October 27, 2021

Such Ke Sath

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जातीय जनगणना की डिमांड में नीतीश कुमार को हो रहे ये 5 फायदे

जातीय जनगणना होने पर नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को बहुत फायदा हो न हो, जब तक डिमांड बनी हुई है फायदा ही फायदा है – और तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) को चुप करा कर नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) से दो-दो बात करने का मौका तो मिल ही रहा है.

 

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) धीरे धीरे पुराने रंग में आने लगे हैं. बिहार चुनाव में नीतीश कुमार ने लालू यादव के जेल में रहने का पूरा फायदा तो उठाया ही, अब जबकि आरजेडी नेता जमानत पर छूट कर राजनीति में सक्रिय हो गये हैं, नीतीश कुमार नये सिरे से फायदा देख रहे हैं.

बिहार में जातीय जनगणना की मांग काफी पुरानी है, लेकिन ताजा तेजी नीतीश कुमार के साथ साथ लालू यादव के भी एक्टिव हो जाने से आयी है. 18 फरवरी, 2019 में विधानमंडल और 27 फरवरी 2020 को बिहार विधानसभा में जातीय जनगणना का प्रस्ताव पास हुआ – और दो बार ये प्रस्ताव केंद्र को भेजा जा चुका है.

अब नीतीश कुमार खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) से इस सिलसिले में मुलाकात कर ज्ञापन सौंपने जा रहे हैं. हाल ही में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर बिहार के प्रतिनिधिमंडल के नेतृत्व का आग्रह किया था जिसे नीतीश कुमार ने तत्काल मान लिया. फिर नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखा और मुलाकात के लिए समय मांगा था – जिसके बाद 23 अगस्त को मीटिंग का समय तय हुआ.

2011 में जातीय जनगणना करायी गयी थी, लेकिन कुछ खामियों का हवाला देकर उसे प्रकाशित नहीं किया गया. हालांकि, पहली बार जातीय जनगणना आजादी से पहले 1931 में हुई थी. काफी दिनों से आरजेडी नेता लालू यादव जातिगत आधार पर हुई जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग करते रहे हैं.

हाल ही में एक ट्वीट में लालू यादव ने कहा था कि जानवरों की जो जनगणना होती है उसका क्या अचार डालेंगे – और फिर जातीय जनगणना को लेकर जनांदोलन शुरू करने जैसे भी संकेत दिये. लालू यादव ने कहा है कि अगर केंद्र सरकार ने अगले सेनसस में जातीय जनगणना नहीं करायी तो पिछड़े वर्ग के लोग उसका बहिष्कार करेंगे.

प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखने के बाद से एक चीज देखने को मिली कि नीतीश कुमार लगातार अपडेट देते रहे हैं. जब भी मीडिया के सामने आते बाकी मुद्दे भले ही टाल जाते लेकिन जातीय जनगणना का जिक्र जरूर करते रहे हैं. प्रधानमंत्री से मुलाकात से पहले भी नीतीश कुमार का कहना रहा, हमें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री इस पर सकारात्मक रुख अपनाएंगे… पहले से हम लोग इसकी चर्चा करते रहे हैं.

सवाल ये है कि नीतीश कुमार आखिर जातीय जनगणना में क्यों दिलचस्पी ले रहे हैं? देखा जाये तो एक तरीके से नीतीश कुमार का ये स्टैंड बीजेपी के खिलाफ ही है, फिर क्यों वो मोदी-शाह की नाराजगी मोल लेने का जोखिम उठाने को तैयार हो गये हैं?

ऐसा क्यों लगता है जैसे नीतीश कुमार को जातीय जनगणनवा वाकई हो ही, इससे ज्यादा दिलचस्पी इसकी चर्चा में है – ऐसा इसलिए कि नीतीश कुमार को खुद को प्रासंगिक और ताकतवर बनाये रखने के लिए ऐसे ही किसी हथियार की जरूरत रही – और वो मिल गया है.

1. मोदी से आमने सामने बैठकर बात करने का मौका है

2017 में महागठबंधन छोड़ने के बाद नीतीश कुमार जब से एनडीए में लौटे हैं कदम कदम पर झुक कर ही रहना पड़ा है – ये ठीक है कि राजनीति के शह-मात के खेल में माहिर नीतीश कुमार कोई न कोई उपाय ढूंढ ही लेते हैं.

तभी का एक वाकया है. तब ज्यादा दिन नहीं हुए थे नीतीश कुमार को एनडीए में लौटे हुए. पटना यूनिवर्सिटी में शताब्दी वर्ष समारोह चल रहा था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कार्यक्रम में पहुंचे हुए थे.

 

 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी से हाथ जोड़कर अनुरोध किया कि वो गौरवशाली अतीत वाले पटना विश्वविद्यालय को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा दे दें, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी सीधे सीधे टाल गये. मोदी ने कहा कि केंद्र सरकार सेंट्रल यूनिवर्सिटी से भी बड़ी चीज देने जा रही है. मोदी ने घोषणा की कि सरकार देश के 10 सरकारी और 10 निजी विश्वविद्यालयों को पांच साल के लिए 10 हजार करोड़ रुपये दे रही है जिससे विश्वविद्यालयों का सर्वांगीण विकास हो सकेगा. नीतीश कुमार क्या करते, चुप हो गये. बल्कि कहें कि आगे से भी ऐसी बातें सार्वजनिक तौर पर न करने का फैसला कर लिया.

बाद में नीतीश कुमार ने कभी कभार थोड़ा तेवर जरूर दिखाया था – जैसे मोदी मंत्रिमंडल 2.0 विस्तार के वक्त. जब पहली बार एक मंत्री से ज्यादा के लिए बीजेपी तैयार नहीं हुई तो एक तरह से बहिष्कार ही कर दिया था. उसके तत्काल बाद बिहार कैबिनेट का विस्तार किया तो बीजेपी का कोई मंत्री नहीं बना था – और अभी अभी तो जिस तरह से आरसीपी सिंह मोदी कैबिनेट में शामिल हुए हैं, उसकी तो अलग ही कहानी है.

ये पहला मौका होगा जो प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आमने सामने बैठे होंगे और सिर्फ जातीय जनगणना के ही मुद्दे पर बात हो रही होगी. नीतीश के साथ बिहार के सभी दलों के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल भी होगा – साथ में, तेजस्वी यादव भी होंगे ही.

ये मौका तो नीतीश कुमार के लिए कुछ कुछ ‘आरंभ है प्रचंड’ जैसा ही फील देने वाला होगा – देखते हैं आगे आगे क्या होता है?

2. बिहार में बीजेपी को हद में रहने का संदेश भी है

खास बात ये है कि नीतीश कुमार जिस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं, उसमें बीजेपी को भी शामिल होना पड़ा है. अब अगर नीतीश कुमार को लगता है कि बीजेपी को इसके लिए मजबूर कर दिया है, तो खुश होने का ख्याल अच्छा हो सकता है, लेकिन बीजेपी ने इसका डबल फायदा उठाने का उपाय कर लिया है.

बीजेपी को पहला फायदा तो ये होगा कि बिहार के मुद्दे पर वहां के लोगों को संदेश दे देगी कि वो उनके साथ है – साथ भी ऐसे कि अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़ी हो रही है. शामिल न होने पर सबको बोलने का मौका मिल जाता. अव्वल तो नीतीश कुमार ने दबाव बनाया था कि दोनों डिप्टी सीएम में से किसी एक को बीजेपी भेजे, लेकिन पार्टी ने सोच समझ कर एक नेता को चुना – जनक राम को.

बीजेपी का दूसरा फायदा ये है कि हर हरकत पर उसकी नजर रहेगी. नीतीश कुमार कहीं तेजस्वी यादव और लालू यादव के साथ कोई नयी खिचड़ी तो नहीं पका रहे हैं – बीजेपी को पल पल की जानकारी मिलती रहेगी.

हालांकि, नीतीश कुमार की ये संदेश देने की कोशिश होगी कि बिहार के लिए वो पूरे साल दुश्मन जैसे व्यवहार करने वाले तेजस्वी यादव के साथ खड़े हो रहे हैं – और वो भी उसी बीजेपी के खिलाफ जो सरकार चलाने में उनकी बैसाखी बनी हुई है.

ये पूछे जाने पर – अगर केन्द्र सरकार जातीय जनगणना के लिये तैयार नहीं हुई तो क्या बिहार सरकार जातीय जनगणना खुद से करायेगी?

नीतीश कुमार कहते हैं, वो तो हम लोगों ने पहले भी कहा है कि अगर पूरे देश के लिये जातीय जनगणना का निर्णय नहीं होता है, तो इस पर विचार किया जाएगा.

लोगो में ये संदेश चले जाना ही नीतीश कुमार के लिए बीजेपी पर दबाव बनाने के लिए काफी होगा – जो हुआ वो हुआ, हमेशा एकतरफा मनमानी नहीं चलेगी.

3. लालू के साथ संवाद और रिश्ते सुधारने का बहाना

जमानत पर जेल से छूटे लालू यादव हद से ज्यादा एक्टिव नजर आ रहे हैं. राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष को एकजुट करने की गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं और पहले की ही तरह ही शरद पवार जैसे नेता भी पूरी तवज्जो दे रहे हैं.

नीतीश कुमार ऐसी सारी गतिविधियों पर नजर टिकाये हुए हैं, लेकिन ऐसे खेमे में हैं कि बाहर निकल कर ताक झांक भी खतरे से खाली नहीं है. चुनावों में नीतीश कुमार ने लालू यादव के परिवार के खिलाफ लाख निजी हमले तक किये, लेकिन बीजेपी को दिखाने के लिए – दुश्मनी इतनी ही निभायी कि आगे भी दोस्ती की गुंजाइश बनी रहे. तब बीजेपी में ये माना जा रहा था कि नीतीश लालू परिवार के प्रति सॉफ्ट बने रहते हैं.

रैलियों में तो लालू-राबड़ी के जंगलराज की याद दिलाने से लेकर बिहार के विकास के नाम पर बच्चे पैदा करने तक की बात करते रहे, लेकिन लालू यादव की बहू ऐश्वर्या को टिकट नहीं दिया. हां, लालू यादव के समधी को टिकट जरूर दिया था. तब तो चर्चाएं रही कि जेडीयू लालू यादव के बेटों को घेरने के लिए उनकी बहू को भी मैदान में उतार सकती है.

जब तेजस्वी यादव ने बच्चे पैदा करने वाली बातों को लेकर बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार के खिलाफ बोलना शुरू किया तो आपे से बाहर हो गये, लेकिन लालू यादव के प्रति जो संबोधन रहा, वो ध्यान देने वाला रहा – ‘भाई जैसे दोस्त का बेटा…’ राजनीति में रिश्ते निभाये जाने की ये मिसाल नहीं तो और क्या है?

 

कहने को तो नीतीश कुमार को लेकर पूछे जाने पर लालू यादव ने बोल दिया था, ‘हरवा दिया…’ – लेकिन अभी जो कुछ भी हो रहा है उसमें संवाद की गुंजाइश तो बन ही जाती है.

4. एनडीए से इतर वैकल्पिक इंतजाम भी जरूरी है

नीतीश कुमार को भले ही बिहार की राजनीति में चाणक्य माना जाता हो, लेकिन छवि तो ऐसी बना ही ली हो कि पलटी मार लेने के मामले में हमेशा ही शक की निगाह से देखा जाता है.

महागठबंधन की तरफ से अक्सर ही नीतीश कुमार को एनडीए छोड़ कर लौट आने की सलाह दी जाती रही हो, लेकिन लालू परिवार की तरफ से ऐसा कभी नहीं बोला गया है. खबरें तो ऐसी भी आयी थीं कि एनडीए में शामिल होने के बाद भी प्रशांत किशोर के जरिये लालू परिवार से बातचीत चलती रही. हालांकि, ये उस जमाने की बातें हैं जब प्रशांत किशोर जेडीयू के उपाध्यक्ष हुआ करते थे.

एनडीए में चले जाने के बाद नीतीश कुमार के लिए विपक्षी खेमे के नेताओं के साथ बातचीत का दायरा भी कम हो गया है, लेकिन अगर लालू मान जाते हैं तो बात बन भी सकती है – वैसे भी गाढ़ें दिनों के लिए एक वैकल्पिक इंतजाम रखना चाहिये कि नहीं?

5. CM बने रहने का जुगाड़, PM के लिए खुला ऑप्शन

जब सब लोग जातीय जनगणना की डिमांड में उलझे रहेंगे तो नीतीश कुमार के खिलाफ साजिशों के भी मौके कम मिलेंगे – मुख्यधारा की राजनीति के रेस में बने रहने के लिए ये भी तो एक कारगर पैंतरा ही होता है और नीतीश कुमार के लिए तो ये बायें हाथ का खेल ही समझा जाना चाहिये.

चुनावों में चिराग पासवान की मदद और बाकी तिकड़मों की बदौलत बीजेपी ने नीतीश कुमार को काफी कमजोर कर दिया है. मुख्यमंत्री जरूर बनाया है, लेकिन कोई भी फैसला अपने दम पर लेने का विकल्प ही नहीं छोड़ा है. एक मजबूत साथी रहे सुशील मोदी को भी हटा दिया है. सुशील मोदी का रिप्लेसमेंट दिया है शाहनवाज हुसैन के रूप में जिसका भला बीजेपी नेतृत्व के साथ ही बने रहने में है.

ऐसे उपायों से मुख्यमंत्री की कुर्सी की उम्र लंबी खिंच जाये, तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है – और क्या पता अगर कभी विपक्षी गठबंधन को सरकार बनाने का मौका मिला और राहुल गांधी या ममता बनर्जी के नाम पर बात नहीं बनी तो एक मौका तो हाथ में रहेगा ही!

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