को समर्पित कर देते हैं | वे जो भी कर्म करते हैं वह प्रभु को समर्पित कर देते हैं और जो भी मिलता है उसे प्रभु का प्रसाद मानकर आनंद से जीवन जीते हैं | वे सबसे ज्यादा सुख से जीवन जीते हैं |

आपको फिर से याद दिला दें , हमारा उपरलिखित शब्द लिखना और आपका यह शब्द पढ़कर कोई दिशा प्राप्त करना , सब इश्वर की माया है | इस बारे में आप आगे आने वाले अध्यायों में भी अच्छे से समझ सकेंगे |

 

एक सवाल जो अक्सर मेरे दिलो दिमाग में रहता है – कर्म प्रधान या भाग्य प्रधान? मैंने इस सवाल का हल ढूंढने का बहुत प्रयत्न किया पर अभी तक किसी ठोस नतीजे पे नही पहुँच पाया हूँ। यह सवाल मेरे दिलों दिमाग को कभी कभी झंझोर के रख देता है।
भगवद गीता में ये लिखा हुआ है की तुम कर्म करो, फल की चिंता न करो। और मैंने कई लोगों से सुना है की कर्म प्रधान है। तो फिर भाग्य क्या है? बहुत से लोग कहते हैं कि मनुष्य अपने कर्म से अपना भाग्य बदल सकता है। पर मैंने ये भी सुना है की भाग्य तो इंसान के जन्म से पहले ही लिखा जा चुका है। और एक बार भाग्य में जो लिखा जा चुका है उसे कोई नही बदल सकता। तो फिर कर्म प्रधान कैसे है? और अगर भाग्य ही सबकुछ है तो फिर इंसान कर्म ही क्यों करेगा? वो ये सोचेगा की जो भाग्य में होना है वो तो होके ही रहेगा, मैं कुछ क्यों करु?
कई लोग अक्सर ये उदाहरण देते है कि वो आदमी अपनी मेहनत, लग्न, परिश्रम और कर्मो के बदौलत आज जीवन में इस बड़े मूकाम पे पहुंचा है। उसने अपने कर्मो से अपना भाग्य बदला। और कई बार लोग ये भी उदाहरण देते है कि यह व्यक्ति बिना किसी परिश्रम के, सिर्फ अपने भाग्य के कारण आज इस मुकाम पे है। और कई बार लोग ये भी कहते हैं की इस व्यक्ति को इसके कर्म के अनुसार फल नही मिला। इसने मेहनत तो बहुत की, पर इसे इसके मेहनत का फल नही मिला। और कई बार किसी व्यक्ति को बिना मेहनत किये ही सबकुछ या बहुतकुछ मिल जाता है, अच्छे भाग्य के वजह से।

इसीलिए मैं ये जानना चाहता हूँ की जीवन में भाग्य ही सबकुछ है या कर्म। जीवन में कर्म प्रधान होता है या भाग्य या जीवन कर्म और भाग्य दोनों का एक मिश्रण है? या दोनों का अपना अपना महत्त्व है जीवन में?

 

कृपया करके मेरे इस दुविधा (कर्म प्रधान या भाग्य प्रधान) का हल या उत्तर बताएं।

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वैसे मेरे समझ से:-

कर्म प्रधान विश्व रची राखा
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एक व्यक्ति था उसके तीन मित्र थे।
एक मित्र ऐसा था जो सदैव साथ देता था।
एक पल, एक क्षण भी बिछुड़ता नहीं था।
दूसरा मित्र ऐसा था जो सुबह शाम मिलता।
और तीसरा मित्र ऐसा था जो बहुत दिनों में जब तब मिलता।
एक दिन कुछ ऐसा हुआ की उस व्यक्ति को अदालत में जाना था किसी कार्यवश और किसी को गवाह बनाकर साथ ले जाना था।
अब वह व्यक्ति अपने सब से पहले अपने उस मित्र के पास गया जो सदैव उसका साथ देता था और बोला :-
“मित्र क्या तुम मेरे साथ अदालत में गवाह बनकर चल सकते हो ?
वह मित्र बोला :- माफ़ करो दोस्त, मुझे तो आज फुर्सत ही नहीं।
उस व्यक्ति ने सोचा कि यह मित्र मेरा हमेशा साथ देता था।
आज मुसीबत के समय पर इसने मुझे इंकार कर दिया।
अब दूसरे मित्र की मुझे क्या आशा है।

फिर भी हिम्मत रखकर दूसरे मित्र के पास गया जो सुबह शाम मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।
दूसरे मित्र ने कहा कि :- मेरी एक शर्त है कि में सिर्फ अदालत के दरवाजे तक जाऊँगा, अन्दर तक नहीं।
वह बोला कि :- बाहर के लिये तो मै ही बहुत हूँ मुझे तो अन्दर के लिये गवाह चाहिए।
फिर वह थक हारकर अपने तीसरे मित्र के पास गया जो बहुत दिनों में मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।

तीसरा मित्र उसकी समस्या सुनकर तुरन्त उसके साथ चल दिया।
अब आप सोच रहे होँगे कि वो तीन मित्र कौन है…?
तो चलिये हम आपको बताते है इस कथा का सार।
जैसे हमने तीन मित्रों की बात सुनी वैसे हर व्यक्ति के तीन मित्र होते है।
सब से पहला मित्र है हमारा अपना ‘शरीर’ हम जहा भी जायेंगे, शरीर रुपी पहला मित्र हमारे साथ चलता है।

 

एक पल, एक क्षण भी हमसे दूर नहीं होता।
दूसरा मित्र है शरीर के ‘सम्बन्धी’ जैसे :- माता – पिता, भाई – बहन, मामा -चाचा इत्यादि जिनके साथ रहते हैं, जो सुबह – दोपहर शाम मिलते है।
और तीसरा मित्र है :- हमारे ‘कर्म’ जो सदा ही साथ जाते है।
अब आप सोचिये कि आत्मा जब शरीर छोड़कर धर्मराज की अदालत में जाती है, उस समय शरीर रूपी पहला मित्र एक कदम भी आगे चलकर साथ नहीं देता।
जैसे कि उस पहले मित्र ने साथ नहीं दिया।
दूसरा मित्र – सम्बन्धी श्मशान घाट तक यानी अदालत के दरवाजे तक राम नाम सत्य है कहते हुए जाते है।
तथा वहाँ से फिर वापिस लौट जाते है।
और तीसरा मित्र आपके कर्म है।

कर्म जो सदा ही साथ जाते है चाहे अच्छे हो या बुरे।
अगर हमारे कर्म सदा हमारे साथ चलते है तो हमको अपने कर्म पर ध्यान देना होगा अगर हम अच्छे कर्म करेंगे तो किसी भी अदालत में जाने की जरुरत नहीं होगी।
और धर्मराज भी हमारे लिए स्वर्ग का दरवाजा खोल देगा।
इसलिये हमे भगवान् का आश्रय लेकर अपने कर्म करते रहना है।

 

 

1 thought on “कर्म प्रधान है या भाग्य?

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