July 7, 2022

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बजट 2019:गरीबों को UBI का तोहफा दे सकती है सरकार, जानें क्या है यह योजना

Universal Basic Income in Budget 2019 : चुनावी साल को देखते हुए सरकार गरीबों के लिए UBI लागू कर सकती है। इसके तहत गरीबों के बैंक खाते में सीधे पैसा ट्रांसफर किया जा सकता है।

 

मोदी सरकार आज अंतरिम बजट पेश करने जा रही है। हालांकि यह पूर्ण बजट नहीं फिर भी लोगों की नजरें इस बजट पर लगी हैं। सबसे ज्यादा चर्चा यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) पर हो रही है। आर्थिक क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि चुनावी साल को देखते हुए सरकार यूबीआई जैसी योजना की घोषणा कर सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि उनकी सरकार यदि सत्ता में चुनकर आती है तो वह गरीबों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी देगी। समझा जा रहा है कि राहुल की इस घोषणा के बाद सरकार पर इस तरह की योजना शुरू करने का दबाव है। आइए जानते हैं कि यूबीआई है क्या-

क्या है (UBI) यूनिवर्सल बेसिक इनकम
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने यूबीआई को परिभाषित करते हुए कहा है कि यूबीआई एक ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत एक समान राशि देश के सभी व्यक्तियों को हस्तांतरित की जाती है। यूबीआई सरकार की सब्सिडी, टैक्स रिफंड अथवा कल्याणकारी योजनाओं से अलग होती है। यूबीआई पाने वाला व्यक्ति इस राशि को जैसे चाहे खर्च कर सकता है। व्यक्ति को सरकार को यह बताना नहीं पड़ता कि इस राशि को उसने कैसे और कहां खर्च की। आसान शब्दों में कहें तो यूबीआई के तहत प्रत्येक महीने एक तय रकम प्रत्येक नागरिक (चाहे वह नौकरीपेशा हो अथवा बेरोजगार) को हस्तांतरित की जाती है।

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जकरबर्ग और एलन मस्क हैं UBI के प्रबल समर्थक
दुनिया भर में फैली आर्थिक असमानता की खाई पाटने के लिए कारोबारी, पेशेवर और अर्थशास्त्रियों ने यूबीआई की अवधारणा का समर्थन किया है। इन हस्तियों का मानना है कि यूबीआई के जरिए प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक रूप से एक सहारा दिया जा सकता है। टेस्ला के सीईओ एलन मस्क और फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग यूबीआई के प्रबल समर्थक हैं। मस्क और जकरबर्ग का मानना है कि आने वाले समय में रोबोट्स एवं ऑटोमेशन पर निर्भरता बढ़ने की वजह से बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो सकते हैं ऐसे में यूबीआई कुछ हद तक उन्हें आर्थिक सुरक्षा दे सकती है।

काफी पुरानी है UBI की अवधारणा
दुनिया भर में इन दिनों जिस यूबीआई की बात की जा रही है, उसकी अवधारणा काफी पुरानी है। दार्शनिक थॉमस पैने ने अपनी पुस्तक ‘अग्रेरियन जस्टिस’ में इसी तरह की भुगतान व्यवस्था के बारे में लिखा है। उन्होंने अपनी पुस्तक में ‘गरीब अथवा अमीर प्रत्येक व्यक्ति को भुगतान’ की व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव दिया था। इनके अलावा मार्टिन लूथर ने 1967 में गरीबी से लड़ने के एक उपाय के रूप में ‘आय की गारंटी’ होने की बात कही थी।

कहां लागू है UBI?
ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनामिक डेवलपमेंट के मुताबिक किसी भी देश ने कामकाजी उम्र वाली आबादी के लिए यूबीआई को आर्थिक मदद के एक सैद्धांतिक उपकरण के रूप में लागू नहीं किया है लेकिन कई ऐसे देश हैं जो अपनी आबादी के एक छोटे हिस्से के लिए यूबीआई की अवधारणा पर काम कर रहे हैं। यूबीआई की अवधारणा पर फिनलैंड ने 2017 में काम करना शुरू किया। फिनलैंड ने अपने करीब 2000 बेरोजगार युवकों को दो साल तक प्रत्येक महीने 560 यूरो देने की व्यवस्था लागू की। इसके अलावा नीदरलैंड, केन्या, कनाडा और अमेरिका में यूबीआई की तरह बेसिक इनकम दिया जाता है।

क्या भारत में लागू हो सकती है UBI
दुनिया भर में यूबीआई पर चर्चा शुरू होने के बाद भारत में भी इस तरह की योजना एवं व्यवस्था लागू करने की जरूरत महसूस की गई। समझा जा रहा है कि लोकसभा चुनावों से पहले भारत सरकार गरीबों के लिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) शूरू करने की दिशा में काम कर रही है। सरकार के आर्थिक सर्वे 2016-17 में पहली बार यूबीआई के बारे में उल्लेख किया गया। देश में गरीबी में कमी लाने के लिए सर्वे में इसे एक संभावित विकल्प के तौर पर देखा गया।

क्या कहता है कि 2016-17 का आर्थिक सर्वेक्षण
2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया कि प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम आय मिलनी चाहिए ताकि व्यक्ति अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति एवं एक सम्नानजनक जीवन का हकदार बन सके। इसे ध्यान में रखते हुए तेंदुलकर समिति की गरीबी रेखा के फॉर्मूले का इस्तेमाल करते हुए 2016-17 के लिए गरीबी रेखा तय की गई और सलाना 7620 रुपए कमाने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा के नीचे रखा गया।

सर्वे में कहा गया कि यूबीआई लागू करने पर जीडीपी का 4.9 प्रतिशत खर्च होगा जबकि केंद्र एवं उसके द्वारा समर्थित कुल 950 योजनाओं पर जीडीपी का 5.3 प्रतिशत खर्च होता है। यूबीआई लागू करने के लिए अन्य योजनाओं में कटौती एवं कुछ सब्सिडी बंद की जा सकती है।

इकोनॉमिक सर्वे का यह मॉडल 2011-12 के लिए गरीबी रेखा के निर्धारण पर तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट पर आधारित था जिसकी काफी आलोचना हुई। समिति ने गरीबी के नए मानक तय किए जिसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 27.2 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 33.3 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर रखा गया। समिति ने 22 फीसदी आबादी को गरीबी रेखा से नीचे रखा।

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