June 29, 2022

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सच के साथ

दो जून की रोटी : मुहावरे का इतिहास

भारत में सदियों से सामाजिक वर्गीकरण का आधार केवल आर्थिक स्तर ही रहा हैं. ऐसे में कब, कहाँ से और कितने मुहावरों का जन्म हुआ कोई नहीं कह सकता. दो जून की रोटी इन्हीं मुहावरों की उपज है. इसका यदि सीधा मतलब समझा जाए, तो 2 समय के भोजन से हैं. लेकिन देश में विभिन्न साहित्कारों ने इस मुहावरे को भाव देकर समझाया. जिनमें कुछ कथाकारों ने अपनी कहानी के पात्रों की इस मूलभूत आवश्यकता को जिस भावपूर्ण तरीके से समझाया है, उससे इसका महत्व और बढ़ गया. इसके अलावा ये जानना और समझना भी आवश्यक हैं कि राजनेताओं द्वारा “2 जून की रोटी” की उपलब्धता वाली बात बार- बार करने से देश के इतने बड़े वर्ग का कौनसा तन्तु प्रभावित होता है, जिसके कारण वो किसी भी राजनेता की कोई भी बात हर बार मानने को तैयार हो जाता है. या फिर ये जानना भी आवश्यक है कि मजदूर और किसान का महत्त्व क्यों, कैसे और कब से है? और आखिर क्यों सम्पन्न वर्ग के लिए “2 जून की रोटी” एक मुहावरा मात्र बनकर रह गया.

2 जून की रोटी के भावों को समझने के लिए देश के गाँवों का विचरण और ग्रामीण जीवन का अध्ययन करना जरुरी हो जाता हैं. ऐसा नहीं हैं कि शहर में रहने वाली आबादी इसके महत्व से अनजान हैं. लेकिन शहर में इसके महत्व का वर्गीकरण हो जाता हैं. समृद्ध और सम्पन्न घरों में 2 जून रोटी का महत्व सिर्फ उन बढ़ते बच्चों को समझाया जाता हैं. जिनकी परवरिश में हिंदी एक अहम हिस्सा होती हैं, या फिर इन घरों के उन युवाओं को जिन्हें मेहनत का महत्त्व या परिश्रम का महत्त्व झ नहीं आता, उन्हें विविध प्रकार से समझाने के लिए इस मुहावरे की गाहे-बगाहे आवश्यकता पड़ती रहती हैं.

2 वक्त का भोजन और मूलभूत अधिकार

युनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स (UDHR) : अर्टिकल 25 के अनुसार जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को व्यक्ति का अधिकार बनाया गया हैं जिसमें भोजन भी शामिल हैं.

भारत में भोजन का अधिकार सबसे मूलभूत अधिकारों में शामिल हैं. और हकीकत में अभी भी भारत में 14.5 प्रतिशत भारतीयों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता. आज़ादी के 70 वर्षों बाद भी ये आंकड़ा होना भयावह तब और हो जाता हैं जब एफएओ के हिसाब से “दी स्टेट ऑफ़ फ़ूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन दी वर्ल्ड 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 190.7 मिलियन लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता. इस कारण 15 से 49 वर्ष की महिलाएं जो गर्भाधान की अवस्था से गुजरती हैं, वो 51.4 प्रतिशत तक एनीमिया की शिकार हैं.ऐसे में 2 जून की रोटी के महत्व को नजर-अंदाज नहीं किया जा सकता. बस इसके साथ बात इतनी हैं कि जीवन की मूलभूत आवश्यकता को इस मुहावरे में ना केवल जरूरत बल्कि मेहनत के साथ भी जोडकर देखा और समझा जाता हैं.

कैसे हैं 2 जून की रोटी की उपलब्धता मानवीय कर्तव्यों में भी शामिल??

वास्तव में ये वो मानवीय आवश्यकता हैं जिसकी पूर्ति होना हर मानव का अधिकार हीं नहीं कर्तव्य हैं. कर्तव्य से यहाँ मतलब हैं करुणा,उदारता और स्नेह का प्रदर्शन. जो कि मानव को जानवर से मानव बनाता हैं.

इसे ऐसे समझा जा सकता हैं कि जानवरों के समूह में यदि किसी जानवर को एक दिन भोजन ना मिले, तो उसके समूह के अन्य सदस्य उसके लिए कुछ प्रयत्न करे जरुरी नहीं, लेकिन यदि मानवों के समूह में किसी व्यक्ति को 2 जून की रोटी तक ना मिले, तो बचे हुए मानव समाज पर कर्तव्यों को पूरा करने की जिम्मेदारी आ जाती हैं. क्योंकि मानव ही हैं जो डार्विन के सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट के कंसेप्ट को नकार सकता हैं, मानव ही हैं जो ब्रह्मांड के प्रत्येक जीव की आवश्यकता को समझ सकता हैं, मानव ही हैं जो समाज की एक नई परिभाषा रच सकता हैं. क्योंकि भोजन उपलब्ध कराना ही नहीं रोजगार देकर आत्म-निर्भर बनाना भी इंसान ही कर सकता हैं. और 2 जून की रोटी के कारण उपजे विभेद को मिटा सकता हैं.

इतनी जिम्मेदारियों और सम्पन्नता के बीच किसी कमजोर, पिछड़े या भूखे की मदद करना, किसी भी व्यक्ति के लिए मुश्किल काम नहीं हो सकता. और बस यहीं से शुरू होती हैं विभिन्नता, जो ना केवल समाज और विचारों का वर्गीकरण करती हैं बल्कि ये मूलभूत आवश्यकताओं तक को एक मुहावरा घोषित करके छोड़ देती हैं.

2 जून की रोटी पर एक  कहानी :

गोपाल ने आज अपने स्कूल में नया पाठ पढ़ा था. और वो इसी ख़ुशी में इठलाकर चल रहा था कि वो जाकर अपनी माँ को ये पाठ सुनाएगा. किसी के उतरे हुए और जगह-जगह से फटे हुए कपडे पर कुछ टुकड़े लगाकर सिले गए हल्के रंग के स्कूल के कपड़ों में वो खुद को कहीं का राजा समझता था. उसके दोस्त उसे उतरन का पहनावा कहकर चिढाने की कोशिश भी करते, तो भी उसकी मुस्कान कभी कम नहीं होती, क्योंकि उसे लगता था कि दुनिया में बस 2 ही लोग हैं जो सच कहते हैं उसकी माँ और उसकी मैडम. मैडम शब्द भले उसे पुकारना ना आता हो लेकिन माँ ने समझाया था कि उनकी कही हर बात उतनी ही सच्ची हैं, जितनी कि भगवान की उनके घर में उपस्थिति. गोपाल का बाल-मन कभी नहीं मान पाया था कि भगवान नाम कुछ होता हैं. माटी से बने एक लिंग को जिसे माँ भगवान कहती हैं, वो यदि सच हैं तो उसे क्यों नहीं दिखते, वो यदि हैं उसमे हैं तो वहां कौन है. ऐसे कई  भारी –भारी सवाल थे, जिनके जवाब गोपाल की माँ को भी नहीं पता थे. लेकिन अब बाल-मन माने भी तो कैसे  कि  माँ  को कुछ पता नहीं हो सकता.

जितनी  गोपाल के लिए अक्षरों की दुनिया नई थी, उतनी ही उसकी माँ के लिए भी. ऐसे में जब वो कोई सवाल का जवाब नहीं दे पाती, तो गोपाल से कहती कि जब वो बड़ा हो जाए तो खुद ही जवाब खोज लेना. इन सब विचारों के साथ चलते-चलते गोपाल को याद आया कि श्याम की माँ ने उसे स्कूल छोड़ने को कहा हैं, क्योंकि अब वो स्कूल की फीस नहीं भर सकती. गोपाल ने अपना रास्ता श्याम के घर की तरफ मोड़ लिया,और उसके घर जाके स्थिति को समझने का निर्णय लिया.

गोपाल जब श्याम के घर पहुंचा तो वहां अजीब स्थिति हो रखी थी, श्याम की माँ रो रही थी, तो उसके बापू उदास से बैठे थे. गोपाल ने श्याम से कारण पूछा तो उसने बताया कि अब से उन्हें शायद 2 जून की रोटी भी मिल नहीं सकेगी. गोपाल ने जब श्याम से इसका मतलब पूछा तो श्याम के पास इसका कोई जवाब नहीं था, अपने दोस्त को उदास देखकर गोपाल ने कहा कि रोटी ना सही वो भात खा सकता हैं. रोटी कौन सेहत के लिए बड़ी अच्छी होती हैं. एक तो मोटी उस पर से  चबानी भी पड़ती हैं, कभी जल भी गई तो और समस्या. फिर साथ में दाल और सब्जी भी मांगती हैं. अपनी भात का क्या हैं, ना अच्छी सब्जी की जरुरत ना अलग से कोई दाल चाहिए, दांतों को तो कोई कष्ट होगा ही नहीं, बस गप्प से मुंह में गयी और कहाँ घुल गयी पता भी नहीं चलता. श्याम को गोपाल के तर्क में दम लगा,उसने भी अपनी समझदारी दिखाते हुए कहा कि हाँ! भात तो माँ अपने हाथ से भी खिला सकती हैं, वर्ना हम ज्यादा गिरा देते हैं ना. उसने गोपाल को सम्मान की दृष्टि से देखा,जैसे गोपाल ने कोई गूढ़ रहस्य सुलझा दिया हो. गोपाल अपनी बुद्धिमत्ता से बहुत खुश हुआ, लेकिन रोटी के साथ जुड़े 2 जून के शब्द को वो भी समझ नहीं पाया था, और अब इसे पता लगाना ही उसका अगला उद्देश्य था. अब गोपाल कुछ क्षणों में अपने सवालों की टोकरी लेकर माँ के सामने था, उसने पूछा- माँ, रोटी किससे बनती हैं?? माँ ने कहा-आटे से. अभी गोपाल को समझ आया उसने मन में सोचा कि “तो जून कोई आटे का नाम है?? हाँ! यही होगा वो भी तो 2 किलो आटा लाकर देता हैं माँ को, परचून की दूकान से और ध्यान से दूकानदार को डायरी में 2 किलो ही लिखवाकर भी आता हैं, दिनांक के साथ. कितना जिम्मेदार हैं गोपाल” गोपाल एक बार फिर से अपनी बुद्धि पर गौरवान्वित हुआ. अभी उसे जाकर श्याम को बताना चाहिए कि वो जून की जगह किलो की रोटी भी खा सकता हैं.

अगली सुबह जब गोपाल स्कूल पहुंचा, तो हर किसी ने उससे श्याम के बारे में पूछा. उसने सबको बताया कि श्याम को अब 2 जून  की रोटी नहीं मिलेगी तो उसकी माँ फीस नहीं भरेगी, इसलिए वो स्कूल नहीं आएगा. उसने कक्षा में भी इस जिम्मेदारी को बखूबी से निभाया. उसकी मैडम को जब ये बात पता चली, तो उन्होंने गोपाल को पास बुलाकर श्याम की स्थिति सही से जानने की कोशिश की. अभी गोपाल का उत्साह का चरम पर था, उसने ना केवल पूरी बात बताई बल्कि उसने अपनी समझदारी भी मैडम को बताई, की कैसे उसने श्याम की समस्या को हल कर दिया.

मैडम स्तब्ध थी बाल-मन की दी हुई इस नई परिभाषा से. वो कहना चाहती थी कि 2 जून की रोटी का मतलब हैं वो आवश्यक भोजन जो तुम्हे सुबह-शाम मिलता हैं. जिसके लिए किसान महीनों खेत में हल चलाता हैं,जिसके लिए मजदूर भरी दुपहरी में अपना पसीना बहाता हैं. जिसके लिए गोपाल की माँ घर-घर जाकर काम करती हैं. ऐसा जाने कितना कुछ था मैडम के मन जो वो गोपाल को समझाना चाहती थी, लेकिन आँखों में अटके आंसू गले से निकलने वाली आवाज़ को रोक रहे थे. उसने गोपाल को अगले दिन श्याम को स्कूल लाने और फीस की चिंता ना करने का निर्देश दिया, और मिड-डे-मिल के प्रबन्धन में दिल से लग गई. अब वहां स्कूल के उस माहौल में एक दृढ-निश्चय था परिवर्तन का, एक उम्मीद थी नई संभावनाओं की, जगी हुई मानवीय सम्वेदनाए थी, करुणा थी-जो अपना मार्ग खोज रही थी, समझ थी जरूरत की, और साथ में था गोपाल का मासूम सा सवाल- मैडम मैंने श्याम को सही सुझाव दिया ना?? उसे 2 जून की रोटी की खाने की जगह भात खाने की सही सलाह दी ना?? गोपाल मैडम की नजरों में भी पक्का करना चाहता था वो सम्मान जो उसे श्याम ने दिया था, लेकिन मैडम ये नहीं समझ पा रही थी कि उसे कैसे समझाए कि 2 जून की रोटी का सम्बन्ध सिर्फ खाने से नहीं कमाने से भी हैं……


1 thought on “दो जून की रोटी : मुहावरे का इतिहास

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