June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

क्या है गणतंत्र के गण की पहली चुनौती?

26 जनवरी को भारतीय गणतंत्र को स्थापित हुए 70 साल पूरे हो गए। हम अपने गणतंत्र की 71वीं सालगिरह मना रहे हैं। इस मौके पर एक सवाल बेहद अहम हो जाता है। एक गणतंत्र में गण की सुरक्षा ज्यादा मायने रखती है या तंत्र की? आजादी के बाद देश का तंत्र अखंड और सुचारू है, यह बात संतोष देती है। लेकिन गण का क्या हाल है? क्या देश की आधी आबादी के बिना भारतीय गण की कल्पना की जा सकती? समाज की इकाई परिवार होती है और परिवार का केंद्र महिलाएं। क्या महिलाओं की स्थिति में बेहतरी लाए बिना परिवार और फिर वृहत्तर समाज की बेहतरी की कल्पना की जा सकती है?

आधी आबादी की बेहतरी और संपन्नता का सवाल सबसे अहम है। लेकिन हम मौजूदा भारतीय सामाजिक परिवेश में महिलाओं के हालात का जायजा लेते हैं तो सारे दावे खोखले नजर आते हैं। महिलाओं को सिर्फ हिंसा और जुल्मों का सामना ही नहीं करना पड़ता, बल्कि इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी उनकी स्थित बेहतर नहीं है।

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध की खबरें रोजाना सुर्खियों में रहती हैं। महिलाओं के साथ-साथ बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं के साथ बलात्कार की खबरें मानवता को शर्मसार करती हैं। महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न और हिंसा कई तरह के रूपों में मौजूद हैं जिनमें हाथापाई, गाली-गलौच, तेजाब छिड़कना, शारीरिक-मानसिक शोषण, बाल विवाह, दहेज हत्या, मानव तस्करी और बलात्कार तक शामिल हैं। स्कूल, सड़क, दफ्तर, होटल, पार्क, खेत, कारखाना, बाजार, बाथरूम, भीड़, एकांत, शायद ही ऐसी कोई जगह बची हो जहां महिलाएं हिंसा का शिकार नहीं हुई हों।

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महिलाओं का शारीरिक शोषण एक महामारी बन चुका है जिसके इलाज की सख्त जरूरत है। संस्कृति और सभ्यता का सिरमौर कहलाने वाला भारत देश भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। लेकिन अब लड़कियां इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाने लगी हैं।

बुजुर्ग महिलाओं से लेकर मासूम बच्चे तक बलात्कार और हत्या की भयावह वारदातों के शिकार हो रहे हैं। साल 2016 में 16,000 से ज्यादा बच्चों का बलात्कार हुआ है जिसमें शिशु भी शामिल हैं।’ राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की साल 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में दर्ज बलात्कार के करीब 39,000 मामलों में 43 फीसदी पीड़ित बच्चे या 18 साल से कम उम्र की लड़कियां थीं। साल 2015 के मुकाबले 2016 में देश में बलात्कार की घटनाओं में 12.4 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

28.8 फीसदी शादीशुदा महिलाएं पतियों द्वारा प्रताड़ित होती हैं.

भारत में राष्ट्रीय परिवार स्वाथ्य्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि 28.8 फीसदी शादीशुदा महिलाएं अपने पतियों द्वारा प्रताड़ित होती हैं। यही नहीं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो-2016 के आकंड़े बताते हैं कि एक लाख 10 हजार 378 दर्ज मामलों में महिलाएं अपने पति या परिजनों द्वारा प्रताड़ित की गई हैं। इसके अलावा डिजीटल होते भारत में ऑललाइन स्टॉकिंग, साइबर अपराध और महिला तस्करी के मामले भी तेजी से बढ़े हैं।

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महिलाएं जन्म से लेकर बुढ़ापे तक जीवन के हर पड़ाव पर हिंसा का सामना करती हैं। जुल्म की यह दास्तां जन्म होने से पहले ही भ्रूण हत्या से शुरू होती है। इसकी मुख्य वजह है लड़कियों से जुड़ी असुरक्षा और दहेज। एक अरसे से दहेज का विरोध हो रहा है और दहेज ना लेने की कसमें खिलाई जाती रही हैं। लेकिन दिनों-दिन शादियां एक चकाचौंध और दिखावे में तब्दील हो गई हैं। जहां पैसों और दहेज का जमकर दिखावा होता है।

महिला मामलों के जानकार बताते हैं कि दहेज एक ऐसा दानव है जिसके दबाव में बच्चियों के पैदा होने से पहले ही उन्हें मार दिया जाता है। भले ही कानून में दहेज विरोधी कानून और आईपीसी में 498-ए जैसी कठोर धारा है लेकिन हमारी मानसिकता पर कोई असर नहीं हो रहा है।

गांवों और शहरों की झुग्गी झोंपड़ी की गरीब, दलित, विधवा महिलाओं के साथ-साथ मुस्लिम, आदिवासी और दूर दराज के इलाकों में रह रही महिलाओं को भी सामाजिक स्तर पर कई तरह के भेदभावों और आर्थिक शोषण का शिकार होना पड़ता है।

यूएनवूमेन के साल 2012 में किए गए एक शोध के मुताबिक दिल्ली में 95 फीसदी महिलओं और लड़कियों को सार्वजनिक स्थलों पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। कुछ दिनों पहले यौन उत्पीड़न के खिलाफ सोशल मीडिया पर अमेरिका से शुरू हई मुहिम ‘मी टू’ (#MeToo) ने एक वैश्विक आंदोलन का रूप ले लिया। दुनिया भर की महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न की घटनाओं को खुलकर पूरी दुनिया को बताया।
अपराध के खिलाफ आवाज उठानी होगी:-

 

स्वामी विवेकानंद के कहे अनुसार हमें संगठित होकर जागना होगा ताकि लोगों की चेतना से महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हो रही हिंसा को जड़ से खत्म किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अपने पहले स्वाधीनता दिवस के संबोधन में नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्रचीर से देशवासियों को कहा था कि सभी पुरूषों और लड़कों को समाज की महिलाओं और लड़कियों को समानता का अधिकार देना होगा। प्रधानमंत्री ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी मुहिम शुरू कर देशवासियों को संदेश दिया कि विशेष कार्यक्रम और अभियान चलाकर बेटियों को शिक्षा के जरिए ही ताकतवर बनाया जा सकता है।

पिछले पांच सालों के दौरान अपराधिक कानून सुधार एक्ट 2013 के जरिए कार्यस्थलों पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा के क्षेत्र में सुधार हुए हैं। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त हिदायतें दीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि अपने खिलाफ हो रहे हिंसा को खत्म करने के लिए महिलाओं को खुद भी नीति और रणनीति बनाने में दृढ़ हस्तक्षेप करना होगा। भारतीय गणतंत्र में नगर सुरक्षित होंगे तभी महिलाएं भी सुरक्षित होंगी। महिलाओं को पहले से चले आ रहे सामाजिक मानदंडों और प्रथाओं में व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामुदायिक स्तरों पर आमूलचूल परिवर्तन लाने की कोशिशें करनी होंगी और नए समाधान पेश करने होंगे।

महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा और भेदभाव की रोकथाम के लिए जरूरत इस बात की है कि महिला अपराधों के खिलाफ बने कानूनों को लेकर लोगों को संवेदनशील और जागरूक बनाया जाए। हमें संकल्प लेना होना कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले किसी भी अपराध और भेदभाव के खिलाफ हम अपनी आवाज उठाएंगे।

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