June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

जानें क्या हैं NCR, FIR और जीरो FIR, कब-कहां और कैसे होता है इनका इस्तेमाल…

देश में आयेदिन हर किसी के साथ छोटी-बड़ी अपराधिक घटनाएं घटती है ऐसे कोई थाने के चक्कर कटाने से कतराता है मगर कुछ लोग साहस करके जाते है थाने में तो पुलिसवाले कभी कानून के नाम पर पीड़ित शख्स को एक थाने से दूसरे थाने दौड़ाया करते है. तो कभी केस को मामूली बनाने का दबाव डाला जाता है. आइए देखें इस मामले में क्या हैं आपके अधिकार

अपराध दो तरह के होते हैं. संज्ञेय (कॉग्निजेबल) और असंज्ञेय (नॉन-कॉग्निजेबल). असंज्ञेय अपराध बेहद मामूली अपराध होते हैं. मसलन मामूली मारपीट आदि. ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं की जाती. पुलिस एनसीआर काटती है और मामला मैजिस्ट्रेट को रेफर कर दिया जाता है. दूसरी तरफ संज्ञेय अपराध गंभीर किस्म के अपराध होते हैं मसलन किसी पर गोली चलाना, डकैती या किसी के घर को आग लगा देना. इस तरह के अपराधिक घटनाओं के बाद पीड़ित तीन तरीकों से पुलिस थानों में शिकायत दर्ज करा सकता है.

FIR (प्राथमिकी या प्रथम सूचना रपट)

सीआरपीसी की धारा 154 के तहत पुलिस को संज्ञेय मामलों में एफआईआर दर्ज करना जरूरी है. पुलिस आनाकानी करे, तो शिकायती डीसीपी को इसकी शिकायत कर सकता है. इसके बाद डीसीपी के निर्देश पर थानेदार को एफआईआर करनी होगी. शिकायती ने जो शिकायत थाने में की है, अगर एफआईआर में मजमून उसके मुताबिक न लिखा गया हो तो शिकायती दस्तखत करने से मना कर सकता है.अगर थाने और आला पुलिस अधिकारियों के सामने की गई शिकायत के बावजूद पुलिस एफआईआर दर्ज करने को तैयार न हो, तो पीड़ित पक्ष इलाके के चीफ मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट या अडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा-156 (3) के तहत शिकायत कर सकता है।’

 

इसके बाद केस संबंधित मैजिस्ट्रेट को रेफर होता है और शिकायती मैजिस्ट्रेट के सामने अपना पक्ष रखता है. अगर मैजिस्ट्रेट शिकायती की बातों से संतुष्ट हो जाए तो फिर एफआईआर का ऑर्डर करता है. एफआईआर किए जाने के बाद पीड़ित पक्ष को एफआईआर की कॉपी भी दी जानी चाहिए. पीड़ित पक्ष एफआईआर के लिए हाई कोर्ट का भी दरवाजा खटखटा सकता है. हाई कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिकाकर्ता अर्जी दाखिल कर गुहार लगा सकता है.

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आखिर ये FIR होता क्या हैं:

फर्स्ट इन्फ़र्मेशन रिपोर्ट (FIR), पुलिस द्वारा लिखित में तैयार की गयी एक रिपोर्ट होती हैं जिसमें पीड़ित पर हुए किसी दंडनीय अपराध का ब्यौरा होता है. ध्यान दे ये FIR रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि FIR दर्ज होने के बाद पुलिस उस अपराध के छानबीन एवं समाधान के प्रति प्रतिबद्ध हो जाते हैं.

FIR से जुड़े आपके अधिकार:

ध्यान दे FIR एक शिकायत होती है जो किसी व्यक्ति/समूह के मूल अधिकारों के हनन पर उपरोक्त थाने में दर्ज करायी जा सकती हैं. आइये एक नज़र डालते हैं FIR से जुड़े आपके अधिकारों पर

FIR, पीड़ित या फिर पीड़ित के किसी भी जानकर या फिर किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा दर्ज करायी जा सकती हैं एवं पुलिस कर्मी किसी भी रूप में आपके शिकायतों को सुनने एवं उसे दर्ज करने से मना नहीं कर सकते.
आप अपने शिकायतों को लिखित या मौखिक में भी दर्ज करा सकते हैं. ध्यान दे मौखिक में दर्ज करायी गयी FIR को आप पुलिसकर्मी द्वारा सुनाने का भी अनुरोध कर सकते हैं.
अपने द्वारा दर्ज शिकायतों को पूरी तरह सुनने एवं पढने के बाद ही आप FIR रिपोर्ट में हस्ताक्षर करे. इस कार्य में कोई भी आप पर दबाव नहीं डाल सकता.
ध्यान दे आपके द्वारा दर्ज की गयी FIR ही कानू-व्यवस्था की नींव होती हैं अतः FIR दर्ज करते वक़्त सही एवं सटीक जानकारियां देना अपनी ज़िम्मेदारी समझे.

जीरो FIR

हर पुलिस स्टेशन का एक ज्युरिडिक्शन होता है. यदि किसी कारण से आप अपने ज्युरिडिक्शन वाले थाने में नहीं पहुंच पा रहे या आपको इसकी जानकारी नहीं है तो जीरो एफआईआर के तहत आप सबसे नजदीकी पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं. जीरो एफआईआर में क्षेत्रीय सीमा नहीं देखी जाती. इसमें क्राइम कहां हुआ है, इससे कोई मतलब नहीं होता. इसमें सबसे पहले रिपोर्ट दर्ज की जाती है. इसके बाद संबंधित थाना जिस क्षेत्र में घटना हुई है, वहां केज्युरिडिक्शन वाले पुलिस स्टेशन में एफआईआर को फॉरवर्ड कर देते हैं. यह प्रोविजन सभी के लिए किया गया है. इसका मकसद ये है कि ज्युरिडिक्शन के कारण किसी को न्याय मिलने में देर न हो और जल्द से जल्द शिकायत पुलिस तक पहुंच जाए.

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जानिए, किसे कहते हैं जीरो एफआईआर?

सचिवालय में तैनात उत्तराखंड से संबंधित एक अपर सचिव पर एक युवती द्वारा दिल्ली में दर्ज कराए गए दुष्कर्म के मामले में दिल्ली पुलिस जीरो एफआईआर (जीरो प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज कर मामले की जांच कर रही है।
जीरो एफआईआर उसे कहते हैं, जब कोई महिला उसके विरुद्ध हुए संज्ञेय अपराध के बारे में घटनास्थल से बाहर के पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाए। इसमें घटना की अपराध संख्या दर्ज नहीं की जाती। हमारे देश की न्याय व्यवस्था के अनुसार, संज्ञेय अपराध होने की दशा में घटना की एफआईआर किसी भी जिले में दर्ज कराई जा सकती है। चूंकि यह मुकदमा घटना वाले स्थान पर दर्ज नहीं होता, इसलिए तत्काल इसका नंबर नहीं दिया जाता, लेकिन जब उसे घटना वाले स्थान पर स्थानांतरित किया जाता है, तब अपराध संख्या दर्ज कर ली जाती है।

असल में, अपराध दो तरह के होते हैं, पहला संज्ञेय (गोली चलाना, हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर अपराध) और दूसरा असंज्ञेय (मामूली मारपीट आदि)। असंज्ञेय में सीधे तौर पर एफआईआर दर्ज नहीं करके शिकायत को मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया जाता है, और फिर मजिस्ट्रेट आरोपी को समन जारी करता है, जबकि संज्ञेय अपराध में एफआईआर दर्ज करना जरूरी है; यह व्यवस्था सीआरपीसी की धारा,154 के तहत की गई है।

जीरो एफआईआर के पीछे सोच यह थी कि किसी भी थाने में शिकायत दर्ज कर मामले की जांच शुरू की जाए और सबूत एकत्र किए जाएं। शिकायत दर्ज नहीं होने की स्थिति में सबूत नष्ट होने का खतरा होता है। जीरो एफआईआर हो या सामान्य एफआईआर, दर्ज की गई शिकायत को सुनकर/ पढ़कर उस पर शिकायती का हस्ताक्षर करना अनिवार्य कानूनी प्रावधान है।

कैसे करे zero फिर:

सामान्य FIR के तरह ही zero FIR भी लिखित या मौखिक में करवाई जा सकती हैं. यदि आप चाहे तो पुलिस वाले से रिपोर्ट को पढने का भी अनुरोध कर सकते हैं. ध्यान दे की FIR लिखने के बाद पुलिस अबिलम्ब उस केस के छानबीन में जुट जाये.

याद रखे की विषम परिस्थितयों में आपके द्वारा दिखाई गयी सूझ-बुझ एवं जागरूकता ही आपको विषम परिस्थितयों से उबार सकती हैं. अतः हमारी आप सभी से ये ही गुजारिश हैं की सुरक्षित रहे, जागरूक रहे एवं लोगो को भी जागरूक करते रहे. ज्ञात रहे की आपके द्वारा दिखाई जागरूकता एक विकसित समाज की स्थापना करने में हमारी काफी मदद कर सकती हैं.

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निर्भया रेप कांड के बाद बना एक्ट

जीरो एफआईआर का कॉन्टेप्ट दिसंबर 2012 में हुए निर्भया केस के बाद आया. निर्भया केस के बाद देशभर में बड़े लेवल पर प्रोटेस्ट हुआ था. अपराधियों के खिलाफ सिटीजन सड़क पर उतरे थे. इसके बाद जस्टिस वर्मा कमेटी रिपोर्ट की रिकमंडेशन के आधार पर एक्ट में नए प्रोविजन जोड़े गए. दिसंबर 2012 में हुए निर्भया केस के बाद न्यू क्रिमिनल लॉ (अमेडमेंट) एक्ट, 2013 आया.

जीरो एफआईआर के फायदे

इस प्रोविजन के बाद इन्वेस्टिगेशन प्रोसीजर तुरंत शुरू हो जाता है. टाइम बर्बाद नहीं होता. इसमें पुलिस 00 सीरियल नंबर से एफआईआर लिखती है. इसके बाद केस को संबंधित थाने में ट्रांसफर कर दिया जाता है. जीरो FIR से अथॉरिटी को इनिशिएल लेवल पर ही एक्शन लेने का टाइम मिलता है. यदि कोई भी पुलिस स्टेशन जीरो एफआईआर लिखने से मना करे तो पीड़ित सीधे पुलिस अधिक्षक को इसकी शिकायत कर सकता है और अपनी कम्प्लेंड रिकॉर्ड करवा सकता है. एसपी खुद इस मामले में इन्वेस्टिगेशन कर सकते हैं या फिर किसी दूसरी अधिकारी को निर्देशित कर सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि कोई भी पुलिस ऑफिसर एफआईआर लिखने से इंकार करे तो उस पर डिसिप्लिनरी एक्शन लिया जाए. कोई व्यक्ति चाहे तो वह ह्युमन राइट्स कमीशन में भी जा सकता है.

नॉन कॉग्निजेबल रिपोर्ट (NCR)

किसी का कोई समान चोरी हो जाय या खो जाय तो एनसीआर में पुलिस घटना के बारे में जिक्र करती है और उसकी एक कॉपी शिकायती को दिया जाता है. इसके बाद अगर उक्त मोबाइल या फिर गायब हुए किसी दस्तावेज का कोई भी शख्स गलत इस्तेमाल करता है तो एनसीआर की कॉपी के आधार पर अपना बचाव किया जा सकता है. ऐसे में एनसीआर की काफी ज्यादा अहमियत है. एनसीआर की कॉपी पुलिस अधिकारी कोर्ट को भेजता है. साथ ही मामले की छानबीन के बाद अगर कोई क्लू न मिले तो पुलिस अनट्रेसेबल का रिपोर्ट दाखिल करती है लेकिन छानबीन के दौरान पुलिस अगर केस सुलझा ले और सामान की रिकवरी हो जाए तो एनसीआर की कॉपी के आधार पर वह सामान शिकायती को मिल सकता है.

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1 thought on “जानें क्या हैं NCR, FIR और जीरो FIR, कब-कहां और कैसे होता है इनका इस्तेमाल…

  1. Indian Constitution (Bhartiya Samvidhan)- The Constitution of India is the supreme law of India. The document lays down the framework demarcating fundamental political code, structure, procedures, powers, and duties of government institutions and sets out fundamental rights, directive principles, and the duties of citizens.

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