August 4, 2021

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धारा के खिलाफ चलने का नाम है लोकतंत्र

धारा के खिलाफ चलने का नाम है लोकतंत्र

क्या लोकतंत्र को सिर्फ एक ऐसे सीमित शासन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो बहुमत द्वारा और बहुमत के लिए हो?

 

 

क्या लोकतंत्र को सिर्फ एक ऐसे सीमित शासन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो बहुमत द्वारा और बहुमत के लिए हो? क्या राजनीति किसी ऐसे समाज में लोकतांत्रिक हो सकती है जो यथास्थिति को पसंद करता है और आगे की बजाय पीछे देखना चाहता है?

अगर हम लोकतंत्र को समझना चाहते हैं तो कम से कम तीन ऐसे सवाल हैं जिन्हें हमें समझने की जरूरत है। क्या लोकतंत्र का अर्थ हर 5 या 6 साल पर लोगों की राय जानने की व्यवस्था है कि कौन उन पर शासन करेगा? क्या लोकतंत्र को बहुमत की इच्छा की अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए? क्या लोकतंत्र राजशाही और तानाशाही जैसी शासन व्यवस्था है?

सभी सवालों का जवाब हां में है। लेकिन कोई भी हां मुकम्मल जवाब नहीं है। लोकतंत्र सिर्फ एक ऐसी व्यवस्था नहीं है जो लोगों को समय-समय पर यह चुनने का मौका देती है कि कौन उनका प्रतिनिधित्व करेगा और कौन उन पर शासन करेगा। किसी देश या समाज के लोकतांत्रिक होने की शर्त बस इतनी ही होती तो नाजियों का जर्मनी भी एक लोकतांत्रिक देश कहलाने के लायक हो जाएगा, जैसे कि कई दूसरे कठपुतली या सैन्यवादी शासन वाले देश नियमित चुनावों का मुखौटा लगाकर खुद को लोकतांत्रिक कहते हैं।

क्या बहुमत का शासन लोकतंत्र को परिभाषित करता है? बहुमत का शासन केवल आंशिक परिभाषा है, क्योंकि हिटलर और उनके राष्ट्रीय डेमोक्रेटिक पार्टी थर्ड राइच को लंबे समय तक बहुमत का समर्थन मिलता रहा था। लेकिन हिटलर के अनुयायियों और नव नाजियों को छोड़कर कोई भी उस शासन को लोकतांत्रिक नहीं कहेगा। बहुमत के शासन के साथ एक और समस्या है। बहुमत हमेशा सही नहीं होता, वास्तव में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहां बहुमत का शासन गलत साबित हुआ है।

जनमत संग्रह?

अगर कोई व्यक्ति गुप्त मतदान के जरिए नीचे दिए गए तीन सवालों पर जनमत संग्रह करे तो उसके नतीजे देखकर कोई भी हैरान हो जाएगा।

-क्या युवाओं को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार होना चाहिए, भले ही उनके माता-पिता उसके खिलाफ हों?

-क्या स्त्री और पुरूष की कुंडली और जाति को मिलाए बिना विवाह होना चाहिए?

-क्या वैसी शादियों को अवैध घोषित कर दिया जाना चाहिए, जिनमें दहेज की मांग की गई है या उसकी पेशकश की गई है?

हम सभी जानते हैं कि सामंतवादी, रुढ़िवादी, प्रतिगामी, तर्कहीन और स्पष्ट रूप से अवैधानिक विचारों के प्रभाव की वजह से हमारी बहुसंख्यक आबादी का जवाब ‘नहीं’ होगा। इनमें तथाकथित शिक्षित लोग भी शामिल होंगे।

और अगर बहुमत के आधार पर विवाह की वैधता का कानून तैयार किया जाना हो तो ये किस प्रकार का कानून होगा? जाहिर तौर पर, बहुत ही अलोकतांत्रिक, नारी विरोधी, घोर जातिवादी और पितृसत्तात्मक कानून होगा। युवाओं को जीवन में अपनी पसंद चुनने के अधिकार के विचार को अस्वीकार करना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है। और फिर भी अगर कानून इस आधार पर तैयार किया जाना है कि बहुमत जो भी सोचता है वह सही है तो हम वैवाहिक गठजोड़ से संबंधित कानून बनाने लगेंगे। यह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक होगा और ऐसे कठोर कानूनों को व्यापक समर्थन मिलेगा।

इसके सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं कि बहुमत किस प्रकार से अलोकतांत्रिक और सामाज विरोधी कानूनों और प्रथाओं को मजबूत करने के लिए संरक्षण देता है।

दो उदाहरण इस तथ्य को समझने के लिए पर्याप्त होंगे। एक मुद्दा जिस पर न्यायविदों के बीच सर्वसम्मति है कि दोषी साबित होने तक एक आरोपी निर्दोष होता है। इस सिद्धांत के जरिए कानूनी बचाव का अधिकार हर अभियुक्त को संवैधानिक रूप से हासिल है। इसके तहत अपने लिए एक वकील रखने और ऐसा करने में असमर्थ होने पर अदालत की ओर से नियुक्त वकील के माध्यम से बचाव का अधिकार मिलता है।

मुंबई आतंकवादी हमले के अभियुक्त कसाब का बचाव अब्बास काजमी और केपी पवार नाम के दो वकीलों ने किया था। दोनों को कसाब के बचाव के लिए अदालत ने नियुक्त किया था। क्योंकि कसाब अपने लिए वकील रखने में असमर्थ था और पाकिस्तानी वकीलों द्वारा बचाव की उसकी याचिका पर पाकिस्तान की सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया था।

एक आतंकवादी का बचाव करने की वजह से काजमी और पवार दोनों को बदनाम किया गया और बहिष्कृत कर दिया गया। दोनों को अपने वकालत के पेशे में भी नुकसान उठाना पड़ा। इनसे पहले इस मामले में अदालत से नियुक्त वकील अंजली वाघमारे को खुद ही हटना पड़ा था क्योंकि वह हमले में बचे एक पीड़ित की भी वकील थीं। लेकिन उनके फैसले से पहले शिव सेना ने कसाब के बचाव के अधिकार का विरोध करना शुरू कर दिया और मांग की कि कोई वकील किसी आतंकवादी का बचाव नहीं करे। हालांकि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि शिवसेना ने मुंबई दंगे के अभियुक्तों के मामले में ऐसी कोई मांग नहीं उठाई थी। इस मामले की सुनवाई शुरू होने से पहले ही एक सुनियोजित मीडिया ट्रायल शुरू हुआ और हर कोई कसाब के खून का प्यासा हो गया।

दूसरा उदाहरण, 2012 के दिल्ली बलात्कार केस का है। एक बड़ा वर्ग अभियुक्त के भयावह कृत्यों के कारण उसे पीट-पीट कर मार डालने की मांग कर रहा था। हजारों लोग बलात्कारियों के लिए सार्वजनिक फांसी, पीट-पीटकर मार डालने या उनके यौनांगों को काटे जाने की सजा जल्द से जल्द चाहते थे।

बड़े पैमाने पर जनभावनाओं और बड़ी संख्या में ऐसी कार्रवाई के लिए प्रदर्शनों के बावजूद भीड़ द्वारा की जा रही इस तरह की मांग को लोकतांत्रिक नहीं ठहराया जा सकता। अगर पूरा देश भी अभियुक्तों को कानूनी बचाव का अधिकार दिए बिना इस तरह की सजा का समर्थन करता है तो भी यह अलोकतांत्रिक ही होगा।

इन दो मामलों को इस तथ्य को रेखांकित करने के लिए सामने रखा गया है कि हत्यारी भीड़ को मनमानी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। जो समाज न्यायिक प्रक्रिया की इस प्रकार धज्जियां उड़ाने की कोशिश करता है उसे किसी भी तरह से एक लोकतांत्रिक समाज नहीं कहा जा सकता।

इसलिए, एक तरफ हमारे पास तथाकथित तथाकथित शिक्षित और समझदार लोगों की दकियानूसी भावनाओं का विस्तार है। इनमें से कई लोगों को न्यूज चैनल राष्ट्रीय अंतरात्मा के रखवालों के रूप में उभार रहे हैं। दूसरी ओर, भीड़ तंत्र के न्याय के खिलाफ अल्पसंख्यक समाज द्वारा दर्ज किया गया पुरजोर विरोध है। सत्ता में शामिल और उस पर नियंत्रण रखने वालों के भारी विरोध के बावजूद यह समाज हमेशा सबकी बेहतरी के लिए खड़ा होता है।

बहुमत हमेशा सही नहीं होता

1860 के दशक के मध्य में जब एक चितपावन ब्राह्मण, अनंत शास्त्री डोंगरे ने अपने बेटे श्रीनिवास को संस्कृत ग्रंथों की शिक्षा देनी शुरू की तो उसके साथ-साथ उन्होंने अपनी पत्नी लक्ष्मीबाई और बेटी रमाबाई को भी उन ग्रंथों की शिक्षा दी। उनके गांव के अन्य ब्राहम्णों के लिए उन्हें और उनके परिवार को डराने-धमकाने और प्रताड़ित करने के लिए यह वजह पर्याप्त थी। और आखिरकार उन्हें परिवार सहित गांव छोड़ जंगल में जाकर रहने पर मजबूर होना पड़ा।

कलकत्ता में संस्कृत भाषा और वैदिक ग्रंथों पर अपनी दक्षता का प्रदर्शन कर पंडिता और सरस्वती के खिताब से सम्मानित उनकी बेटी, रमाबाई ने जब बंगाल के एक कायस्थ वकील से शादी करने का फैसला किया तो उसे बहिष्कृत कर दिया गया। जब उन्होंने ब्राह्मण विधवाओं को शिक्षित करने और उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए एक आश्रम खोला तो उन्नीसवीं सदी के अंत में पुणे के एक सबसे बड़े राजनीतिक नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, उनका मजाक उड़ाया गया और उन पर हमला किया गया।

अपने समय की सड़ी-गली प्रथाओं के खिलाफ खड़े होने पर अगर विशिष्ट पृष्ठभूमि से जुड़े लोगों को तथाकथित प्रबुद्ध समुदाय के प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है तो कोई आसानी से पंडिता रमाबाई से लगभग 25 साल पहले जन्में ‘तथाकथित निम्न जाति’ के ज्योति राव फुले और सावित्री बाई फुले द्वारा किए गए संघर्षों की कल्पना कर सकता है। वह भी सिर्फ इसलिए कि वे अपने बच्चों के लिए शिक्षा, गांव के कुंए से पानी लेने का अधिकार चाहते थे और उन्होंने गांव के बाहर बसने का आदेश मानने से मना कर दिया था क्योंकि वहां ब्राह्मण नहीं चाहते थे कि उन पर उनकी छाया पड़े।

1830 के दशक में यह सब रोजामर्रा की घटना थी। एक दशक के भीतर ज्योति राव फुले के जन्म के 200 वर्ष पूरे हो जाएंगे। लेकिन महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और हाशिए पर मौजूद सभी लोगों पर रोजाना हो रहे अत्याचारों को ध्यान में रखें तो आज भी चीजें कुछ खास नहीं बदली हैं।

यह सब चुनावी लोकतंत्र की प्रणाली वाले उस समाज पर सवाल खड़े करता है जहां बहुसंख्यक आबादी अलगाववादी, विभेदकारी, भेदभावपूर्ण आस्थाओं, रीति-रिवाजों, प्रथाओं और अनुष्ठानों का अनुसरण करती है जो बुनियादी रूप से अलोकतांत्रिक हैं।

इस विरोधाभास को हमें हल करने की जरूरत है और इसे हमें जल्द से जल्द हल करना होगा। एक लोकतांत्रिक प्रणाली के जरिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करने की व्यवस्था ठीक है और हमने कई बार देखा है कि सरकारों को सत्ता से बेदखल करने के लिए लोगों ने किस तरह से इस शक्ति का इस्तेमाल किया है। लेकिन आज हम देखते हैं कि सबसे पिछड़ी और प्रतिक्रियावादी विचारधाराएं मजबूत समूहों को बढ़ावा देकर, संवैधानिक सत्ता केंद्रों से बाहर की ताकतों और प्रतिगामी विचारों का इस्तेमाल कर लोकतंत्र की बुनियाद को नष्ट कर रही हैं। वे ऐसा करने में सक्षम हैं क्योंकि वे लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार कर लोगों को कमजोर करने में सक्षम हो चुके हैं।

तानाशाही और राजशाही व्यवस्थाएं लोगों की चाहत की परवाह किए बिना शासन करती हैं, लेकिन समाज को व्यापक और दूरगामी तौर पर लोकतांत्रिक किए बिना लोकतंत्र को लोकतंत्र नहीं बनाया जा सकता। और अगर कोई समाज खुद को इस तरह संचालित करता रहता है जहां परिवार से लेकर सामाजिक, प्रशासनिक, न्यायिक और राजनीतिक संरचनाओं में लोकतांत्रिक विचारों और व्यवहारों के लिए जगह नहीं है तो चुनावी लोकतंत्र का मुखौटा बहुत लंबे समय तक नहीं टिक सकता। यह साबित करने के लिए कि कभी-कभी लोकतंत्र कितना बड़ा मजाक हो सकता है, हमारे पड़ोस में बहुत सारे उदाहरण मौजूद हैं।

अगर हम उनकी तरह नहीं बनना चाहते जिन्हें हम हमेशा धिक्कारना पसंद करते हैं तो हमें बैठकर गहन मंथन करने की जरूरत है।

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