July 7, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

कश्मीर के मामले में प्रधानमंत्री के तौर पर पंडित नेहरू के 3 फैसलों पर सबसे ज्यादा सवाल उठते हैं;

पहला कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना, दूसरा 1948 में भारत-पाकिस्तान की जंग के बीच अचानक सीजफायर का ऐलान और तीसरा धारा 370के जरिये जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देना। नेहरू ने जो किया वो उस समय की मांग थी या उनकी गलत सोच इस बात पर काफी बहसें चला करती हैं, लेकिन इस सब पर भारी एक बड़ा सवाल ये भी है कि दूरद्रष्टा कहे जाने वाले नेहरू अगर इस तरह के फैसले नहीं करते तो क्या वाकई कश्मीर की समस्या आज नहीं होती?

बीजेपी का इस बारे में साफ जवाब है कि नेहरू अगर गलतियां नहीं करते तो कश्मीर समस्या नहीं होती। इसकी तह तक जाने के लिए जरा पीछे जाते हैं। दरअसल भारत जब आजाद हुआ तो यहां की 565 रियासतें भी आजाद हो रही थीं। उनके सामने यह विकल्प था कि वो या तो भारत में शामिल हो जायें या पाकिस्तान से जुड़ जाएं, लेकिन कश्मीर के महाराजा हरि सिंह कश्मीर को आजाद मुल्क रखना चाहते थे इसलिए उन्होंने 15 अगस्त 1947 के बाद भी कोई फैसला नहीं किया। लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि पाकिस्तान, कश्मीर को अपने साथ जोड़ने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, इसीलिए जब 22 अक्टूबर 1947 को हथियारों से लैस कबायलियों ने पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर पर हमला बोल दिया तब महाराजा हरि सिंह ने भारत से सैनिक मदद मांगी और भारत में विलय का फैसला भी ले लिया।


हरि सिंह के भारत में विलय के फैसले के बाद भारतीय सेना ने इतिहास के सबसे बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया। कुछ ही दिनों के अंदर भारतीय सेना ने कई महत्वपूर्ण स्थानों जैसे कि बारामुला को वापस हासिल कर लिया जिससे श्रीनगर के ऊपर मंडराता हुआ खतरा दूर हो गया। दुश्मन को पूरी तरह से खत्म करने के लिए सेना हाईकमान की इजाजत का इंतजार करती रही, लेकिन नेहरु ने इस बात की इजाजत देने की बजाय संयुक्त राष्ट्र का दरवाजा खटखटाना बेहतर समझा और इस गलती की वजह से भारत आज तक अपना भूभाग वापस नहीं ले पाया।
नेहरू ने माउंटबेटन की सलाह पर 31 दिसंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के खिलाफ शिकायत भेजी, इसके बाद से ही कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया। बाद में संयुक्त राष्ट्र में जो हुआ वो नेहरू के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। सुरक्षा परिषद में अमेरिका और ब्रिटेन, अपने राजनीतिक हितों को साधने में लग गए। उन्होंने कश्मीर पर भारत की शिकायत को दरकिनार करते हुए दोनों देशों को एक ही तराजू में तौलना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि नेहरू को भी अपने फैसले पर अफसोस होने लगा यही वजह थी कि कई सालों बाद जब नेहरू से कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बारे में सवाल किया गया तो वह इससे इंकार करने लगे।

हरहाल 1948 में संयुक्त राष्ट्र ने भारत और पाकिस्तान को कश्मीर से अपनी सेना वापस बुला कर सीजफायर लागू करने का प्रस्ताव पास किया। नेहरू ने इसे मानते हुए1 जनवरी 1949 को सीजफायर लागू कर दिया, यही उनकी एक और बड़ी गलती थी। नेहरू ने फैसला मान लिया लेकिन पाकिस्तान ने अपनी सेना वापस नहीं बुलाई। नेहरू के इस फैसले का काफी विरोध हुआ क्योंकि जब सीजफायर हुआ उस वक्त तक भारतीय सेना ने पश्चिम में पुंछ और उत्तर में कारगिल और द्रास तक कबायलियों को पूरी तरह खदेड़ दिया था, लेकिन इसके आगे का हिस्सा अब भी पाकिस्तान के कब्जे में था। आरएसएस नेता एच वी शेषाद्रि ने अपनी किताब “…और देश बंट गया” में लिखा है कि“इससे पूर्व कि हमारी सेना कश्मीर की धरती से पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को पूरी तरह खदेड़ पाती, पंडित नेहरू ने युद्द विराम की घोषणा कर दी, इसके फलस्वरूप आज तक एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तानी आक्रामकों के अधिकार में है”


कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है उसे हम पीओके यानी पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर कहते हैं। जो सीज़ फायर लाइन थी उसे ही लाइन आफ कंट्रोल कहा जाने लगा, तब से लेकर आज तक इसी लाइन ऑफ कंट्रोल के दोनों तरफ भारत और पाकिस्तान की सेनाओं की मुठभेड़ चलती रहती है। बीजेपी कहती रही है कि नेहरू ने अकारण ही संघर्ष विराम का ऐलान कर दिया था, उन्होंने ऐसा क्यों किया देश आज तक नहीं जान पाया। पिछले दिनों बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि नेहरू अपनी छवि को लेकर बहुत चिंतित रहा करते थे और सिर्फ अपनी छवि के लिए उन्होंने संघर्ष विराम का ऐलान किया, जिससे कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के पास चला गया और आज कश्मीर आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है।

जहां तक धारा 370 का सवाल है तो इसके बारे में कहा जाता है कि नेहरू ने अपने प्रिय शेख अब्दुल्ला की खुशी के लिए इसे देश पर लाद दिया और आज हम इसके बोझ तले दबे जा रहे हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस की नींव रखने वाले कश्मीर के लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला की नेहरू से नजदीकियों की वजह से ही उन्हें कश्मीर में नेहरू का आदमी भी कहा जाता था। नेहरू ने कश्मीर को लेकर अपनी सभी नीतियां शेख अबदुल्लाह को ध्यान में रखते हुए बनाई। उनकी वजह से ही महाराजा हरि सिंह को कश्मीर की बागडोर शेख के हाथों में सौंपनी पड़ी। जनसंघ के नेता बलराज मधोक ने कश्मीर पर अपनी किताब “जीत में हार” में लिखा है, “शेख ने यह कहना शुरू कर दिया कि कश्मीर घाटी के लोगों का मत भारत में विलय के लिए है लेकिन उन्हें यह आश्वस्त किया जाये कि घाटी का मुस्लिम चरित्र बना रहेगा और इसे सुरक्षा और विदेश नीति को छोड़कर पूर्ण आंतरिक स्वायत्तता प्राप्त होगी” इसी के साथ कश्मीर को विशेष दर्जा देने की बात शुरू हुयी और शेख अब्दुल्लाह पर पूरा भरोसा करने वाले नेहरू उनकी इस बात को भी मानने के लिए तैयार हो गये। नेहरू ने शेख से कहा कि इस प्रस्ताव को संविधान में शामिल करने के लिए वो खुद कानून मंत्री डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर से बात करें।

बलराज मधोक ने अपनी किताब में दावा किया है कि डॉक्टर अम्बेडकर ने खुद मधोक को यह बताया कि शेख ने उनके सामने यह प्रस्ताव रखा जिसके जवाब में डॉक्टर अम्बेडकर ने कहा कि, “तुम चाहते हो कि भारत, कश्मीर की रक्षा करे. इसकी सारी जरूरतें पूरी करे लेकिन उसका कश्मीर पर कोई अधिकार न हो, मैं भारत का कानून मंत्री हूं, तुम्हारे प्रस्ताव को मानना देश के साथ विश्वासघात होगा, मैं इसके लिए तैयार नहीं हो सकता”। इसके बाद नेहरू ने गोपालस्वामी आयंगर को ये जिम्मेदारी सौंपी की वो इस प्रस्ताव को संविधान सभा के सामने रखें। इसके बाद नेहरू विदेश यात्रा पर चले गए। आयंगर भारी विरोध के बावजूद पटेल की मदद से सदस्यों को यह समझाने में कामयाब हुए कि कश्मीर की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति देखते हुए उसे अस्थायी तौर पर अन्य राज्यों से अलग दर्जा देना होगा, इसके बाद ही धारा 370 संविधान में जुड़ गयी। कश्मीर को अलग संविधान बनाने का अधिकार मिला, तय हुआ कि सुरक्षा, विदेश और संचार के अलावा भारत की संसद में पारित कानून राज्य में उसी स्थिति में लागू होंगे,जब राज्य की विधानसभा में भी वो पारित हो जाएं।

जाहिर है नेहरू ने Kashmir पर इस तरह के फैसले नहीं किए होते तो आज Kashmir के बड़े भूभाग पर पाकिस्तान का कब्जा नहीं होता, पाकिस्तान इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने और विवादित करने के बारे में नहीं सोच पाता और भारत का ही हिस्सा होने के बावजूद Kashmir में दूसरा कानून नहीं चलता। धारा 370 की वजह से भारत के अन्य राज्यों के लोग जम्मू कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। वित्तीय आपातकाल लगाने वाली धारा 360 भी जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होती। जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा है। कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहरी से शादी करती है तो उसकी कश्मीर की नागरिकता तक छिन जाती है।

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