July 7, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

गणतंत्र या भ्रष्टतंत्र पर एक कविता

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कपूतो कि करतूतो से भारत माँ के घाव और गहरे हो गए
शायद आजादी के मद मे लोग गूँगे-बहरे हो गए ।
राष्ट्र भ्रष्टाचार कि आगोश मे आकंठ डूबा हुआ है,
विधी-निर्माताओं से जनमानस ऊबा हुआ है,
ईमान कि कमाई पर लुटेरो के पहरे हो गए,
शायद आजादी के मद मे लोग गूँगे-बहरे हो गए ।
आतंकवाद, नक्सलवाद, हिंसा के बहाने बहुत हैं ,
धर्म, मजहब, जातपात के फसाने बहुत हैं ,
मारो, काटो, लूटो, नोचों मासूमों के ककहरे हो गए
शायद आजादी के मद मे लोग गूँगे-बहरे हो गए ।
बेटी-बहुओं कि आबरू कि रक्षा कौन करेगा ?
पहरेदार ही जब देखकर खुद मौन रहेगा ,
भय और व्याकुलता से स्याह चेहरे हो गए ,
शायद आजादी के मद मे लोग गूँगे-बहरे हो गए ।
क्यूँ आज पैदा कोई ‘भगत’ ‘आजाद’ नहीं होता ,
यूँ देश कि संपती खुलेआम बर्बाद नहीं होता ,
भ्रष्ट, घोटालेबाजो के दिवाली-दशहरे हो गए
शायद आजादी के मद मे लोग गूँगे-बहरे हो गए ।
स्वतंत्र भारत के परतंत्र नागरिको को गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई ।।

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