August 9, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

ब्यंग: गोबर संस्कृति और गोबर का इतिहास….

न्यूज डेस्क 6 अगस्त | गुड़ गोबर करना- क्या सचमुच ही किसी विषय वस्तु को नष्ट करने के अर्थ में सटीक बैठता है? इसी तरह से गोबर गणेश क्या सचमुच ही मूर्खता का पर्याय हो सकता है?

 

गोबर का नाम सुनते ही कई लोग अपना मुंह बुरा सा बना लेते हैं। साहित्य के पूर्व विद्वजनों ने ऐसा ही कहकर गोबर को साहित्य के लिए प्यार किया या फिर महत्वहीन साबित किया है। बाद के कवियों की नजर में भी या गोबर बदबूदार और त्याज्या पदार्थ ही रहा है। कुछ अपवादी को छोड़ दीजिए। पता नही गोबर के प्रति उन विद्वजनों में इतनी वितृष्णा के कारण क्या थे । कही ऐसा तो नही कि अपनी लापरवाही से गोबर पर फिसलकर गिर पड़े हो, और उनकी धोती गोबर में सनकर खराब हो गई हो । फिर वह जहां गए हो वहां उन्हें कड़वे अपमान सहन करने पड़े हो। वह भी सकता है, क्योंकि बहुत ज्यादा तो नहीं, लगभग 5 छह दशक पूर्व कोई शायद ही ऐसा घर परिवार रहा हो जिनके घर पर दो चार गाय बैल ना बने रहते हो। द्वार पर खूटों की संख्या के आधार पर उनकी समृद्धि का अंदाजा लगाया जाता था। दिन की शुरुआत ही उन जानवरों के गोबर मूत्र की सफाई से शुरू होता था। मवेशियों के बिना वह परिवार ही समाज में त्याज्य माना जाता था।

 

भाई समय भी तो करवटें लेता ही रहता है फोटो की संख्या आप गाड़ियों की संख्या में परिणत हो गई पर सांसारिक सुखी जीवन  कौन नहीं यापन करना चाहता है।

 

इसी के लालच में लोग गांव को छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर गए ऐसे में भला अपने गाय और भैंस और बैल को नगर में कैसे ले जाते। बक्सानुमा कमरे में स्वंय रहे या गाय बैल को रखें? फिर पशु के रूप में कोई जीव को पालने की ही चाहत है । तो जो कुत्ते बिल्लियों को ही पाल लिया जाए। उनके लिए तो कोई खास कमरे या किसी बाड़े की आवश्यकता तो नहीं रहेगी। बिस्तर पर ही साथ सो जाया करेंगे साथ में खाना भी खा लिया करेंगे। बाहर मार्केटिंग या किसी टूर पर जाने के लिए उनका कोई खास ख्याल भी नहीं रखना पड़ेगा। वे भी मालिक के ममता भरी गोद में बैठ कर सफर कर लिया करेंगे। अब आप ही बताएं तो सही, गाय -भैंस -बैल को लेकर आप किस मार्केट में जाएंगे ?या फिर कहां दूर करने निकलेंगे अपने साथ उन्हें किस होटल में रखेंगे ?उन्हें अपने साथ किस। डाइनिंग टेबल पर खाना खिलाएंगे। संभव ही नहीं है।तो इससे बेहतर तो यही हुआ कि उन्हें अब अपने जीवन और अपने द्वार से ही दुत्कार दें ,सो अलग कर दिया। दूध की जरूरत है तो डेयरी फार्म वाला बंद प्लास्टिक पैकेट में मिलता है कि नहीं? अब कोई पूजा पाठ में ही तो गाय के दूध गोबर मूत्र की जरूरत होती है बराबर तो नहीं ।कोई बात नहीं। ऐसे समय पर किसी के सामने हाथ पसार दिया करेंगे। वह जो कुछ भी देगा सहर्ष स्वीकार कर लिया करेंगे। उसके ही विश्वास पर उसकी शुद्धता को मान लिया करेंगे या फिर उन्हें भी बंद पैकेट में बिक रहे बाजार से खरीद लिया करेंगे आखिर ऑनलाइन शॉपिंग में गोबर के गोएथे भी मिल रहे हैं कि नहीं?

 

गोबर और मूत्र भी बाजार में बिक ही रहा है। चाहे जो भी लेवे। फिर क्या जरूरत पड़ी है गाय और भैंस पालने की। अब भला गाय और भैंस के दूध को पीकर किसने इंद्रासन हिला दिया है। चार कंधों पर सवार होकर अंत में श्मशान घाट ही तो गए या फिर कहीं और गए?

आज कितने बच्चे हैं जो कि हार्लिक्स और बोर्नविटा ,काम्लान के समक्ष दूध पीना पसंद करते है । अब बच्चों की बात ही छोड़िए बूढे लोगो को भी दूध कहां पचता है। उन्हें भी तो दूध से एलर्जी गैस या फिर एसिडिटी की अक्सर शिकायतें हो जाया करती हैं कि नहीं?

भाई बात हो रही थे गुड गोबर और गणेश जी और जा पहुंचे दूध तक, क्या कीजिएगा मानव स्वभाव ही ऐसा है। हसुंए के ब्याह में लोग खुरपी के गीत गाने ही लगते है । इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है। आप भी तो अपने दफ्तर स्कूल काले या कर्म स्थल में कई बार ऐसा गीत गा ही चुके हैं। भले ही कोई मजबूरी रही हो।

छोड़िए इन बातों को और अब अपनी मूल बात पर आते हैं।  गाय बैल और गोबर भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग और मानव जीवन के स्वर्णिम भविष्य आधार रहे हैं। सुबह होते ही घर आंगन से लेकर खेत खलिहान तक की लिपाई पुताई चिकनाई के कार्यों के लिए गाय के गोबर को बरसों से उपयोग और धन धन से समृद्ध कारक माना गया है।  माना गया है कि जो व्यक्ति गाय बैल और उनके गोबर के संपर्क में रहते हैं उन्हें विषाणु जनित चेचक जैसा जानलेवा रोग स्पर्श तक नहीं कर सकता है। बड़ी विचित्र बात है न ?पर यह वैज्ञानिक सत्य है।

 

डॉक्टर एडवर्ड जेनर ने चेचक की रोकथाम के लिए गाय के फोड़े से निकले पीप से चेचक का अचूक टीका निर्माण किया । और लाखों-करोड़ों लोगो को चेचक जैसी जानलेवा बीमारी से बचा लिया । आज उसी टीके में हम गोबरपन या फोड़ेपन की बातों को नजरअंदाज कर ढेरो पैसा खर्च कर आगरा पूर्व खरीदते हैं और उसका सप्रेम सेवन करते है ।स्वार्थ के प्रति अन्य बाते निराधार साबित होती है । गो माता के आदेश को सिरोधार्य कर ही मां लक्ष्मी उसके गोबर और मूत्र को परम पवित्र स्थान मानकर उसमे निरंतर निवास करने की ठानी । अत: गाय को लक्ष्म रूपिणी सुरभि कामधेनु की संतान और ब्रह्मा की पुत्री माना गया है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Copyright © All rights Reserved with Suchkesath. | Newsphere by AF themes.