June 24, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

गण पर हावी तंत्र

कवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है कि, ‘जो भरा नहीं भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं…।’ प्रणाम है उन महान शहीद देशभक्तों को जिनकी बदौलत आज हम सभी एक गणतंत्र देश में आजादी से रह रहे हैं। अपनी जान की परवाह किए बगैर इन सभी ने देश पर अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था। महात्मा गांधी ने गणतंत्र के लिए जो यह विचार रखा था कि ‘मैं ऐसे संविधान के लिए प्रयत्न करूंगा जिसमें छोटे से छोटे व्यक्ति को भी यह अहसास हो यह देश उसका है, इसके निर्माण में उनका योगदान है, उसकी आवाज का यहां महत्त्व है…।’ इसका अनुसरण करना आजाद देश के सत्ताधारी, स्वार्थी राजनेता और नौकरशाही के लालची लोग भूल गए हैं, तभी तो आज गण और तंत्र के बीच फासला बढ़ता जा रहा है या फिर महात्मा गांधी के सपनों के संविधान को आज कोई पूरा करने वाला नही हैं? आज सबको कुर्सी और धन-दौलत की भूख है। आज गण के भ्रष्टतंत्र में आमजन को जरा भी अहसास नहीं होता है कि यह उनका तंत्र है या उनकी सेवा के लिए संविधान में गण के लिए तंत्र का प्रावधान किया गया था।

गण पर तंत्र का हावी होना यह भी दर्शाता है कि देश की राजनीति और नौकरशाही में स्वार्थी-लालची लोगों की बढ़ोतरी हो रही है और देशभक्तों की कमी। भारत के गण के तंत्र में आए खोट का आधार है राजनीति की खोट। सरकारें और नौकरशाही मिलकर तंत्र को खोटमय बनाने का काम करते हैं। गण के तंत्र में आए खोट को दूर करने के लिए गण भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। तंत्र के आधार के खोट को चुनाव में अपने वोट का प्रयोग राजनीतिक तौर पर जागरूक होकर करके दूर करने का प्रयत्न करके भी किया जा सकता है।

लेकिन यहां यह कहना भी उचित होगा कि जब तक राजनेता और नौकरशाही अपने अंदर देशसेवा और लोकसेवा नहीं लाएंगे और देश को आजाद करवाने वाले महान देशभक्तों की कुर्बानियों के इतिहास को नहीं समझेंगे, शायद तब तक गण पर तंत्र हावी ही होता जाएगा। गणतंत्र की आन-बान और शान के लिए देश के हरेक नागरिक, चाहे वो किसी भी धर्म, संप्रदाय का क्यों न हो अपने अंदर देशभक्ति की भावना भरनी चाहिए। संविधान में मिले अधिकारों के प्रति ही नहीं, बल्कि कर्तव्यों के प्रति भी गंभीरता दिखानी चाहिए। और कोई भी ऐसा काम नहीं करना जो देशहित में न हो।

यू तो इन्सान को जीने के लिये दो रोटी और तन पर एक कपडा बहुत है मगर जिस रफ्तार से विदेशो में देश के कुछ बडे नेताओ के काले धन के मामले सामने आ रहे है और देश में एक घोर भ्रष्ट संस्कृति पनप रही है वो राजतंत्र, पुलिसतंत्र और न्यायतंत्र का निकम्मापन है। हम लोग तीस सालो से गंगा में प्रदूषण की चर्चा कर रहे है। लेकिन देश में भ्रष्टाचार का प्रदूषण तो आज दिमाग को चकराने वाला है। दो दशर्क पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गॉधी जी ने खुद स्वीकार किया था कि “सरकार द्वारा चलाई गई तमाम विकास योजनाओ के प्रत्येक एक रूपये में से केवल 15 पैसे जरूरतमंदो तक पहॅुचते है’’। आज मनरेगा, गरीबो को सस्ता आनाज, वृद्वा व विधवा पैंशन आादि तमाम सरकारी योजनाओ में हमारे राजनेता और नौकरशाहो की पोल खुलने के बाद हमे इस बात का अहसास हो रहा है। वास्तव में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गॉधी जी ने उस वक्त कितनी साफ सुथरी बात कही थी। आज देश में हुए तमाम घोटालो में प्रधानमंत्री मनमोहन सिॅह द्वारा खुद को ईमानदार साबित कर के सिर्फ पट्टी धोने की कोशिश की जा रही है जख्म पर मरहम या चीरा नही लगाया जा रहा है। कुछ मंत्रियो द्वारा सरकार में फैले भ्रष्टाचार के कारण सरकार को विकास के साथ साथ आम आदमी और कमर तोड मंहगाई पर नियंत्रण का भी ख्याल नही रहा। सरकार कार्यवाही के नाम पर सिर्फ लीपापोती करने में लगी है।

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