June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

कश्मीर की राह के कांटे

जम्मू-कश्मीर पर 20 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान की ओर से कबायलियों का आक्रमण हुआ, जिसका जम्मू-कश्मीर की सेना और वहां के लोगों ने जमकर मुकाबला किया। पाकिस्तान का जम्मू-कश्मीर को हड़पने का इरादा जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भारतीय सेना के साथ मिल कर नाकाम कर दिया, फिर भी पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम प्रस्ताव के बावजूद जम्मू-कश्मीर के गिलगित-बल्तिस्तान की बत्तीस हजार वर्गमील भूमि पर अवैध आधिपत्य जमा लिया, जो आज भी जारी है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में 13 अगस्त, 1948 को साफ-साफ आदेश दिया गया था कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर की तमाम अधिकृत भूमि को खाली कर दे। पाकिस्तान ने केवल साढ़े चार हजार वर्गमील भूमि को छोड़ कर, जो जम्मू प्रदेश का क्षेत्र था, मीरपुर से मुजफ्फराबाद तक आजाद कश्मीर का दर्जा देकर जम्मू-कश्मीर की बाकी बत्तीस हजार वर्गमील अधिकृत भूमि, जो गिलगित-बल्तिस्तान का हिस्सा है, उसे पाकिस्तान के साथ मिला दिया, जिसको पाकिस्तान ने 2009 में एक प्रांत घोषित कर दिया। त्रासदी यह है कि भारत के रक्षामंत्री कृष्ण मेनन के बाद भारत की इस आवाज को कि जम्मू-कश्मीर की समस्या है क्या, किसी ने विश्व के समक्ष नहीं रखा।

त्रासदी यह है कि भारत ने जिस गंभीरता और आत्मविश्वास के साथ जम्मू-कश्मीर की समस्या को विश्व के समक्ष रखना था, नहीं रख सका, और आज भी जब आरएसएस समर्थित भारत सरकार दिल्ली में बहुसंख्यक शक्ति से राज चला रही है, उसे भारत की एकता और अखंडता की मजबूती के लिए और भारत की विदेश नीति को मजबूत बनाने के लिए जो कदम उठाने थे, नहीं उठा सका। जम्मू-कश्मीर में आंतरिक विवाद ज्यादा परेशानी की वजह है और इसका कारण एक है कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने बाकी 577 रियासतों के शासकों की तरह भारत में विलय किया था। इस विलय को पाकिस्तान या कोई भी विदेशी शक्ति झुठला नहीं सकती थी, लेकिन महाराजा हरिसिंह के विलय फैसले पर भारत के नेताओं ने यानी भारतीय संसद ने खुद रोक लगा कर रखी है और उसे इस्तेमाल किया है संविधान में एक अस्थायी प्रावधान लगा कर, वह है धारा 370, जो राष्ट्र की रक्षा के लिए एक खतरनाक मामला बन कर रह गया है।

जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्तूबर, 1947 को भारत में विलय किया। बड़ौदा के महाराजा ने 1948 में विलय किया, जबकि हैदराबाद और जूनागढ़ के रजवाड़ों ने विलयपत्र पर हस्ताक्षर ही नहीं किए थे। 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान पूरे देश पर लागू हुआ और 577 राज्य (रियासतें) आदि भारतीय गणराज्य के स्थायी हिस्सेदार बन गए। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने विलय के उसी प्रारूप पर अपने हस्ताक्षर 26 अक्टूबर, 1947 को कर दिए और जम्मू-कश्मीर से खुद जलावतन भी हो गए। प्रश्न उठता है कि जब 577 राज्यों (रियासतों) को भारत संघ में जोड़ दिया गया, जिनमें दो रियासतों के शासकों ने हस्ताक्षर भी नहीं किए थे, तब जम्मू-कश्मीर को अलग क्यों रखा गया? इसे भारत के संविधान में शामिल क्यों नहीं किया गया और जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान में अस्थायी प्रावधान धारा-370 लगा कर भारतीय संविधान से अलग क्यों कर दिया? सड़सठ वर्ष गुजर चुके हैं, पर अस्थायी स्वरूप नहीं बदल सका। जम्मू-कश्मीर में महाराजा हरिसिंह के बनाए हुए 1939 के संविधान का विस्तार करके 1956 में जम्मू-कश्मीर पर एक तथाकथित संविधान थोप दिया गया।

जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भारत की परंपराओं, संस्कृति, धर्मनिरपेक्षता को जमकर निभाया, जबकि भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ हमेशा खिलवाड़ करती रही। जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ सबसे बड़ी त्रासदी यह हुई कि जम्मू-कश्मीर को संविधान तो दे दिया, पर उसमें मानवाधिकारों का कोई उल्लेख ही नहीं है, जिन मानवाधिकारों को भारतीय संविधान के अध्याय-तीन में बड़ी खूबसूरती से पेश किया गया है। जम्मू-कश्मीर तीन क्षेत्रों की संस्कृति और सभ्यता से जुड़ा रहा है और होना तो यह चाहिए था कि तीनों क्षेत्रों को भारतीय संविधान के अंतर्गत उनकी मान्यता के आधार पर मानवाधिकार और राष्ट्र में आगे बढ़ने के अवसर मिलते।

हुआ क्या? धारा-370 के नाम पर जम्मू-कश्मीर के लोगों का शोषण सड़सठ वर्षों से हो रहा है और इस शोषण की जवाबदेही उन केंद्रीय नेताओं की बनती है, जो दिल्ली में बैठ कर जम्मू-कश्मीर के लोगों की आकांक्षाओं, मानवाधिकारों और भविष्य से खिलवाड़ करते रहे हैं। यह कहना गलत न होगा कि आज जम्मू-कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी भारत की संसद पर है, कि वह जम्मू-कश्मीर के लोगों को आज भी मानवाधिकार क्यों नहीं प्रदान कर सकी। जम्मू-कश्मीर का हाइकोर्ट भी भारत के संविधान के पूरे दायरे में नहीं आता। जम्मू-कश्मीर का हाइकोर्ट जूडिकेचर नहीं है। जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए भारतीय संविधान की अध्याय-3 की मौजूदगी जम्मू-कश्मीर के संविधान में है ही नहीं। इसमें जम्मू-कश्मीर के लोगों का दोष क्या है?

 

जम्मू-कश्मीर में जो हालात लगभग चार सप्ताह से चल रहे हैं, वे कोई नए नहीं हैं। मैं छठी कक्षा में रामनगर के हाइस्कूल में पढ़ता था, तत्कालीन प्रधानमंत्री (जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में) शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने मुझे क्लासरूम से बाहर फेंकने का आदेश दिया था, क्योंकि शेख अब्दुल्ला के राज में मेरे पिताजी को, जो आइएनए (इंडियन नेशनल आर्मी) से संबंधित थे, जेल में बंद कर दिया गया था। आज तक मेरा प्रश्न एक ही रहा कि जब जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने भारत के साथ कानूनी रिश्ता जोड़ दिया, विलयपत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और इसका स्वागत शेख अब्दुल्ला ने स्वयं लाल चौक में अपने इन शब्दों से किया था, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में, कि ‘मुझे इस बात पर गर्व है कि मेरे जम्मू-कश्मीर ने भारत के साथ विलय करके भारत का दामन थाम लिया है।’ इसके बाद धारा-370 को लेकर हमारे नेताओं ने गलतियां कीं, पर आज वे नेता हमारे बीच में मौजूद नहीं हैं, पचास वर्ष गुजर चुके हैं, पंडित जवाहरलाल नेहरू को हमसे जुदा हुए, फिर भी हम उसी चौराहे पर क्यों खड़े हैं? कौन है जिम्मेदार आज के हालात का? जिस कश्मीर में तलवार या बंदूक का नाम तक नहीं था, आज वहां ये बंदूकें, ये तोपें, ये गोलाबारी कहां से हो रही है, इसे कौन ला रहा है और यह कैसे आ रही है, जबकि भारत के पांच लाख से ज्यादा सैनिक अपनी जान जोखिम में डाल कर भारत की सीमाओं की रक्षा के लिए तत्पर हैं।

घाटी में हालात क्यों बिगड़ गए, इसका उत्तर सिर्फ इतना है कि घाटी में हालात 1947 से बिगड़ते ही आए हैं। मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की। प्रश्न यह है कि मर्ज क्या था और दवा कौन-सी थी? जम्मू-कश्मीर के लोग भारत से जुड़ना चाहते थे, आज भी जुड़ना चाहते हैं, पर मैं साफ शब्दों में कहूंगा, उन्हें रोकने के लिए अगर कोई जिम्मेवार है, तो वह भारत की संसद है। यह नई बात नहीं है कि कोई नौजवान गोली का शिकार हो जाता है तो उसको अंतिम विदाई देने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ी हो, पर इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि कश्मीर वादी में लोग खुद को असुरक्षित क्यों महसूस कर रहे हैं, जबकि सरकार भी अपनी है, नेता भी अपने हैं। यहां एक प्रश्न उठता है कि बीस या इक्कीस साल के तीन लड़के एक घर में छुपे हुए थे या उनके हाथ में हथियार थे, क्या यह जानना जरूरी नहीं था कि इन किशोरों के पीछे कौन छुपा है, इनके पास हथियार कहां से आए, या वर्षों तक सरकार को इसकी खबर तक नहीं हुई? क्या इनको जिंदा पकड़ना भारत की सुरक्षा और मानवाधिकार के लिहाज से जरूरी नहीं था? प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि केंद्र सरकार जो पार्टी चला रही है, जिसकी जम्मू-कश्मीर सरकार में पूरी-पूरी हिस्सेदारी है, उसकी भूमिका क्या रही है।

 

बहुत बड़ा प्रश्न है कि ऐसे हालात पैदा क्यों हुए? इसका सबसे बड़ा कारण है कि जम्मू-कश्मीर को हम सड़सठ वर्षों में भारत के साथ संवैधानिक रूप से जोड़ नहीं सके। कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या कोई दूसरे दल, जो भी भारत की संसद में 1950 से भूमिका निभा रहे हैं, उन सभी राजनीतिक दलों को पूरे भारत के लोगों के सामने सफाई देने की आवश्यकता है कि जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ रिश्ता क्या है? जम्मू-कश्मीर की बाबत अस्थायी धारा-370 संविधान में जोड़ कर जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग क्यों रखा गया, इसका राज क्या है? जम्मू-कश्मीर के लोगों को मानवाधिकार के दायरे से बाहर क्यों रखा गया? जम्मू-कश्मीर के हाइकोर्ट को भारत के संविधान के तहत क्यों नहीं लाया गया। जम्मू-कश्मीर के लोगों को मानवाधिकार से वंचित क्यों रखा गया, जो भारतीय संविधान के अध्याय-तीन में बाकी देश के सभी नागरिकों के लिए लागू हैं।

प्रश्न है हर भारतीय का, चाहे वह जम्मू-कश्मीर से हो या कन्याकुमारी से, गुजरात से हो या नगालैंड से, कि जम्मू-कश्मीर के इन हालात का कैसे समाधान किया जा सकता है। इसका एक ही उत्तर है- धारा-370 में तुरंत संशोधन और तिरंगा और भारतीय संविधान, ताकि जम्मू-कश्मीर के लोग भी गर्व से कहें कि वे हिंदुस्तानी हैं और उन्हें मानवाधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा। धारा-370 में संशोधन- कि भारत एक है।

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