December 1, 2020

Such Ke Sath

सच के साथ – समाचार

बेहद निराश और सताए हुए लोग, सुंदर भविष्य का निर्माण करने के लिए ध्यान रखें

सच के साथ |एक पत्थर था। किसी जमाने में सिर उठाए खड़ा था। समय के चक्र ने उसे धरती के नीचे दबा दिया। फिर उसकी किस्मत पलटी। खुदाई में वह बाहर निकला। भूगर्म शास्त्रियों के लिए उसका कोई महत्व न था। फैंक दिया गया लेकिन उसका भी एक भविष्य था। एक दिन एक मूर्तकार की नजर उस पर पड़ी। मूर्तकार ने उसे अपनी कार्यशाला में लाकर रखा। पत्थर काफी बड़ा था। 

समर में घाव खाता है उसी का मान होता है,
छिपा उस वेदना में अमर बलिदान होता है,
सृजन में चोट खाता है छेनी और हथौड़ी का,
वही पाषाण मंदिर में कहीं भगवान होता है | 

मूर्तकार ने उसे हिसाब से दो भागों में तोड़ दिया। अब दो पत्थर हो गए। उसने दोनों से दो अलग-अलग मूर्तियां बनाने की रूपरेखा अपने मन में तैयार की। निश्चित हो जाने के बाद उसने अपने हाथों में छेनी और हथौड़ा लेकर पत्थर को आकार प्रदान करने के लिए उस पर चोट करना प्रारंभ किया। पत्थर को दर्द महसूस होता। वह जोर से चिल्लाता। 

मूर्तकार उसकी चिल्लाहट से परेशान हो गया। उसने पत्थर को छेनी हथौड़ी की चोट से मुक्ति दे दी और एक कोने में रख दिया। फिर मूर्तकार ने दूसरे पत्थर को तराशना शुरू किया। चोट तो उसे भी लगी। उसे दर्द भी हुआ लेकिन दूसरे पत्थर ने सोचा, ‘‘समय कब एक समान रहता है। कितने दौर से गुजर चुका हूं। आज जीवन में पुन: एक नया दौर आया था। उसने मन को मजबूत किया। छेनी और हथौड़ी की चोट झेल-झेल कर एक दिन वह पत्थर से शंख चक्र-गदाधारी, आकर्षक और मनोहारी चतुरानन मूर्त में बदल गया।

अब उसकी सुंदरता की छटा देखते ही बनती थी। एक दिन एक सेठ, मूर्तकार की दुकान के सामने से गुजर रहे थे उनकी नजर सुंदर मनोहर मूर्त पर पड़ी। मोल पता किया और मूर्त को ले लिया। साथ ही उसने अनगढ़ पत्थर को भी ले लिया कि किसी और काम में यह प्रयोग हो जाएगा। 

सेठ ने एक भव्य मंदिर बनवाया। उसमें भगवान को स्थापित किया। फिर उनकी प्राण प्रतिष्ठा की। पूजा-अर्चना प्रारंभ हुई। भक्तगण आने लगे। मंदिर में सेठ ने भगवान के चरणों में दूसरे पत्थर को स्थापित कर दिया।

एक रात की बात है मूर्त को नींद नहीं आ रही थी। उधर चरणों में पड़ा दूसरा पत्थर भी जाग रहा था और वह कराह रहा था। उसने पत्थर को बताया कि जब पहली बार उसके शरीर पर मूर्तकार ने हथौड़ा चलाया था तो उसे भी बड़ा डर लगा था लेकिन उसने इसे अपनी नियति नहीं माना। उसे लगा था कि कौन जाने इसी चोट में सुंदर भविष्य का सूरज छिपा हो, जो एक दिन उसके जीवन में एक नया उजाला लेकर उगे और यही हुआ। यही होता भी है। तकलीफ में सुंदर भविष्य छिपा होता है।

जो पत्थर का पहला टुकड़ा, उसने उसके रोने-चिल्लाने पर फेंक दिया था, वह भी वहीं एक ओर पड़ा है और लोग उसके सिर पर नारियल फोड़कर मूर्ति पर चढ़ा रहे हैं।

शिल्पकार ने मन ही मन सोचा, जीवन में कुछ बन पाने के लिए शुरू में अपने जीवन के शिल्पकार (माता-पिता, शिक्षक, गुरु आदि) को पहचानकर, उनका सत्कार कर, कुछ कष्ट झेल लेने से व्यक्ति का जीवन बन जाता है और बाद में सारा विश्व उसका सत्कार करता है। उसको नमन करता है, लेकिन जो डर जाते हैं और बचकर भागना चाहते हैं, वे बाद में जीवनभर कष्ट झेलते हैं। उनका सत्कार, आदर कोई नहीं करता। सभी उसे अपमानित और तिरस्कृत करते हैं।

वैसे बड़े-बुजुर्गों ने ये बात बहुत उत्तम कही है कि यदि कोई खेत हल चलाने से दुखी हो तो वह कभी अनाज पैदा नहीं कर सकता। यदि कोई पत्थर छेनी-हथौड़ी की मार से रोये तो वह कभी मूरत नहीं बन सकता और यदि कोई बालक अपने माता, पिता और गुरुजनों की डांट- फटकार से दुखी हो, रोये या अपने आप काे अपमानित समझे तो वह कभी अच्छा इंसान नहीं बन सकता।

जीवन चक्र बड़ा विलक्षण है। कष्ट पाकर ही निखरता है। वसुदेव-देवकी ने कष्ट सहा तो परम्ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए। भीष्म पितामह ने शरशैया का कष्ट सहा तो अंतिम क्षण में श्रीकृष्ण ने उनको अपने धाम भेज दिया। ध्रुव और प्रह्लाद ने कष्ट सहा तो भगवान नारायण का कृपा प्रसाद प्राप्त किया। मीरा ने अपने ही स्वजन बन्धुओं द्वारा अनेकानेक वेदनाओं को सहा तो श्रीकृष्ण स्वरूप को ही प्राप्त हो गईं। कुन्ती ने जीवनभर असहनीय कष्टों, पीड़ाओं को सहन किया तो नन्द नन्दन का कृपा प्रसाद प्राप्त किया।

ब्रजगोपियों और ब्रजवासियों ने वियोग जनित दुख को सहा तो श्यामसुन्दर ने उनको कृत-कृत्य कर दिया। अतः जिन्दगी में कष्टों से मत घबराना। कष्टों से ही जीवन संवरता, निखरता और सुधरता है। कहा भी गया है, ‘कष्ट से सब कुछ मिले, बिन कष्ट कुछ मिलता नहीं। समुन्दर में कूदे बिना मोती मिलता नहीं।’

कहने का भाव यही है कि कष्ट इतना कष्टकारी नहीं होता, जितनी उसकी चिन्ता कष्टकारी होती है। इसलिए कुछ बनने के लिए कष्ट सहन करो। यही जीवन का परम सत्य है।

कोशिशों  के  बावजूद हो  जाती  है  कभी  हार …होके निराश  मत  बैठना मन  को  अपने  मार …बड़ते  रहना  आगे  सदा हो  जैसा  भी  मौसम …पा लेती है मंजिल  चींटी  भी गिर  गिर  के  हर  बार॥


ऐसा  नहीं  की  राह  में  रहमत  नहीं  रही पैरो  को  तेरे  चलने  की  आदत  नहीं  रही कश्ती  है  तो  किनारा  नहीं  है  दूरअगर  तेरे  इरादों  में  बुलंदी बनी  रही॥  


मुश्किलों  से  भाग  जाना  आसन  होता  है ,हर  पहलु  ज़िन्दगी  का  इम्तिहान  होता  है ,डरने  वालो  को  मिलता  नहीं  कुछ  ज़िन्दगी  में ,लड़ने  वालो  के  कदमो  में  जहाँ   होता  है॥ 

बुलबुल  के  परो  में  बाज़  नहीं  होते ,कमजोर  और  बुजदिलो  के  हाथो  में  राज  नहीं  होते ,जिन्हें  पड़ जाती  है  झुक  कर  चलने  की  आदत ,दोस्तों  उन  सिरों  पर  कभी  ताज  नहीं  होते॥  


हर  पल  पे  तेरा  ही  नाम  होगा ,तेरे  हर  कदम  पे  दुनिया  का  सलाम  होगा मुशिकिलो  का  सामना  हिम्मत  से  करना ,देखना  एक  दिन  वक़्त  भी  तेरा  गुलाम  होगा॥ 


मंजिले  उन्ही  को  मिलती  है  जिनके  सपनो  में  जान  होती  है पंखो  से  कुछ  नहीं  होता होसलो  से  उडान होती  है॥ 
ताश के पत्तों से महल नहीं बनता,नदी को रोकने से समंदर नहीं बनता, बढ़ाते रहो जिंदगी में हर पल,क्यूंकि एक जीत से कोई सिकंदर नहीं बनता 

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