October 27, 2021

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क्या है लैटरल एंट्री, जिसके जरिए सरकार किसी को भी IAS जैसा अधिकारी बना सकती है?

देश को चलाने के लिए यहां की जनता विधायक और सांसद चुनती है. विधायक राज्यों के मुख्यमंत्री चुनते हैं और सांसद देश के प्रधानमंत्री. इन्हीं विधायकों और सांसदों में से राज्य और केंद्र में मंत्री भी बनाए जाते हैं. लेकिन देश को चलाने में सबसे बड़ी भूमिका नेताओं की नहीं, अफसरों की होती है. वो अफसर, जो कानून बनाते हैं, उन्हें लागू करवाते हैं और तमाम प्रशासनिक फैसले लेते हैं. राज्यों के अफसरों के चुनाव के लिए हर राज्य में राज्य लोक सेवा आयोग और केंद्र में संघ लोक सेवा आयोग होता है. इन्हीं आयोग के जरिए सरकारें अपने अफसरों का चुनाव करती हैं.

 

तीन परीक्षाएं पास कर आदमी बनता है बड़ा अधिकारी

राज्य और केंद्र के अधिकारियों को चुनने के लिए सरकार जो परीक्षाएं आयोजित करवाती है, उसमें तीन चरण होते हैं. संघ लोक सेवा आयोग यानी कि UPPSC के जरिए अफसर बनने के लिए प्री, मेन्स और उसके बाद इंटरव्यू देना पड़ता है. जो तीनों परीक्षाएं पास कर लेता है, वहीं अफसर बन सकता है. लेकिन मोदी सरकार ने फैसला किया है कि बड़ा अधिकारी बनने के लिए अब आपको संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. अब प्राइवेट कंपनी में काम करने वाला 40 साल का कोई भी अधिकारी केंद्र सरकार में बड़े अधिकारी के तौर पर तैनात हो सकता है. इसके लिए ज़रूरी है कि उसके पास काम करने का कम से कम 15 साल का अनुभव हो. 10 जून को जारी आदेश के मुताबिक अब वित्त, आर्थिक मामले, खेती-किसानी, सड़क, शिपिंग (पानी के जहाज), पर्यावरण, नवीकरणीय ऊर्जा, नागरिक उड्डयन औक कॉमर्स विभाग में सीधी भर्ती हो सकेगी. इसके लिए कैबिनेट सेक्रेटरी की अगुवाई वाली कमिटी के सामने इंटरव्यू देना होगा. जो इस इंटरव्यू को पास कर जाएगा, वो सीधे तौर पर जॉइंट सेक्रेटरी के पद पर तैनात कर दिया जाएगा. फिलहाल सरकार की ओर से 10 पदों पर ये सीधी भर्तियां हो रही हैं. भर्तियां तीन साल के लिए होंगी और अगर काम अच्छा रहा तो इसे बढ़ाकर पांच साल तक किया जा सकता है.

 

प्रशासनिक सुधार आयोग करता है सिफारिशें

देश में प्रशासनिक सुधारों के लिए एक प्रशासनिक सुधार आयोग है. इसकी स्थापना 5 जनवरी 1966 को की गई थी. उस वक्त मोरारजी देसाई को इसका अध्यक्ष बनाया गया था. लेकिन जब मार्च 1967 में मोरारजी देसाई देश के उपप्रधानमंत्री बन गए, तो कांग्रेस के नेता के. हनुमंथैया को इसका अध्यक्ष बना दिया गया. इस समिति का काम ये देखना था कि देश में सरकारी अफसरशाही को किस तरह से और बेहतर बनाया जा सकता है. ये वो वक्त था, जब देश अकाल से उबरने की कोशिश कर रहा था. और चीन से हुए युद्ध में मिले घाव पूरी तरह से भर नहीं पाए थे. उस वक्त इस समिति ने अलग-अलग विभागों के लिए 20 रिपोर्ट्स तैयार की थीं, जिसमें 537 बड़े सुझाव थे. इन सुझावों पर अमल करने की रिपोर्ट नवंबर 1977 में संसद के पटल पर रखी गई थी. तब से लेकर 2005 तक देश की अफसरशाही उन्हीं सिफारिशों के आधार पर चलती रही.

 

कांग्रेस ने 2005 में किया था दूसरे सुधार आयोग का गठन 

इसके बाद 5 अगस्त 2005 को यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे वीरप्पा मोइली के नेतृत्व में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया. इस आयोग में केरल के मुख्य सचिव रहे और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों में बतौर सलाहकार काम कर चुके वी. रामचंद्रन को भी सदस्य बनाया गया था. इसके अलावा भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे जय प्रकाश नारायण के साथ ही डॉक्टर एपी मुखर्जी और डॉक्टर ए.एच. कालरो को सदस्य बनाया गया था. इसके अलावा भारतीय प्रशासनिक सेवा की वरिष्ठ अधिकारी और भारत सरकार की वित्त सचिव रहीं विनीता राय को इस आयोग का सदस्य सचिव बनाया गया था.

 

 

इस आयोग को केंद्र सरकार को हर स्तर पर देश के लिए एक सक्रिय, प्रतिक्रियाशील, जवाबदेह और अच्छा प्रशासन चलाने के दौरान आ रही खूबियों और खामियों की समीक्षा करने और उसका समाधान खोजने की जिम्मेदारी दी गई थी. इसके अलावा इस आयोग के पास काम ये था कि वो भारत सरकार के केंद्रीय ढांचे, शासन में नैतिकता, अफसरों को भर्ती करने की प्रक्रिया को फिर से देखना, पैसे का प्रबंधन, राज्य के स्तर पर प्रभावी प्रशासन, लोगों को ध्यान में रखकर चलने वाला प्रशासन, ई-प्रशासन, संकट प्रबंधन और आपदा प्रबंधन के बारे में भी रिपोर्ट तैयार करे.

2005 में आई रिपोर्ट, कहा फेरबदल की है भारी गुंजाइश

इस प्रशासनिक आयोग ने 2005 में ही भारतीय अफसरशाही में भारी फेरबदल की गुंजाइश की बात कही थी. प्रशासनिक आयोग ने सुझाव दिया था कि जॉइंट सेक्रेटरी के स्तर पर होने वाली भर्तियों को विशेषज्ञों से भरा जाए. इन विशेषज्ञों को बिना परीक्षा पास किए सिर्फ इंटरव्यू के जरिए जॉइंट सेक्रेटरी बनाया जा सकता है. इसके लिए प्रशासनिक आयोग ने तय किया था कि अधिकारी की उम्र कम से कम 40 साल होनी चाहिए और उसे काम करते हुए कम से कम 15 साल का अनुभव होना चाहिए. इसके अलावा समिति ने सिफारिश की थी कि जितने भी प्रशासनिक अफसरों की नियुक्ति होती है, उन्हें कम से कम तीन साल के लिए किसी निजी कंपनी में काम करने के लिए भेजा जाना चाहिए, ताकि वो निजी कंपनी में काम करने के तौर-तरीके सीखें और फिर उसे भारतीय अफसरशाही में भी लागू करें. यूपीए की सरकार ने इस सिफारिश को सिरे से खारिज कर दिया.

इसके बाद 1 सितंबर 2007 को जयप्रकाश नारायण ने आयोग से इस्तीफा दे दिया. 1 अप्रैल 2009 को वीरप्पा मोइली ने भी आयोग के अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया. इन दोनों के इस्तीफे के बाद वी. रामचंद्रन को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. आयोग ने 2010 में एक बार फिर से प्रशासनिक सुधारों के लिए कुछ सुझाव दिए. इनमें प्रशासनिक सेवा के लिए ली जाने वाली परीक्षा की उम्र और परीक्षा के तरीकों के बारे में भी सुझाव दिए गए थे. इसके अलावा समिति ने 2005 में दिए गए अपने सुझावों को एक बार फिर से सरकार के सामने रखा. मनमोहन सरकार ने एक बार फिर से इन सिफारिशों को सिरे से खारिज कर दिया. 2014 में केंद्र की सरकार बनने के बाद इस समिति की सिफारिशों पर अमल होने शुरू हुए.

समिति कांग्रेस ने बनाई, लागू बीजेपी ने किया

सबसे पहले समिति ने कहा था कि सिविल सेवा के लिए सामान्य वर्ग के लिए उम्र 21 से 25, ओबीसी के लिए 21 से 28 और एससी-एसटी के लिए उम्र सीमा 21 से 29 साल होनी चाहिए. लेकिन सरकार ने कहा कि सामान्य के लिए उम्र 26 साल, ओबीसी के लिए 28 साल और एससी-एसटी के लिए 29 साल अधिकतम उम्र होगी. इसके साथ ही प्रशासनिक सुधार आयोग की बिना परीक्षा के भर्तियों की सिफारिश को लागू करवाने के लिए एक समिति बना दी. ये फैसला 2015 में हुआ था. इसके अलावा इस प्रशासनिक सुधार आयोग ने और भी 15 रिपोर्ट्स दी हैं, जिनमें से कुछ पर अमल हुआ है और कुछ को सरकार ने सिरे से खारिज़ कर दिया है. ये समिति दो साल तक इस बात की तलाश करती रही कि क्या निजी क्षेत्र के लोगों को जॉइंट सेक्रेटरी जैसे पद पर नियुक्त किया जा सकता है. इसको लेकर सबसे ज्यादा खींचतान आईएएस अधिकारियों के बीच में ही थी. लेकिन आखिरकार 10 जून को केंद्र सरकार की ओर से इस सिफारिश को मंजूर कर लिया गया और भर्ती के लिए विज्ञापन जारी कर दिया गया.

 

 

देश में जॉइंट सेक्रेटरी के कुल 341 पद होते हैं, जिनमें से 249 पदों पर आईएएस अधिकारी ही होते हैं. ये सभी अधिकारी विभागों और मंत्रालयों में विभागीय इकाई के मुखिया होते हैं. इसके अलावा मुख्य सतर्कता अधिकारी, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, रजिस्ट्रार जनरल, भारतीय जनगणना आयुक्त, नागरिक उड्डयन के डायरेक्टर जनरल, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के डायरेक्टर जनरल, आर्थिक सलाहकार, ट्राई के सलाहकार, सीबीआई के संयुक्त निदेशक, दूरदर्शन और आकाशवाणी के अतिरिक्त निदेशक, कर्मचारी चयन आयोग के बोर्ड मेंबर, कर और पुलिस के आयुक्त, केंद्रीय सरकार के विभागों में चीफ इंजीनियर, भारतीय राष्ट्रपति के सोशल सेक्रेटरी या प्रेस सेक्रेटरी जैसे पदों पर होते हैं. ये लोग अपने विभाग के अतिरिक्त सचिव, विभागीय सचिव और मंत्रालय के जिम्मेदार मंत्री को रिपोर्ट करते हैं.

 

 

पहले भी बिना परीक्षा के बन चुके हैं बड़े अधिकारी

लेकिन 92 बचे हुए पदों पर विशेषज्ञों की ही नियुक्ति की जाती है. हालांकि इसके लिए अब तक किसी तरह का विज्ञापन नहीं निकाला जाता था. सरकार खुद से इनकी नियुक्ति कर देती थी. उदाहरण के लिए भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक अर्थशास्त्री ही थे. वो दिल्ली स्कूल ऑफ इकनामिक्स में अर्थशास्त्र पढ़ाते थे. लेकिन 1971 में उन्हें भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया गया. मनमोहन सिंह ने सिविल सेवा की परीक्षा नहीं दी थी, फिर भी वो इस पद पर पहुंच गए थे. 1972 में मनमोहन सिंह को वित्त मंत्रालय का मुख्य आर्थिक सलाहकार भी बनाया गया था और ये पद भी ज़ॉइंट सेक्रेटरी स्तर का ही होता है. इसी तरह से मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री रघुराम राजन को अपना मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया था. रघुराम राजन भी संघ लोक सेवा से चुनकर नहीं आए थे, लेकिन वो जॉइंट सेक्रेटरी के स्तर तक पहुंच गए थे. नंदन नीलेकणी के साथ भी यही हुआ था. उन्हें भी यूआईडीएआई का चेयरमैन बनाया गया था. लेकिन अब पहली बार केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर विज्ञापन निकालकर 10 मंत्रालयों के लिए आवेदन मंगवाए हैं. सत्ता पर इस पर अपनी दलीलें दे रहा है और विपक्ष इसपर हंगामा मचा रहा है. वहीं कुछ लोग इसे आरक्षण खत्म करने की दिशा में उठाया गया कदम भी मान रहे हैं. लेकिन आखिरी बात ये है कि बीजेपी की सरकार ने फैसला उस समिति की सिफारिश पर लिया है, जिसे कांग्रेस की सरकार ने गठित किया था.

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