October 3, 2022

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सच के साथ

कौन हैं भारत माता और कहां से आया ‘भारत माता की जय’

पिछले कुछ समय से ‘भारत माता’ और ‘भारत माता की जय,’ इसे लेकर देशभर में खूब विवाद हो रहा है। कोई पार्टी कहती है कि यह नारा देश के लिए आपके समर्पण भाव को दिखाता है तो कोई पार्टी कहती है कि इस नारे का मकसद देश का भगवाकरण करना है।

कोई व्‍यक्ति कहता है कि वह भारत माता की जय नहीं बोलेगा तो कोई कहता है कि वह जोर-शोर से इस नारे को कहेगा।

 

खैर हम यहां पर विवादों पर कोई टिप्‍पणी नहीं करना चाहते हैं। लेकिन हम चाहते हैं कि आप भारत माता और भारत माता की जय, क्‍या है और इसका क्‍या महत्‍व रहा है।
दरअसल यह किस्‍सा देश की आजादी से पहले का है जब देश में आजादी की लड़ाई आगे बढ़ाई जा रही थी। उसी समय देश को भारत माता माना गया था।
आइए जानिए भारत माता के इतिहास और इससे जुड़े खास तथ्‍यों के बारे में।

सन 1873 में पहली बार नजर आईं भारत माता
भारत माता की जो तस्‍वीर आज आप देखते हहैं उसे 19वीं सदी के आखिरी में स्‍वतंत्रता संग्राम में तैयार किया गया था। किरन चंद्र बनर्जी ने एक नाटक लिखा था जिसका टाइटम था, ‘भारत माता,’ इस नाटक का प्रदर्शन सन 1873 में किया गया था। यहीं से ‘भारत माता की जय’ इस नारे के शुरू होने के बारे में बातें कही गई हैं।

 

वंदे मातरम की प्रेरणा
सन 1882 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्‍याय ने ‘आनंदमठ’ नामक नॉवेल लिखा। इस नॉवेल के साथ उन्‍होंने पहली बार ‘वंदेमातरम’ जैसा गीत देश को दिया। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इसकी प्रेरणा कहीं न कहीं ‘भारत माता’ नाटक से उन्‍हें मिली थी।

 

बिपिन चंद्र पाल ने दिया अलग स्‍वरूप
बिपिन चंद्रपाल ने इसे एक विस्‍तृत रूप दे दिया। उन्‍होने भारत माता को हिंदु दर्शन और आधात्मिक कार्यों से जोड़ा। उन्‍होंने भारत माता को एक विश्‍व और एक देश जैसे विचारों के साथ जोड़ना शुरू किया था।

 

कैसे बनी भारत माता की तस्‍वीर
भारत माता का एक तस्‍वीर में वर्णन करने का श्रेय अबानींद्रनाथ टैगोर को जाता है। उन्‍होंने भारत माता को चार भुजाओं वाली देवी दुर्गा के रूप की तरह दिखाते हुए एक पेंटिंग तैयार की थी। यह देवी हाथ में एक पुस्तिका पकड़े है और सफेद रंग के कपड़े पहने थी। इस तस्‍वीर ने उन दिनों देशवासियों की भावनाओं को देश के लिए मजबूत करने का काम किया था।

 

सिस्‍टर निवेदिता का योगदान
स्‍वामी विवेकानंद की शिष्‍या रहीं सिस्‍टर निवेदिता ने इस पेंटिंग को और विस्‍तृत किया। उन्‍होंने भारत माता को हरियाली से संपूर्ण धरती पर खड़ा दिखाया जिनके पीछे एक नीला आसमान था और उनके पैरों पर कमल के चार फूल थे। चार भुजाएं आधायात्मिक ताकत का पर्याय बनीं।

भारत माता का उपहार
सिस्‍टर निवेदिता ने इस पेंटिंग से यह दर्शाने की कोशिश की थी कि भारत माता ने देश के बच्‍चों को शिक्षा, दीक्षा, अन्‍न और वस्‍त्र जैसे उपहार दिए हैं।

फिर मां गंगा के रूप में
इसके बाद सुब्रहमण्‍यम भारती जो कि आजादी की लड़ाई में सक्रिय थे उन्‍होंने भारत माता की व्‍याख्‍या गंगा की धरती के तौर पर की और भारत माता को प्राशक्ति के तौर पर पहचाना। उन्‍होंने कहा था कि उन्‍होंने अपनी गुरु सिस्‍टर निवेदिता से मिलने के साथ ही भारत माता का दर्शन किया है।

1936 में बना पहला मंदिर
वर्ष 1936 में महात्‍मा गांधी ने वाराणसी स्थित काशी यूनिवर्सिटी में भारत माता के मंदिर का उद्घाटन किया था।

वीएचपी के बनाए मंदिर का इंदिरा ने किया उद्घाटन
इसके बाद हरिद्वार में विश्‍व हिंदु परिषद (वीएचपी) की ओर से एक मंदिर का निर्माण वर्ष 1983 में किया गया था। उस समय तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस मंदिर का उद्घाटन किया था।

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इंडियन आर्मी को जोश देने वाला
‘भारत माता की जय’ अब इंडियन आर्मी का ध्‍येय वाक्‍य बन गया है। 

 

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कौन है ‘भारत माता’ और क्या है ‘भारत माता की जय’ का असली मतलब?

‘भारत माता की जय’ के बिना राष्ट्रीय पर्व का उद्दघोष पूरा नहीं होता है लेकिन क्या आप जानते हैं ‘भारत माता की जय’ का उद्दघोष कहां से आया है और क्या होता है इसका मतलब।

आइए जानते हैं भारत माता के बारे में विस्तार से…
भारत को मातृदेवी के रूप में चित्रित करके उसे भारतमाता या ‘भारतम्बा’ कहा जाता है।
भारतमाता को प्राय: केसरिया या नारंगी रंग की साड़ी पहने, हाथ में भगवा ध्वज लिये हुए चित्रित किया जाता है और उनकी सवारी शेर है।

काशी का भारतमाता मन्दिर
भारत में भारतमाता के बहुत से मन्दिर हैं।
काशी का भारतमाता मन्दिर अत्यन्त प्रसिद्ध है जिसका उद्घाटन सन् 1936 में स्वयं महात्मा गांधी ने किया था।

‘भारत माता की जय’
पिछले कुछ वक्त से ‘भारत माता की जय’ को लेकर काफी विवाद हुआ, कुछ लोगों ने इस पर भगवाकरण का आरोप लगाया तो कुछ लोगों ने इस पर राजनीतिक रोटियां सेंकने में जरा भी देर नहीं की लेकिन अगर इतिहास पर गौर फरमाएंगे तो सच्चाई इससे बहुत अलग है। ‘भारत माता की जय’ भारतीय स्वाधीनता संग्राम के समय सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाला नारा था।

इस नारे का बार बार प्रयोग किया
भारत भूमि को जीवन का पालन करने वाली माता के रूप में रूपायित कर उसकी मुक्ति के लिए की गई कोशिशों में उसकी संतानों ने इस नारे का बार बार प्रयोग किया। भारत माता की वंदना करने वाली यह उक्ति हर उद्दघोष के साथ स्वाधीनता संग्राम के सिपाहियों में नए उत्साह का संचार करती थी। इसलिए आज भी इस नारे का प्रयोग राष्ट्रप्रेम या राष्ट्र निर्माण से जुड़े अवसरों, कार्यक्रमों एवं आंदोलनों में किया जाता है।

 

लेखक किरण चन्द्रबनर्जी
सन 1873 में लेखक किरण चन्द्रबनर्जी ने अपने नाटक ‘भारत-माता’ के लिए इस शब्द का उपयोग किया गया था। उस समय बंगाल में दुर्गा पूजा, लोगों को एकजुट करने और स्वराज पर चर्चा करने का एक माध्यम बनी थी| इस बीच बंगाल के लेखकों, साहित्यकारों और कवियों के लेखों और रचनाओ में मां दुर्गा का गहरा प्रभाव रहा था और इन लेखकोंं द्वारा लिखे गए लेखों, नाटकों में भी भारत को दुर्गा की तर्ज पर मां और मातृभूमि कहकर सम्बोधित किया जाने लगा।

अवनीन्द्रनाथ टैगोर ने बनाई थी पहली फोटो
इसके बाद वर्ष 1905 में अवनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता का एक चित्र बनाया। इसे भारत माता की पहली तस्वीर माना जाता है। चित्र में भारत का नक्शा नहीं था। भारत माता भगवा रंग के बंगाल के परंपरागत परिधान में दिखाई गईं। शुरू में इसे बंग माता भी कहा गया। चार हाथों वाली देवी के हाथों में किताब, धान की पुली, माला और सफेद वस्त्र था।

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