June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

दरिया दिखाती है, जरिया छुपाती है सियासत

दरिया दिखाती है, जरिया छुपाती है सियासत

अपुन के इदर कबी नारा लगता है समाजवाद का, कबी इंकलाब के जिंदाबाद का तो कबी सबका साथ का, पन असली रंग जमता है खुर्ची की सियासत की करामात का। वो क्या है ना भाय, बोले तो ये सियासत वोट की खुराक से फूलती फलती है, तो जिदर वोट की तादाद दिखती है उदर दिखावे की रेवड़ी बंटती है तो फालतू की भीड़ छंटती है और आदमी की बस्ती टुकड़ों में बंटती है। किदर जात के ऊंच नीच के टुकड़े, किदर अपने पराये मजहब के टुकड़े, किदर भरपेट और भूक के टुकड़े, किदर वीआईपी कोटे के, तो किदर जात के कोटे के टुकड़े। और अबी बुलंद खबर तो ये है बावा, बोले तो लोक टुकड़े फेंक के बी टुकड़े कर देते हैं।
अबी मुलुक के हालात जास्ती दूरी की एक्सप्रेस ट्रेन का माफिक हो गएले हैं बावा, बोले तो अक्खी गाड़ी अलग-अलग टुकड़ों के रिजर्वेशन के डब्बों से बन रएली है और जो एक दो जनरल डब्बे बचे हैं, वो सजा का माफिक हो गएले हैं। बोले तो कोई बैठा है टेड़ा, कोई एक टांग पे है खड़ा, तो कोई ने बर्थ का कोना है पकड़ा। कोई खिड़की पे टिका है, कोई संडास के कोने में छिपा है तो कोई बर्थ का नीचू सटका है। हाथ हलाने कू नई होता, गर्दन घुमाने कू नई होता, पांव चलाने कू नई होता, भूक लगे तो कुच खाने कू नई होता। एक ईच जगा पे हलते हलते नींद आती है और उठो तो जगा जाती है। तो क्या है ना, बोले तो जित्ती बी जगा मिली है, समजने का अपुन की जागीर है, अपुन के टेशन तलक अपुन की तकदीर है।
अबी प्रॉब्लम यईच है, बोले तो अपुन के इदर पोलिटिक्स आदमी कू आदमी का माफिक जीने का हक देने का वादा तो करती है, पन जीने नई देती। टाइम पड़ने पर कबी आदमी कू खाने कू मच्छी करी बी दे देती है, पन उसकू मच्छी पकड़ने कू नई सिखाती, बोले तो दरिया दिखाती है, जरिया छुपाती है। यईच सिखाया होता तो उसकू बार-बार पेट भरने का वास्ते लीडर लोक का मोहताज होने कू नई पड़ता।
अपुन कू जात का नाम पे रिजर्वेशन बी ऐसा ईच लगता है। बोले तो जो पीछू छूट गया है, उसकू हाथ बड़ा के आगे नई लाने का। उसकू उदर ईच रोक के सपने दिखाने का, खेल खिलाने का और जिंदगी भर रुलाने का। उदर गाड़ी में जात का नाम पे एक डब्बा और लग जाता है और एक और जात दूसरा सबसे अलग हो जाती है। किदर तो बात थी सबकू एक करने की और किदर ये हाल हो गया, बोले तो अपुन का अपुन का देखने का, दूसरे पे कीचड़ फेंकने का, अपुन के मतलब की रोटी सेकने का और गपचुप निकल लेने का।
अबी क्या है, बोले तो सिस्टम पब्लिक का वास्ते है, पन पी कंपनी के लोक, बोले तो पोलिटिशियन लोक पब्लिक कू उप्पर आने कू देना नई मांगताए, कायकू बोले तो जन गण के मन का अधिनायक बन जाएंगा लायक, तो चिरकुट सियासत की हो जाएंगी हालत। यईच वास्ते बोलने कू आजादी के बरस हो गएले हैं एक्काहत्तर, पन हालात दर दिन होते हैं पएला से बदतर।

अपुन के इदर ऊंचा लोक कू सब मिलता है। उनका वास्ते अलग जगमग बोगी है, बोले तो बिजनेस क्लास है। बिजनेस में लॉस है तो बंदा वंटास है, बोले तो फॉरेन में इंतजाम झकास है, इदर पब्लिक के पैसे वाला बैंक खल्लास है। लीडर लोक कू बी सब मिलता है, बोले तो फोन, पानी, बिजली, गाड़ी, ट्रेन, प्लेन सब। कोई लोचा होएंगा तो एमपी चप्पल बी चलाएंगा, पन ट्रेन के संडास में मग्गे कू बी जंजीर से बांध के रखा जाएंगा, बोले तो बड़े आदमी को लूट की छूट और पैदल पब्लिक होए, तो चल फूट।
और सबसे बड़ी बात तो ये है भाय, बोले तो ट्रैक पे ट्रेन लेट है, पन प्लानिंग में सीदी बुलेट है। ये सिस्टम की रेलवे के हैं जलवे, बोले तो आज की गाड़ी अगले दिन आती, फिर बी भाव खाती। पन सच्ची बात तो ये है बावा, बोले तो सियासत चलाने का वास्ते जेब में नोट, हाथ में वोट और नीयत में खोट नई मांगता, सिस्टम की ये थूकपट्टी पे चोट मांगता है।

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