December 2, 2020

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जहां दया तहां धर्म हैं;

‘जहां दया तहां धर्म है,

करुणा’ शब्द का वास्तविक अर्थ सैकड़ो साल पुरानी उस घटना से लगाया जा सकता है जब संजय ने महाभारत की लड़ाई से पहले कौरवों के राजा धृतराष्ट्र को अर्जुन के मन की अवस्था का बखान किया था। अर्जुन व्यथित था और करुणा की तलाश में उसने खुद को कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया था। करुणा शब्द का शाब्दिक अर्थ है दया, दूसरों की देखभाल करना और दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहना। कृष्ण ने अर्जुन के दर्द को समझा और उसके बाद अर्जुन को दी हुई उनकी शिक्षा एक करुणापूर्ण कार्य ही था जिसने अर्जुन को दुख की अवस्था से बाहर आने में मदद की। इस प्रकार करुणा शब्द की व्याख्या एक ऐसे दुर्लभ उपहार के रूप में की जा सकती है जब आत्मा न केवल दूसरों के दुख और दर्द को महसूस करता है बल्कि अपने कर्मों से उसके दुख को कम करने की भी कोशिश करता है। ऐसे व्यक्ति को दूसरों के दर्द को समझने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती है। एक करुणामयी व्यक्ति इसे चुपचाप महसूस कर सकता है, भले ही अपने दर्द को जताने के लिए कोई जोर-जोर से ना रो रहा हो। वह दर्द और पीड़ा के मूक रुदन को सुन सकता है।

कबीर कहते हैं, ‘जहां दया तहां धर्म है, जहां लोभ तहां पाप, जहां क्रोध तहां काल है, जहां क्षमा वहां आप।’ इसका अर्थ है, ‘जहां करुणा है वहां आध्यात्मिकता है, जहां लालच है वहां पाप है, जहां क्रोध है वहां मृत्यु है, और जहां क्षमा है वहां भगवान हैं।’ करुणा हृदय को दूसरों के दर्द से भर देती है और यह अवस्था किसी को भी निडर और ऊर्जावान बना देती है। प्राचीन शास्त्रों ने करुणा की व्याख्या प्रार्थना और ध्यान के रूप में की है। बौद्ध धर्म में करुणा और सहानुभूति का वर्णन एक बीज के रूप में हुआ है, जिसका जन्म गहरे ध्यान से होता है और इसके उत्कर्ष को प्राप्त करने के लिए बोधिसत्व महत्वपूर्ण होता है। बौद्ध धर्म का महायान संप्रदाय भावना और दया पर केंद्रित है। मैंने बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की पेंटिग के माध्यम से करुणा शब्द को चित्रित करने की कोशिश की है, जिसमें कई सिर और आंखों को दर्शाया गया है जो उन लोगों के प्रति सतर्क रहता है जो पीड़ा से ग्रसित हैं या जिनपर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। महायान सूत्र कहता है कि एक साधक को मंत्र अवश्य सुनना चाहिए ताकि उसका हृदय हर जीवित चीज के प्रति दया और करुणा से सराबोर रहे। उसे वचन लेना चाहिए कि वो बिना किसी उम्मीद के उनलोगों की देखभाल जरूर करेगा जो पीड़ा में है या जिन्हें उसकी आवश्यकता है।

बुद्ध के महान करुणा की व्याख्या हजारों हाथ और हजारों आंखों के साथ की जाती है। सूत्र कहता है कि इस करुणा का वास बुद्ध के जड़ और उनकी तीन खजानें यानि बुद्ध, धर्म और संघ में है। शास्त्रों का कहना है कि करुणा का शुद्ध रूप हमेशा शर्तरहित रहता है और किसी की सहानुभूति केवल उसके दोस्तों या रिश्तेदारों के लिए नहीं होती है। इसे जानवरों और इंसानों के बीच भी फर्क नहीं करना चाहिए। करुणा का शुद्ध रूप तभी सामने आता है जब किसी को खुद के प्रति भी वही करुणा हो। वज्र प्रज्ञा परिमिता सूत्र में शाक्यमुनि बुद्ध के बारे में एक कथा वर्णित है। कथा के अनुसार एक बार शाक्यमुनि जैसे ही बाहर निकले, एक छोटी सी चिड़ियां ने उनके झोपड़ी की तरफ उड़ान भरी जिसका पीछा एक खुंखार बाज कर रहा था। चिड़ियां रोने लगी और उसने उन्हें बाज से खुद को बचाने के लिए कहा जो उसे खाना चाहता था। “लेकिन कैसे”, बुद्ध ने पूछा। इससे पहले कि चिड़ियां बता पाती, बाज ने बुद्ध से कहा कि अगर उन्होंने इस पंक्षी की रक्षा की तो वह भूख से मर जायेगा।

“किसी एक का जीवन बचाना और दूसरे को मार डालना करुणा नहीं है।” पंक्षी की याचना और बाज के तर्क दोनों पर बुद्ध विचार करने लगे। उन्होंने एक चाकू निकाला और अपने शरीर का मांस काटकर बाज को खाने दे दिया। बाज लालची था। इसलिये उसने और मांस मांगा। बुद्ध ने अपने शरीर के दूसरे हिस्से का मांस काटकर उसे खाने दे दिया। लेकिन बाज ने फिर से मांस मांगा। इस बार बुद्ध ने बाज को अपना पूरा शरीर खाने के लिए दे दिया और कहा, “तुम जितना खाना चाहो खा लो।” करुणा ऊर्जा के समान कार्य करता है और आपको निडर बना देता है। लोटस सूत्र का अध्याय 15 व्याख्या करता है कि करुणा का अर्थ है कि कभी किसी पर क्रोधित मत हो और सभी जीवित प्राणियों को अपने पुत्र और पुत्री समान देखो। इसलिये कहा गया है कि बोधिसत्व अवस्था की यात्रा में करुणा के नाव की आवश्यकता होती है।

ओशो कहते हैं कि करुणा प्यार का शुद्धतम रूप है। यह सबसे बड़ा चमत्कार है जिसका इंतजार हर प्राणि को अपने जीवन में दर्द और पीड़ा के समय रहता है। वह बताते हैं कि एक का दूसरे के प्रति प्यार की कमी ही है जो मानवता के लिए दुख और पीड़ा का सबब बन गई है। इस कारण अब लोगों के जख्म भरने और उनके आंसू पोंछने के लिए काफी अधिक मात्रा में करुणा और सहानुभूति की आवश्यकता है। यही कारण है कि कृष्ण, जीसस, बुद्ध, महावीर, नानक और लाओत्से जैसे महान और चमत्कारी गुरुओं ने मानवता के पोषण और उनके जख्म भरने के लिए समय-समय पर इस धरती पर जन्म लिया। ओशो का यह भी कहना है कि करुणा चिकित्सीय है क्योंकि कोई भी व्यक्ति प्यार की कमी के कारण ही बीमार पड़ता है। उसने ना तो कभी किसी से प्यार किया होगा और ना ही उसे कभी किसी से प्यार मिला होगा। करुणा वह अवस्था है जहां कोई व्यक्ति मदद बिना किसी उम्मीद के करता है। प्यार में हम शुक्रगुजार होते हैं क्योंकि हमें किसी से कुछ मिला है। लेकिन करुणा में हम शुक्रगुजार होते हैं क्योंकि वहां हम किसी को कुछ देते हैं। यह जीवन का एक महान खेल है जहां एक देता है और दूसरा लेता है और एक शुक्रगुजार होता है और दूसरा दयावान। करुणा प्रार्थनाओं का एक रूप है। यह खुद को ध्यान के रूप में भी व्यक्त करता है। यह खुद को ऊर्जा के उच्चतम रूप में भी अभिव्यक्त करता है।

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