August 9, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

कौन हैं रोहिंग्या मुस्लिम..? जानिए विस्तार से

न्यूज डेस्क |म्यांमार में करीब 8 लाख रोहिंग्या मुस्लिम रहते हैं और वे इस देश में सदियों से रहते आए हैं, लेकिन बर्मा के लोग और वहां की सरकार इन लोगों को अपना नागरिक नहीं मानती है। बिना किसी देश के इन रोहिंग्या लोगों को म्यांमार में भीषण दमन का सामना करना पड़ता है। बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग बांग्लादेश और थाईलैंड की सीमा पर स्थित शरणार्थी शिविरों में अमानवीय स्थितियों में रहने को विवश हैं।

कॉमन ईरा (सीई) के वर्ष 1400 के आसपास ये लोग ऐसे पहले मुस्लिम्स हैं जो कि बर्मा के अराकान प्रांत में आकर बस गए थे। इनमें से बहुत से लोग 1430 में अराकान पर शासन करने वाले बौद्ध राजा नारामीखला (बर्मीज में मिन सा मुन) के राज दरबार में नौकर थे। इस राजा ने मुस्लिम सलाहकारों और दरबारियों को अपनी राजधानी में प्रश्रय दिया था।

अराकान म्यांमार की पश्चिमी सीमा पर है और यह आज के बांग्लादेश (जो कि पूर्व में बंगाल का एक हिस्सा था) की सीमा के पास है। इस समय के बाद अराकान के राजाओं ने खुद को मुगल शासकों की तरह समझना शुरू किया। ये लोग अपनी सेना में मुस्लिम पदवियों का उपयोग करते थे। इनके दरबार के अधिकारियों ने नाम भी मुस्लिम शासकों के दरबारों की तर्ज पर रखे गए।

यहां से शुरू हुई अत्याचार की कहानी… आगे पढ़ें…

वर्ष 1785 में बर्मा के बौद्ध लोगों ने देश के दक्षिणी हिस्से अराकान पर कब्जा कर लिया। तब उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों को या तो इलाके से बाहर खदेड़ दिया या फिर उनकी हत्या कर दी। इस अवधि में अराकान के करीब 35 हजार लोग बंगाल भाग गए जो कि तब अंग्रेजों के अधिकार क्षेत्र में था। वर्ष 1824 से लेकर 1826 तक चले एंग्लो-बर्मीज युद्ध के बाद 1826 में अराकान अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया।

तब अंग्रेजों ने बंगाल के स्थानीय बंगालियों को प्रोत्साहित किया कि वे अराकान ने जनसंख्या रहित क्षेत्र में जाकर बस जाएं। रोहिंग्या मूल के मुस्लिमों और बंगालियों को प्रोत्साहित किया गया कि वे अराकान (राखिन) में बसें। ब्रिटिश भारत से बड़ी संख्या में इन प्रवासियों को लेकर स्थानीय बौद्ध राखिन लोगों में विद्वेष की भावना पनपी और तभी से जातीय तनाव पनपा जो कि अभी तक चल रहा है।

दूसरे द्वितीव विश्व युद्ध के दौरान दक्षिण पूर्व एशिया में जापान के बढ़ते दबदबे से आतंकित अंग्रेजों ने अराकान छोड़ दिया और उनके हटते ही मुस्लिमों और बौद्ध लोगों में एक दूसरे का कत्ले आम करने की प्रतियोगिता शुरू हो गई। इस दौर में बहुत से रोहिंग्या मुस्लिमों को उम्मीद थी कि वे ‍अंग्रेजों से सुरक्षा और संरक्षण पा सकते हैं। इस कारण से इन लोगों ने एलाइड ताकतों के लिए जापानी सैनिकों की जासूसी की। जब जापानियों को यह बात पता लगी तो उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ यातनाएं देने, हत्याएं और बलात्कार करने का कार्यक्रम शुरू किया। इससे डर कर अराकान से लाखों रोहिंग्या मुस्लिम फिर एक बार बंगाल भाग गए।

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्त‍ि और 1962 में जनरल नेविन के नेतृत्व में तख्तापलट की कार्रवाई के दौर में रोहिंग्या मुस्लिमों ने अराकान में एक अलग रोहिंग्या देश बनाने की मांग रखी, लेकिन तत्कालीन बर्मी सेना के शासन ने यांगून (पूर्व का रंगून) पर कब्जा करते ही अलगाववादी और गैर राजनीतिक दोनों ही प्रकार के रोहिंग्या लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। सैनिक शासन ने रोहिंग्या लोगों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया और इन्हें बिना देश वाला (स्टेट लैस) बंगाली घोषित कर दिया।

तब से स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। संयुक्त राष्ट्र की कई रिपोर्टों में कहा गया है कि रोहिंग्या दुनिया के ऐसे अल्पसंख्यक लोग हैं, जिनका लगातार सबसे अधिक दमन किया गया है। बर्मा के सैनिक शासकों ने 1982 के नागरिकता कानून के आधार पर उनसे नागरिकों के सारे अधिकार छीन लिए हैं। ये लोग सुन्नी इस्लाम को मानते हैं और बर्मा में इन पर सरकारी प्रतिबंधों के कारण ये पढ़-लिख भी नहीं पाते हैं तथा केवल बुनियादी इस्लामी तालीम हासिल कर पाते हैं।

बर्मा के शासकों और सै‍‍न्य सत्ता ने इनका कई बार नरसंहार किया, इनकी बस्तियों को जलाया गया, इनकी जमीन को हड़प लिया गया, मस्जिदों को बर्बाद कर दिया गया और इन्हें देश से बाहर खदेड़ दिया गया। ऐसी स्थिति में ये बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, थाईलैंड की सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसते हैं या फिर सीमा पर ही शिविर लगाकर बने रहते हैं। 1991-92 में दमन के दौर में करीब ढाई लाख रोहिंग्या बांग्लादेश भाग गए थे। इससे पहले इनको सेना ने बंधुआ मजदूर बनाकर रखा, लोगों की हत्याएं भी की गईं, यातनाएं दी गईं और बड़ी संख्या में महिलाओं से बलात्कार किए गए।

संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं रोहिंया लोगों की नारकीय स्थितियों के लिए म्यांमार की सरकारों को दोषी ठहराती रही हैं, लेकिन सरकारों पर कोई असर नहीं पड़ता है। पिछले बीस वर्षों के दौरान किसी भी रोहिंग्या स्कूल या मस्जिद की मरम्मत करने का आदेश नहीं दिया गया है। नए स्कूल, मकान, दुकानें और मस्जिदों को बनाने की इन्हें इजाजत ही नहीं दी जाती है।

इनके मामले में म्यांमार की सेना ही क्या वरन देश में लोकतंत्र की स्थापना का श्रेय लेने वाली आंग सान सूकी का भी मानना है कि रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार के नागरिक ही नहीं हैं। वे भी देश की राष्ट्रपति बनना चाहती हैं, लेकिन उन्हें भी रोहिंग्या लोगों के वोटों की दरकार नहीं है, इसलिए वे इन लोगों के भविष्य को लेकर तनिक भी चिंता नहीं पालती हैं। उन्हें भी राष्ट्रपति की कुर्सी की खातिर केवल सैनिक शासकों के साथ बेतहर तालमेल बैठाने की चिंता रहती है।

उन्होंने कई बार रोहिंग्या लोगों की हालत पर चिंता जाहिर की, लेकिन कभी भी सैनिक शासकों की आलोचना करने का साहस नहीं जुटा सकीं। इसी तरह उन्होंने रोहिंग्या लोगों के लिए केवल दो बच्चे पैदा करने के नियम को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया, लेकिन उन्होंने इसका संसद में विरोध करने की जरूरत नहीं समझी।

रोहिंग्या लोगों के खिलाफ बौद्ध लोगों की हिंसा तो समझ में आती है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस हिंसा में अब बौद्ध भिक्षु भी भाग लेने लगे हैं। इस स्थिति को देखने के बाद भी आंग सान सूकी म्यांमार के लोकतंत्र के लिए संघर्ष में भारत की चुप्पी की कटु आलोचना करती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की यह वैश्विक नायिका रोहिंग्या मुस्लिमों के बारे में कभी एक बात भी नहीं बोतली हैं। और अगर बोलती हैं तो केवल यह कि रोहिंग्या म्यांमार के नागरिक नहीं हैं और कोई भी उन्हें देश का नागरिक बनाने की इच्छी भी नहीं रखता है।

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने म्यांमार को चेतावनी दी है कि यदि वह एक विश्वसनीय देश के रूप में देखा जाना चाहता है तो उसे देश के पश्चिमी हिस्से में रह रहे अल्पसंख्यक मुसलमानों पर बौद्धों के हमले रोकना होगा।

उल्लेखनीय है कि गत वर्ष बौद्ध देश म्यांमार में अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ गुटीय हिंसा में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और करीब एक लाख 40 हजार लोग बेघर हो गए थे। कुछ लोगों का मानना है कि यह स्थिति म्यांमार के राजनीतिक सुधारों के लिए खतरा है क्योंकि इससे सुरक्षा बल फिर से नियंत्रण स्थापित करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं।

विश्व संस्था के महासचिव बान की मून ने हाल ही में कहा कि म्यांमार के अधिकारियों के लिए यह जरूरी है कि वह मुस्लिम-रोहिंग्या की नागरिकता की मांग सहित अल्पसंख्यक समुदायों की वैधानिक शिकायतों को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं। उन्होंने कहा कि ऐसा करने में असफल रहने पर सुधार प्रक्रिया कमजोर होगी और नकारात्मक क्षेत्रीय दुष्परिणाम ही मिलेंगे।

 क्यों सुर्खियों में हैं रोहिंग्या मुस्लिम

हाल में बोधगया में हुए बम विस्फोटों से जुड़कर म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिमों का नाम चर्चा में आया है, जबकि पिछले साल आईबी की एक रिपोर्ट में दर्ज एक आशंका के सिवाय इस चर्चा का अन्य कोई आधार नहीं है।

आईबी की रिपोर्ट का संबंध असम में हुई सांप्रदायिक हिंसा और उसकी प्रतिक्रिया के नाम पर पुणे, बेंगलुरु और लखनऊ में हुए बम ‍विस्फोटों से था। पता चला कि पाकिस्तान में बैठे कुछ भारत विरोधी तत्वों ने बर्मा के राखिन बौद्धों द्वारा वहां के रोहिंग्या ‍मुस्लिमों पर किए गए हमलों की तस्वीरों को असम के मुस्लिमों पर हो रहे कथित अत्याचार की बानगी की तरह पेश किया था।

आईबी के जासूसों ने यहीं से सुराग पकड़ते हुए अपनी रिपोर्ट में भारत के बौद्ध और हिंदू तीर्थों पर हमले की आशंका जताने की खानापूरी कर दी थी। जबकि अभी भी म्यांमार से विस्थापित करीब छह हजार रोहिंग्या मुस्लिम दिल्ली, हैदराबाद और कुछ अन्य भारतीय शहरों में बेहद बेचारगी की जिंदगी जी रहे हैं।

खुद संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि कुल आठ लाख रोहिंग्या आबादी का करीब एक चौथाई भाग विस्थापित है और उससे ज्यादा बुरा हाल अभी दुनिया की अन्य किसी भी विस्थापित कौम का नहीं है। रोहिंग्या विस्थापितों का सबसे बड़ा हिस्सा थाईलैंड और बांग्लादेश में रह रहा है, लेकिन अब भारत, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे नजदीकी देशों में भी उनके जत्थे देखे जाने लगे हैं।

और क्या है इनके हमदर्दों की हकीकत…

सबसे बड़ी समस्या रोहिंग्या विस्थापितों के इस्लामी हमदर्दों की है, जो पाकिस्तान के अपने सुरक्षित अड्डों में बैठकर उनकी दुर्दशा को ‘इस्लाम-विरोधी अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र’ की तरह पेश करते हैं। उनसे निपटने की चुनौती भारत के सामने हमेशा ही रहती है और यह काम रोहिंग्या-समस्या के साथ इसे नत्थी किए बगैर भी जारी रखा जा सकता है। लेकिन एक लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत को यह जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर लेनी होगी कि उसके पड़ोसी देशों में नस्ली सफाये जैसी कोई गंदी हरकत आकार न लेने पाए।

यह सचाई है कि बर्मा में बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के बीच पिछले एक-दो सालों से ऐसा कट्टरपंथी प्रचार अभियान चलाया जा रहा है, जिसका शिकार वहां के सभी अल्पसंख्यकों को होना पड़ रहा है। बर्मा के फौजी शासकों ने आंग सान सू की के नेतृत्व वाले लोकतांत्रिक आंदोलन का असर कम करने के लिए दो फॉर्मूलों पर अमल किया है। एक तो चीन के साथ नजदीकी बनाकर भारत के लोकतंत्र समर्थक रुझान को कुंद कर दिया और दूसरा, बहुसंख्यक कट्टरपंथ की पीठ पर अपना हाथ रखकर खुद को धर्म-संस्कृति और राष्ट्रीय अखंडता के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में पेश किया।

ऐसे माहौल में दखल देना भारत के लिए आसान तो नहीं है, लेकिन इसके लिए वह दुनिया भर के लोकतांत्रिक और जन अधिकार संगठनों को अपना खुला समर्थन जरूर दे सकता है। म्यांमार के सत्तारूढ़ सैनिक शासकों को हर स्तर पर यह संदेश दिया जाना चाहिए कि उसकी चालबाजियां दुनिया की नजर से छुपी नहीं हैं, और उसके इशारे पर चलने वाले धार्मिक गिरोह सालों साल अपने ही देश के एक जन-समुदाय के खिलाफ इस तरह का बर्ताव नहीं कर सकते।

 

हर कागज की कीमत तय

भारत में अपनी गहरी जड़ें जमा चुके रोहिंग्या मुसलमान यहां से जरूरी दस्तावेज भी हासिल कर लेते है। हर दस्तावेज के लिए कीमत भी तय है। मिली जानकारी के मुताबिक, निर्वाचन कार्ड के लिए पांच हजार रुपये, राशन कार्ड के लिए 10 हजार रुपये, आधार कार्ड के लिए 25 हजार रुपये, पासपोर्ट के लिए एक लाख रुपये तथा नेपाल पहुंचाने के लिए इनको 10 हजार रुपये देना पड़ता है।

 

उत्तराखंड: नेपाल तक पहुंचने का रास्ता

उत्तराखंड से सटी नेपाल सीमा पर बसे रोहिंग्या बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा से होते हुए पश्चिम नेपाल तक पहुंच गए। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, 10 परिवार ऐसे हैं, जो बिहार की रक्सौल सीमा से करीब 1,236 किलोमीटर का सफर तय कर नेपाल में आबाद हो गए। जहां उन्हें इस्लामिक संघ नेपाल जैसे जिहादी गुटों से फंडिंग मिल रही है। उत्तराखंड से सटे नेपाली जिलों में 30 परिवारों ने तो आवास भी बना लिया है। गोरखपुर-बस्ती मंडल से सटे नेपाली क्षेत्रों में करीब 378 रोहिंग्या ने जमीन भी खरीद ली है। रोहिंग्या को सभी सुविधाएं मिल जा रही हैं। शुरुआत फर्जी निर्वाचन कार्ड बनवाने से होती है। रेट तय हैं।

 

बंगाल: यहां से दिल्ली-मुंबई तक करते सफर

बंगाल के कूचबिहार, मालदा, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर जिले में रोहिंग्या यहां के मुसलमानों के बीच छिपकर रहते हैं। दार्जिलिंग समेत अन्य जगहों पर दलालों के माध्यम से तीन-चार हजार रुपये में इन्हें फर्जी प्रमाण पत्र मिल जाते हैं। इस संबंध में आधिकारिक रूप से कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। असम के रास्ते ये दिल्ली, मुंबई आदि जाने के लिए उत्तर-पूर्व के कारिडोर सिलीगुड़ी का प्रयोग करते हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, पिछले दो वर्ष में एक दर्जन से ज्यादा रोहिंग्या की गिरफ्तारी सिलीगुड़ी और आसपास के क्षेत्र में हो चुकी है। बीते 16 मार्च को रेलवे पुलिस ने सात रोहिंग्या को गिरफ्तार किया था। इन्हें ले जा रहे मु. जुबैर ने पूछताछ में बताया कि कंचनजंगा एक्सप्रेस से वह असम के कुमारघाट से सभी को दिल्ली ले जा रहा था। नौ फरवरी 2019 को सिलीगुड़ी के निकट खोरीबाड़ी क्षेत्र से छह रोहिंग्या को गिरफ्तार किया गया था। ये सभी म्यांमार के रास्ते भारत आए थे।

 

पूर्वी, पश्चिमी चंपारण, सुपौल, अररिया से सीमा तक

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार बंगाल होते हुए बड़ी संख्या में रोहिंग्या बिहार के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया और किशनगंज के चोर रास्तों (खुली सीमा) से नेपाल पहुंचे हैं। इनकी पहली बड़ी खेप 2018-19 के मध्य यहां से गुजरी है।

उत्तर प्रदेश: जमा चुके हैं गहरी जड़ें

 

राज्य में रोहिंग्या अपनी गहरी जड़ें जमा चुके हैं। जांच एजेंसियों की छानबीन में प्रदेश में 1,700 से अधिक रोहिंग्या के डेरा जमाने के तथ्य सामने आ चुके हैं। एटीएस विशेष तौर पर इनकी छानबीन कर रहा है और बीते दो वर्ष में ठेके पर रोहिंग्या को बांग्लादेशियों की घुसपैठ कराने वाले गिरोह पकड़े जा चुके हैं। फर्जी दस्तावेजों की सहायता से रोहिंग्या को भारत की सीमा में लाने के बाद पहले उनका संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय (यूएनएचआरसी) में पंजीकरण कराया जाता है और फिर उन्हें अलग-अलग जिलों में पहचान बदलकर शरण दिलाई जाती है। सूबे में अलीगढ़, उन्नाव, आगरा, कानपुर, मथुरा व अन्य जिलों में वह बस गए हैं। खासकर, उन्हें मीट के कारखानों व सफाई के काम में लगाया जाता है। रोहिंग्या के थोड़े रुपयों के लालच में देश विरोधी गतिविधियों में आसानी से शामिल होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। भारत आने के बाद वह पहचान बदलकर खाड़ी देशों का भी रुख करते हैं। एडीजी कानून-व्यवस्था उप्र, प्रशांत कुमार ने बताया कि अब तक उत्तर प्रदेश में पहचान बदलकर रह रहे कई रोहिंग्या पकड़े जा चुके हैं। चूंकि ये आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं, लिहाजा इनके बारे में एटीएस गहनता से छानबीन कर रही है। इनकी घुसपैठ कराने वाले कई गिरोह की पड़ताल कराई जा रही है।

 

 

जम्मू-कश्मीर: छह हजार से अधिक रोहिंग्या बसे, जनसांख्यिकी बदलने की साजिश

बंगाल से दिल्ली होते हुए हजारों रोहिंग्या जम्मू-कश्मीर में आ बसे हैं। सबसे ज्यादा रोहिंग्या जम्मू शहर के आसपास बसे हैं और इसे जम्मू की जनसांख्यिकी को बदलने की साजिश के तौर पर देखा जाता है। इसमें कई समाजसेवी संगठन और धर्म के नाम पर रोटिया सेंकने वाले सियासतदान परोक्ष रूप से जुड़े रहे हैं। रोहिंग्या कोलकाता के रास्ते दिल्ली और फिर वहां से ट्रेन में भर-भर कर जम्मू पहुंचे। यहां सक्रिय कुछ तत्व उनके लिए तुरंत रहने और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था कर देते हैं। जम्मू-कश्मीर प्रशासन के अनुसार, यहां म्यांमार व बांग्लादेश के 13,400 निवासी हैं। इनमें से 6,523 रोहिंग्या हैं। 6,461 जम्मू संभाग और 62 कश्मीर में हैं। इनके ठिकाने जम्मू, सांबा, डोडा, पुंछ व अनंतनाग में हैं। ये अपराध में भी सक्रिय हैं। बीते मार्च में किश्तवाड़, डोडा के संवेदनशील क्षेत्रों में सक्रिय कुछ रोहिंग्या पकड़े गए थे। जम्मू- कश्मीर हाई कोर्ट ने चार अप्रैल को छह सप्ताह के भीतर रोहिंग्याओं और घुसपैठियों की पहचान कर सूची बनाने को कहा है।

 

गोरखपुर से आना सबसे मुफीद

नेपाल जाने के लिए रोहिंग्या के लिए सबसे मुफीद गोरखपुर मंडल के महराजगंज जिले से लगी सीमा रही है। यहां छह जनवरी 2021 को चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। संतकबीरनगर जिले के समर्थन गांव में बसे रोहिंग्या अजीजुल्लाह को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद 28 फरवरी को अलीगढ़ के कमेला रोड पर रह रहे मुहम्मद फारुख और हसन को पकड़ा गया। फारुख का भाई शाहिद उन्नाव में रहता था, जिसे आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने एक मार्च को दबोचा। अजीजुल्लाह बंगाल से बिहार और फिर ट्रेन से गोरखपुर पहुंचा था। यहां करीब एक लाख रुपये में फर्जी पते पर पासपोर्ट बनवाया। उसकी तैयारी विदेश जाने की थी।

 

बिहार: सीमावर्ती क्षेत्रों में पहुंचे

नेपाल सीमा से लगे अररिया, किशनगंज व सुपौल जिले के कुछ क्षेत्रों में रोहिंग्या मुसलमान प्रवेश कर चुके हैं। खुफिया विभाग के अधिकारी इस बात की पुष्टि करते हैं कि रोहिंग्या का प्रवेश इन क्षेत्रों में हो चुका है। हालांकि, प्रशासनिक अधिकारी इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, इन इलाकों का काफी दिनों से सामाजिक सर्वेक्षण भी नहीं किया गया है।

झारखंड : मुर्शिदाबाद से करते राज्य में प्रवेश

रोहिंग्या मुसलमानों के झारखंड के कई हिस्सों में रहने की खुफिया सूचनाएं पुलिस को मिलती रही हैं। गंभीरता से छानबीन हो तो हजारों रोहिंग्या मिल जाएंगे। अप्रैल 2020 में धनबाद के बैंक मोड़ क्षेत्र से तीन रोहिंग्या मुसलमानों की गिरफ्तारी हुई थी। खुफिया एजेंसी सक्रिय हुईं, लेकिन जांच आगे नहीं बढ़ी। लोहरदगा में भी दो वर्ष पहले राष्ट्रीय नागरिक पंजिका व नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में निकले जुलूस पर जानलेवा हमला, आगजनी व पथराव में भी बांग्लादेशी व रोहिंग्या के शामिल होने की आशंका थी। खुफिया एजेंसी की मानें तो बंगाल के मुर्शिदाबाद से झारखंड में रोहिंग्या का प्रवेश होता है। पापुलर फ्रंट आफ इंडिया से भी इन्हें संरक्षण मिलने की बात खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट में है।

दिल्ली: कालिंदी कुंज में रहते करीब 500 परिवार

राष्ट्रीय राजधानी में कालिंदी कुंज के श्रम विहार में स्थित झुग्गियों में करीब 500 रोहिंग्या परिवार रहते हैं। यह संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। कई ने यमुना खादर में अपनी झुग्गियां बना रखी हैं। बहुत रोहिंग्या के पास शरणार्थी पहचान पत्र भी नहीं है। ये चोरी-छिपे सीमा पार करके विभिन्न राज्यों से होते हुए दिल्ली पहुंचे हैं। श्रम विहार स्थित रोहिंग्या कैंप में डेढ़ हजार से ज्यादा रोहिंग्या हैं। लूटपाट, झपटमारी समेत कई स्ट्रीट क्राइम में भी ये शामिल पाए गए हैं। अब मोलड़बंद एक्सटेंशन, हाजी मक्की मस्जिद कालोनी आदि क्षेत्रों तक ठिकाना बना लिया है।

यहां भी मिली मौजूदगी

बंगाल, बिहार के अलावा उप्र के वाराणसी, मेरठ, बिजनौर, बहराइच, गोरखपुर, संतकबीरनगर, महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बरेली में भी रोहिंग्या की मौजूदगी पाई गई है।

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