January 16, 2021

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

किसान आंदोलन: किसानों को मोदी सरकार पर भरोसा क्यों नहीं, कॉर्पोरेट जगत का डर क्यों..जानिए

नई दिल्ली |हाल में पारित किये गए तीन नए कृषि क़ानूनों का विरोध करने वाले किसानों को कई आपत्तियां हैं जिनमें से एक ये है कि इन क़ानूनों की आड़ में कॉर्पोरेट जगत कृषि क्षेत्र पर हावी हो जाएगा और किसानों के शोषण का खतरा पैदा हो जाएगा.

लेकिन सच तो ये है कि कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट की दुनिया की एंट्री कब की हो चुकी है. इसे देखने के लिए एक उदाहरण को समझना होगा.

सरकारी संस्था फ़ूड कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया किसानों के उत्पाद की सब से बड़ी ख़रीदार है. 23 अलग-अलग फ़सलों के ख़रीदे जाने का प्रावधान है लेकिन सरकार अक्सर केवल चावल और गेहूं ख़रीदती है.

लेकिन यह जानना दिलचस्प होगा कि देश में दूसरे नंबर पर गेहूं का ख़रीदार कौन है?

कॉर्पोरेट की दुनिया की 75,000 करोड़ मूल्य वाली कंपनी, आईटीसी ग्रुप.इसने इस साल 22 लाख टन गेहूं देश भर के किसानों से सीधे ख़रीदा है.

महिंद्रा ग्रुप भी कृषि क्षेत्र में काफ़ी अंदर तक प्रवेश कर चुका है. नेस्ले, गोदरेज और महिंद्रा जैसी निजी कंपनियां कृषि क्षेत्र में फल फूल रही हैं.

खाद्य सुरक्षा या फ़ूड सिक्योरिटी

केंद्र में हर सरकार का देश की ग़रीब जनता के लिए खाद्य सुरक्षा या फ़ूड सिक्योरिटी एक बड़ी सियासी प्रतिबद्धता है. पीडीएस द्वारा बहुत ही कम दामों पर पर या इस महामारी के दौरान मुफ़्त अनाज पहुँचाना इसी का एक हिस्सा है. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इसके लिए एफ़सीआई में इतने बड़े भंडार की ज़रुरत नहीं है.

सरकार को पीडीएस के लिए केवल 400 लाख टन से कुछ अधिक स्टॉक की ज़रूरत है. इसका मतलब साफ़ है कि ज़रुरत न होते हुए भी सरकार को मंडियों में जाकर मिनिमम सपोर्ट प्राइस (एमएसपी) के अंतर्गत चावल और गेहूं खरीदते रहना पड़ता है. ये सरकार की सियासी मजबूरी है.

मुंबई स्थित आर्थिक विशेषज्ञ विवेक कौल कहते हैं कि एफ़सीआई द्वारा ज़रुरत से ज़्यादा अनाज ख़रीदना किसी भी तरह से सही नहीं है.

वो कहते हैं, “इसका प्रभाव ये है कि सरकार ने चावल और गेहूं खरीदने में बहुत पैसा खर्च किया. वह पैसा सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे पर आसानी से खर्च किया जा सकता था, जिसकी भारत में बहुत कमी है.”

कृषि उत्पाद में भारत बहुत पीछे

भारत में इसके कुल घरेलू उत्पाद में 17 प्रतिशत योगदान कृषि क्षेत्र का है जिसपर देश की 60 प्रतिशत आबादी निर्भर करती है. अमेरिका के बाद खेती योग्य सबसे अधिक ज़मीन भारत में है लेकिन पैदावार में भारत अमेरिका से कहीं पीछे है.

कृषि विशेषज्ञ कहते हैं इसके कई कारण है, जिनमें टेक्नोलॉजी का बहुत कम इस्तेमाल, मानसून की बारिश की अनिश्चितता और खेती से जुड़े लोगों में आधुनिक तकनीक का अभाव ख़ास हैं. दूसरा बड़ा कारण है सरकार की तरफ़ से बुनियादी ढाँचे बनाने में ज़बरदस्त ढीलापन.

भारत सरकार की इस क्षेत्र में भारी भूमिका भी आज के आधुनिक दौर के विशेषज्ञ सही नहीं मानते लेकिन उत्तर भारत के किसान सरकार की भूमिका हटाए जाने का विरोध कर रहे हैं.

अब सरकारी संस्था फ़ूड कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (एफ़सीआई) का उदाहरण देखें. इस साल जून तक इसके गोदामों में 832 लाख टन अनाज (अधिकतर गेहूं और चावल) मौजूद था. सरकार इस स्टॉक को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) द्वारा रियायती दामों पर ग़रीब जनता को बेचती है. इन्हें आम भाषा में राशन की दुकानें कहा जाता है.

ई-चौपाल और किसान

आईटीसी ग्रुप और किसानों का आपसी रिश्ता कोई 20 साल पुराना है और इसमें मज़बूती इसकी ई-चौपाल योजना के कारण आई है.

साल 2000 में लॉन्च किया गया, ई-चौपाल मॉडल, गावों में इंटरनेट कियोस्क का एक नेटवर्क है जो औपचारिक बाज़ारों से कटे छोटे और सीमांत किसानों को वास्तविक समय के मौसम और मूल्य की जानकारी देते हैं और कृषि को बढ़ाने के लिए प्रासंगिक ज्ञान और सेवाओं को इन किसानों तक पहुँचाते हैं.

ये मॉडल काम कैसे करता है? इसका उदाहरण मैंने 2005 में देख था, उस समय जब मैं नागपुर के सोयाबीन उगाने वाले किसानों पर एक स्टोरी कर रहा था.

मैं उन गावों और मंडियों में गया था जो ई-चौपालों के अंतर्गत आते थे. मैंने देखा था कि गावों में कंप्यूटर बैठाए गए हैं और एक-दो युवा इसका इस्तेमाल करके किसानों को मौसम की जानकारी देते थे. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोयाबीन के रोज़ाना मूल्य की जानकारी भी देते थे.

इसके बाद मंडी में ये किसान अपना उत्पाद लेकर पहुंचते थे और आईटीसी की टीम पहले से तय हुए भाव पर किसानों का सोयाबीन खरीद लेती थी.

उस समय ये योजना नई थी और किसानों का कॉर्पोरेट जगत के साथ संपर्क भी नया था. इसलिए आईटीसी ने इस पर एक वीडियो विज्ञापन तैयार किया था जिसे कंपनी शाम को गावों में बड़े परदे पर किसानों को दिखाया करती थी. किसान भी खुश थे और कंपनी भी.

लेकिन जानकारों के मुताबिक़ ये बात सही है कि अगर कोई कंपनी इन किसानों का शोषण करना चाहे तो इसका ख़तरा पूरा मौजूद है. नए क़ानून में इसके बचाव का कोई इंतज़ाम नहीं है.

ई-चौपाल एक सफल मॉडल है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब इससे 40 लाख किसान जुड़े हैं. ये 10 राज्यों में 6100 कंप्यूटर कियोस्क के माध्यम से 35,000 गाँवों में फैला है. कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक़ इसका लक्ष्य एक करोड़ किसानों तक पहुँचने का है.

ई-चौपाल एक तरह से आईटीसी और किसानों के बीच कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का उदाहरण है जिसका प्रावधान नए कृषि क़ानून में है और जिसका विरोध किसान ये कह कर कर रहे हैं कि इससे “अडानी और और अंबानी” जैसे कॉर्पोरेट समूहों के कृषि क्षेत्र में प्रवेश का खतरा है.

कृषि क्षेत्र में बदलाव

दरअसल कृषि क्षेत्र में पिछले दो दशकों में कई तरह के बदलाव आए हैं, जो सरकार की वजह से कम और बाज़ार की ताक़तों की वजह से ज़्यादा संभव हुआ है. नई टेक्नोलॉजी, डाटा और ड्रोन का इस्तेमाल, नयी बीज और खाद की क्वालिटी और एग्रो बिज़नेस का उदय ये सब सकारात्मक बदलाव हैं.

इन बदलाव ने कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों को जगह दी है. लेकिन जिस तेज़ी से बदलाव आ रहे हैं, उस तेज़ी से सरकार के ज़रिए क़ानून को आधुनिक बनाये जाने पर ज़ोर नहीं दिया जा रहा था.

कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौर में भी नए क़ानून लाने पर बहस ज़रूर हुई थी लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ था. कांग्रेस पार्टी के 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में भी नए क़ानून लाने की बात कही गई थी.

अब जब निजी कंपनियों को कृषि क्षेत्र में आने से रोका नहीं जा सकता था तो कुछ ऐसे क़ानून और नियम बनाये जाने ज़रूरी थे जिन से ये निश्चित हो कि निजी कंपनियां आम किसान का शोषण न कर सकें और आम तौर से उनकी आय बढ़े.

मोदी सरकार ने पारित किए तीन कृषि क़ानूनों में इन्हीं ज़मीनी हकीक़त से जूझने की कोशिश की है लेकिन किसानों को लग रहा है कि क़ानून को जल्दबाज़ी में पारित किया गया और इस पर किसानों के साथ चर्चा नहीं की गयी.

केरल के पूर्व विधायक और किसानों की मांग के लिए विरोध प्रदर्शन में शामिल कृष्णा प्रसाद कहते हैं कि निजी कंपनियां पहले से कृषि क्षेत्र में मौजूद हैं इस लिए सरकार को इन्हें रेगुलेट करना और भी ज़रूरी था लेकिन नए क़ानून ने इसे नियंत्रण मुक्त कर दिया है जिसके कारण किसानों के शोषण का ख़तरा और भी बढ़ गया है.

मोदी अच्छे वक्ता, पर किसानों तक बात पहुँचाने में नाकाम रहेः गुरचरण दास

अर्थशास्त्री और लेखक गुरचरण दास कृषि क्षेत्र में सुधार के एक बड़े पैरोकार हैं और मोदी सरकार द्वारा लागू किये गए तीन नए कृषि क़ानूनों को काफ़ी हद तक सही मानते हैं.

लेकिन ‘इंडिया अनबाउंड‘ नाम की प्रसिद्ध किताब के लेखक केअनुसार प्रधानमंत्री किसानों तक सही पैग़ाम देने में नाकाम रहे हैं. वो कहते हैं कि नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिकेटर होने के बावजूद किसानों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल नहीं रहे.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा, “मोदी जी की ग़लती ये थी कि उन्होंने रिफ़ॉर्म (सुधार) को ठीक से नहीं बेचा है. अब आपको इसे ना बेचने का ख़ामियाज़ा तो भुगतना पड़ेगा. लोगों ने पोज़ीशन ले ली है. अब ज़्यादा मुश्किल है.”

चीन में आर्थिक सुधार लाने वाले नेता डेंग ज़ियाओपिंग और ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की मिसाल देते हुए वो कहते हैं कि आर्थिक सुधार को लागू करने से अधिक इसका प्रचार ज़रूरी है.

वो कहते हैं, “दुनिया में जो बड़े सुधारक हुए हैं, जैसे डेंग ज़ियाओपिंग और मार्गरेट थैचर, वो कहा करते थे कि वो 20 प्रतिशत समय रिफ़ॉर्म को लागू करने में लगाते हैं और 80 प्रतिशत वक़्त सुधार का प्रचार करने में.”

मोदी सरकार द्वारा हाल में पारित किये गए तीन नए कृषि क़ानूनों का किसान, ख़ासतौर से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान कड़ा विरोध कर रहे हैं और कुछ दिनों से लाखों की संख्या में दिल्ली के बाहर धरने पर हैं. उनके प्रतिनिधियों और सरकार के बीच बातचीत के दो दौर हुए हैं लेकिन ये विफल रहे हैं. अगली बातचीत 5 दिसंबर को है.

किसान चाहते हैं कि सरकार कृषि संबंधित नए क़ानून में संशोधन करके न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को क़ानून में शामिल करे और क़ानून में कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों को विनियमित करने के प्रावधान भी हों. किसानों की ये भी मांग है कि मंडियों का सिस्टम ख़त्म न किया जाए.

ग़रीब किसानों को कैश सिक्योरिटी

किसान आंदोलन जारी है और सरकार निश्चित रूप से दबाव में है लेकिन किसानों की माँगों के बारे में गुरचरण दास क्या सोचते हैं?

वो कहते हैं, “हाँ उनकी मांग कुछ हद तक ठीक है लेकिन ये (एमएसपी) एक आदर्श प्रणाली नहीं है. एक अर्थशास्त्री के रूप में मैं कहूँगा कि ये एक घटिया सिस्टम है क्योंकि इसमें बहुत कमियाँ हैं. मुझसे अगर कहा जाता कि क्या सिस्टम होना चाहिए तो मेरा जवाब होगा कि इसमें कोई रियायतें और सब्सिडी नहीं होनी चाहिए. खाद पर नहीं, बिजली पर नहीं, पानी पर नहीं और मूल्य पर भी नहीं. आप हर महीने छोटे और ग़रीब किसानों को सिर्फ़ कैश ट्रांसफ़र कर दो. इसे आप छोटे किसानों के लिए कैश सिक्योरिटी कह सकते हैं.”

वो आगे कहते हैं, “इस समय बहुत सारी रियायतों को असल में हम टैक्स अदा करने वालों को सहना पड़ता है”

“खाद्य सुरक्षा या फ़ूड सिक्योरिटी देश का क़ानून है. सरकार को ग़रीबों को अनाज देना पड़ेगा और इसीलिए ये एक आदर्श प्रणाली न होते हुए भी चलेगी. मुझे लगता है कि इनको डर पैदा हो गया है. अगर इन्हें शुरू से समझाया जाता कि क्या हो रहा है और ये कि एमएसपी नहीं जा रही है और मंडियाँ नहीं जा रही हैं तो तस्वीर कुछ और होती.”

सरकार की ग़लती?

गुरचरण दास का मानना है कि किसानों से शुरू में ही बातचीत होनी चाहिए थी. उन्हें लगता है अब किसानों को समझाना आसान नहीं होगा.

उनके अनुसार केंद्र में कोई भी सरकार फ़िलहाल वर्तमान प्रणाली को ख़त्म नहीं कर सकती.

इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं,”एमएसपी का सिस्टम भी चलेगा और एपीएमसी (कृषि उपज मंडी समिति) का सिस्टम भी जारी रहेगा क्योंकि सरकार को अनाज ख़रीदना पड़ेगा. सरकार को हर हफ़्ते लाखों राशन की दुकानों को अनाज सप्लाई करना है और अनाज ख़रीदने के लिए सरकार को किसानों को इसका मूल्य देना पड़ेगा. ये प्रणाली चलेगी.”

किसानों के इस डर पर कि अब कृषि क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियां हावी होने लगेंगी और उनका शोषण होने लगेगा, इस पर गुरचरण दास कहते हैं, “मैं समझता हूँ कि ये सही चिंता है किसानों की क्योंकि एक तरफ़ बड़ा व्यापारी हो और दूसरी तरफ़ छोटा किसान हो तो इसमें समानता का अभाव तो होगा. दोनों पक्ष में जो बातचीत हो रही है शायद उसमें इस तरह की बात आये, जिससे कि किसानों के हित को अधिक सुरक्षित किया जा सके.”

लेकिन वो कहते हैं कि किसानों के पास रास्ते हैं.

उन्होंने कहा, “मेरा कहना ये है कि किसान के पास विकल्प है. उन्हें अब आज़ादी है कि वो निजी कंपनियों को कह सकते हैं कि हम आपके साथ काम नहीं कर सकते.”

गुरचरण दास के अनुसार 1980 में देश में मध्यम वर्ग की आबादी केवल आठ प्रतिशत थी. आर्थिक सुधार की लगातार पॉलिसी के कारण अब ये आबादी 35 प्रतिशत हो चुकी है. उनके मुताबिक़ आज इस आबादी के रहने के अंदाज़ और खाने-पीने की पसंद में भी फ़र्क़ आया है.

वो कहते हैं, “चावल और गेहूं पर ज़्यादा ध्यान है हमारा, लेकिन लोगों के खाने के तरीक़े बदल गए हैं. प्रोटीन के लिए लोग दाल अब पहले से ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं और दूध भी अब ज़्यादा इस्तेमाल होता है. भारत दुनिया में सबसे अधिक दूध उत्पादित करने वाला देश है. तो माहौल बदल गया है. लेकिन पॉलिसी बनाने वाले नेतागणों का सोचने का तरीक़ा पुराना है. वो ये सोचते हैं हम अब भी एक ग़रीब देश हैं.”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright © All rights Reserved with Suchkesath. | Newsphere by AF themes.