June 24, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

किसी के पास पैसा है तो किसी के पास दिल;

 

ज़िंदगी में कई बार आपका वास्ता ऐसे लोगों से पड़ता है जो पैसे वाले होते हैं, मगर ख़र्च करने में कंजूसी करते हैं. बहुत से लोग इन जैसे लोगों के बारे में ये भी कह देते हैं कि इन्होंने ऐसे बचा-बचाकर ही दौलत जमा की है. पर सवाल ये उठता है कि क्या सभी पैसे वाले ऐसे होते हैं? या सिर्फ़ कुछ लोगों की ही ऐसी आदत होती है? या फिर पैसा आने के बाद लोग ऐसे हो जाते हैं?
इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए बहुत से रिसर्च किए गए हैं. दिलचस्प बात ये कि हर तजुर्बे का अलग नतीजा निकला. जैसे 1993 में अमरीका में कुछ छात्रों के बीच एक तजुर्बा किया गया. इसमें पाया गया कि जो छात्र अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रहे थे, वो पैसे ख़र्च करने में बहुत एहतियात बरतते थे. कई बार उनकी ये आदत कंजूसी लगती थी. वहीं मनोविज्ञान या इतिहास के छात्र फ़राख़-दिल पाए गए. वो खुले हाथों से ख़र्च करते थे.

 

इसी रिसर्च में ये भी पाया गया कि ग्रैजुएशन के शुरुआती सालों में दूसरे क्षेत्र में पढ़ाई करने वाले भी थोड़ी कंजूसी से काम लेते हैं. लेकिन, पढ़ाई के आख़िरी दिनों में पैसे ख़र्च करने में उनका हाथ खुलने लगता है जबकि अर्थशास्त्र के छात्रों के बर्ताव में पैसे के मामले में बहुत कम ही बदलाव आता है.
लेकिन, कहने का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि अर्थशास्त्र से ताल्लुक़ रखने वाले सभी लोग ऐसे होते हैं. कुछ लोग खुले हाथ वाले भी होते हैं लेकिन उनकी तादाद ज़रा कम ही रहती है.
इस बात के सबूत भी मिलते हैं कि जिन लोगों के पास ज़्यादा पैसा होते या जो पैसे वाली जगह पर रहते हैं वो ज़्यादा परोपकारी होते हैं. इसके लिए भी एक रिसर्च की गई. कुछ रिसर्चर लंदन की बीस अलग अलग जगह पर निकले और सड़कों पर यहां की फुटपाथ पर डाक टिकट लगी चिट्ठियां फेंक दीं. पाया गया कि विंबल्डन जैसे अमीरों वाले इलाक़े में क़रीब 87 फ़ीसद ख़त को लोगों ने उनकी सही जगह तक पहुंचा दिया. जबकि शेडवेल जैसे ग़रीबी वाले इलाक़े में सिर्फ़ 37 फीसद ख़त ही अपने सही पते पर पहुंच पाए.

 

ये भी देखा गया है कि खाते पीते घराने के लोग भलाई के नाम पर बहुत से ऐसे काम भी करते हैं, जिनका कोई सीधा फ़ायदा उन्हें नहीं मिलता. अमरीका की जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एबिगेल मार्श और क्रिस्टीन ब्रेथल हारविट्स ने एक रिसर्च में पाया कि अमरीका में अजनबियों को गुर्दे दान देने के आंकड़े हर राज्य के अलग-अलग हैं. लेकिन जिन राज्यों में लोगों की आमदनी ज़्यादा थी वहां ज़्यादा लोगों ने किडनी डोनेट की.
हालांकि इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं है कि अमीर लोगों में ही अंग दान की भावना ज़्यादा होती है. दरअसल जो लोग अच्छे इलाक़े में रहते हैं वो ये जानते हैं कि ख़ुद को सेहतमंद रखने के लिए कितने ज़्यादा पैसे ख़र्च करने पड़ते हैं. इसीलिए उनके दिल में दूसरे की भलाई के लिए काम करने का जज़्बा भी मज़बूत हो जाता है.

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90 के दशक के अर्थशास्त्र के छात्रों पर हुए तजुर्बों को अगर छोड़ दिया जाए तो बाद में जो रिसर्च किए गए उनके नतीजे एकदम अलग हैं. अमरीका की बर्कले यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर पॉल पिफ का कहना है कि अगर कभी ऐसी नौबत आ जाए कि आपको अपनी ज़िंदगी बचानी है तो अमीर लोग पहले आगे आते हैं. उन्हें लगता है अपनी ज़िंदगी बचाने का पहला हक़ उन्हीं का है. बहुत से अमीर लोग ये भी मानते हैं कि वो कभी ग़लत नहीं हो सकते और वो हर चीज़ में अच्छे होते हैं.

 
पॉल ने एक और रिसर्च की. उन्होंने क़रीब दो लाख डॉलर सालाना कमाने वाले लोगों को दस डॉलर दिये. इसमें से वो जितना चाहें दान में दे सकते हैं.
पाया गया कि जो लोग पिफ की रिसर्च में शामिल होने से पहले अमीर थे उन्होंने ही दान देने में दिलेरी दिखाई. पिफ का कहना है बहुत बार वक़्ती तौर पर पैसे का न होना भी इंसान को ख़ुदगर्ज़ बना देता है. इसी तरह उन्होंने सैन फ्रांसिस्को में देखा कि बड़ी कारों के ड्राइवर मदद के लिए कम निकल कर आते हैं. जबकि सस्ती कार चलाने वाले ड्राइवर दूसरों की मदद के लिए ज़्यादा आगे आते हैं. हालांकि इस बात को भी पूरी तरह से सही नहीं माना जा सकता क्योंकि गाड़ी मालिक चला रहा है या ड्राइवर कहना मुश्किल होता है.

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जर्मनी की हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर स्टीफ़न ट्रॉटमेन का कहना है कि किसी इंसान के परोपकारी होने में बड़ा अंतर्विरोध है. तमाम तजुर्बों के अंत में पाया यही गया कि ये ज़रूरी नहीं है कि अमीर लोग उदारवादी होंगे. वो किसी दूसरे ग़रीब इंसान की तरह कंजूस भी हो सकते हैं. ग़रीब इंसान कंजूस ही होते हैं ये कहना भी ग़लत है. दरअसल उसके पास ख़र्च करने के लिए पैसे ही नहीं होंगे तो वो दूसरों की मदद कैसे करेगा? अगर किसी के पास पैसा है और वो तब भी ख़र्च नहीं करता तो कंजूस कहलाएगा.

 
सभी तजुर्बों का एक ही निचोड़ है कि ना सभी अमीर और ना सभी ग़रीब एक जैसे होते हैं. बल्कि फ़राख़-दिली का जज़्बा दिल से जुड़ा होता है. हां इतना ज़रूर है कि किसी पर पैसा ख़र्च करने के लिए ख़ुद आपके पास पैसा होना चाहिए. इसीलिए जो बहुत ज़्यादा अमीर होते हैं वो दान करने में ज़्यादा आगे रहते हैं. क्योंकि अपनी आमदनी के मुक़ाबले वो जितना दान करते हैं वो उनके लिए मायने नहीं रखता. ऐसे लोग नाम मात्र ही होते हैं जो अपने ख़र्च का पैसा अपने पास रखकर सारा पैसा दान कर दें.

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