March 5, 2021

Such Ke Sath

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किसान आंदोलन:अब पंजाब और हरियाणा में सपना चौधरी नहीं, रिहाना के गाने बजेंगे!

कल तक किसान आंदोलन का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर तक ही बना हुआ था. अब अंतरराष्ट्रीय हो चला है. रिहाना के ट्वीट के बाद तो जैसे अंतरराष्ट्रीय हस्तियों में इस मुद्दो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की होड़ सी लग गई. पर्यावरणविद ग्रेटा थनबर्ग, अमेरिकी उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी मीना हैरिस समेत कई अन्य अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने भी किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट किया है.

हरियाणवी गानों पर अपने डांस मूव्स से लोगों को दीवाना बनाने वाली सपना चौधरी (Sapna Choudhary) के दिन अब लदने वाले हैं. देशभर में ‘देसी गर्ल’ के नाम से मशहूर सपना चौधरी को अब अंतरराष्ट्रीय पॉप स्टार रिहाना (Rihanna) से कड़ी टक्कर मिलने की पूरी संभावना जताई जा रही है. हरियाणा और पंजाब के कई लोगों ने अपना फोकस सपना के गानों से रिहाना के सॉन्ग पर शिफ्ट भी कर लिया है. देश की राजधानी दिल्ली में चल रहा किसान आंदोलन (Farmer Protest) अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हो गया है. किसान आंदोलन का समर्थन करने के बाद भारत में पॉप सिंगर रिहाना की फैन फॉलोइंग बढ़ती हुई देखी जा सकती है. बीते कुछ घंटों के अंदर ही ट्विटर पर उनके एक मिलियन से ज्यादा फॉलोवर बढ़ गए हैं. ये सब कुछ केवल किसान आंदोलन को लेकर किए गए एक ट्वीट के चलते हुआ है. आने वाले समय में अगर पंजाब और हरियाणा में सपना चौधरी को किनारे करते हुए रिहाना के गाने बजने लगें, तो लोगों को चौंकना नहीं चाहिए.

रिहाना ने भारत में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर एक खबर शेयर करते हुए सवाल उठाया है कि हम इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं?रिहाना ने भारत में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर एक खबर शेयर करते हुए सवाल उठाया है कि हम इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं?

कैरेबियन पॉप सिंगर रिहाना अपने एक ट्वीट को लेकर खासी चर्चा में हैं. रिहाना ने भारत में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर एक खबर शेयर करते हुए सवाल उठाया है कि हम इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं? इसके साथ उन्होंने एक खबर भी शेयर की है. जिसमें किसानों और पुलिस के बीच हिंसा और इंटरनेट सेवा बंद करने की बात कही गई है. रिहाना के इस ट्वीट से खलबली मच गई है. इस दौरान भारत में उनके फैन्स की संख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. रिहाना उन हस्तियों में शामिल हैं, जो किसी भी मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखती हैं. इसी के साथ भारत में उनके धर्म और उनके मुस्लिम होने को लेकर भी खोजबीन की जा रही है. गूगल पर इस ट्वीट के बाद बड़ी संख्या में लोग उनका धर्म भी खोजते दिख रहे हैं.

 

सोशल मीडिया के इस दौर में राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय हस्तियां, सभी को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. इनमें से एक वर्ग हमेशा विवादों से किनारा करते हुए कुछ भी कहने से बचता है. वहीं, दूसरा वर्ग हर मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखता है. उदाहरण के लिए कंगना रनौत, स्वरा भास्कर जैसी बॉलीवुड हस्तियां भी इस दूसरे वर्ग में आती हैं. हालांकि, ये दोनों ही अपने-अपने नजरिये से मुद्दों पर अपनी राय रखती हैं. कंगना को आप राष्ट्रवाद की क्वीन के रूप में, तो स्वरा भास्कर को विरोधात्मक भूमिका निभाती हुई एक्टिविस्ट कलाकार मान सकते हैं.

वैसे हम बात कर रहे थे कि सपना चौधरी के सामने रोटी-रोजगार की समस्या आने वाले कुछ समय में पैदा हो सकती है. अंतरराष्ट्रीय सिंगर रिहाना के किसान आंदोलन को लेकर सवाल उठाने के साथ ही देशभर के कई ‘ताऊ’ इस पॉप स्टार को अपना समर्थन दे रहे हैं. सिंगर रिहाना के किसान आंदोलन को लेकर ट्वीट करने के बाद कुछ लोगों ने उन्हें म्यांमार का मामला भी उठाने की सलाह दी. इसको अमल में लाते हुए रिहाना ने म्यांमार में हुए तख्तापलट पर भी अपनी प्रार्थनाएं प्रकट कर दीं. कहा जा रहा है कि ऐसा ही चलता रहा, तो जल्द ही हरियाणा-पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में रिहाना के गाने फुल वॉल्यूम में बजते सुनाई देंगे. बीते साल सपना चौधरी ने चोरी-छिपे शादी भी कर ली थी. जिसके बाद से उनके कई फैन्स नाराज चल रहे थे.

सिंगर रिहाना के किसान आंदोलन को लेकर ट्वीट करने के बाद कुछ लोगों ने उन्हें म्यांमार का मामला भी उठाने की सलाह दी.सिंगर रिहाना के किसान आंदोलन को लेकर ट्वीट करने के बाद कुछ लोगों ने उन्हें म्यांमार का मामला भी उठाने की सलाह दी.

कल तक किसान आंदोलन का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर तक ही बना हुआ था. अब अंतरराष्ट्रीय हो चला है. रिहाना के ट्वीट के बाद तो जैसे अंतरराष्ट्रीय हस्तियों में इस मुद्दो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की होड़ सी लग गई. अमेरिकी उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस (Kamala Harris) की भांजी मीना हैरिस (Meena Harris), पर्यावरणविद ग्रेटा थनबर्ग (Greta thunberg) और पूर्व पॉर्न स्टार मिया खलीफा (Mia Khalifa) समेत कई अन्य अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने भी किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट किया है.

https://twitter.com/MEAIndia/status/1356853835361259520?s=19

 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसान आंदोलन के मशहूर होने और हरियाणवी डांसर सपना चौधरी के सामने पैदा हुई समस्या की खबर लगते ही भारत सरकार नींद से जाग गई है. विदेश मंत्रालय ने इस मामले में बिना नाम लिए एक लंबा-चौड़ा आग्रह इन मशहूर हस्तियों से किया. विदेश मंत्रालय की ओर से आग्रह करते हुए कहा गया कि ऐसे मामलों पर टिप्पणी करने से पहले तथ्यों का पता लगाया जाए और मुद्दों की उचित समझ पैदा की जाए. साथ ही इसमें कहा गया है कि मशहूर हस्तियों द्वारा सनसनीखेज सोशल मीडिया हैशटैग और कमेंट्स के प्रलोभन का शिकार होना, न सटीक है और न ही जिम्मेदाराना है.

आने वाले समय में किसान आंदोलन का जो होना होगा, वो हो या नहीं. मोदी सरकार को जो करना है, वो हो या नहीं. किसानों की समस्याओं का हल निकले या न निकले. लेकिन, सपना चोधरी के सामने एक बड़ी ही विकट समस्या आ खड़ी हुई है. अगर पॉप सिंगर रिहाना भारत के हरियाणा-पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मशहूर हो गईं, तो आगे उनको अपना करियर किसी और चीज में बनाने की ओर रुख करना पड़ेगा. सपना चौधरी के फैन्स को पता होना चाहिए कि रिहाना को 9 ग्रैमी अवॉर्ड्स, 13 अमेरिकन म्यूजिक अवॉर्ड्स, 12 बिलबोर्ड म्यूजिक अवॉर्ड्स मिल चुके हैं. वहीं, सपना चौधरी के खाते में ऐसी कोी बड़ी उपलब्धि नहीं है.

 

ग्रेटा थनबर्ग और रिहाना की टिप्पणियों से इतना डर क्यों?

भारत के मेरी तरह के बहुत सारे लोग स्वीडन की किशोर पर्यावरण योद्धा ग्रेटा थनबर्ग या तुनबेयर के बारे में जानते तो थे, लेकिन गायिका रिहाना (या रियेना) या पोर्न कलाकार मिया ख़लीफ़ा के बारे में शायद उन्हें कम मालूम रहा होगा. किसान आंदोलन पर उनके ट्वीट को भी वे संजीदगी से ज़्यादा कौतूहल से लेते, जिससे बस यह समझने में मदद मिलती कि भारत में चल रहे किसान आंदोलन के दमन की ख़बर किस-किस रूप में कहां-कहां पहुंच रही है.

लेकिन इसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी कि जो सरकार किसानों या इस देश के मीडिया के प्रति भी ख़ुद को जवाबदेह नहीं समझती, वह ग्रेटा थनबर्ग और रिहाना के दो ट्वीटस पर इस तरह बौखला जाएगी कि विदेश मंत्रालय सफ़ाई देने खड़ा हो जाएगा. फिर विदेश मंत्रालय ने सफ़ाई ही नहीं दी, क्रिकेट और फिल्मों के सितारों को भी इस काम में लगा दिया कि वे थनबर्ग और रिहाना की ‘साज़िश के ख़िलाफ़ देश की रक्षा’ करें.

लेकिन क्या भारत इतना कमज़ोर है? क्या ट्वीट के कुछ शब्दों में सामने आई दो मशहूर हस्तियों की राय में इतनी ताक़त है कि उनके धक्के से हमारे पांव डगमगाने लगें? क्या ये ट्वीट हमारे अंदरूनी मामलों में दख़ल हैं?

और अगर ये दख़ल हैं तो फिर पुलिसवाले के जूते तले कुचल कर मारे गए अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड पर हमारी राय क्या अमेरिका के अंदरूनी मामलों में दख़ल नहीं थी. इस बात की ओर क्रिकेटर इरफ़ान पठान ने ध्यान खींचा है, लेकिन बहुत सहमी हुई शालीनता के साथ. वे बस यह कह पाते हैं कि हमने उचित ही उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त की. शायद उन्हें यह एहसास हो कि नए भारत में बहुत सारे लोग इसे उनकी बेबाक नागरिकता का मामला नहीं मानेंगे, उनकी राय को उनकी मज़हबी पहचान से जोड़ देंगे.

लेकिन यह सवाल वाजिब है कि जब हम ‘सेव ब्लैक लाइव्स’ जैसे किसी नारे के साथ होते हैं तो क्या अमेरिका के ख़िलाफ़ होते हैं या उसके अंदरूनी मामलों में दख़ल दे रहे होते हैं? या फिर तिब्बत के बौद्धों या शिनजियांग के उइगर मुसलमानों या म्यांमार के रोहिंग्या लोगों का सवाल उठा रहे होते हैं तो क्या चीन और म्यांमार के अंदरूनी मामलों में दख़ल देते हैं?

दरअसल ऐसे मामलों में सरकारों का खेल समझने की ज़रूरत है. अमेरिकी सरकार और अमेरिका एक नहीं हैं. चीनी सरकार और चीन एक नहीं हैं. भारत सरकार और भारत एक नहीं हैं. अमेरिकी सरकार की आलोचना अमेरिका की आलोचना नहीं है. भारत सरकार की आलोचना भारत की आलोचना नहीं है. लेकिन सरकारें अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना डालती हैं. अगर दुनिया ने जॉर्ज फ्लॉयड के मारे जाने पर अमेरिकी प्रशासन की आलोचना की तो वह अमेरिका की आलोचना नहीं थी. बल्कि यह सच है कि अमेरिकी सरकारों की सबसे तीखी आलोचना अमेरिकी लोगों ने ही की है. अमेरिका में काले लोगों के लिए ‘सेव ब्लैक लाइव्स’ आंदोलन चलाने से कई साल पहले अपने दिलचस्प उपन्यास ‘सेल आउट में पॉल बीटी ने अमेरिकी सरकार और समाज का बहुत तीखा मज़ाक उड़ाया था. इसके लिए उन्होंने आलोचना नहीं झेलनी पड़ी, बल्कि बुकर अवार्ड मिला.

लेकिन यह सच है कि यह सिर्फ भारत सरकार ने नहीं किया, सारी सरकारें यही काम करती हैं. वो अपनी नाकामियों को राष्ट्र की उदात्त भावना के पीछे छुपा लेना चाहती हैं. भारत सरकार ने एक क़दम आगे जाकर यह किया कि जिन सितारों का हम एक स्वतंत्र अस्तित्व मानते हैं, उन्हें अपने वैचारिक मज़दूरों या उपकरणों की तरह इस्तेमाल कर उन्हें भी छोटा किया और राष्ट्रीय पहचान के प्रतीकों को भी उपहास्पद बनाया.

दरअसल सचिन या अक्षय या अजय देवगन होने का क्या मतलब है? किसान आंदोलन या किसी भी आंदोलन में इनकी राय क्या अहमियत रखती है? इस सवाल के दो जवाब हैं. दोनों जवाबों में छुपी कुछ वैध चिंताएं हैं. पहली बात तो यह कि नया भारत अब विशेषज्ञता की नहीं, विज्ञापन की संस्कृति पर चलता है. उसे अर्थव्यवस्था पर आर्थिक जानकारों की या विज्ञान पर वैज्ञानिकों की या समाजशास्त्रियों की राय नहीं चाहिए, उसे हर विषय पर सितारों की राय चाहिए- चाहे वे किसी क्रिकेट के हों या फिल्म के हों या फिर उद्योगों के कामयाब लोग.

दूसरी बात कुछ ठहर कर विचार करने की है. राष्ट्र एक राजनीतिक संरचना है, लेकिन इकहरी नहीं. एक राष्ट्र के भीतर कई देश होते हैं. इसको इस तरह समझें कि राजनीति द्वारा राष्ट्र की जो बनी हुई छवि होती है, उससे अलग खेलों या फिल्मों द्वारा बनाई गई छवि भी होती है. फुटबॉल को सामने रख कर देखते हैं तो हम पाते हैं कि ब्राजील और अर्जेंटीना दुनिया के बड़े देश मालूम होते हैं और क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया, भारत ज़्यादा बड़े नज़र आते हैं. भारत के भीतर भी कई भारत हैं- एक शहरी भारत है, एक ग्रामीण भारत है, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले कई भारत एक-दूसरे से संवादरत हैं. एक भारत ऐसा है जिसके भगवान नेता नहीं, क्रिकेटर हैं. लेकिन एक दूसरा भारत ऐसा भी है जिसके ईश्वर फिल्मी अभिनेता हैं- बेशक, ये दोनों भारत भी आपस में मिलते-जुलते होंगे. लेकिन कम से कम दो भारत हम पहचान सकते हैं जो एक दूसरे को बेशक, मज़बूती भी देते हैं- एक अगर राजनीतिक भारत है तो दूसरा सांस्कृतिक भारत. राजनीतिक भारत अपने फायदे के लिए कई बार सांस्कृतिक भारत का इस्तेमाल करता है तो सांस्कृतिक भारत कई बार राजनीतिक भारत को निर्देशित करता है.

लेकिन राजनीतिक भारत जब सांस्कृतिक भारत को आदेश देकर एक अनचाहे विवाद में उसे शामिल करता है तो दरअसल वह उसके साथ अन्याय कर रहा होता है. बेशक, यह सांस्कृतिक भारत के नुमाइंदों का भी दायित्व है- मसलन सचिन तेंदुलकर जैसे नायक का- कि वे ऐसे किसी दबाव के आगे झुकने से इनकार करते. निश्चय ही एक नागरिक के तौर पर उनका अधिकार है कि वे अपनी राय रखें, लेकिन जब हर मामले में खामोशी के बीच अचानक एक मामले में धडाधड़ सितारों के एक जैसे ट्वीट आने लगते हैं तो शक होता है कि सितारों को अपनी गरिमा से ज़्यादा सरकारी दबाव की फ़िक्र है.

इस पूरे मामले का विचारणीय पक्ष यही है. सरकार ने अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना डाला. ऐसे सांस्कृतिक सिपाही भी तैनात कर दिए जो इस आलोचना पर हमला करें. फिर दुहराने की ज़रूरत है कि सभी सरकारें ऐसा करती हैं. लेकिन सजग नागरिकों को यह समझना पड़ता है. दशकों पहले फ्रांस में अल्जीरिया की आज़ादी की मांग को जब वहां के बुद्धिजीवी लेखक ज्यां पाल सार्त्र ने समर्थन दे डाला तो वहां उनकी गिरफ्तारी की मांग शुरू हो गई. कहते हैं कि तब फ्रांसीसी राष्ट्रपति द गॉल ने कहा था कि फ्रांस अपनी अंतरात्मा को गिरफ़्तार नहीं कर सकता.

तीन बरस पहले स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म ‘द पोस्ट’ आई थी. यह फिल्म वियतनाम युद्ध के समय की सच्ची घटनाओं पर आधारित है. निक्सन की सरकार नहीं चाहती कि अमेरिकी अख़बार वियतनाम युद्ध की सच्चाई बताएं. न्यूयॉक टाइम्स पर वह मुक़दमा कर देती है. वह आर्थिक संकट से गुज़र रहे वाशिंगटन पोस्ट पर भी दबाव बनाती है कि वह ये ख़बरें न दें. फिल्म के अंत में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आता है- वाइट हाउस के हित अमेरिका के हित नहीं हैं.

हमें भी यह समझना होगा. सरकार देश की राजनीतिक प्रतिनिधि होती है, देश नहीं होती. उसकी आलोचना देश की आलोचना नहीं होती. किसान आंदोलन के दमन में अगर वह मध्ययुगीन तरीक़े इस्तेमाल करेगी तो उस पर सवाल उठेंगे और दुनिया भर से उठेंगे. और इन सवालों के केंद्र में भारतीय नागरिकों के मानवाधिकार ही होंगे. बेशक, ऐसे अवसरों का लाभ उठाने के लिए तरह-तरह की एजेंसियां भी सक्रिय रहती हैं लेकिन इनकी आड़ में हम ज़्यादा बड़े मूल्य को अपनी नज़र से ओझल होने नहीं दे सकते. क्योंकि सरकारें देश की आड़ लेकर अपने ही नागरिकों का दमन करती हैं और उसको जायज़ भी ठहराती हैं.

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