April 21, 2021

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फेसबुक ने ऑस्ट्रेलिया में भले अपनी दुकान बंद कर ली मगर दुनिया के सामने बहुत गहरे सवाल खोल दिए!

फेसबुक ने ऑस्ट्रेलिया में भले अपनी दुकान बंद कर ली मगर दुनिया के सामने बहुत गहरे सवाल खोल दिए!
टेक्नोलॉजी की दुनिया में बढ़ता एकाधिकार दुनिया के सामने बहुत बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। अब देखने वाली बात यही होगी कि दुनिया इन चुनौतियों का सामना कैसे करती है?

फेसबुक एक तरह का डिजिटल प्लेटफॉर्म है, यह बात आपने हमेशा सुनी होगी। लेकिन कभी आपने सोचा है कि इसे प्लेटफार्म क्यों कहा जाता है? अगर नहीं सोचा है तो अब सोच लीजिए। इसे प्लेटफार्म इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका चरित्र ठीक रेलगाड़ियों के प्लेटफार्म की तरह है। जहां पर रेलगाड़ियां आकर रुकती है, जहां से रेलगाड़ियां प्रस्थान करती हैं। लेकिन उस व्यवस्था को क्या कहेंगे जहां रेलगाड़ियों की आवाजाही से होने वाली सारी कमाई केवल प्लेटफार्म के खाते में चली जाए?

फेसबुक एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के तौर पर यही काम कर रहा है। बहुत सारी व्यवस्थाएं कर न्यूज़ कंपनियां न्यूज़ इकट्ठा करती हैं। अपने पत्रकारों को पैसा देती हैं। वह गली-गली घूमते हैं। आज के दौर में सरकार की प्रताड़ना भी सहते हैं। जान जोखिम में डालकर न्यूज़ इकट्ठा करते हैं। यह न्यूज़ फेसबुक प्लेटफार्म के जरिए लोगों के बीच फैलती है। लेकिन इससे होने वाली सारी कमाई फेसबुक के खाते में चली जाती है।

इस अन्याय पूर्ण व्यवस्था को सुधारने के लिए ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने अपनी संसद के निचले सदन में बिल प्रस्तावित किया। बिल यह है कि फेसबुक और गूगल जैसी बड़ी टेक्नोलॉजी के प्लेटफार्म को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा न्यूज़ संगठनों के साथ भी शेयर करना होगा, जिनके कंटेंट को पढ़ने के लिए लोग फेसबुक जैसे प्लेटफार्म पर आते हैं।

फेसबुक को यह बात नागवार गुजरी। फेसबुक ने ऑस्ट्रेलिया में न्यूज सर्विस और इमरजेंसी पोस्ट बंद कर दी हैं। यानी अब वहां के लोगों को फेसबुक के प्लेटफार्म पर न्यूज़ पोस्ट नहीं दिखेगी। और न ही न्यूज़ वेबसाइट फेसबुक पर न्यूज कंटेंट पोस्ट कर सकेंगी।

फेसबुक चूंकि पूरी दुनिया में फैला हुआ डिजिटल प्लेटफार्म है, इसलिए यह एक ऐसी ख़बर है जिसका जुड़ाव पूरी दुनिया से है। इंडियन इस्टिट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के प्रोफेसर आनंद प्रधान कहते हैं कि फेसबुक न्यूज़ कंपनियों के साथ भी अपनी कमाई का बंटवारा करें, इसकी चर्चा बहुत लंबे समय से चलती आ रही है।

यूरोप और फ्रांस में इसके लिए कानून भी बने हैं। फ्रांस में गूगल और न्यूज़ कंपनियों के साथ कुछ पार्टनरशिप भी हुई है। मौजूदा समय में पत्रकारिता की असली दिक्कत पत्रकारिता के बिजनेस मॉडल में है। परंपरागत मीडिया संगठन विज्ञापनों के जरिए कमाई करते थे। लेकिन पत्रकारों, संपादको के जरिए न्यूज़ वेबसाइट पर मौजूद खबरें जब फेसबुक पर ट्रैफिक लाती हैं तो अधिकतर विज्ञापन फेसबुक के पास चले जाते हैं। कंटेंट के लिए मेहनत न्यूज़ वेबसाइट से जुड़े लोग करते हैं और कमाई डिजिटल प्लेटफॉर्म को होती है। इसकी वजह से छोटे और मझोले आकार के स्वतंत्र मीडिया संगठनों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। अगर सही तरह से कमाई में बंटवारे का मॉडल खड़ा नहीं हुआ तो स्वतंत्र तरीके से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाली छोटे और मझोले मीडिया घरानों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट के आंकड़े के मुताबिक मौजूदा समय में भारत के तकरीबन 35 साल से कम के 28% लोग न्यूज़ के लिए डिजिटल पोर्टल और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। महज 16 फ़ीसदी लोग प्रिंट के जरिए न्यूज़ तक अपनी पहुंच बनाते हैं। कहने का मतलब यह है कि मौजूदा समय में और आने वाले समय में न्यूज़ से जुड़ा कामकाज डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए ही बहुत बड़ी आबादी तक पहुंच रहा है और पहुंचेगा। शायद इसीलिए पिछले 1 साल में फेसबुक के रेवेन्यू में तकरीबन 22% का इजाफा हुआ है और मुनाफे में तकरीबन 57% का इजाफा हुआ है।

अब थोड़ा इसे गहरे नजरिए से सोचते हैं। सूचनाओं की पूरी दुनिया डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद है। डिजिटल प्लेटफार्म की पकड़ इंटरनेट की वजह से दुनिया में उन सभी लोगों तक है, जिनके हाथ में मोबाइल है। इनके पास पैसा इतना अधिक है कि ये डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ी कंपनियां सूचनाओं के लिहाज से चाहे कुछ भी कर सकती हैं। अपना खुद का मीडिया संस्थान खोल सकती हैं। चूंकि डिजिटल प्लेटफार्म की तकनीक की मिल्कियत उनकी है इसलिए वह चाहे तो किसी कंटेंट की रीच कम कर सकती हैं और चाहे तो किसी कंटेंट की रीच बढ़ा सकती हैं। चाहे तो किसी बिजनेस को आबाद कर सकती हैं और चाहे तो किसी बिजनेस को बर्बाद कर सकती हैं।

अब यह इस पर निर्भर करता है कि टेक्नोलॉजी कंपनियां किस माहौल में काम कर रही हैं। एक सिंपल उदाहरण से समझिए। आम शिकायत है कि भाजपा के नेता कपिल मिश्रा सोशल मीडिया की दुनिया में नफ़रत बेचने का कारोबार करते रहते हैं लेकिन आज तक उन्हें कभी ब्लॉक नहीं किया गया। लेकिन वहीं पर कई ऐसे सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ता हैं जो जायज सवाल उठाने की वजह से ब्लॉक कर दिए गए। इस उदाहरण के जरिए कई तरह के उदाहरण पर विचार किया जा सकता है कि सूचनाओं के लिहाज से डिजिटल की दुनिया किस तरह का कहर बरपा सकती है।

हमारे दौर की राजनीति को पैसा और टेक्नोलॉजी की शक्ति मिलकर बहुत ज्यादा प्रभावित कर रही हैं। कभी-कभार ध्यान से सोचने पर ऐसा भी लगता है कि जिसके पास पैसा और तकनीक की मिल्कियत है, वही संप्रभुता को नियंत्रित कर रहा है।

बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को रेगुलेट करने के लिए नियम कानून बनाना जरूरी है लेकिन यह ध्यान में रखना भी जरूरी है कि ऐसा नियम कानून ना बनाया जाए जिससे रेगुलेशन के नाम पर जीवंत लोकतंत्र का ही रेगुलेशन होने लगे। अभी यह घटना ऑस्ट्रेलिया में घटी तो भारत कि मौजूदा सरकार नैतिकता के कटघरे में खड़ी होकर दुहाई दे सकती है लेकिन जैसे ही कुछ घटनाएं भारत की मौजूदा सरकार के खिलाफ जाएंगी तो इस पूरे मुद्दे को देखने का नजरिया बदल जाएगा। वह सब कुछ नियंत्रण के नाम पर जायज दिखने लगेगा जो बिल्कुल नाजायज है। अभी जब फेसबुक पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है तब जब पत्रकारों और मीडिया हाउस को डराने धमकाने का खेल सरकार की तरफ से चलता है तो जरा सोचिए कि जब फेसबुक को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सरकार के पास होगी तब क्या हाल होगा?

इसका मतलब यह नहीं है कि बड़ी-बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को नियंत्रित और विनियमित करने के कानून न बने। लेकिन इसका मतलब यह जरूर है कि जब कानून बने तो उन कानूनों के मूल में स्वतंत्रता न्याय और सभी मीडिया हाउस को मिलने वाली समानता की भावना जरूर हो। ऐसा ना हो कि बड़ी-बड़ी टेक्नोलॉजी की कंपनियां बड़े बड़े कॉरपोरेट घराने और नेताओं के साथ सांठगांठ करने वाले पूंजीपति लोगों को फायदा पहुंचाने वाली प्लेटफार्म बनकर रह जाए।

टेक्नोलॉजी की दुनिया में बढ़ता एकाधिकार दुनिया के सामने बहुत बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। अब देखने वाली बात यही होगी कि दुनिया इन चुनौतियों का सामना कैसे करती है? कहीं ऐसा ना हो कि बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को नियंत्रित करने के नाम पर लोकतंत्र को और अधिक काबू में करने वाला सिस्टम बन जाए? कहीं ऐसा ना हो कि बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को पूरी तरह से छूट देकर लोकतंत्र की बर्बादी वाले रास्ते पर कोई रोक ना लगे?

कई तरह के अंतर्विरोध हैं। इन अंतर्विरोध हो का हल बहुत जरूरी है।

मौजूदा समय की जरूरत यह है कि ऐसी संस्थाएं रूल्स और रेगुलेशन बनाई जाएं जिनके भीतर ऐसे लोग काम करें जो इन चुनौतियों का इस तरीके से समाधान करें कि सबको सबका हक भी मिले और लोकतंत्र भी धूमधाम से फले-फूले।

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