June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

जानिए क्यूं सोने की ईंटें, अर्थव्यवस्था की नींव की ईंटें हैं.

गोल्ड रिजर्व के मामले में भारत दुनिया के टॉप टेन देशों में आता है. इन-फैक्ट वो सबसे अंतिम यानी दसवें पायदान पर है. सबसे टॉप में अमेरिका और दूसरे नंबर में जर्मनी है. रूस, जापान, स्विट्ज़रलैंड, चाइना, फ्रांस जैसे देश भी इस लिस्ट में आते हैं और भारत से ऊपर हैं.

 

इस लिस्ट से साफ़ पता लगता है कि गोल्ड रिजर्व का किसी देश की अर्थव्यवस्था से सीधा संबंध है. जो देश गोल्ड रिजर्व के मामले में सबसे ऊपर है कमोबेश वही देश उसी क्रम में विकास के पैमाने पर भी ऊंचे, और ऊंचे पायदानों पर है. होने को इसका उल्टा भी संभव है कि जो देश जितना विकसित है उसने उतना सोना इकट्ठा कर लिया है.
लेकिन दोनों ही स्थितियों में सवाल ये पैदा होता है कि गोल्ड यानी सोना, न तेल की तरह इंडस्ट्री में यूज़ होता है, न गाय की तरह दूध, न पेड़ की तरह फल देता है और न ही इसका कोई अन्य भौतिक उपयोग है फिर भी ये पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था में बादशाह की कुर्सी पर कैसे बैठा है, और इसके सर पर ‘सोने’ का ताज़ कैसे है? सदियों से!

 

क्यूं हर कोई इंडीविज़ुअल और हर कोई समाज और हर कोई देश सोने के पीछे भाग रहा है? सोने की यह बादशाहत मुझे शतरंज के खेल सरीखी लगती है, जिसमें बादशाह के पास करने के लिए कुछ नहीं होता, वो केवल एक घर दाएं-बाएं चल सकता है, वो भी अपने को बचाने के लिए. अटैक नहीं डिफेंस के लिए. लेकिन उसको बचाने के लिए सारी फौज़ लगी रहती है. वो ख़त्म तो खेल खत्म.

 

यकीन कीजिए सोने की भी ‘विश्व की अर्थव्यवस्था’ में यही स्थिति है. वो न तेल है, न जल है, न मुद्रा है, वो ज्यादा से ज्यादा आभूषणों जैसी गैर ज़रुरी ‘लग्ज़री’ चीज़ों के लिए उपयोग में आता है, लेकिन फिर भी हर किसी को चाहिए.

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सोने की अर्थव्यवस्था समझने के लिए आइए थोड़ी विषय से भटकते हैं और विज्ञान समझते हैं. विज्ञान में एक चीज़ होती है – फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस. अब ये फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस क्या है?

 

देखिए, दुनिया में कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है जो स्थिर है. दुनिया क्या पूरी आकाशगंगा, पूरे ज्ञात यूनिवर्स में कोई चीज़ ऐसी नहीं है जो स्थिर है. तो इस स्थिति में ये कहना अनुचित होगा कि किसी गाड़ी की स्पीड अस्सी किलोमीटर प्रति घंटा है, क्यूंकि जिस गाड़ी की स्पीड अस्सी किलोमीटर प्रति घंटा है वो धरती में चल रही है, जो धरती खुद अपनी धुरी में घूम रही है और साथ ही साथ सूरज के चारों ओर भी चक्कर लगा रही है. उधर सूरज भी स्थिर नहीं है वो आकाशगंगा में अपनी स्थिति परिवर्तित करता रहता है. और हम जानते ही हैं कि ‘यूनिवर्स इज़ एक्स्पेंडिंग’ यानी आकाशगंगा और पूरा यूनिवर्स फ़ैल रहा है, यानी वो भी स्थिर नहीं है.

 

 

तो जब हम कहते हैं कि मेरी गाड़ी की स्पीड अस्सी किलोमीटर प्रति घंटा है (आशा है कि कोई ट्रैफिक इंस्पेक्टर इस पोस्ट को नहीं पढ़ रहा होगा) तो इससे मेरा आशय है कि मेरी गाड़ी की स्पीड धरती की गति की तुलना में अस्सी किलोमीटर प्रति घंटा है. यानी मैंने ये मान लिया, चाहे आम बोलचाल की भाषा में बोला नहीं पर, कि धरती स्थिर है. तो गाड़ी की गति नापने के लिए धरती मेरा ‘फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस’ है.

 

यानी आइंदा कोई आपसे कहे कि आज मैंने सत्तर की स्पीड से बाइक चलाई तो उससे फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस पूछिएगा. क्यूंकि जब आपकी बाइक स्टैंड में खड़ी भी रहती है तब भी उसकी स्पीड एक लाख दस हज़ार किलोमीटर प्रति घंटा होती है, यदि ‘फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस’ सूर्य लिया जाए. क्यूंकि यही वह स्पीड है जिस स्पीड से धरती सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है.

 
अब इस ‘फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस’ को पकड़े रहिए क्यूंकि इसी को ‘रेफरेंस’ की तरह यूज़ करके दुनिया की अर्थव्यवस्था को समझा जाएगा.
अर्थव्यवस्था, जैसी आज है वैसी आज क्यूं है इसका उत्तर है – इतिहास!

हम इतिहास को जानेंगे लेकिन काल, इसवी, समय और घटनाओं से नहीं बल्कि लॉजिक से. ऐसा कब हुआ के बजाय ऐसा क्यूं हुआ होगा का विश्लेष्ण करेंगे, कब हुआ तो आपकी कोई भी बता देगा.

 

 

दुनिया में पहले बार्टर सिस्टम था. मुद्रा का कांसेप्ट नहीं होता तो वही आज भी होता. यानी आप अपने खेत में उगे हुए कुछ या ढेर सारे गाज़र एप्पल स्टोर में देते और एप्पल स्टोर वाला आपको आई फोन नाइन दे देता. हर महीने की पहली तारीख को आपको सेलरी के रूप में बत्तीस किलो चावल, दो टूथपेस्ट, चार साबुन एक महीने का नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन और दिल्ली-मुंबई का एक रिटर्न टिकट मिलता. अब यदि आपको इनकी या इसमें से किसी चीज़ की जरूरत नहीं होती तो किसी से मिलकर अपनी चीज़ें बदल लेते. आपको मुंबई नहीं गोवा जाना था तो आपने टिकट बदल लिया. आपको अमेज़न प्राइम का सब्स्क्रिप्शन चाहिए था तो आपने नेटफ्लिक्स के सब्सक्रिप्शन के साथ उसे बदल लिया. ज़िंदगी सॉर्टेड!

 

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ये सब मैं इतना विस्तारपूर्वक क्यूं एक्सप्लेन कर रहा हूं? ताकि समझ में आए कि ये सोचने में ही कितना मुश्किल लगता है, तो करने में कितना दिक्कत भरा होता होगा. आज तो फिर भी इंटरनेट है आप अपनी चीज़ों की लिस्ट ओएलएक्स में डाल सकते हैं और लोग सर्च कर सकते हैं, फिर भी चीज़ें बिना बिके अपनी पूरी शेल्फ लाइफ खा जाती हैं. गाज़र सड़ जाते हैं, मार्किट में आई फ़ोन टेन आ जाता है. अपनी पसंद का दिल्ली-गोवा टिकट ढूंढना और ये भी दुआ करना कि जिसके पास ऐसा टिकट हो उसे आपके पास अवेलेबल टिकट ही चाहिए और साथ ही एक और दुआ कि उसे अभी तक आप सा कोई न मिला हो.

 

तो ये सब जानने के बाद हमें पता चलता है बार्टर सिस्टम में कमियां तो ढेरों थीं लेकिन उन कमियों का कारण एक ही था – कॉमन फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस का न होना. कोई आपकी गाड़ी की चाल पुच्छल तारे के रेस्पेक्ट में माप रहा था, कोई ध्रुव तारे के.

 
मतलब ये कि किसी के पास केवल अपने खेत में उगाए गाज़र थे किसी के पास केवल अपनी फैक्ट्री में बनाए आई फोन. गाज़र वाले को लगता था कि उसके गाज़र कीमती हैं और आई फोन वाले को लगता था उसके आई फोन. तो धीरे धीरे बढ़ रही दिक्कतों के चलते एक ऐसा कॉमन फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस लाने की सोची गई जिसकी वेल्यू समान रहे और साथ ही सभी के द्वारा स्वीकार्य भी हो. सभी के द्वारा स्वीकार्य होना भी एक बहुत बड़ी शर्त है क्यूंकि यहां तो हम विचारों से सहमत नहीं होते तो ऐसा कैसे स्वीकार कर लेते कि कोई एक दिन उठ कर आए और कहे कि आज से मेरे गाज़रों को मुद्रा के रूप में यूज़ किया जाएगा. गाजरों के साथ यह भी दिक्कत थी कि एक दिन वो सड़ जाते, और साथ ही यदि गाज़र (या उसकी जैसी कोई चीज़) मुद्रा के रूप में सर्वमान्य होती तो सब अपने खेतों में गाज़र ही उगाने लग जाते.

 

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तो स्वीकार्यता जैसी चीज़ को यूं सॉल्व किया गया होगा कि जिसका अमुक समाज में सबसे ज्यादा रसूख है, जो सबसे दबंग है, जिसकी सब सुनते हैं या जो ज़ोर-जबरदस्ती से अपनी सुनवा के मानता है वो ही डिसाइड करता होगा कि आज से मेरी मुद्रा चलेगी. ऐसा व्यक्ति राजा, रानी, मुखिया या हेड ही हो सकता है.

 

 

(आगे बढ़ने से पहले फिर गौर करें कि हम इतिहास को ऐसे नहीं देख रहे हैं कि किसने, क्या, कब लागू किया, अपितु हम ऐसे देख रहे हैं कि उस वक्त की स्थितियों में क्या खामी थी और उसको दूर कैसे किया गया. फिर नए सेटअप में आई खामियों को दूर किया गया और धीरे धीरे, डेसपेसीटो, क्वे सरा सरा, वर्तमान की स्थितियों तक पहुंचे…)

 

अब ऐसा गुण तो किसी मेटल में ही हो सकता था. और भी चीज़ें होंगी लेकिन मेटल ‘में भी’ दीर्घायु का गुण था. और जो शुरू में शतरंज के बादशाह वाली बात थी, वो मेटल या धातुओं के लिए श्राप नहीं वरदान साबित हुई. क्यूंकि यदि धन या मुद्रा का कोई और भी उपयोग होगा तो स्थितियां खराब हो जातीं. गाज़र या सेब को मुद्रा बनाने में यह भी एक दिक्कत थी. लेकिन यदि किसी मेटल को मुद्रा के रूप में यूज़ किया जाता और उसके ऊपर केवल वेल्यू आरोपित कर दी जाती तो कोई भी रातों रात अमीर हो जाता. लोग खेती बाड़ी करने के बजाय खदानों में लग जाते.

 

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वैल्यू आरोपित करने का मतलब आज के संदर्भ में ऐसे समझें – यदि मान लिया जाता कि एक किलो लोहे की वेल्यू एक करोड़ रुपया है, तब जबकि उसकी रियल वेल्यू एक हज़ार रूपये ही है – तो इसे वैल्यू आरोपित करना कहेंगे. अब इस स्थिति में लोग उस लोहे को कमाने के बजाय माइनिंग करने लग जाते. और हां एक बात और, ये तो थी वो स्थिति जब ज़्यादा वैल्यू आरोपित की गई, यदि कम वैल्यू आरोपित की जाती, तो लोग उसे मुद्रा के रूप में उपयोग में लेन के बजाय उसे वस्तु के रूप में उपयोग में लाते. मुझे पता नहीं कि ये घटना सच है या झूठ लेकिन एक उदाहरण के रूप में परफेक्ट है – मैंने सुना था कि कुछ साल पहले लोग सिक्कों को गला कर उसका मेटल बनाने लग गए थे, क्यूंकि सिक्का

 

एक रुपये का था लेकिन उसमें लगे मेटल की कीमत दस रुपए थी. बहरहाल इस ‘आरोपित करने’ वाली दिक्कत के दो हल थे –

 

 

1- मेटल के ऊपर कोई काल्पनिक या बड़ी वेल्यू ‘आरोपित’ करने के बजाय उसपर मूल वैल्यू ही आरोपित की जाए. जिससे खेती करने वाले और उस स्पेसिफिक मेटल की खुदाई करने वाले में से कोई भी ठगा महसूस न करे. यानी जो खुदाई कर रहा है उसे अगर एक किलो लोहा मिलता है तो उसे एक किलो लोहे के बराबर ही ख़ुशी हो न कि एक करोड़ रूपये के बराबर. किसी दिन जब आपको बिट कॉइन के बारे में बताएंगे तो आपको लगेगा कि अरे हां यही हाल वहां पर भी है. बिटकॉइन की माइनिंग करने वाला और उसे कमाने वाला दोनों की एक बराबर या लगभग एक बराबर खुश हैं.

 

 

2- मेटल के ऊपर कोई बड़ी वेल्यू ‘आरोपित’ करने के साथ ही उसमें ऐसा कोई चिन्ह लगा दिया जाए जिसको कॉपी करना नामुमकिन हो. (लेकिन ये दूसरी विधि तब फेल हो जाती है जबकि मेटल के ऊपर कोई छोटी वेल्यू ‘आरोपित’ की जाए.)

 

 

तो दूसरे पॉइंट ने ही सिक्कों को जन्म दिया लेकिन दूसरे पॉइंट में एक जगह ‘नामुमकिन’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है. और जब तक ये ‘नामुमकिन’, नामुमकिन रहता है तब तक तो दूसरी तरह से बनाई मुद्रा को परफेक्ट मुद्रा कहा जा सकता है लेकिन हर दौर में चाहे वो हुमायूं के चमड़े के सिक्के हों या आज की करेंसी, नकली मुद्रा बनाना मुश्किल से और मुश्किल तो होता रहा है मगर नामुमकिन कभी नहीं रहा.

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पहले और दूसरे पॉइंट के कॉम्बिनेशन से मिलकर बनी मुद्रा भी प्रचलन में आई. यानी वो मेटल यूज़ किए गए जिनसे बनी मुद्रा को यदि पिघला भी दिया जाता तो भी कोई ख़ास फायदा या नुकसान नहीं होता. लेकिन एक्स्ट्रा सिक्युरिटी फीचर के रूप में उसमें भी कुछ ऐसे राजसी चिन्ह लगाए गए जिससे उनकी नकल करना एनीवे मुश्किल होता. सोने चांदी के बने सिक्के ऐसे ही थे.

 

इन सोने चांदी से बने सिक्कों में सिक्यूरिटी फीचर लगाना इसलिए भी ज़रुरी था क्यूंकि बेशक इन सिक्कों में यूज़ हुए मेटल की कीमत उतनी ही थी जितनी उस मेटल से बने सिक्के की, लेकिन फिर भी उसी रंग और उसी प्रकार के कुछ सस्ते मेटल भी उपलब्ध रहे थे, जो सोने और चांदी की बजाय उपयोग में ले आए जाते और बेशक जौहरी या पारखी नज़र वाला तो उन्हें पहचान लेता लेकिन दैनिक खरीद फ़रोख्त में ठगी के बहुत चांसेज थे.

 
बहरहाल चूंकि हम मुद्राओं की नहीं सोने की बात कर रहे हैं तो उसी पटरी पर आगे बढ़ते हैं –

 

वो स्थिति सोचिए जब एक राजा का दौर खत्म हो और दूसरा राजा पुरानी मुदा का डीमोनेटाईज़ेशन कर दे? या वो स्थिति जब एक देश का आदमी किसी दूसरे देश व्यापार करने जाए लेकिन दोनों देशों की मुद्राएं अलग हों.

 

ऐसी स्थिति में तो वही मुद्रा काम में आ सकती थी जिसमें मुहर कहीं की भी या कोई भी लगी हो लेकिन उसमें प्रयुक्त मेटल की कीमत, मुद्रा में स्पेसिफाईड कीमत के बराबर ही हो. ऐसा मेटल कोई भी हो सकता था. लोहा भी. पीतल भी. लेकिन लोहा इतना सस्ता होता है कि उसका सौ रुपए का सिक्का शायद एक किलो का हो, पीतल का आधे किलो का, चांदी का पावभर का और सोने का सौ ग्राम. अब आप डिसाइड कीजिए कि आपको एक दो टन लोहा लेकर चलना है या कुछेक किलो सोना?

 

तो उपर्युक्त धातुओं में से सबसे कम वज़न में सबसे ज्यादा मूल्य की मुद्रा सोने से ही बन सकती है. और जब सोना दूसरे देश ले जा ही रहे हैं, या दूसरे राजा का शासन आ ही रहा है तो उसमें मुहरें हों न हों क्या ही फर्क पड़ता है. बड़े सौदों में तो असली नकली सोने की जांच की ही जाएगी और सोने की जांच करना इतना भी मुश्किल नहीं. कुछ न भी हो तो भी पानी से किसी धातु के असली नकली होने का पता लगाया जा सकता है. थैंक्स टू आर्कीमिडिज.

तो इसलिए पूरी अर्थव्यवस्था का फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस सोना बन गया.

सब सवालों के बाद एक ही सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि सोना महंगा क्यूं है, या सोने की महंगाई का पता कैसे चला जबकि ‘अल्टीमेट’ फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस तो खुद सोना ही है.

 

 

सोना एक प्राकृतिक चीज़ है, साथ ही इनोर्गेनिक. इनोर्गानिक मतलब उसे उगाया नहीं जा सकता, कोई एल्केमिस्ट सोना बनाने की विधी नहीं जानता. होने को अन्य धातुओं से सोना बनाया जाता भी हो यदि प्रयोगशालाओं में, रेडियोएक्टिविटी या अन्य किसी प्रोसेस के जरिए, तो भी उस प्रोसेस की कीमत, बनने वाले सोने से कहीं अधिक है.

 

हां तो अन्य सभी/ज़्यादातर मेटल्स की तरह ही सोना भी केवल खदानों से निकला जाता है. लेकिन इसकी उपलब्धता लोहा पीतल या अन्य कई (सभी नहीं) मेटल्स से बहुत कम है. इसलिए ये महंगा है.

 

यहां पर अर्थशास्त्र के सबसे पहले पाठ – मांग की लोच का नियम लागू होता है. यानी जो चीज़ जितनी कम उपलब्ध होगी वो उतनी महंगी होगी. हां बस वो पूरी तरह अनुपयोगी न हो.

 

लेकिन सोना सबसे महंगा मेटल तो है नहीं फिर भी इसे फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस क्यूं लिया जाता है?

 

सोना कम मात्रा में तो पाया जाता है लेकिन फिर भी इतनी मात्रा में है कि एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में भी प्लैटिनम मिले न मिले टाइटेनियम मिले न मिले सोना जरुर मिल जाता है. लेकिन लोहे या पीतल की तरह किसी अलमारी के हैंडल या नल की टोंटी के रूप में नहीं, ‘ऐसेट’ के रूप में. यानी उपलब्ध है लेकिन बहुत कम. तो जैसा कि बुद्ध ने कहा है – मध्यमार्ग. जैसा सलमान ने कहा है – कोई तुझसे अच्छी पटेगी नहीं, कोई तुझसे कम भी चलेगी नहीं.

 

अब आप यदि फिर भी कहेंगे कि सोना अर्थव्यवस्था के लिए सबसे परफेक्ट तो नहीं है. तो इसका उत्तर है कि आप ये मान के चल रहे हैं कि गोया हमने परफेक्ट समाज, परफेक्ट अर्थव्यवस्था एचिव कर ली हो और विकास की सारी प्रोसेस समाप्त हो चुकी हो. लेकिन हम मंजिल पर नहीं रास्ते में हैं और ‘सबसे बेहतरीन’ नहीं, ‘अभी तक की सबसे बेहतरीन’ व्यवस्था में जी रहे हैं. नोट, क्रिप्टो करेंसी, चांदी, प्लेटिनम कई चीज़ें आईं, कई और आएंगी. जो कोई भी बादशाह होगा उसका प्रोफाइल किया जाएगा, उसके बारे में लिखा जाएगा, उसकी चर्चा होगी. लेकिन अभी तो –

 

बेशक हीरा है सदा के लिए, लेकिन सोना है सौदा के लिए!

 
अंततः – हमने शुरुआत में कहा कि सोना किसी काम नहीं आता, लेकिन दरअसल वो इसलिए ही किसी काम में नहीं लाया जाता क्यूंकि वो महंगा बहुत है, अन्यथा वो ऊष्मा और विद्युत् का सबसे अच्छा कंडेक्टर है, सबसे मजबूत धातु है. उसकी पतली से पतली परत बनाई जा सकती है, आदि आदि. लेकिन फिर भी उसे ‘सेफ’ में रखने में ज्यादा फायदा है बजाय कि ‘फेस’ में लगाने के. सोना लिक्विड मनी और नॉन-लिक्विड ऐसेट के बीच का कुछ है. मतलब जब चाहे भंजा लो. और सदियों बाद भी वैल्यू ऑलमोस्ट सेम. (रहेगी ही, फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस जो है वो.)

 

अब आप कहेंगे कि, ‘सोने के दाम भी घटते बढ़ते रहते हैं’.

 

ये कथन ऐसा ही है जैसे ट्रेन में बैठा कोई कह रहा हो कि पेड़ पीछे जा रहे हैं. जब सोना फ्रेम ऑफ़ रेफरेंस है तो उसके दाम उतने ही रहेंगे. क्यूंकि पांच सौ साल पहले भी एक किलो सोने के बदले एक किलो सोना ही मिलता था और आज भी. घट-बढ़ तो आपकी कुछ दशकों से चलन में आई करेंसी रही है. और गोल्ड –
ओल्ड इज़ गोल्ड ही नहीं बल्कि गोल्ड इज़ आल्सो ओल्ड वेरी ओल्ड!

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