June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

क्या हमारी जड़ें खोखली हो रही है! संस्कृति का पतन हो रहा है…

कहते हैं, जो होता है अच्छे के लिये होता है।

कल KBC में सोनाक्षी सिन्हा इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाईं कि हनुमान जी किसके प्राण वापस लाने के लिये हिमालय से संजीवनी बूटी लाने गये थे। इस पर KBC के दर्शक आक्रोश में आ गये और उन्होंने सोशल मीडिया पर सोनाक्षी को खूब खरी-खोटी सुनाई। इन खरी-खोटी सुनाने वालों में मैं भी शामिल था।

 

पर इस एपिसोड का एक सकारात्मक पक्ष भी था। और वो यह कि लोगों को इस बात से एक बहुत बड़ा झटका लगा। उन्हें समझ आया कि सोनाक्षी सिन्हा कोई अकेली नहीं हैं। वह आज की युवा पीढ़ी का प्रतिबिम्ब हैं। आज के माता-पिताओं को इस बात का आभास हुआ कि उनके बच्चे लगातार अपने धर्म, संस्कृति और परम्पराओं से दूर होते चले गये और उन्हें इस बात की भनक तक नहीं लगी।

 

 

वो तो भला हो सोनाक्षी सिन्हा का कि उन्होंने करोड़ों माता-पिताओं को यह बात याद दिला दी कि आज कल के बच्चों की परवरिश में उनसे कहीं न कहीं कोई कमी रह गई है जो उन्हें उनकी जड़ों से काटती जा रही है।

 

आज शिक्षा के सेक्युलरीकरण के कारण स्कूली सिलेबस से रामायण और महाभारत को बाहर कर दिया गया है ताकि बच्चे अपनी जड़ों से कट जायें। अपनी जड़ों से कटे लोग ही बाद में धर्मान्तरण का शिकार होते हैं। हमें धर्म के बारे में अध

 

हमारी पीढ़ी के बच्चों को तो फिर भी ये कहानियाँ पता थीं क्योंकि हमें रामायण-महाभारत की कहानियां घर में ही बाबा-दादी ने सुना दी थीं।

 

टेलीविजन पर रामानंद सागर और बी आर चोपड़ा ने विस्तार से जो रामायण और महाभारत दिखाया वो अलग। आज संयुक्त परिवार के विखंडीकरण के कारण बच्चे अपने धर्म और अपनी सांस्कृतिक धरोहर से वंचित रह गये हैं।
बाबा-दादी साथ रहते नहीं और माँ-बाप के पास नौकरी के बाद इतना टाइम नहीं होता कि वो उन्हें, राम, कृष्ण, शिव-पार्वती, गणेश, दुर्गा इत्यादि की कहानियाँ सुना सकें। भाषा, गणित और विज्ञान पढ़ाने के लिए तो उनके पास टाइम ही नहीं होता तो वे रामायण-महभारत के बारे में कहाँ से पढ़ायेंगे। भाषा, गणित और विज्ञान पढ़ाने के लिए भी उन्हें ट्यूशन रखना पड़ता है।

 

 

तो प्रश्न यह उठता है कि इसका समाधान क्या है? हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि हमारे बच्चों को अपने धर्म, और सांस्कृतिक धरोहर के बारे में जानकारी मिले ताकि वो अपनी जड़ों से जुड़े रहें।

 

 

मेरा विचार है कि बचपन में ही हम अपने बच्चों को बाल रामायण और बाल महाभारत पुस्तकें ला कर दें और फिर उनके साथ बैठ कर उन कहानियों में जो ज्ञान निहित है उसकी चर्चा करें, उन्हें समझायें।
इसके लिए हम गीता प्रेस की पुस्तकें ला सकते हैं या फिर अमर चित्र कथा का पूरा संग्रह उन्हें दे सकते हैं। जब हमारे बच्चे अपने साथियों के साथ इन कहानियों की चर्चा करेंगे तो उनके मन में भी और जानने की इच्छा जागृत होगी और फिर वो भी अपने माता-पिता से इन किताबों की माँग करेंगे।

 

पुस्तकों के साथ-साथ आप अपने बच्चों को रामानंद सागर की रामायण, बी आर चोपड़ा की महाभारत, और डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी का चाणक्य भी यू ट्यूब पर अवश्य दिखाएं। दिखाते समय साथ स्वयं भी देखें और उनके साथ चर्चा भी करें।

 

रामायण और महाभारत के अतिरिक्त हमारे जो अन्य महापुरुष हैं – जैसे, चाणक्य, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, राजा कृष्णदेव राय, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, सरदार पटेल; जीजाबाई, रानी लक्ष्मीबाई, लोकमान्य तिलक, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, ऋषि अरविंद और वीर सावरकर – उनके जीवन पर आधारित पुस्तकें भी हमें अपने बच्चों को लाकर देनी चाहिये और उनके जीवन से मिलने वाली शिक्षा की चर्चा उनसे करनी चाहिए।

 

 

साथ ही साथ, हमें अपनी सरकारों के ऊपर भी इस बात का दबाव बनाना चाहिये कि हमारे स्कूल सिलेबस में रामायण और महाभारत की कहानियों को शामिल किया जाए। हमें पता है कि कुछ वामी-जेहादी इसका विरोध करेंगे, पर हमें उन्हें नज़रअंदाज़ कर देना चाहिये, क्योंकि वो तो चाहते ही यही हैं कि हमारी भावी पीढ़ी अपनी जड़ों से पूरी तरह से कट जाए ताकि उनका काम आसान हो सके। पर ध्यान रहे, सब काम सरकारें ही नहीं करतीं, कुछ काम स्वयं भी करना पड़ता है। इसलिए सरकार यदि न भी करे तो भी आप अपना काम ज़रूर कीजिये। क्योंकि बच्चे तो आपके हैं और उन्हें कैसी शिक्षा मिले या न मिले, इसकी ज़िम्मेदारी भी आपकी ही है।

 

 

तो इस बात को गंभीरता से लीजिये और साथ ही साथ सोनाक्षी सिन्हा को धन्यवाद दीजिये कि उन्होंने इस गहन चर्चा को जन्म दिया।

 

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