June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

क्या विकासवाद सच है?

अशोक कुमार वर्मा

एक जाने-माने विकासवादी और वैज्ञानिक, प्रोफेसर रिचर्ड डॉकन्ज़ ने दावा किया: “विकासवाद उतना ही सच है जितना कि सूरज की गरमी।” इसमें कोई शक नहीं कि तरह-तरह के परीक्षणों और खुद इंसान के अनुभव से साबित हुआ है कि सूरज गरम है। लेकिन क्या किसी परीक्षण और इंसानी अनुभव से यह साबित हुआ है कि विकासवाद की शिक्षा सच है?

इस सवाल का जवाब देने से पहले, हमें एक बात साफ-साफ समझने की ज़रूरत है। कई वैज्ञानिकों ने गौर किया है कि समय के गुज़रते, जीवों की नसलों में हलका-सा बदलाव आ सकता है। चार्ल्स डार्विन ने इस बदलाव को “पीढ़ी-दर-पीढ़ी होनेवाली तबदीली” कहा। ऐसे बदलाव सीधे-सीधे देखे गए हैं, इस बारे में परीक्षण किए गए और उनके नतीजों को दर्ज़ किया गया है और पौधों और जानवरों की नसलें पैदा करनेवालों ने भी बड़ी अक्लमंदी से इनका इस्तेमाल किया है।* इसलिए ऐसे बदलावों को सच माना जा सकता है। मगर कई वैज्ञानिकों ने ऐसे हलके बदलावों को “सूक्ष्मविकास” (microevolution) का नाम दिया है। यह नाम देकर वे दावा करते हैं कि ये छोटे-छोटे बदलाव इस बात का सबूत हैं कि एक बहुत ही अलग तरह की घटना घटी थी, जिसे किसी ने नहीं देखा। वैज्ञानिकों ने उस घटना को ‘महाविकास’ (macroevolution) नाम दिया।

तो आप गौर कर सकते हैं कि डार्विन ने ऐसी घटना की बात की जिसे किसी ने घटते नहीं देखा। उसने अपनी मशहूर किताब, दी ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़ में लिखा: “मैं नहीं मानता कि पौधों और जीवित प्राणियों को अलग-अलग बनाया गया था, बल्कि वे सब चंद जीवों के वंशज हैं।” डार्विन ने कहा कि अरसों पहले, इन शुरूआती “चंद जीवों” या जिन्हें जीवन का सरल रूप माना जाता था, उनमें “बहुत ही बारीक तबदीलियाँ” हुईं और इस तरह, उनसे पृथ्वी पर लाखों किस्म के जीवों का विकास हुआ। विकासवादी अपने मन-मुताबिक सिखाते हैं कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऐसे छोटे-छोटे बदलाव होते रहने से जीवों में बड़े-बड़े बदलाव आए, जैसे मछलियाँ, जल-थल जंतुओं में तबदील हो गयीं और बंदर, इंसान में। इन बड़े-बड़े बदलावों को ‘महाविकास’ कहा जाता है। कई लोगों को यह धारणा सही लगती है। वे सोचते हैं, ‘अगर एक जाति के जीवों में छोटे-छोटे बदलाव हो सकते हैं, तो फिर लंबे अरसे के दौरान विकास के ज़रिए बड़े-बड़े बदलाव भी ज़रूर हो सकते हैं।’*

महाविकास की शिक्षा इन तीन अहम धारणाओं पर आधारित है:

  1. उत्परिवर्तन या जीन में फेरबदल करने (mutations) से ऐसे पदार्थ मिलते हैं जो एक नयी जाति की रचना के लिए ज़रूरी हैं।*
  2. प्राकृतिक चुनाव (natural selection) से नयी-नयी जातियाँ बनती हैं।
  3. जीवाशम या फॉसिल रिकॉर्ड से इस बात के सबूत मिलते हैं कि पौधों और जानवरों में महाविकास हुआ था।
    क्या महाविकास के लिए दिए जानेवाले सबूत इतने ठोस हैं कि इसे सच माना जा सकता है?

क्या उत्परिवर्तन से वाकई नयी जातियाँ बन सकती हैं?

एक पौधे या जानवर की बारीकियाँ, उसके जेनेटिक कोड में लिखी हिदायतों से तय होती हैं। जेनेटिक कोड का मतलब है, आनुवंशिक रूप-रेखा जो हर कोशिका की नाभि (nucleus) में पायी जाती है।* खोजकर्ताओं ने पता लगाया है कि जेनेटिक कोड में उत्परिवर्तन से या अपने आप होनेवाले बदलावों से, पौधों और जानवरों की नसलों में कुछ तबदीलियाँ आ सकती हैं। सन्‌ 1946 में, नोबेल पुरस्कार विजेता और आनुवंशिक उत्परिवर्तन के अध्ययन की शुरूआत करनेवाले, हरमन जे. मलर ने दावा किया: “वैज्ञानिकों ने उत्परिवर्तन के ज़रिए पौधों और जानवरों में छोटे-छोटे बदलाव लाकर उनमें सुधार किए हैं। अगर इंसान ऐसा कर सकता है, तो प्राकृतिक चुनाव से जीवों का भी विकास ज़रूर हुआ होगा।”

जी हाँ, महाविकास की शिक्षा, इस दावे पर आधारित है कि उत्परिवर्तन से न सिर्फ पौधों और जानवरों की नयी जातियाँ बन सकती हैं बल्कि उनका पूरा-का-पूरा नया कुल बन सकता है। क्या इतने बड़े दावे को साबित करने का कोई तरीका है? ध्यान दीजिए कि आनुवंशिक विज्ञान पर, करीब 100 साल तक किया गया अध्ययन क्या दिखाता है।

सन्‌ 1930 के दशक के आखिरी सालों में, वैज्ञानिकों ने गर्मजोशी के साथ यह धारणा अपनायी कि अगर प्राकृतिक चुनाव से, जिसमें उत्परिवर्तन अपने आप होता है, पौधों की नयी जाति पैदा हो सकती है, तो इंसान के किए उत्परिवर्तन से और भी बढ़िया जातियाँ पैदा होनी चाहिए। इस बारे में जर्मनी के ‘मेक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर प्लांट ब्रीडिंग रिसर्च’ में काम करनेवाले एक वैज्ञानिक, वुल्फ-एकहार्ट लौनिग ने एक इंटरव्यू में सजग होइए! को बताया: “इससे ज़्यादातर जीव वैज्ञानिकों, आनुवंशिक वैज्ञानिकों और खासकर पौधों और जानवरों की नसलें पैदा करनेवालों में सनसनी फैल गयी।” लेकिन क्यों? लौनिग, जिन्होंने करीब 28 साल पौधों के जीन में किए जानेवाले फेरबदल का अध्ययन किया है, कहते हैं: “इन खोजकर्ताओं को लगा कि अब वक्‍त आ गया है कि वे पौधों और जानवरों की नसलें पैदा करने के पुराने तरीके छोड़कर, नयी तरकीबें अपनाएँ। उन्होंने सोचा कि उत्परिवर्तन से वे अच्छे जीन तैयार करके, नए और उम्दा पौधे और जानवर पैदा कर सकते हैं।”*

अमरीका, एशिया और यूरोप के वैज्ञानिकों ने कई खोज कार्यक्रमों की शुरूआत की। इन कार्यक्रमों में उन्होंने ऐसे तरीके इस्तेमाल किए जिनके बारे में उन्होंने वादा किया कि इनसे पौधों और जानवर में विकास तेज़ी से होगा। इन कार्यक्रमों में काफी पैसा खर्च किया गया। मगर 40 से भी ज़्यादा साल तक ज़बरदस्त खोजबीन करने के बाद, क्या नतीजे सामने आए? खोजकर्ता, पेटर फॉन ज़ैंगबूश कहते हैं: “हमने रेडिएशन से उत्परिवर्तन करके पौधों और जानवरों की अच्छी नसलें पैदा करने की खूब कोशिश की। और इसमें बहुत पैसा खर्च किया। फिर भी, हमारी यह कोशिश काफी हद तक नाकाम रही।” लौनिग कहते हैं: “सन्‌ 1980 के आते-आते, दुनिया-भर के वैज्ञानिकों की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। पश्‍चिमी देशों में उत्परिवर्तन के ज़रिए नयी नसलें पैदा करने के बारे में जो अध्ययन किए जा रहे थे, उन्हें भी रोक दिया गया। उत्परिवर्तन से ‘अच्छे जीन तैयार’ करके नसलें पैदा करने की कोशिश ‘नाकाम’ रही, क्योंकि ये नसलें या तो मर गयीं या कुदरती नसलों से भी कमज़ोर निकलीं।”

लेकिन फिर भी, इससे एक फायदा ज़रूर हुआ है। उत्परिवर्तन पर की गयी करीब 100 साल की खोज और खासकर इस तरीके से नसलें पैदा करने के बारे में 70 साल की खोजबीन से वैज्ञानिक ढेर सारे आँकड़े और जानकारी इकट्ठा कर पाए हैं। इनकी मदद से वे इस बारे में नतीजे निकाल पाए हैं कि क्या उत्परिवर्तन से नयी जाति पैदा की जा सकती है या नहीं। सबूतों की जाँच करने के बाद, लौनिग ने कहा: “उत्परिवर्तन के ज़रिए [पौधों या जानवरों की] मूल जातियों से एक बिलकुल नयी जाति पैदा करना नामुमकिन है। यह बात, 20वीं सदी में किए गए सारे अध्ययन और परीक्षण के नतीजे से मेल खाती है। यहाँ तक कि यह ‘संभाविता के नियम’ (laws of probability) के मुताबिक भी है। इसलिए ‘बार-बार होनेवाले एक ही तरह के बदलाव के नियम’ से ज़ाहिर होता है कि जिन दो जातियों के जीन में फर्क होता है, उनमें ऐसी सीमाएँ होती हैं जिन्हें इत्तफाक से होनेवाले बदलाव भी मिटा नहीं सकता।”

अब ज़रा ऊपर बतायी सच्चाइयों पर गौर कीजिए। अगर ऊँची शिक्षा और बढ़िया ट्रेनिंग हासिल करनेवाले वैज्ञानिक, जीन में फेरबदल करके नयी जातियाँ पैदा नहीं कर पाए हैं, तो भला कुदरत अपने आप बेहतर और नयी जातियाँ कैसे पैदा कर सकती है? अगर खोज दिखाती है कि उत्परिवर्तन के ज़रिए मूल जाति से एक बिलकुल अलग और नयी जाति पैदा नहीं की जा सकती, तो फिर महाविकास ठीक-ठीक कैसे हुआ होगा?

क्या प्राकृतिक चुनाव से नयी जाति बनती है?

डार्विन का मानना था कि जिसे वह प्राकृतिक चुनाव कहता है, उसके तहत वे जीव ज़िंदा रहते हैं जो खुद को वातावरण के हिसाब से ढाल पाते हैं, जबकि दूसरे जीव धीरे-धीरे मर जाते हैं। नए ज़माने के विकासवादी सिखाते हैं कि जब जीवों की अलग-अलग जातियाँ दुनिया में फैलने लगीं और अलग-थलग रहने लगीं, तब प्राकृतिक चुनाव से उन जीवों को फायदा हुआ जिनके जीन में हुए उत्परिवर्तन की वजह से वे अपने नए वातावरण में जीने के काबिल बने। नतीजा, विकासवादी दावा करते हैं कि इन जीवों का धीरे-धीरे विकास होने लगा और आखिरकार, वे एकदम नयी जातियों में तबदील हो गए।

जैसे हमने पहले देखा कि खोज से मिले नतीजे, इस बात के ठोस सबूत देते हैं कि उत्परिवर्तन से न तो पौधों की और ना ही जानवरों की एक बिलकुल नयी जाति पैदा हो सकती है। लेकिन विकासवादियों के पास इस बात का क्या सबूत है कि प्राकृतिक चुनाव में जिन जीवों में उम्दा तरीके से उत्परिवर्तन हुए, उनसे नयी जातियाँ पैदा हुईं? सन्‌ 1999 में, अमरीका की ‘विज्ञान की राष्ट्रीय अकादमी’ (NAS) ने एक ब्रोशर छापा, जिसमें लिखा था: “[नयी जातियों का विकास होता है,] इसकी सबसे ज़बरदस्त मिसाल है, फिंच नाम के पक्षी की 13 जातियाँ, जो गलापगस द्वीप-समूह में पायी जाती हैं। इन्हीं पक्षियों पर डार्विन ने अध्ययन किया था, इसलिए आज ये ‘डार्विन के फिंच’ के नाम से जाने जाते हैं।”

सन्‌ 1970 के दशक में एक खोजकर्ता दल ने, जिसकी अगुवाई पीटर और रोज़मेरी ग्रांट ने की थी, इन पक्षियों पर अध्ययन करना शुरू किया। उन्होंने पाया कि गलापगस द्वीप-समूह में एक साल सूखा पड़ने के बाद, बड़ी चोंचवाले पक्षी ज़िंदा बच गए जबकि छोटी चोंचवाले पक्षी मर गए। दरअसल, इन 13 जातियों के फिंच पक्षियों को खास तौर पर उनकी चोंच के आकार और नाप से पहचाना जाता है। इसलिए खोजकर्ताओं ने माना कि बड़ी चोंचवाले पक्षियों का ज़िंदा बचना, प्राकृतिक चुनाव का एक बड़ा सबूत है। ब्रोशर आगे कहता है: “पीटर और रोज़मेरी ग्रांट ने अनुमान लगाया कि अगर द्वीप-समूह में हर 10 साल में एक बार सूखा पड़ेगा, तो करीब 200 साल में फिंच की एक नयी जाति बन सकती है।”

लेकिन इस ब्रोशर में ऐसी कुछ अहम सच्चाइयाँ नहीं लिखी गयीं, जो काफी शर्मनाक हैं। जिस साल द्वीप-समूह में सूखा पड़ा, उसके बादवाले सालों में दोबारा छोटी चोंचवाले पक्षियों की तादाद बढ़कर, बड़ी चोंचवाले पक्षियों से ज़्यादा हो गयी। इसलिए पीटर ग्रांट और एक ग्रेजुएट विद्यार्थी, लायल गिब्स ने सन्‌ 1987 में, विज्ञान की पत्रिका कुदरत (अँग्रेज़ी) में लिखा कि उन्होंने “प्राकृतिक चुनाव को पलटते देखा है।” सन्‌ 1991 में, ग्रांट ने लिखा कि जब भी आबोहवा में बदलाव आते हैं, तो “जिन पक्षियों पर प्राकृतिक चुनाव का असर पड़ता है, उनकी गिनती घटती-बढ़ती रहती है।” खोजकर्ताओं ने यह भी गौर किया कि फिंच की कुछ अलग-अलग “जातियाँ” आपस में सहवास करती हैं और उनके जो बच्चे पैदा होते हैं, वे अपने माँ-बाप से बेहतर जी पाते हैं। यह देखकर, पीटर और रोज़मेरी ग्रांट इस नतीजे पर पहुँचे कि अगर इसी तरह प्रजनन जारी रहा, तो 200 साल में दो “जातियाँ” मिलकर एक जाति बन जाएँगी।

सन्‌ 1966 में, विकासवाद पर अध्ययन करनेवाले जीव वैज्ञानिक, जॉर्ज क्रिसटफर विलियम्स ने लिखा: “यह बड़े दुःख की बात है कि विकासवाद को समझाने के लिए सबसे पहले प्राकृतिक चुनाव का सिद्धांत ईजाद किया गया। दरअसल, यह सिद्धांत इस बात को समझाने के लिए ज़्यादा ज़रूरी है कि जीव वातावरण के मुताबिक खुद को कैसे ढाल पाते हैं।” सन्‌ 1999 में, विकासवाद के सिद्धांत को बढ़ावा देनेवाले, जैफरी श्‍वॉट्‌र्ज़ ने लिखा कि अगर विलियम्स की बात सही है, तो यह मुमकिन है कि अलग-अलग जाति के जीव, प्राकृतिक चुनाव की मदद से बदलते माहौल में ज़िंदा रह रहे हैं, लेकिन “इससे कुछ भी नया नहीं बन रहा है।”

इसमें कोई शक नहीं कि डार्विन के फिंच पक्षियों से “कुछ भी नया” नहीं बन रहा है। फिंच अभी-भी फिंच ही हैं। और यह सच्चाई कि वे आपस में प्रजनन कर रहे हैं, विकासवादियों के उन तरीकों को गलत साबित करती है जिनके आधार पर वे कहते हैं कि एक नयी जाति पैदा होती है। इसके अलावा, यह इस बात का भी पर्दाफाश करती है कि विज्ञान की जानी-मानी संस्थाएँ भी पक्षपाती हो सकती हैं और सबूतों को तोड़-मरोड़कर पेश कर सकती हैं।

क्या फॉसिल रिकॉर्ड महाविकास को सच साबित करता है?

‘विज्ञान की राष्ट्रीय अकादमी’ का ब्रोशर, जिसका ज़िक्र पहले किया गया था, पढ़नेवालों के मन में यह छाप छोड़ता है कि वैज्ञानिकों को इतने फॉसिल मिले हैं कि वे महाविकास को सच साबित करने के लिए काफी हैं। ब्रोशर कहता है: “जब मछली से जल-थल जंतुओं का, जल-थल जंतुओं से रेंगनेवालों का और रेंगनेवालों से स्तनधारियों का, यहाँ तक कि जब बंदर से इंसान का विकास हुआ, तब इनके विकास के दौरान जो तरह-तरह के प्राणी बने, उनके ढेरों फॉसिल मिले हैं। इसलिए यह ठीक-ठीक बताना अकसर मुश्‍किल है कि एक जाति दूसरी जाति में कब तबदील हो गयी।”

बड़े ताज्जुब की बात है कि यह बयान कितने पक्के यकीन के साथ छापा गया। लेकिन इसमें ताज्जुब की क्या बात है? सन्‌ 2004 की नैशनल जिओग्राफिक पत्रिका ने बताया कि फॉसिल रिकॉर्ड, “विकासवाद की एक ऐसी फिल्म” की तरह है “जिसकी हर 1,000 तसवीरों में से 999 तसवीरें, काट-छाँट के दौरान गुम हो गयी हैं।” तो हर हज़ार में से जो एक-एक “तसवीरें” बची हैं, क्या उनसे वाकई यह साबित किया जा सकता है कि महाविकास हुआ था? आखिर, फॉसिल रिकॉर्ड असल में क्या दिखाते हैं? कट्टर विकासवादी, नायल्ज़ एलड्रेज कबूल करते हैं कि फॉसिल रिकॉर्ड दिखाते हैं कि एक लंबे अरसे से “जानवरों की ज़्यादातर जातियों में एकदम न के बराबर बदलाव हुए।”

दुनिया-भर के वैज्ञानिकों ने आज तक, करीब 20 करोड़ बड़े फॉसिल और अरबों छोटे-छोटे फॉसिल खोद निकाले हैं और उनके रिकॉर्ड तैयार किए हैं। बहुत-से खोजकर्ता इस बात से सहमत हैं कि इतने सारे ब्यौरेदार रिकॉर्ड दिखाते हैं कि जानवर के सभी खास समूह अचानक वजूद में आए और उनमें लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ, और बहुत-सी जातियाँ जिस तरह अचानक वजूद में आयीं, उसी तरह अचानक लुप्त भी हो गयीं। फॉसिल रिकॉर्ड की जाँच करने के बाद जीव वैज्ञानिक, जॉनथन वेल्स लिखते हैं: “जानवरों को जिन खास समूहों में बाँटा जाता है, जैसे जगत, संघ और वर्ग, उससे साफ ज़ाहिर होता है कि विज्ञान के मुताबिक, यह धारणा सच नहीं कि सभी जीवों की शुरूआत एक ही पूर्वज से हुई। फॉसिल रिकॉर्ड और अणुओं की जटिल व्यवस्था की जाँच करने पर मिले सबूतों से पता चलता है कि इस सिद्धांत का कोई ठोस आधार भी नहीं है।”

विकासवाद—सच या झूठ?

बहुत-से जाने-माने विकासवादी क्यों इस बात पर अड़े हुए हैं कि महाविकास एक सच है? विकासवादी रिचर्ड लवॉनटन ने, जिनका काफी दबदबा है, रिचर्ड डॉकन्ज़ की कुछ दलीलों की निंदा करने के बाद लिखा कि कई वैज्ञानिक, विज्ञान के उन दावों को सच मानने के लिए तैयार हैं जिनमें कोई तुक ही नहीं, क्योंकि “हम सभी वैज्ञानिकों ने यह वादा किया है कि हम बस इसी धारणा को मानेंगे: जो चीज़ें दिखायी देती हैं वही हकीकत हैं और विश्‍व और उसमें पाए जानेवाले जीवन की शुरूआत के पीछे किसी आलौकिक शक्‍ति का हाथ नहीं।” यहाँ तक कि कई वैज्ञानिक एक बुद्धिमान रचनाकार के होने की गुंजाइश को मानने से साफ इनकार करते हैं। क्यों? लवॉनटन लिखते हैं: “हमारी दुनिया में परमेश्‍वर के लिए कोई जगह नहीं।”

इस बारे में समाज वैज्ञानिक, रॉडनी स्टार्क ने जो कहा, उसका हवाला देते हुए साइंटिफिक अमेरिकन पत्रिका कहती है: “पिछले 200 सालों से, इस बात को बढ़ावा दिया गया है कि अगर आप विज्ञान के माननेवाले बनना चाहते हैं, तो आपको धर्म की बेड़ियों से आज़ाद होना पड़ेगा।” उन्होंने यह भी कहा कि खोज करनेवाले विश्‍वविद्यालय में, “धर्म पर आस्था रखनेवाले लोग अपना मुँह बंद रखते हैं,” और “नास्तिक लोग उन्हें नीचा देखते हैं।” स्टार्क के मुताबिक, “[वैज्ञानिकों की बिरादरी में] ऊँचे दर्जे के लोगों में जो नास्तिक होते हैं, उन्हें सिर आँखों पर बिठाया जाता है।”

अगर आप महाविकास की शिक्षा को सच मानना चाहते हैं, तो आपको यह मानना होगा कि अज्ञेयवादी या नास्तिक वैज्ञानिक अपनी खोज में खुद के खयालात मिलाकर नहीं बताएँगे। आपको यह भी यकीन करना होगा कि उत्परिवर्तन और प्राकृतिक चुनाव से हर तरह के जटिल जीव पैदा हुए हैं, इसके बावजूद कि उत्परिवर्तन पर की गयी सौ साल की खोज और इस तरीके से पैदा की गयी अरबों नसलों की जाँच दिखाती है कि उत्परिवर्तन से एक भी ढंग की नयी जाति पैदा नहीं हुई है। इसके अलावा, आपको यह भरोसा करना होगा कि सब जीवों की शुरूआत एक ही पूर्वज से हुई, हालाँकि फॉसिल रिकॉर्ड ज़ोरदार तरीके से इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि पौधों और जानवरों के खास समूह अचानक वजूद में आए और कई अरसों के बीतने पर भी उनका एक से दूसरी जाति में विकास नहीं हुआ। अब बताइए, क्या आपको लगता है कि ये सारी धारणाएँ सच पर आधारित हैं या झूठ पर?

कुत्तों की नसलें पैदा करनेवाले विशेषज्ञ, कुत्तों को चुनकर उनका आपस में सहवास कराते हैं ताकि वक्‍त के गुज़रते ऐसी नसलें पैदा हों जिनके पैर छोटे हों या जिनके बाल उनके पूर्वजों से ज़्यादा लंबे हों। मगर अकसर ये बदलाव जीन में कुछ खराबी की वजह से होते हैं। उदाहरण के लिए, डाक्सहूण्ड नाम के कुत्ते इसलिए बौने पैदा होते हैं क्योंकि उनमें उपास्थि (कार्टिलेज) बराबर बन नहीं पाती।

हालाँकि इस लेख में शब्द “जाति” का कई बार इस्तेमाल किया गया है, मगर ध्यान दीजिए कि यह विज्ञान से जुड़ा शब्द है। इसमें और बाइबल की किताब, उत्पत्ति में इस्तेमाल किए गए शब्द “जाति” में फर्क है। बाइबल के शब्द “जाति” का मतलब है, “किस्म, प्रकार, वर्ग, तरह-तरह के।” जबकि विज्ञान के शब्द “जाति” का मतलब है, “वंश (genus) का छोटा समूह जिसमें एक-जैसी खासियत और लक्षण रखनेवाले जानवर या पौधे होते हैं।” इसलिए वैज्ञानिक जिसे विकासवाद के ज़रिए पैदा हुई नयी जाति कहते हैं, वह दरअसल बाइबल के शब्द “जाति” के मुताबिक एक किस्म है।

“जीवों को किन अलग-अलग समूहों में बाँटा जाता है,” बक्स देखिए।

एक खोज दिखाती है कि एक जीव को बनाने में जेनेटिक कोड के अलावा, कोशिका में पाए जानेवाले कोशिका द्रव्य (cytoplasm), झिल्ली (membranes), और दूसरे सूक्ष्म अंग का भी हाथ होता है।

इस लेख में लौनिग, ‘मेक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर प्लांट ब्रीडिंग रिसर्च’ की तरफ से राय नहीं दे रहे हैं बल्कि खुद अपनी राय पेश कर रहे हैं।

उत्परिवर्तन के परीक्षण से बार-बार यही नतीजा सामने आया है कि नसलों में जितने भी नए बदलाव होते हैं, वे बदलाव आगे की नसलों में खत्म होते जाते हैं और आखिरकार, एक ही तरह की नसलें पैदा होती रहती हैं। लौनिग ने इसे “बार-बार होनेवाले एक ही तरह के बदलाव का नियम” (law of recurrent variation) कहा। इसके अलावा, जिन पौधों में उत्परिवर्तन किया गया था, उनमें से 1 प्रतिशत से भी कम पौधों को आगे की जाँच के लिए चुना गया। और इन पौधों में 1 प्रतिशत से भी कम, बाज़ार में बेचने लायक थे। जानवरों में किए उत्परिवर्तन के नतीजे और भी बदतर निकले, इसलिए इस तरीके को पूरी तरह छोड़ दिया गया।

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