June 27, 2022

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गन्ना किसानों को बकाए की मार…

न्यूज डेस्क 27 मार्च |गन्ना किसान अपनी समस्याओं को लेकर लंबे समय से सरकार के रवैए पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने कई बार इसके लिए आंदोलन का रास्ता भी अख्तियार किया, लेकिन इसके हल की दिशा में अब तक कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है। बल्कि हालत यह है कि आज भी गन्ना किसानों को अपने वाजिब हक के लिए इंतजार और संघर्ष करना पड़ रहा है। जब गन्ना किसान अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहे होते हैं तब उस पर गौर करना सरकार के संबंधित महकमों को जरूरी नहीं लगता और वे इस मसले पर विचित्र तर्क देते हुए सफाई पेश करने लगते हैं।

मगर खुद सरकार या संसद की ही कोई समिति जब आधिकारिक रूप से किसानों की शिकायत और पीड़ा को सही ठहराती है, उसके बाद भी सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए कोई पहल करना जरूरी नहीं लगता। संसद में मंगलवार को पेश खाद्य, उपभोक्ता मामले एवं सार्वजनिक वितरण संबंधी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में किसानों की गन्ना आपूर्ति का बकाया अब भी 16,612 करोड़ रुपए होने पर हैरानी जताई है। समिति ने कहा है कि सरकार बकाया राशि का तत्काल भुगतान सुनिश्चित करने के लिए चीनी मिलों पर दबाव डाल कर उचित उपाय करे और साथ ही बंद और रुग्ण चीनी मिलों के पुनरुद्धार के लिए नीति बनाए।

 

 

यों गन्ना किसानों की समस्याएं जगजाहिर रही हैं और सरकारों को भली-भांति पता है कि इसका समाधान क्या है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि सरकार को शायद ही कभी यह जरूरी लगा कि इसके हल के लिए एक नियमित व्यवस्था कायम की जाए। जब भी किसानों की ओर से अपनी मांगों को लेकर आंदोलन या विरोध प्रदर्शन जैसी स्थिति सामने आती है, तब सरकार तात्कालिक तौर पर राहत की घोषणा करती है, मगर उसे पूरा करने को लेकर निरंतरता और इच्छाशक्ति कभी नहीं दिखती।

 

 

यह बेवजह नहीं है कि गन्ना के बकाए का भुगतान करने के सरकार के दावे के बावजूद बकाए की राशि हजारों करोड़ में दर्ज पाई जाती है। संसदीय समिति ने इस संबंध में भी टिप्पणी की है कि हालांकि गन्ना मूल्य बकाया पहले की तुलना कम हो गया है, मगर 16,612 करोड़ रुपए की राशि अब भी बहुत ज्यादा है। जाहिर है, इस बकाए की मार आखिरी तौर पर गन्ना किसानों को ही झेलनी पड़ रही है।

गौरतलब है कि केवल उत्तर प्रदेश में करीब चार करोड़ लोगों की रोजी गन्ने की खेती और उससे होने वाली आय से जुड़ी हुई है। चीनी मिलों का रवैया यह है कि वे किसानों को पहले गन्ना पहुंचाने, फिर दाम देने की बात कहते हैं। लेकिन गन्ना किसानों की सबसे बड़ी समस्या बकाए का समय से भुगतान नहीं होना ही है। निजी मिलों की समस्या अलग स्तर पर जटिल है। जबकि प्रावधान यह है कि गन्ने की आपूर्ति के चौदह दिनों के भीतर किसानों के पैसे का भुगतान कर दिया जाना चाहिए।

 

 

हकीकत यह है कि 2016-17 और उससे पहले के गन्ना मूल्य का भुगतान अब भी बाकी है। अगर इससे परेशान और निराश किसानों ने खेती के अन्य विकल्प अपनाने शुरू कर दिए तब कैसे हालात पैदा होंगे। संसदीय समिति ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है कि समय पर गन्ना मूल्य के बकाए का भुगतान न करना हतोत्साहित करने वाला हो सकता है जो किसानों को अन्य फसलें उगाने पर मजबूर कर सकता है। सवाल है कि यह स्थिति अगर लंबे समय से बनी हुई है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है और इसके हल को लेकर सरकार क्या सोचती है!

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