June 24, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

नेत्रहीनता की वजह से रेलवे ने नहीं दी नौकरी तो दूसरे प्रयास में IAS टॉपर बनकर दिया करारा जवाब

~कोई भी लक्ष्य मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, हारा वही है जिसमें लड़ने का साहस नहीं~

वह देख नहीं सकती तो क्या हुआ उसकी आंखों की अक्षमता में इतनी हिम्मत नहीं कि उसे सपने देखने से रोक सकें। वो सपने देखती है और अपने सपनों को हकीकत में बदलने का इरादा रखती है। उसने सिर्फ अपनी जिंदगी में ही नहीं बल्कि उन लोगों के जीवन में भी उम्मीद का उजाला लाया है जो आंखें होते हुए भी निराशा के अंधकार में डूब रहे हैं।हिम्मत, हौसले और पहाड़ जैसे अडिग इरादों का जीता जागता उदाहरण है महाराष्ट्र के उल्हासनगर की रहने वाली प्रांजल पाटिल।

अपने आँखो की अक्षमता से जीवन में छाए अंधेरे को प्रांजल ने रास्ते की अड़चन नहीं बनने दिया और पहले ही प्रयास में देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली यूपीएससी की सिविस सेवा परीक्षा में राष्ट्रीय स्तर पर 773वां रैंक हासिल कर आईएएस अधिकारी बनने की ओर कदम बढ़ा दिया। प्रांजल की सफलता इसलिए भी बड़ी है कि यूपीएससी परीक्षा पास करने के लिए उसने किसी कोचिंग की मदद नहीं ली।

 

प्रांजल कहती हैं कि “पढ़ाई को वे एंज्वॉय करती हैं। जापान के बौद्ध फिलॉस्फर डाईसाकू इगेडा के लेखन को पढ़कर मेरी हर दिन की शुरुआत होती है। इससे मुझे यह प्रेरणा मिलती है कि जिंदगी में कुछ भी असंभव नहीं है।”

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परीक्षा में पास होने के बाद भी सफलता का सफर काँटों भरा था। यूपीएससी में सफल होने के बाद प्रांजल को भारतीय रेलवे में आई.आर.एस के पद पर कार्य करने का अवसर दिया गया। प्रांजल ने उत्साह के साथ अपनी ट्रेनिंग में भाग लिया लेकिन जब रेलवे की तरफ से चयनित विद्यार्थियों को स्थान देने की घोषणा होने लगी तब प्रांजल भी अपनी मेहनत से मिले पद को प्राप्त करके समाज को नई दिशा देना चाहती थी, लेकिन बहुत समय बीत जाने पर भी जब प्रांजल को पद और स्थान आवंटित नहीं हुआ तो प्रांजल ने अपने उच्च अधिकारियों से इसका कारण जानना चाहा। तब प्रांजल को जो कारण बताया गया उसे यदि इतने बड़े डिपार्टमेंट की अतार्किक सोच कहा जाए तो बड़ी बात नहीं होगी।

 

रेलवे का जवाब था कि प्रांजल सौ फीसदी दृष्टि बाधित है, अतः वह आई.आर.एस पद के लिए अयोग्य है। अब रेलवे को कौन बताए कि प्रांजल में दृष्टिबाधित होने पर भी कुछ तो प्रतिभा रही होगी तभी तो वह यूपीएससी की परीक्षा को प्रथम प्रयास में पास कर ली। रेलवे विभाग के बताये कारण से प्रांजल असंतुष्ट जरूर थी लेकिन उसने हार नहीं मानी क्योंकि वो हारना जानती ही नहीं थी। जीवन ने उसके आगे समय-समय पर मुसीबतों के पहाड़ खड़े किये है लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसे हारना ही होता तो तब ही हार मान लेती जब वो 6 साल की थी और एक दिन स्कूल में बच्चे के हाथ से उसकी एक आंख में पेंसिल चुभ गई। उस हादसे ने प्रांजल की एक आंख छीन ली, अभी वो तकलीफ़ कम भी नहीं हुई थी कि साल भर बाद साइड इफेक्ट ने दूसरी आंख की भी रौशनी खत्म ही गई।

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7 साल की उस छोटी सी बच्ची के पास मायूसी और निराशा भरा जीवन जीने की लाखों वजह थी। वो छोटी जरूर थी पर कमजोर नहीं थी। उसकी हिम्मत देखिए कि जिंदगी भर की अक्षमता को दरकिनार करते हुए वो आगे बढ़ती गयी। प्रांजल के पिता ने उन्हें मुबंई के दादर स्थित श्रीमति कमला मेहता स्कूल में दाखिल कराया। यह स्कूल प्रांजल जैसे खास बच्चों के लिए था, जहाँ ब्रेल लिपि के माध्यम से पढ़ाई होती थी। प्रांजल ने वहाँ से 10वीं तक की पढ़ाई पूरी की और फिर चंदाबाई कॉलेज से आर्ट्स में 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की जिसमें प्रांजल ने 85 फीसदी अंक प्राप्त किये। उसके बाद उत्साह के साथ बीए की पढ़ाई के लिए उन्होंने मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज का रुख किया।

प्रांजल कहती है कि “रोजाना उल्हासनगर से सीएसटी तक का सफर करती थीं। हर बार कुछ लोग मेरी मदद करते थे। वे सड़क पार कराते थे, तो कभी ट्रेन में बिठा देते थे। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो कई तरह के सवाल करते थे। वे कहते थे कि रोज इतनी दूर पढ़ने के लिए क्यों आती हो? उल्हासनगर में ही क्यों नहीं पढ़ती हो? लेकिन मैं उन लोगों से कह देती कि मैं पढूंगी तो इसी कॉलेज में और इसके लिए मैं हर मुश्किल के लिए कमर कस चुकी हूँ।”

 

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ग्रेजुएशन के दौरान प्रांजल और उनके एक दोस्त ने पहली बार UPSC सिविस सर्विस के बारे में एक लेख पढ़ा। बस फिर क्या था प्रांजल ने यूपीएससी की परीक्षा से संबंधित जानकारियां जुटानी शुरू कर दी। उस वक्त प्रांजल ने किसी से यह बात जाहिर नहीं की, लेकिन मन ही मन आई.ए.एस बनने का प्रबल इरादा कर लिया। बीए करने के बाद वह दिल्ली पहुंची और जेएनयू से एम.ए किया। इस दौरान ही प्रांजल ने आंखों से अक्षम लोगों की पढ़ाई के लिए बने एक खास सॉफ्टवेयर जॉब ऐक्सेस विद स्पीच की मदद लेना शुरू किया और अब प्रांजल को एक ऐसे लिखने वाले की जरूरत थी जो उसकी रफ्तार के साथ लिख सके। और इस विकल्प की खोज समाप्त हुई विदुषी पर जाकर। प्रांजल विदुषी के बारे में बात करते हुए कहती है “परीक्षा के दौरान विदुषी ने मेरा बखूबी साथ दिया। मैं उत्तर बोलती थी और विदुषी कागज पर तुरंत उत्तर लिख देती थी। और जब कभी मैं थोड़ा स्लो होती थीं तो विदुषी मुझे डांट भी दिया करती थी।

जिस तरह मौसम बदलने का एक वक़्त होता है
इसी तरह वक़्त बदलने का भी एक मौसम होता है
हालात बदलते तो ही रहते हैं ,
हालात के साथ हालत भी बदल जाते है

उसने साल 2015 में तैयारी शुरू की। साथ–साथ एम.फिल भी चल रही थी। इसी दौरान उसकी शादी ओझारखेड़ा में रहने वाले पेशे से एक केबल ऑपरेटर कोमल सिंह पाटिल से हुई। लेकिन प्रांजल की शर्त थी कि वो शादी के बाद भी अपनी पढ़ाई लगातार जारी रखेंगी और इस शर्त को उनके पति ने केवल स्वीकार ही नहीं किया अपितु प्रांजल की पढ़ाई में हर प्रकार से सहयोग भी किया। माता-पिता, पति और दोस्तों के सहयोग से प्रांजल यूपीएससी की परीक्षा को प्रथम प्रयास में ही उत्तीर्ण कर ली।
प्रांजल कहती हैं कि “सफलता आपको प्रेरणा नहीं देती है बल्कि सफलता के लिए किए गए संघर्ष से आपको प्रेरणा मिलती है। लेकिन सफलता जरूरी है क्योंकि तभी दुनिया आपके संघर्ष को तरजीह देती है। आपका नजरिया और ललक आपको आगे ले जाती है और हर किसी में यह क्षमता होती है कि वो एक सुंदर समाज का निर्माण कर सके।“

 

प्रांजल के फौलादी इरादों से प्रभावित होकर समर कुमार दत्ता नाम के शख्स ने उन्हें अपनी एक आंख देने का भी फैसला किया लेकिन प्रांजल की आंखें इस लायक नहीं हैं कि ट्रांसप्लांट के जरिए उन्हें फिर से रौशनी मिल सके। फिर भी 66 वर्षीय समर के इस त्याग भाव ने प्रांजल की आंखों को नम जरूर कर दिया। प्रांजल ने फिर से अपनी मेहनत और हिम्मत से दोबारा यूपीएससी की परीक्षा दी और दूसरे प्रयास में पहले से भी अच्छे अंक प्राप्त कर दिव्यांगता को कमी बताकर ठुकराने वालों को यूपीएससी परीक्षा में 124 रैंक हासिल कर करारा जवाब दिया है। साथ ही प्रांजल ने दिव्यांग वर्ग में भी टॉप किया है।

 

 

अपनी मां को अपनी प्रेरणा मानने वाली प्रांजल आत्मविश्वास के साथ यह कहती है कि “यूपीएससी परीक्षा 2015 में 773 रैंक लाने के बाद भी रेलवे मंत्रालय ने मुझे नौकरी देने से इनकार कर दिया। क्योंकि उन्होंने मेरी आंखों की सौ फीसदी नेत्रहीनता को कमी का आधार बनाया था। मैं उन लोगों को यह दिखाना चाहती थी कि मैं दिव्यांग नहीं थी बल्कि उनकी सोच दिव्यांग थी। उन्होंने केवल मेरी अक्षमता को देखा, मेरे जज्बे को नहीं समझा। बेशक मैं आंखों की रोशनी नहीं होने के कारण इस दुनिया के रंगों को देख नहीं सकती लेकिन अनुभव कर सकती हूँ।

वाकई में मुश्किल हालातों से निकल कर अपने आई.ए.एस बनने के सपने को साकार करने वाली प्रांजल पाटिल के हौसले को सलाम है। एक ऐसा हौसला जो ना जाने कितने लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बनकर सफलता की कहानी लिखेगा।

इतिहास का अध्ययन महज अतीत का अध्ययन ही नहीं है बल्कि वर्तमान का अतीत से संवाद स्थापित करने का प्रयास है।

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