September 27, 2022

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बिहार में कहर बन रहा चमकी बुखार क्या है? क्या हैं इसके लक्षण, कारण, इलाज और बचाव?

बिहार में चमकी बुखार यानी एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रॉम के मरीज़ लगातार बढ़ रहे हैं और इस संक्रमण से पीड़ितों की मौतों का आंकड़ा भी. आखिर क्या है ये संक्रमण? क्या इस जानलेवा रोग का इलाज मुमकिन है?

 

बिहार में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रॉम (AES) का कहर जारी है. यहां पिछले 24 घंटों में 10 पीड़ित बच्चों की मौत हो चुकी है. इस बीमारी की चपेट में आकर अब तक कुल 48 बच्चे काल के गाल में समा चुके हैं. क्या है ये बीमारी? क्यों होती है और इससे बचाव कैसे संभव है? इन तमाम सवालों के जवाब आपको यहां मिलेंगे लेकिन इससे पहले ये जानिए कि बिहार में इस बीमारी से ग्रस्त करीब 60 बच्चे अस्पताल में भर्ती किए गए हैं, उनमें तेज़ बुखार और खतरनाक वायरल संक्रमण जैसे लक्षण दिखे हैं.

 

भारत में गंभीर समस्या बन चुके AES से ज़्यादातर बच्चे और नौजवान पीड़ित होते दिख रहे हैं. देश के नेशनल हेल्थ पोर्टल की मानें तो अप्रैल से जून के बीच मुज़फ्फरपुर के उन बच्चों में ये रोग ज़्यादा फैला, जो कुपोषण के शिकार रहे और लीची के बागों में लगातार जाते रहे. जानलेवा साबित होने वाले इस संक्रमण के 1978 में भारत में फैलने के बाद हाल में, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में भी इसके मरीज़ पाए गए.

 

 

इस जानलेवा संक्रमण से बिहार का उत्तरी इलाका और उत्तर प्रदेश का पूर्वी इलाका बुरी तरह चपेट में आ चुका है. बिहार में स्थानीय तौर पर इस संक्रमण को चमकी कहा जा रहा है. उप्र सरकार के आंकड़ों के हिसाब से 2017 में इस संक्रमण से 553 जानें गई थीं और 2018 में कम से कम 187 मौतें हुईं.

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क्या है AES यानी एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रॉम?
सीडीसी के मुताबिक AES एक ऐसी क्लीनिकल स्थिति है, जो ज़्यादातर जैपनीज़ इंसेफलाइटिस वायरस के संक्रमण के कारण होती है. इसके अलावा यह संक्रमण अन्य प्रकार के संक्रमणों या गैर संक्रामक कारणों से भी फैल सकता है.

 

 

AES के लक्षणों में प्रमुख रूप से तेज़ बुखार का बने रहना, तेज़ सिरदर्द और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं होना जिसमें मानसिक असंतुलन, कन्फ्यूज़न, अचेतना और कोमा तक शामिल हैं.

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किसे होता है इस संक्रमण का खतरा?
इस वायरस की चपेट में आने का खतरा उन लोगों को ज़्यादा होता है, जो संक्रमित ग्रामीण इलाकों में रहते हैं. 6 साल तक के बच्चों को इस संक्रमण से ग्रस्त होते ज़्यादा देखा जा रहा है. इसके साथ ही, वो लोग जिनका प्रतिरोधी तंत्र कमज़ोर होता है, जैसे अगर कोई एचआईवी या एड्स से ग्रस्त है या कोई प्रतिरोधी तंत्र को कमज़ोर करने वाली दवाएं लेता है, उन्हें भी इस संक्रमण का खतरा होता है.

 

ऐसे फैलता है AES
भारत में अब तक AES के संक्रमण के लिए माना जाता है कि यह विषाणुओं यानी वायरसों के कारण होता है लेकिन इसके फैलने के दूसरे ज़रिए भी होते हैं. पिछले कुछ दशकों में ऐसी खबरें रही हैं कि यह संक्रमण बैक्टीरिया, फंगस, परजीवी, स्पाइरोकीट, रसायनों आदि के कारण भी हुआ है. लेप्टोस्पिरोसिस और टोक्सोप्लाज़्मोसिस अगर गंभीर रूप धारण कर लें, तो इस कारण भी AES फैल सकता है.

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क्या इसका इलाज मुमकिन है?
AES से संक्रमित होने वाले मरीज़ों को तुरंत इलाज दिए जाने की ज़रूरत होती है. एंटीवायरल दवाएं, स्टैरॉइड इंजेक्शन जैसे तरीकों से इस बीमारी का इलाज किया जाता है. इसके अलावा सघन देखभाल के साथ ही, पूरा आराम, द्रव पदार्थों का सेवन और बुखार रोकने वाली दवाएं भी मरीज़ों को दी जाती हैं.

 

अब तक भी इस संक्रमण का पूरी तरह से इलाज नहीं है, लेकिन इस संक्रमण से बचाव के लिए सुरक्षित और असरदार टीके ज़रूर हैं. टीकाकरण के अलावा अगर आप कुछ सावधानियां बरतें तो इस बीमारी से बचा जा सकता है. साफ सफाई, धुले और शरीर ढंकने वाले कपड़े पहनना, शौच आदि के बाद हाथ ठीक ढंग से धोना, साफ हाथों से साफ-सुथरा भोजन करने जैसी सतर्कताएं अपनाकर इस विषाणुजनित संक्रमण को टाला जा सकता है.

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