September 19, 2021

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नई MSP घोषणा: गेहूं की बाल में गेहूं का दाना ही नहीं 

नई MSP घोषणा: गेहूं की बाल में गेहूं का दाना ही नहीं 
आशा किसान स्वराज के अध्यक्ष किरन विस्सा ने सरकार द्वारा जारी एमएसपी का हिसाब-किताब लगाकर बताया है कि पिछले साल के मुकाबले गेहूं की एमएसपी पर केवल 2% की वृद्धि की गई है। जो पिछले 12 सालों में सबसे कम है।

 1 एकड़ खेत में तकरीबन 10 से 12 क्विंटल गेहूं की पैदावार होती है। जमीन की जुताई, बुवाई, निराई, चिखुराई, सिंचाई से लेकर खाद, कीटनाशक और मजदूरों की मेहनत मिलाकर एक एकड़ गेहूं के खेत में 12 से 13 हजार रुपए का खर्च लग जाता है। बिहार में सरकारी मंडियों का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है। इसलिए किसी नजदीकी खरीददार को ही बेचना पड़ता है। वह मुश्किल से 1500 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से गेहूं खरीदता है। इस तरह से 1 एकड़ जमीन पर 12 हजार का खर्चा लगाने के बाद तकरीबन 15 हजार प्रति एकड़ मिलता है। कमाई के हिसाब से देखा जाए तो खेत में रबी के चार महीने के बाद प्रति एकड़ मुश्किल से 3 से 5 हजार की कमाई। नहीं तो घाटा ही घाटा।

गेहूं की पैदावार पर लगने वाली लागत और कमाई के इस उदाहरण को दिमाग के एक कोने में बिठाकर केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए उस पर्चे को पढ़ना चाहिए जिसमें रबी की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस की कीमत को घोषित किया गया है। अगर केवल गेहूं की ही बात करें। जिसकी पैदावार रबी की फसलों में सबसे अधिक होती है। तो न्यूनतम समर्थन मूल्य के तौर पर सरकार ने प्रति क्विंटल 2015 रुपए MSP तय की है।

यानी अगर बिहार का किसान तकरीबन 12 हजार का खर्चा लगा कर प्रति एकड़ जमीन पर 10 से 12 क्विंटल गेहूं की पैदावार करता है और उसकी गेहूं की सारी बोरियां सरकार खरीदती है तो उसे महज 20 हजार से लेकर 25 हजार मिलेंगे। कमाई के तौर पर देखा जाए तो रबी के 4 महीने की हाड़ तोड़ मेहनत के बाद 8 हजार से लेकर 13 हजार तक की कमाई।

लेकिन यहां सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसा तब होगा जब बिहार के किसान की सारी की सारी बोरियां सरकार द्वारा घोषित किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी जाएंगी। आंकड़ें कहते हैं कि बिहार के 94% किसानों की अनाज की बोरियां एमएससी पर नहीं बिकती हैं।

यह हिसाब किताब इस सवाल का जवाब है कि 2 एकड़ से कम की जमीन पर जीने वाले भारत के 80 फ़ीसदी किसान की जिंदगी बदहाली के दौर से गुजरने के लिए अभिशप्त है लेकिन फिर भी सरकार से लेकर मीडिया तक सब के सब किसानों के संघर्ष को खलनायक के तौर पर पेश करने में लगे रहते हैं।

जब भी एमएसपी की घोषणा की जाती है तो सरकार इसे ऐतिहासिक बता कर अपनी पीठ थपथपाती है। और मीडिया भी अपना हेडलाइन इसी आधार पर बनाता है। संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल तेलंगाना के एक संगठन आशा किसान स्वराज के अध्यक्ष किरन विस्सा ने सरकार द्वारा जारी एमएसपी का हिसाब किताब लगाकर बताया है कि पिछले साल के मुकाबले गेहूं की एमएसपी पर केवल 2% की वृद्धि की गई है। जो पिछले 12 सालों में सबसे कम है।

किरन विसा के मुताबिक अगर घोषित की गई एमएसपी की दरों को महंगाई के दरों से समायोजित कर वास्तविक कीमत निकालें तब तो किसानों को एमएससी के तौर कुछ भी मिलता हुआ नहीं दिखता है। साल 2021-22 में गेहूं की एमएसपी की कीमत सरकार ने 1975 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की थी। इस बार गेहूं की कीमत 2015 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की गई है। पिछले साल के मुकाबले 40 की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन अगर 6% की महंगाई दर के हिसाब किताब को जोड़कर देखें तो असली कीमत महज 1901 रुपए प्रति क्विंटल निकलती है। यानी किसानों को पिछले साल के मुकाबले इस साल प्रति क्विंटल गेहूं बेचने पर वास्तविक कीमत के आधार पर ₹74 कम मिलेगा।

महंगाई दर जोड़कर कीमतों का आकलन करना बहुत जरूरी है। क्योंकि ऐसा तो होता नहीं कि पिछले साल अगर ₹500 में गैस सिलेंडर मिल रहा था तो इस साल भी ₹500 में मिलेगा। इस साल इसकी कीमत 1000 प्रति सिलेंडर तक पहुंच चुकी है। इसलिए यह पता लगाने के लिए कि सरकार द्वारा एमएसपी के तौर पर दिए गए गेहूं के बाली में हकीकत में गेहूं का दाना है भी या नहीं यह जानने के लिए महंगाई दर के हिसाब से एमएससी का आकलन करना जरूरी है।

जौ के लिए पिछले साल की एमएसपी ₹1600 प्रति क्विंटल थी। सरकार ने इस बार इसे बढ़ाकर ₹1635 प्रति क्विंटल कर दिया है। महंगाई दर के हिसाब से जोड़ें तो यह महज ₹1542 प्रति क्विंटल बनती है। यानी एक क्विंटल जौ पर पिछले साल के मुकाबले इस साल किसानों को तकरीबन ₹58 कम मिलेंगे। यही हाल चने और सूरजमुखी के लिए निर्धारित की गई एमएसपी का है। सरकार ने प्रति क्विंटल चना के लिए 5100 रुपए और सूरजमुखी के लिए 5327 रुपए एमएसपी निर्धारित की है। जिसकी गणना अगर महंगाई दर जोड़कर की जाए तो पिछले साल से चने की कीमत प्रति क्विंटल ₹166 कम है और सूरजमुखी की कीमत प्रति क्विंटल  ₹194 कम है। रियल प्राइस यानी वास्तविक कीमतों के आधार पर केवल मसूर और सरसों की फसल की एमएसपी में बढ़ोतरी की गई है। मसूर पर प्रति क्विंटल ₹89 की बढ़ोतरी हुई है तो सरसों के लिए प्रति क्विंटल ₹114 की बढ़ोतरी हुई है।

कुल मिला जुला कर कहा जाए तो सरकार द्वारा रबी की छह फसल पर घोषित किए गए MSP में चार फसलों पर वास्तविक कीमत के आधार पर कमी की गई है और केवल दो फसलों पर वास्तविक कीमत के आधार पर बढ़ोतरी की गई है। गेहूं जो रबी के सीजन में बोई जाने वाली सबसे बड़ी फसल है उस पर भी पिछले साल के मुकाबले ₹58 रुपए प्रति क्विंटल की दर से कमी की गई है।

यह हाल तब है जब किसान सड़कों पर मौजूद हैं। सरकार की लाठियां खा रहे हैं। रात दिन सुबह शाम गर्मी बरसात सब कुछ झेलते हुए अपना हक मांग रहे हैं। लेकिन फिर भी सरकार ने उन्हें कुछ भी नहीं दिया। किसान अपने हक का न्यूनतम मेहनताना मांगते हैं। लेकिन हकीकत की दुनिया में छोड़ दीजिए सरकारी कागजों में भी उन्हें जायज कीमत नहीं मिलती। मौजूदा समय में असली सवाल यही है कि अर्थव्यवस्था के जिस सेक्टर में देश की आबादी के कुल कार्यबल का 40 फ़ीसदी हिस्सा लगा हुआ है, उसकी आमदनी इतनी कम क्यों? अगर 40 फ़ीसदी लोगों को ढंग का मेहनताना नहीं मिल पा रहा है तो सरकार होने का मतलब क्या रह जाता है?

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