January 16, 2021

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

जानिए महिलाओं से संबंधित भारतीय कानून

महिलाओं के अधिकार: वह कानून जो हर भारतीय महिला को पता होने चाहिए

कई अपराध पता नही लग पाते है या फिर रिपोर्ट नही हो पातें हैं  सिर्फ इसलिये कि महिलायें अपने अधिकारों से अवगत नहीं होती है. अपराधों की बढ़ती संख्या के खिलाफ लड़ने के लिए यह जरुरी है कि महिलायें अपने कानूनी अधिकारों के बारे में जानती हो. भारतीय संविधान महिलाओं को कई अधिकार प्रदान करता है. अधिकारों की एक सूची हम यहां दे रहे है जिससे हर लड़की और महिला को अवगत होना चाहिए.

विश्व भर में समय-समय पर महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठती रही है। भारत में महिलाएं सामाजिक रीति-रिवाजों द्वारा शोषित और दमित होती रही हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व भी महिलाओं पर अत्याचारों की संख्याओं में कोई कमी नहीं थी तथा स्वतंत्रता के बाद भी महिलाओं के संबंध में अत्याचार और अपराध निरंतर घटित हो रहे थे।

इन अपराधों के निवारण में कमी एवं इन पर रोक हेतु सशक्त विधान की आवश्यकता थी तथा भारतीय संसद में महिलाओं के संबंध में ऐसे विधान को बनाने से तनिक भी संकोच नहीं किया है। समय-समय पर भारतीय पार्लियामेंट ने महिलाओं से संबंधित विधि का निर्माण किया है। भारतीय संविधान में भी महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने के पूर्ण प्रयास किए गए हैं।

भारतीय संविधान और महिलाएं

उद्देशिका प्रस्तावना में महिलाओं का स्थान

उद्देशिका में वर्णित न्याय स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व की स्थापना भारतीय संविधान निर्माताओं द्वारा कल्याणकारी राज्य की स्थापना में अंतर्निहित उद्देश्य को प्रकट करता है। यह उद्देश्य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के आदर्श वाक्य पर चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है। उद्देशिका में प्रकट विचार सभी नागरिकों के संदर्भ में समान रूप से लागू माने जाते हैं। स्त्रियों और पुरुषों के संदर्भ में विभेद कारी नहीं है।

मूलभूत अधिकारों में महिलाओं का स्थान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में पदावली- विधि के समक्ष समता तथा विधियों का समान संरक्षण का प्रयोग किया गया है। दोनों वाक्यों का उद्देश्य समान न्याय प्रदान करना है। उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पतंजलि शास्त्री के मतानुसार विधि का समान संरक्षण विधि के समक्ष समता का ही उप सिद्धांत है तथा व्यापारिक रूप में दोनों एक ही है।

अनुच्छेद 15 (3)

अनुच्छेद 15 3 में स्पष्ट रूप से इंगित किया गया है कि अनुच्छेद 15 में वर्णित प्रावधानों से प्रभावित रहते हुए राज्य महिलाओं के लिए विशेष उपबंध कर सकेगा जो कि उनके लाभ के लिए होगा। अर्थात ऐसी विधि बनाई जा सकती है जो महिलाओं के संबंध में लाभ है।

वाद जहां महिलाओं के लिए विशेष उपबंध को संवैधानिक स्वीकार किया गया है

केवल स्त्रियों के लिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना तथा अन्य शिक्षण संस्थाओं में उनके लिए स्थान के आरक्षण को मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा दत्तात्रेय बनाम स्टेट के बाद में संवैधानिक घोषित करते हुए कहा गया है कि अनुच्छेद 15 (3) यह संरक्षित है।

भारत में दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धाराएं 125 और धारा 128 पत्नी स्त्रियों को पुरुष से भरण पोषण प्राप्त करने के अधिकार को मान्यता देते हैं। यह अधिकार केवल पत्नी चाहे वह तलाकशुदा हो या पृथक निवास कर रही हो और विवाह वैध हो तो उसको प्राप्त है।

नूर सबा खातून के मामले में सुप्रीम कोर्ट का मत था कि इन प्रावधानों का उद्देश्य आवेदक को तत्कालीन अनुतोष राहत प्रदान करना है, ताकि उसे जीवन की कठिनाइयों से बचाया जा सके तथा उसे जीवन यापन हेतु न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित की जा सके या प्रावधान धर्म समाज समुदाय से निश्चित रहते हुए सभी को उपलब्ध है तथा परित्यक्त पृथक निवास कर रही विवाहित महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए है महिला हित रक्षार्थ विशेष उपबंध होने के कारण इसे संविधान सम्मत माना जाता है।

मुसमा चौकी बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान के मामले में दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 437 की वैधानिकता को चुनौती दी गई थी कि यह अनुच्छेद 15 (1) के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। परंतु राजस्थान उच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि यह वैध है, क्योंकि यह महिलाओं के लिए विशेष उपबंध करता है तथा संविधान के अनुच्छेद 15 (3) द्वारा संरक्षित है। इसी प्रकार सुरेश कुमारी बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा के मामले में हरियाणा उच्च न्यायालय का अभिमत था की धारा 437 के अंतर्गत महिलाओं के पक्ष में भेदभाव विधि सम्मत है।

महिलाओं के विरुद्ध अपराध एवं भारतीय दंड संहिता

भारतीय दंड संहिता 1860 में अश्लीलता को परिभाषित नहीं किया गया है। अश्लीलता से संबंधित धाराएं 292, 293, साल 1969 में संशोधित की गई थी। इस संशोधन के माध्यम से विज्ञान साहित्य कला के उद्देश्य हेतु इन धाराओं को उदार बनाया गया है। इस धारा को बनाने का मकसद समाज में महिलाओं के प्रति उस विचार को दूर करना है जो महिलाओं के साथ लिंग आधारित भेदभाव को जन्म देता है। महिलाओं को सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह पेश करने वाले विचार को इस धारा के अंतर्गत पूर्णता प्रतिबंधित किया गया है।

अश्लील कार्य गाने

भारतीय दंड संहिता में महिलाओं के प्रति अश्लील गाने कार्य करना दोनों को दंडनीय अपराध बनाया गया है। धारा 294 के अनुसार कोई व्यक्ति किसी लोक स्थान में कोई अश्लील कार्य करेगा इस लोग स्थान में उसके समीप कोई ऐसे अश्लील गाने अथवा गीत पखवाड़े या शब्द गाएगा सुनाएगा उपचारित करेगा, जिससे दूसरों को परेशानी हो वह साधारण या सश्रम दोनों में से किसी भी प्रकार की कारावास से जिसकी अवधि 3 मास तक की हो सकेगी से दोनों से दंडित किया जाएगा।

स्त्री की लज्जा हेतु भारतीय दंड संहिता के अन्य प्रावधान

धारा 354 में स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला आपराधिक बल का प्रयोग के विषय में वर्णित है कि जो कोई किसी स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से यह संभव जानते हुए कि ऐसा कार्य करते हुए वह उसकी लज्जा भंग करेगा। उस स्त्री पर हमला करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 2 वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा।

इस धारा का लक्ष्य स्त्री के अस्तित्व की रक्षा करना है तथा उसके आत्मसम्मान और उसकी अस्मिता की रक्षा करना है।

आईएपीसी धारा 376, बलात्कार

इस अपराध को भारतीय दंड संहिता में बलात्संग भी कहा गया है। यह अत्यंत जघन्य अपराध है। यह अपराध भारत की प्रमुख समस्या बनकर उभरा है। भारतीय दंड संहिता में इस अपराध मे मृत्युदंड तक दंडनीय रखा गया है।

प्रकृति के विरुद्ध अपराध धारा 377

इस धारा के अंतर्गत हाल ही के अंदर संशोधन किए गए हैं, परंतु वह संशोधन समलैंगिकों के अधिकारों को सुरक्षित करने हेतु किए गए है। यदि कोई व्यक्ति किसी स्त्री जीव जंतुओं के साथ प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध चलते हुए अपनी इच्छा से इंद्रिय भोग करेगा वह आजीवन कारावास से दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 10 वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडित होगा।

प्रकृति की अवस्था के विरुद्ध संभोग मुखमैथुन एवं गुदामैथुन को माना गया है। यदि कोई स्त्री को इस प्रकार के संभोग हेतु विवश करता है तो वहां इस अपराध का अपराधी माना जाएगा।

दहेज संबंधी अपराध

आईपीसी 304 बी

दहेज की मांग न पूरी होने पर वधू की हत्या की घटनाएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं। ऐसा विधायिका के संज्ञान में आया। खाना बनाते समय चूल्हे की आग वधु को काल कवलित करती है, ऐसा अधिकतर देखा जाता है। वर पक्ष का कोई भी शायद ही कभी जलकर मरता हो। इस समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने हेतु भारतीय दंड संहिता में दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1986 बनने के बाद धारा 304 बी ‘दहेज मृत्यु’ के नवीन अपराध को जोड़ा गया है।

वास्तव में इस संशोधन से पूर्व दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 को दहेज की कुरीति पर नियंत्रण बनाने हेतु अधिनियमित किया गया था, परंतु दहेज की मांग मृत्यु का कारण बनने लगी इसी कुरीति पर प्रभावी अंकुश लगाने के उद्देश्य से भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113 बी जोड़ी गई। यह आजीवन कारावास तक से दंडनीय अपराध है।

आईपीसी धारा 498 ए

इस धारा के अंतर्गत पति और उसके नातेदार द्वारा स्त्री के प्रति क्रूरता को रखा गया है। इस क्रूरता में मानसिक एवं शारीरिक दोनों तरह की क्रूरता को स्थान दिया गया है। यदि पति उसके नातेदार स्त्री के विरुद्ध मानसिक एवं शारीरिक क्रूरता करते हैं तो इस धारा के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। यह एक संज्ञेय अपराध है और गैर जमानती भी है।

दूसरा विवाह

आईपीसी धारा 494 के अनुसार जो कोई पति या पत्नी के जीवित होते हुए किसी ऐसी दशा में विवाह करेगा, जिसमें ऐसा विवाह इस कारण शून्य है कि वह ऐसे पति या पत्नी के जीवन काल में होता है। इस प्रकार पहले जीवन साथी के जीवित रहने पर दूसरा विवाह करना दंडनीय अपराध है। इसके लिए 7 वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान है और दोषी जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

परंतु यह धारा उन लोगों पर लागू नहीं होती है, जिन लोगों को व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत दूसरा विवाह करने का अधिकार अपनी रूढ़ि और प्रथाओं द्वारा दिए गए हैं। जैसे मुस्लिम और आदिवासियों पर यह धारा लागू नहीं होती, क्योंकि मुस्लिम धर्म और आदिवासी रूढ़ियों प्रथाओं के अनुसार कोई पुरुष दूसरा विवाह कर सकता है परंतु स्त्री दूसरा विवाह नहीं कर सकती। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत दूसरे विवाह को प्रतिबंधित किया गया है।

घरेलू हिंसा अधिनियम एवं महिलाएं

घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण हेतु 2005 में भारतीय संसद द्वारा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 बनाया गया। इस अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा को समाप्त करना था। इस अधिनियम के अंतर्गत पति द्वारा घर से निकाली गई महिला को घर में प्रवेश दिलाने का अधिकार भी दिया गया है या तलाकशुदा महिला को भरण पोषण उसकी संतान को भरण पोषण दिए जाने का अधिकार भी दिया गया है।

यह महिलाओं के लिए बनाया गया अत्यंत सार्थक एवं सशक्त कानून है जिसके माध्यम से महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा को रोका जा सकता है। यह कानून हिंसा को रोकने हेतु सार्थक सिद्ध हो रहा है।

कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न

जब महिलाएं घरों से निकलकर वित्तीय मजबूती के लिए कार्य स्थलों पर नौकरियां करने आई तो पुरुषों द्वारा महिलाओं को कार्यस्थल पर भी लैंगिक रूप से उत्पीड़न या यौन उत्पीड़न दिया गया।

विशाखा बनाम राजस्थान राज्य नामक मामले में लैंगिक समानता के लिए कार्यरत एक गैर सरकारी संगठन द्वारा जनहित याचिका के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 14, 19 तथा 21 के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों को प्रभावी रूप से लागू कराने के उद्देश्य से एक प्रयास किया गया

इस बात को निर्णीत करते समय उच्चतम न्यायालय द्वारा लैंगिक समानता को सुनिश्चित करने वाले अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों की विषय वस्तु पर विश्वास किया गया और स्पष्ट किया गया कि मूलभूत रूप से लैंगिक समानता की उपलब्धता निर्वाचित एवं सुनिश्चित करते समय मनो विचित गरिमा सहित कार्य करने का अधिकार तथा लैंगिक उत्पीड़न के विरुद्ध सुरक्षा सुनिश्चित करना अंतर्निहित दायित्व होता है।

इस निर्णय के माध्यम से उच्चतम न्यायालय ने कामकाजी महिलाओं के साथ हो रही यौन उत्पीड़न की घटनाओं की रोकथाम के लिए दिशानिर्देश जारी किए है।

महिला आरोपी की दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अंतर्गत सुरक्षा

महिला आरोपियों को दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत विशेष सुरक्षा दी गई है धारा 46 में गिरफ्तारी के नियम बताए गए हैं, जिसमें महिला आरोपी की गिरफ्तारी महिला अधिकारी द्वारा ही की जाएगी। महिला चिकित्सक द्वारा ही महिला आरोपी का परीक्षण किया जाएगा।

गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम 1971

इस अधिनियम के माध्यम से अबॉर्शन के नियम दिए गए हैं। कोई भी अबॉर्शन किस डॉक्टर द्वारा किया जाएगा या व्यवस्थित रूप से इस अधिनियम में बताया गया है। यह एक आपराधिक अधिनियम है, जिसमें गैर पंजीकृत चिकित्सक द्वारा गर्भ समापन हेतु दंड रखा गया है।

भ्रूण लिंग चयन निषेध अधिनियम 1994

इस अधिनियम के अंतर्गत लिंग के चयन को निषेध किया गया है एवं लिंग के परीक्षण को पूर्णतः अवैध बनाया गया है।

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1956-

इस अधिनियम का मूल उद्देश्य महिलाओं को वेश्यावृत्ति से बचाना है एवं जो महिलाएं पूर्व से वेश्यावृत्ति इत्यादि कामों में लगी हुई है। उनका उत्थान करना है अधिनियम के अंतर्गत सुधार गृह एवं संरक्षण गृह बनाए गए तथा नए वेश्यालय को खुलने से रोकने का पूर्ण इंतजाम किया गया है।

इस अधिनियम के बनने के बाद से भारत भर में वेश्यावृत्ति एवं मुजरा घरों के निर्माण में कमी आई है। भारत की सीमाओं के भीतर किसी भी प्रकार से मानव शरीर का संभोग हेतु खरीदा बेचा जाना जाना पूर्णतः प्रतिबंधित है वेश्यावृत्ति की रोक हेतु अधिनियम सार्थक सिद्ध हुआ है।

 

प्रसूति लाभ अधिनियम (2017)

हाल ही में संशोधित मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम 2017, गर्भावस्था के दौरान काम करने वाली महिलाओं के हितों की रक्षा करता है. इस अधिनियम के अनुसार, प्रत्येक नियोक्ता को अपनी गर्भावस्था के कार्यकाल के दौरान प्रत्येक महिला कर्मचारी को कुछ विशेष सुविधाएं प्रदान करनी होती हैं. इन विशेष लाभों में पेड मातृत्व अवकाश (12 से 26 सप्ताह तक), घर से काम करने का मौका(सामान्य वेतन लाभ के साथ) और कार्यस्थल पर क्रेचे सुविधाएं भी शामिल हैं. यह अधिनियम महिलाओं को उनके काम और पारिवारिक जीवन को संतुलित करने के लिए अधिक फायदे देता है.

हालांकि, इस अधिनियम की वजह से लोगों से विपरित प्रतिक्रिया भी मिली. उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक,  नियोक्ता अब महिला कर्मचारियों को काम पर रखने के लिए उत्सुक नहीं होंगे, जिसकी वजह से उनके लिए नौकरी के कम अवसर होंगे.

कार्यस्थल पर महिलाओं की यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013)

हाल के दिनों में यौन उत्पीड़न एक बड़ी समस्या है. यौन उत्पीड़न का मतलब होता है शारीरिक संपर्क और उसके आगे जाना, या यौन उत्पीड़न की मांग या अनुरोध, या यौन से संबंधित टिप्पणियां  या अश्लीलता दिखाना या यौन प्रकृति के किसी अन्य अवांछित शारीरिक, मौखिक, गैर-मौखिक आचरण शामिल हैं. चाहे वह पुरुष मालिक या सहयोगी द्वारा किया जाता है, आप मामलें में पुलिस से संपर्क कर सकते हैं और शिकायत दर्ज करा सकते हैं.

सभी संगठनों को एक आंतरिक शिकायत समिति की आवश्यकता होती है, जिसे ऐसी किसी भी शिकायत को देखना चाहिए.

घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा (2005)

यह कानून रूप से साथी द्वारा की गई हिंसा से संबंधित किसी भी महिला साथी (चाहे पत्नी या महिलाएं हो)  को सुरक्षा प्रदान करता है. इसमें महिला अपने साथी या परिवार के सदस्यों के खिलाफ शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक परेशानी की शिकायत दर्ज करा सकती है जो उनके जीवन और शांतिपूर्ण अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर रहे हो. इस कानून में संशोधन के बाद विधवा महिलाओं, बहनों और तलाकशुदा महिलाओं के लिए भी इस तरह के अधिकार बढ़ाए गए है.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (2005)

यह अधिनियम सभी हिंदू महिलाओं को पितृ संपत्ति पर पूर्ण नियंत्रण और शक्ति देने का अधिकार देता है. 2005 में हुये संशोधनों ने परिवार में महिला और पुरुष के बीच संपत्ति वितरण अधिकारों को और आगे बढ़ाया. बेटियों को विवाह के बाद भी बेटों के बराबर ही संपत्ति पर अधिकार होगा.

बाल विवाह अधिनियम निषेध, 2006

बाल विवाह हमारे देश में एक लंबे समय तक चलने वाली प्रथा है. यह कानून शुरुआती विवाह के कारण हुई परेशानी से दोनों लिंगों के बच्चों की रक्षा करता है. हालांकि ज्यादातर मामलों में, छोटी लड़कियों का विवाह बड़े व्यक्ति के साथ कर दिया जाता है. इस प्रकार  यह जानना जरुरी है कि एक लड़की के विवाह होने की कानूनी उम्र 18 साल है, जबकि लड़के के लिए यह 21 वर्ष होती है. माता-पिता जो निर्धारित उम्र तक पहुंचने से पहले अपने बच्चों को मजबूर कर लेते हैं, वे इस कानून के तहत दंड के अधीन हैं.

स्ट्रीट पर उत्पीड़न

हालांकि भारतीय दंड संहिता अपनी पुस्तकों में स्ट्रीट उत्पीड़न / छेड़कानी का उपयोग या परिभाषित नहीं करती है लेकिन वह निश्चित तौर पर आपको नुकसान से बचाती है. सरल शब्दों में इसे सार्वजनिक रूप से किसी महिला को प्रताड़ित करना या परेशान करने के कार्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, उदाहरण के लिए  उस पर अपमानजनक टिप्पणी करना. आईपीसी की धारा 294 और 509 महिलाओं को ऐसी परिस्थितियों से बचाती है और किसी भी व्यक्ति या समूह के लोगों को किसी भी उम्र की महिला के प्रति आक्रामक / अपमानजनक टिप्पणी या इशारा करने के लिए प्रतिबंधित करती है.

दहेज प्रतिषेध अधिनियम, (1961)

बाल विवाह की तरह, भारतीय संस्कृति में दहेज भी पुरानी परंपरा है.  दुल्हन और उनके परिवारों को अधिकतम धनराशि का भुगतान करने के लिए अत्याचार किया जाता है ताकि शादी किसी भी तरह से चलती रही. भारतीय कानून इस तरह के किसी भी कृत्य को दंडित करता है जिसमें लेने और देने पर परिवारों के बीच संबंध बनाये जाते है.

जानें कि पुलिस के पास कौन से अधिकार है

  • न्यायालयीन आदेशों के अनुसार, प्रत्येक पुलिस स्टेशन में एक महिला पुलिस अधिकारी (एक हेड कांस्टेबल से नीचे नही होना चाहिए) पूरे समय होना अनिवार्य है.
  • एक महिला कॉन्स्टेबल की अनुपस्थिति में, पुरुष पुलिस अधिकारी द्वारा महिला को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है.
  • सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद एक महिला को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है.
  • पुलिस केवल महिला के निवास पर ही उसकी जांच कर सकती है.
  • एक बलात्कार पीड़िता अपनी पसंद के स्थान पर ही अपना बयान रिकॉर्ड कर सकती है और पीड़िता की चिकित्सा प्रक्रिया केवल सरकारी अस्पताल में ही हो सकती है. सभी महिलाएं मुफ्त कानूनी सहायता का लाभ लेने की हकदार हैं.

“कानून पूरी तरह से देश की महिलाओं की रक्षा, सुरक्षा और सशक्त बनाने के लिए तैयार किए गए हैं. उन्हें किसी भी बदलाव की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उनको सही तरह से लागू करने की जरुरत है. हमारे समाज में जो कमी है वह यह है कि लोगों में सिविक सेंस की कमी है और कानूनों को सही तरह से लागू नही किया जाता. एक बार ऐसा कर दिया जायें तो  निश्चित रूप से बदलाव आयेंगा.”

याद रखें, अन्याय के खिलाफ आवाज न उठाना भी एक अन्याय है. अपराध करना गलत है, लेकिन इसके बारे में चुप रहना ज्यादा ग़लत है.

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