September 27, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

कूड़ावान न हुए तो क्या हुए…

निम्नलिखित लेख उस छात्र की कॉपी से लिया गया है, जिसे पर्यावरण दिवस की निबंध प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला है। लेख का विषय था- कूड़ा प्रबंधन।
कूड़ा, जैसा कि सब जानते हैं, कई प्रकार का होता है। विपक्ष सरकार को कूड़ा मानकर चलता है। सरकार विपक्ष को कूड़े के ढेर में देखना चाहती है। अमेरिका अपने अलावा बाकी सारे मुल्कों को कूड़ा मानता है। नेता पब्लिक को कूड़ा मानता है और पब्लिक नेता को कूड़ा मानती है।
तालिबान पब्लिक को कूड़ा मानते हैं। और पब्लिक चाहे भी तो तालिबान को कूड़ा नहीं मान सकती, क्योंकि तालिबान के पास बम होते हैं। जिनके पास बम होते हैं, वो और कुछ कर सकते हों या नहीं, पर किसी का भी कूड़ा कर सकते हैं। इसी वजह से कई देश पाकिस्तान से डरते हैं, हालांकि उसे कूड़ा मुल्क ही माना जाता है।
कूड़े पर चर्चा करने के लिए बड़े लोग कोपनहेगन जाते हैं। एक खास वक्त में माहौल इतना कोपनहेगनी हो लेता है कि इस सीजन में जो बंदा कोपनहेगन ना गया हो, उसे बड़ा आदमी नहीं माना जाता। इसका मतलब यह नहीं है कि कोपनहेगन में कूड़ा नहीं पाया जाता।
कोपनहेगन में डिफरेंट वैरायटी का कूड़ा पाया जाता है। गरीब मुल्क में केले के छिलके का कूड़ा होता है, डिवेलप्ड कंट्री में कारों और कंप्यूटरों का कूड़ा होता है। वैसे, जानकार लोग कहते हैं कि कविता और कूड़ा हर देश में होता ही होता है। डिवेलप्ड देशों में प्रति व्यक्ति अफेयर और प्रति व्यक्ति कूड़ा ज्यादा ही होता है। अमेरिका के गोल्फर टाइगर के अफेयरों को देखकर और अमेरिका का कूड़ा देखकर यह बात बराबर समझी जा सकती है।
एक्सपर्ट मानते हैं कि विकास होता है, तो कूड़ा आता है। सिर्फ केले और गेहूं पर बसर करने वाले कूड़ा कम करते हैं, पर कार, बहुमंजिली इमारत वालों का कूड़ा भी ज्यादा होता है। यानी कूड़े का विकास भी होता चलता है। कम कूड़े वाले आदिवासियों को विकसित नहीं माना जाता। यानी जो विकट कूड़ा पैदा करने में असमर्थ हो, उसे विकसित मानने में दिक्कत आ सकती है।
इसलिए खुद को कूड़ावान साबित करने के लिए कई लोग पैकेज्ड फूड वगैरह के पैकिट घर के बाहर डस्टबिन में डालते हैं, ताकि स्टेटस बना रहे और कहीं यह ना समझ लिया जाए कि यह भाई तो सिर्फ केले और गेहूं पर बसर करता है।
कई लोगों की कविताओं और शेरों के बारे में भी यही कहा जाता है कि वे कूड़ा हैं। पर ऐसा कूड़े के साथ अन्याय है। बायोडिग्रेडेबल कूड़ा तो कालांतर में खाद वगैरह बन जाता है। पर शेर और कविताएं तो एक के बाद दूसरे को भी सुनाने-सताने के काम आती हैं। इस तरह से हम कह सकते हैं कि कविताएं कूड़े के मुकाबले ज्यादा सताती हैं। कूड़े से मुक्ति जल्दी मिल जाती है, पर कविताओं से नहीं मिलती, खास तौर पर जब, वो कोर्स में लग जाती हैं।
बढ़िया कवि कविता ही लिखते रह जाते हैं और घटिया कवि कोर्स में लग जाते हैं। खैर, कुल मिलाकर कूड़ा चाहे जैसा भी हो, उसे कविता के लेवल तक नहीं गिराया जा सकता।
डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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