July 7, 2022

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कुंभ मेले की शुरुआत कब से हुई ?

कुंभ मेले का इतिहास:

कुंभ मेले का शुभांरम्भ कब हुआ और किसने किया इतिहास के आधुनिक ग्रंथों में इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है परन्तु इसका जो लिखित प्राचीनतम वर्णन उपलब्ध है वह सम्राट हर्षवर्धन के समय का है, जिसका चीन के प्रसिद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग द्वारा किया गया है।

इतिहास के ग्रन्थों मे भले ही कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध न हो परन्तु इस देश की धर्म प्राण जनता के हृदय पटल पर इसकी छवि इतनी गहराई से अंकित है कि सदियों से इस पर्व पर एकत्रित होने के लिए किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं पड़ती और लोग अपने आप लाखों और करोड़ों की संख्‍या में कुंभ पर्व पर प्रयाग में संगम तट पर एकत्रित हो जाते हैं।

इस पर्व पर हिमालय और कन्याकुमारी की दूरी सिमट जाती है। तथा अरुणाचल प्रदेश और कच्छ एक-दूसरे के पास आ जाते हैं। इस पर्व का आकर्षण ऐसा है कि दूर से और पास से गांव से और नगरों से झोपड़ियों से और महलों से लोग कुंभ नगरी मे सिमटते आ रहे हैं। इनकी भाषा वेश रंग-ढंग सभी एक दूसरे से भिन्न है परन्तु इनका लक्ष्य एक है। सभी की मंजिल एक है।

इनमें पुरुष भी है और स्त्रियां भी बच्चे भी है और गृहस्थ भी धनवान भी है और धनहीन भी परन्तु सभी मे एक भावना और एक सांस्कृतिक समरसता के दर्शन होते हैं। हमारे देश की एकता की इसकी अनेकता के बीच। एकरसता के इस महान संगम को आदि शंकराचार्य ने एक ऐसा सुगठित रूप प्रदान किया जो पिछले हजारों वर्षों से इस देश को उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक एक मजबूत एकता के सूत्र में जकड़े हुए है।

कुंभ के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है। इसमें से एक कथा इस प्रकार है कि एक बार इन्द्र देवता ने महर्षि दुर्वासा को रास्ते में भेंट होने पर जब प्रणाम किया तो दुर्वासाजी ने प्रसन्न होकर उन्हें अपनी माला दी किन्तु इन्द्र ने उस माला का आदर न कर अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर डाल दिया। जिसने माला को सूंड से घसीटकर पैरों से कुचल डाला।

इस पर दुर्वासाजी ने कुपित होकर इन्द्र को श्रीविहीन होने का शाप दिया। इस घटना के बाद इन्द्र घबराए हुए ब्रह्माजी के पास गए। ब्रम्हाजी ने इन्द्र को लेकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे इन्द्र की रक्षा करने की प्रार्थना की।

भगवान ने कहा कि इस समय असुरों का आतंक है अतः तुम उनसे संधि कर लो और देवता और असुर दोनों मिलकर समुद्र मंथन कर अमृत निकालों। जब अमृत निकलेगा तो हम तुम लोगों को अमृत बांट देंगे और असुरों को केवल श्रम ही हाथ मिलेगा।

पृथ्वी के उत्तर भाग मे हिमालय के समीप देवता और दानवों ने समुद्र का मन्थन किया। इसके लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया। जिसके फलस्वरूप क्षीरसागर से पारिजात, ऐरावत हाथी, उश्चैश्रवा घोड़ा रम्भा कल्पबृक्ष शंख, गदा धनुष कौस्तुभमणि, चन्द्र मद कामधेनु और अमृत कलश लिए धन्वन्तरि निकलें। इस कलश के लिए असुरों और दैत्यों में संघर्ष शुरू हो गया।

अमृत कलश को दैत्यों से बचाने के लिए देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत बृहस्पति, चन्द्रमा, सूर्य और शनि की सहायता से उसे लेकर भागे। यह देखकर दैत्यों ने उनका पीछा किया। यह पीछा बारह दिनों तक होता रहा। देवता उस कलश को छिपाने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान को भागते रहे और असुर उनका पीछा करते रहे।

इस भाग-दौड़ में देवताओं को पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करनी पड़ी। इन बारह दिनों की भागदौड़ में देवताओं ने अमृत कलश को हरिद्वार, प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन नामक स्थानों पर रखा। इन चारों स्थानों में रखे गए कलश से अमृत की कुछ बूंदे छलक पड़ी। अन्त में कलह को शान्त करने के लिए समझौता हुआ और भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर दैत्यों को भरमाए रखा और अमृत को इस प्रकार बांटा कि दैत्यों का नम्बर आने तक कलश रिक्त हो गया।

पौराणिक घटना भारतीय जनमानस में अमिट हो गई और कालान्तर में संस्कृति का अजस्र प्रवाह बनकर हम सभी को अपने अतीत से जोड़ते हुए पुण्य और मोक्ष के मार्ग पर आगे ले जा रही है।

प्रयाग में स्नान करने का अपार महत्व है जो माघ मास में और अधिक हो जाता है। यदि यह कुंभ का पर्व हो तो उसका वर्णन ही कठिन हो जाता है। कूर्म पुराण के अनुसार यहां स्नान से सभी पापों का विनाश होता है और मनोवांछित उत्तम भोग प्राप्त होते हैं। यहां स्नान से देवलोक भी प्राप्त होता है। भविष्य पुराण के अनुसार स्नान के पुण्य स्वरूप स्वर्ग मिलता है ओर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

स्कन्द पुराण के अनुसार भक्ति भावपूर्वक स्नान करने से जिनकी जो कामना होती है। वह निश्चित रूप से पूर्ण होती है। अग्निपुराण में कहा गया है कि इससे वही फल प्राप्त होता है जो करोड़ों गायों का दान करने से मिलता है। ब्रम्ह पुराण में कहा गया है कि स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ जैसा फल मिलता है और मनुष्य सर्वथा पवित्र हो जाता है। महाभारत में इसके पुण्य फल की चर्चा करते हुए इसे असीम कहा गया है क्योंकि स्वयं ब्रम्हाजी उसके तत्व को बताने में असमर्थ हैं।

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