October 3, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

कैसे गुलाम बना था भारत;

वास्कोडीगामा से मीर जाफर तक,

आज से लगभग 400 साल पहले, वास्कोडीगामा आया था हिंदुस्तान ! वास्कोडीगामा ने भारत की कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान की भी कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान पहले से था, भारत पहले से था लेकिन इतिहासकारों की साजिस की वजह से आज भी यह पढाया जाता है की सन 1498 में मई की 20 तारीख को वास्कोडीगामा हिंदुस्तान आया था ! 15 वी. सताब्दी का जो यूरोप था, उसमे  दो देश बहूत ताकतवर थें उस ज़माने में, एक था स्पेन और दूसरा था पुर्तगाल.  वास्कोडीगामा जो था वो पुर्तगाल का माफ़िया किंग था और पुर्तगाल के  जैसा ही एक दुसरा लुटेरा, डॉन और , माफ़िया था उसका नाम था कोलंबस, वो स्पेन का था.

 

कोलंबस गया था अमेरिका को लुटने के लिए और भारतवर्ष को लुटने के लिए वास्कोडीगामा आया था. एक बार पुर्तगाल और स्पेन की सत्ताओ के बीच में  लूट का माल जो मिले वो किसके हिस्से में ज्यादा जाए को लेकर काफी गंभीर लड़ाई हुई. इस पर मध्यस्तता करते हुए उस ज़माने के पोप ने एक अध्यादेश जारी किया. सन 1492 में, वो नोटिफिकेशन ये था कि 1492 के बाद, सारी दुनिया की संपत्ति को उन्होंने दो हिस्सों में बाँटा, और दो हिस्सों में ऐसा बाँटा कि दुनिया का एक हिस्सा पूर्वी हिस्सा, और दुनिया का दूसरा हिस्सा पश्चिमी हिस्सा. तो पूर्वी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम पुर्तगाल करेगा और पश्चिमी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम स्पेन करेगा. ये आदेश 1492 में पोप ने जारी किया. ये आदेश जारी करते समय, जो मूल सवाल है वो ये है कि क्या किसी पोप को ये अधिकार है कि वो दुनिया को दो हिस्सों में बांटे, और उन दोनों हिस्सों को लुटने के लिए दो अलग अलग देशो की नियुक्ति कर दे? स्पैन को कहा की दुनिया के पश्चिमी हिस्से को तुम लूटो, पुर्तगाल को कहा की दुनिया के पूर्वी हिस्से को तुम लूटो. 1492 में जारी किया हुआ वो आदेश और बुल आज भी एग्जिस्ट करता है.

 

 

पुर्तगालियो को चूँकि दुनिया के पूर्वी हिस्से को लुटने का आदेश मिला पोप की तरफ से तो उसी लुट को करने के लिए वास्को डी गामा हमारे देश आया क्योकि भारतवर्ष दुनिया के पूर्वी हिस्से में पड़ता है. दूसरी तरफ उसी लुट के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए कोलंबस अमरीका गया. इतिहास बताता है कि 1492 में कोलंबस अमरीका पहुंचा, और 1498 में वास्को डी गामा हिंदुस्तान पहुंचा, भारतवर्ष पहुंचा.

 

 

कोलंबस जब अमरीका पहुंचा तो उसने अमरीका में, जो मूल प्रजाति थी रेड इंडियन्स जिनको माया सभ्यता के लोग कहते थे, उन माया सभ्यता के लोगों से मार कर पिट कर सोना चांदी छिनने का काम शुरु किया. उस आदमी ने 14 – 15 वर्षो तक बराबर अमेरीका के रेड इन्डियन लोगों को लुटा, और उस लुट से भर– भर कर जहांज जब स्पेन गए तो स्पेन के लोगों को लगा कि अमेरिका में तो बहुत सम्पत्ति है, तो स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी फिर अमरीका पहुंची और स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी ने अमेरीका में पहुँच कर 10 करोड़ रेड इंडियन्स को मौत के घाट उतार दिया.10 करोड़. और ये दस करोड़ रेड इंडियन्स मूल रूप से अमरीका के बाशिंदे थे.

 

 

वास्कोडीगामा जब कालीकट में आया, 20 मई, 1498 को, तो कालीकट का राजा था उस समय झामोरिन, तो झामोरिन के राज्य में जब ये पहुंचा वास्को डी गामा, तो उसने कहा कि मै तो आपका मेहमान हु, और हिंदुस्तान के बारे में उसको कहीं से पता चल गया था कि इस देश में अतिथि देवो भव की परंपरा. तो झामोरिन ने बेचारे ने, ये अथिति है ऐसा मान कर उसका स्वागत किया, वास्को डी गामा ने कहा कि मुझे आपके राज्य में रहने के लिए कुछ जगह चाहिए, आप मुझे रहने की इजाजत दे दो, परमीशन दे दो ! जिस वास्को डी गामा को झामोरिन के राजा ने अथिति बनाया, उसका आथित्य ग्रहण किया, उसके यहाँ रहना शुरु किया, उसी झामोरिन की वास्को डी गामा ने हत्या कराइ. और हत्या करा के खुद वास्को डी गामा कालीकट का मालिक बना. और कालीकट का मालिक बनने के बाद उसने क्या किया कि समुद्र के किनारे है कालीकट केरल में, वहां से जो जहांज आते जाते थे, जिसमे हिन्दुस्तानी व्यापारी अपना माल भर-भर के साउथ ईस्ट एशिया और अरब के देशो में व्यापार के लिए भेजते थे, उन जहांजो पर टैक्स वसूलने का काम वास्को डी गामा करता था. और अगर कोई जहांज वास्को डी गामा को टैक्स ना दे, तो उस जहांज को समुद्र में डुबोने का काम वास्कोडीगामा करता था.

 

 

वास्कोडीगामा हिंदुस्तान में आया पहली बार 1498 में, और यहाँ से जब लुट के सम्पत्ति ले गया,  तो 7 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी. पोर्तुगीज सरकार के जो डॉक्यूमेंट है वो बताते है कि वास्कोडीगामा पहली बार जब हिंदुस्तान से गया, लुट कर सम्पत्ति को ले कर के गया, तो 7 जहांज भर के सोने की अशर्फिया, उसके बाद दुबारा फिर आया वास्कोडीगामा । दूसरी बार आया तो हिंदुस्तान से लुट कर जो ले गया वो करीब 11 से 12 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी. और तीसरी बार आया और हिंदुस्तान से जो लुट कर ले गया वो 21 से 22 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी. वास्कोडीगामा हिंदुस्तान में 3 बार लगातार लुटने के बाद, चौथी बार भी आता लेकिन मर गया. इतना सोना चांदी लुट कर जब वास्को डी गामा यहाँ से ले गया तो पुर्तगाल के लोगों को पता चला कि हिंदुस्तान में तो बहुत सम्पत्ति है. भारतवर्ष की सम्पत्ति के बारे में पुर्तगालियो ने पहले भी कहीं पढ़ा था, उनको कहीं से ये टेक्स्ट मिल गया था कि भारत एक ऐसा देश है, जहाँ पर महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति आया, 17 साल बराबर आता रहा, लुटता रहा इस देश को, एक ही मंदिर को, सोमनाथ का मंदिर जो वेरावल में है. उस सोमनाथ के मंदिर को महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति, एक वर्ष आया अरबों खरबों की सम्पत्ति ले कर चला गया, दुसरे साल आया, फिर अरबों खरबों की सम्पत्ति ले गया. तीसरे साल आया, फिर लुट कर ले गया. और 17 साल वो बराबर आता रहा, और लुट कर ले जाता रहा.

 

 

उससे पहले भी लुट चली हमारी, महमूद गजनवी जैसे लोग हमको लुटते रहे.

लेकिन वास्को डी गामा ने आकर लुट को जिस तरह से केन्द्रित किया और ओर्गनाइजड किया वो समझने की जरूरत है. उसके पीछे पीछे क्या हुआ, पुर्तगाली लोग आए, उन्होंने 70 –80 वर्षो तक इस देश को खूब जम कर लुटा. पुर्तगाली चले गए इस देश को लुटने के बाद, फिर उसके पीछे फ़्रांसिसी आए, उन्होंने इस देश को खूब जमकर लुट के 70 – 80 वर्ष उन्होंने भी पुरे किए.

उसके बाद डच आ गये हालैंड वाले, उन्होंने इस देश को लुटा.

उसके बाद फिर अंग्रेज आ गए हिंदुस्तान में लुटने के लिए ही नहीं बल्कि इस देश पर राज्य भी करने के लिए. पुर्तगाली आए लुटने के लिए, फ़्रांसिसी आए लुटने के लिए, डच आए लुटने के लिए, और फिर पीछे से अंग्रेज चले आए लुटने के लिए, अंग्रेजो ने लुट का तरीका बदल दिया. ये अंग्रेजो से पहले जो लुटने के लिए आए वो आर्मी ले कर के आए थे बंदूक ले कर के आये थे, तलवार ले के आए थे, और जबरदस्ती लुटते थे. अंग्रेजो ने क्या किया कि लुट का सिलसिला बदल दिया, और उन्होंने अपनी एक कंपनी बनाई, उसका नाम ईस्ट इंडिया रखा. ईस्ट इंडिया कंपनी को ले के सबसे पहले सुरत में आए इसी गुजरात में, ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है इस देश का कि जब जब इस देश की लुट हुई है इस देश की गुजरात के रास्ते हुई है.

 

 

सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी की सबसे पहली कोठी बनी. सूरत के लोगों को मालूम नहीं था,  कि जिन अंग्रेजो को कोठी बनाने के लिए हम जामीन दे रहे है, बाद में यही अंग्रेज हमारे खून के प्यासे हो जाएँगे. अगर ये पता होता तो कभी अंग्रेजो को सुरत में ठहरने की भी जमीन नहीं मिलती.

 

 

अंग्रेजो ने फिर वोही किया जो उनका असली चरित्र था. पहले कोठी बनाई, व्यापार शुरु किया, धीरे धीरे पुरे सुरत शहर में उनका व्यापार फैला, और फिर सन. 1612 में सूरत के नवाब की हत्या कराइ. अंग्रेजो ने जिस नवाब से जमीन लिया कोठी बनाने के लिए, उसी नवाब की हत्या कराइ और 1612 में जब नवाब की हत्या करा दी उन्होंने, तो सूरत का पूरा एक बंदरगाह अंग्रेजो के कब्जे में चला गया. अंग्रेजो ने जो काम सूरत में किया था सन. 1612 में, वही काम कलकत्ता में किया, वही काम मद्रास में किया, वही काम दिल्ली में किया, वही काम आगरा में किया, वही काम लखनऊ में किया, माने जहाँ भी अंग्रेज जाते थे अपनी कोठी बनाने के लिए अपनी ईस्ट इंडिया कंपनी को ले के, उस हर शहर पर अंग्रेजो का कब्जा होता था. और ईस्ट इंडिया कंपनी का झंडा फहराया जाता था. 200 वर्षो के अंदर व्यापार के बहाने अंग्रेजो ने सारे देश को अपने कब्जे में ले लिया. 1750 तक आते आते सारा देश अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का गुलाम हो गया.

 

 

1750 में सिराजुद्दोला जो, बंगाल का नवाब था, उसको ये अंदाजा हो गया कि अंग्रेज इस देश में व्यापार करने नहीं आए है, इस देश को गुलाम बनाने आए है, इस देश को लुटने के लिए आए है. सिराजुद्दोला ने फैसला किया कि अंग्रेजो के खिलाफ कोई बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ेगी. उस बड़ी लड़ाई लड़ने के लिए सिराजुद्दोला ने युद्ध किया अंग्रेजो के खिलाफ, जो 1757 मे पलासी का युद्ध के नाम से मशहूर हुआ ! पलासी के युद्ध में अंग्रेजो के पास मात्र 300 सिपाही थे, और सिराजुद्दोला के पास 18000 सिपाही थे लेकिन फिर भी सिराजुद्दोला हार गया !

 

 

अंग्रेजो की तरफ से जो लड़ने आया था उसका नाम था रोबर्ट क्लाइव, वो अंग्रेजी सेना का सेनापति था. और भारतवर्ष की तरफ से जो लड़ रहा था सिराजुद्दोला, उसका भी एक सेनापति था, उसका नाम था मीर जाफ़र. रोबर्ट क्लाइव ये जनता था कि अगर भारतीय सिपाहियो से सामने से हम लड़ेंगे तो हम 300 लोग है मारे जाएँगे, 2 घंटे भी युद्ध नहीं चलेगा. क्लाइव ने इस बात को कई बार ब्रिटिस पार्लियामेंट को चिट्ठी लिख के कहा था. क्लाइव की 2 चिट्ठियाँ है उन दस्तावेजो में, एक चिट्ठी में क्लाइव ने लिखा कि हम सिर्फ 300 सिपाही है, और सिराजुद्दोला के पास 18000 सिपाही है. हम युद्ध जीत नहीं सकते है, अगर ब्रिटिश पार्लियामेंट अंग्रेजी पार्लियामेंट ये चाहती है कि हम पलासी का युद्ध जीते, तो जरुरी है कि हमारे पास और सिपाही भेजे जाए.  जब रोबर्ट क्लाइव को कोई सेना मदद देने से ब्रिटिश हुकूमत ने मना कर दिया तब उसने मीर जफ़र जैसे एक गद्दार को बंगाल का नवाब बनाने का लालच देकर उसके सिपाहियों को बिना युद्ध लरे समर्पण करने को राजी करवा लिया!

 

 

युद्ध शुरु हुआ 23 जून 1757 को. इतिहास की जानकारी के अनुसार २३ जून १७५७ को युद्ध शुरु होने के 40 मिनट के अंदर भारतवर्ष के 18000 सिपाहियो ने मीर जाफर के कहने पर अंग्रेजो के 300 सिपाहियो के सामने सरेंडर कर दिया.

 

 

अपने 300 सिपाहियो की मदद से हिंदुस्तान के 18000 सिपाहियो को बंदी बनाया, और कलकत्ता में एक जगह है उसका नाम है फोर्ट विलियम, उस फोर्ट विलियम में 18000 सिपाहियो को बंदी बना कर ले गया. 10 दिन तक उसने भारतीय सिपाहियो को भूखा रखा और उसके बाद ग्यारहवे दिन सबकी हत्या कराई. और उस हत्या कराने में मीर जाफ़र रोबर्ट क्लाइव के साथ शामिल था. उसके बाद रोबर्ट क्लाइव ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला की हत्या कराई मुर्शिदाबाद में, क्योकि उस जमाने में बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद होती थी, कलकत्ता नही. सिराजुद्दोला की हत्या कराने में रोबर्ट क्लाइव और मीर जाफ़र दोनों शामिल थे. और नतीजा क्या हुआ ? बंगाल का नवाब सिराजुद्दोला मारा गया, ईस्ट इंडिया कंपनी को भागने का सपना देखता था इस देश में वो मारा गया, और जो ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती करने की बात करता था वो बंगाल का नवाब हो गया, मीर जाफ़र.

 

 

1757 में तो एक मीर जाफ़र था आज हिंदुस्तान में हज़ारो मीर जाफ़र है. जो देश को वैसे ही गुलाम बनाने में लगे हुए है जैसे मीर जाफ़र ने बनाया था, मीर जाफ़र ने क्या किया था, विदेशो कंपनी को समझौता किया था बुला के, और विदेशो कंपनी से समझौता करने के चक्कर में उसे कुर्सी मिली थी और पैसा मिला था. आज जानते है हिंदुस्तान का जो नेता प्रधानमंत्री बनता है, हिंदुस्तान का जो नेता मुख्यमंत्री बनता है वो सबसे पहला काम जानते है क्या करता है ? प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है और कहता है विदेशो कंपनी वालो तुम्हारा स्वागत है, आओ यहाँ पर और बराबर इस बात को याद रखिए ये बात 1757 में मीर जाफ़र ने कही थी ईस्ट इंडिया कंपनी से कि अंग्रेजो तुम्हारा स्वागत है, उसके बदले में तुम इतना ही करना कि मुझे कुर्सी दे देना और पैसा दे देना. आज के नेता भी वही कह रहे है, विदेशी कंपनी वालों तुम्हारा स्वागत है. मै आपसे मेरे दिल का दर्द बता  रहा हु कि एक ईस्ट इंडिया कंपनी इस देश को २०० – २५० वर्ष इस देश को गुलाम बना सकती है, लुट सकती है तो आज तो इन मीर जाफरों ने 6000 विदेशी कम्पनियो को बुलाया हुआ है ! आप खुद अंदाज़ लगा लीजिये की अगली गुलामी कितने वर्ष की होगी ?

 

 

ईस्ट इंडियन कंपनी का विस्तार,

ईस्ट इंडिया कंपनी की शुरुवात संन 1588 में लन्दन के कुछ व्यापारियों ने मिलकर की |  अब इन लन्दन के व्यापरियों ने मिलकर रानी एलिजाबेथ से हिन्द महासागर में व्यापार करने की इजाजत माँगी | जब ईस्ट इंडिया कंपनी की शुरुवात हुयी तो ये शुरुवात के कुछ दिनों में ही दिवालिया कम्पनी घोषित हो गयी क्योंकि ये पैसा नही कमा पायी थी | जब लन्दन के व्यापारी पहली बार समुद्री यात्रा के लिए निकले तो वो अरब सागर से ही वापस लौट आये थे | इसके बाद 1596 में तीन पानी के जहाज यात्रा के लिए लन्दन से रवाना हुए लेकिन मार्ग में ही तूफान की चपेट में आकर तबाह हो गये थे | ऐसी असफलताओ को देखकर रानी ने यात्रा के लिए धन देने से मना कर दिया लेकिन व्यापारियों की जिद के चलते रानी को मानना पड़ा |

 

अब 31 दिसम्बर 1600 को रानी की आज्ञा लेकर फिर एक बार व्यापार के लिए रवाना हुए और इस बार जेम्स लंकैस्टर ने कमान संभाली | वो भारत तो उस समय भी नही पहुच पाए थे लेकिन पूर्वी देशो से व्यापार करते रहे और 20 वर्षो तक घाटे में चल रही कंपनी अंत में 1608 में सुरत के बन्दरगाह पर पहुची | उनकी खुशी का तो ठिकाना नही रहा क्योंकि जिस देश में व्यापार के लिए वो 20 सालो से भटक रहे थे वो देश आ ही गया |  अब उन्होंने अगले दो वर्षो में दक्षिण भारत के बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित मछलीपट्टम में अपना पहला कारखाना लगाया लेकिन वो असफल रहा |

 

ईस्ट इंडिया कंपनी ने वैसे तो व्यापार के बहाने विश्व ले लगभग सभी देशो को लुट चुकी थी लेकिन भारत से उसने जीतन पैसा कमाया उतना किसी भी देश से नही कमाया था |  अब मछलीपट्टम्म के कारखाने की असफलता के बाद उन्होंने सुरत में कारखाना लगाने का विचार किया | सुरत उस समय का सबसे धनवान प्रदेश था क्योंकि वहा से आयात निर्यात के द्वारा काफी मुनाफा होता था | भारत से कपड़ा ,स्टील और मसालों के बदले उनके बराबर के वजन का सोना मिलता था | इसी कारण सुरत में उस समय हर घर में सोने के भंडार थे और इतना सोना था कि उनको सोना तोलकर रखना पड़ता था | अब ईस्ट इंडिया कम्पनी व्यापार के बहाने भारत को लुटने 1618 ही आयी थी इसलिए उसने भारत में पैर ज़माने के लिए कारखाना लगाने की अनुमति चाही |

 

 

उस समय भारत का बादशाह जहाँगीर था और तब अंग्रेज अफसर थोमस रॉ ने मुगल सम्राट से मुलाक़ात करना चाही | अब थोमस ने जहाँगीर को अंग्रेजी भाषा में पत्र लिखा जिसमे वो भारत के व्यापार करने के लिए ट्रेड लाइसेंस चाहते थे | Trade शब्द का उस ज़माने में अर्थ होता था लूटमार | जहांगीर को दुसरी सब भाषाए आती थी लेकिन अंग्रेजी नही आती थी | इस कारण उसने अपने एक दरबारी से पत्र पढने को कहा और उस दरबारी ने अंग्रेज असफर थोमस ने पुरी योजना के साथ पहले ही खरीद लिया था | अब जहांगीर उस दरबारी की विश्वनीयता के चलते ईस्ट इंडिया कम्पनी के Trade वाले पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और इस तरह उनको लूटमार की छुट मिल गयी | अब वो जहा पर भी जाते तो बादशाह का हस्ताक्षर किया हुआ पत्र बताकर लूटमार करते थे |

 

 

अब उन्होंने कारखाने भी खोल दिए और साथ साथ लूटमार भी करने लगे | लूटमार का तरीका ऐसा होता था कि भारत की भोली जनता उनकी योजनाओ को भांप नही पाती थी | उन्होंने सबसे पहले सुरत से लगभग 900 जहाज भरकर सोना लन्दन में भेजा था और इस तरह सोने की चिड़िया कहलाने वाले भारत को लूटना शुरू कर दिया | अब उन्होंने लूटमार के साथ साथ राज भी करना चाहा लेकिन कई वर्षो तक राज करने में असफल रहे क्योंकि भारत के अधिकतर राजाओं ने ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने प्रदेश में राज नही करने दिया | अब उस समय बंगाल बहुत बड़ा प्रदेश हुआ करता था जिसके राजा का नाम सिराजुदोला था |

 

अब ईस्ट इंडिया कंपनी ने इससे पहले कई छोटे छोटे सैन्य अभियान चलाये थे जो ज्यादा सफल नही रहे थे | अब उन्होंने 1757 में  राबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में बंगाल पर हमला करने का विचार किया | राबर्ट क्लाइव ने  केवल ३५० सैनिक होने पर सद्यंत्र की रणनीति बनाई और उसने सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर को धन और सत्ता का लालच लेकर अपनी तरफ कर लिया | अब जब प्लासी के युद्ध का समय आया तो खुद सिराजुद्दौला युद्ध में नही गया क्योंकि उसे पता था कि उनके सैनिक कुछ ही समय में अंग्रेजो को खत्म कर देंगे लेकिन उनको मीर जाफर की गद्दारी का पता नही था | अब मीर जाफर ने अपनी पुरी सेना को युद्ध लड़े बिना समर्पण करने को कहा और इतिहास में इसे अंग्रेजो की जीत कहा जाता है | राबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला की पुर्री सेना को बंदी बना लिया |अब मीर जाफर और रोबर्ट क्लाइव ने योजना बनाकर सिराजुद्दौला को भी मरवा दिया और मीर जाफर सिंहासन पर बैठ गया | मीर जाफर ने रोबर्ट क्लाइव को बंगाल का गर्वनर नियुक्त कर दिया और इस तरह सत्ता में भी ईस्ट इंडिया कंपनी आ गयी थी |

 

 

1757 में तो एक मीर जाफ़र था आज हिंदुस्तान में हज़ारो मीर जाफ़र है. जो देश को वैसे ही गुलाम बनाने में लगे हुए है जैसे मीर जाफ़र ने बनाया था, मीर जाफ़र ने क्या किया था, विदेशो कंपनी को समझौता किया था बुला के, और विदेशो कंपनी से समझौता करने के चक्कर में उसे कुर्सी मिली थी और पैसा मिला था. आज जानते है हिंदुस्तान का जो नेता प्रधानमंत्री बनता है, हिंदुस्तान का जो नेता मुख्यमंत्री बनता है वो सबसे पहला काम जानते है क्या करता है ? प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है और कहता है विदेशो कंपनी वालो तुम्हारा स्वागत है, आओ यहाँ पर और बराबर इस बात को याद रखिए ये बात 1757 में मीर जाफ़र ने कही थी ईस्ट इंडिया कंपनी से कि अंग्रेजो तुम्हारा स्वागत है, उसके बदले में तुम इतना ही करना कि मुझे कुर्सी दे देना और पैसा दे देना. आज के नेता भी वही कह रहे है, विदेशी कंपनी वालों तुम्हारा स्वागत है.

 

 

और हमको क्या करना, हमको कुछ नहीं, मुख्यमंत्री बनवा देना, प्रधानमंत्री बनवा देना. 100 – 200 करोड़ रूपये की रिश्वत दे देना, बेफोर्स के माध्यम से हो के एनरोंन के माध्यम से हो. हम उसी में खुश हो जाएँगे, सारा देश हम आपके हवाले कर देंगे. ये इस समय चल रहा है. और इतिहास की वही दुर्घटना दोहराइ जा रही है जो 1757 में हो चुकी है. और मै आपसे मेरे दिल का दर्द रहा रहा हु कि एक ईस्ट इंडिया कंपनी इस देश को २०० – २५० वर्ष इस देश को गुलाम बना सकती है, लुट सकती है तो आज तो इन मीर जफरो ने 6000 विदेशी कम्पनियो को बुलाया है. !!

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2 thoughts on “कैसे गुलाम बना था भारत;

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