August 9, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉनसन भी बना दिये गए उद्धव ठाकरे! जानिए कैसे हुआ ये हाल…

न्यूज डेस्क 09 जुलाई |बोरिस जॉनसन की सत्ता के पतन को हर लोकतंत्र को देखना चाहिए और खुद से सवाल पूछना चाहिए कि क्या वह मैकियावेली (छल-कपटपूर्ण) नीति वाले नेताओं को सक्षम तो नहीं बना रहा है। किसी भी नेता के करियर का अंत इस बात को प्रतिबिंबित करने का एक अवसर है कि हमें अपने लोकतांत्रिक प्रतिनिधियों से क्या उम्मीदें हैं।

महाराष्ट्र में जिस तरह से सीएम उद्धव ठाकरे की महाविकास आघाड़ी सरकार पर सियासी संकट गहराया था. और, उद्धव ठाकरे को उनकी ही पार्टी शिवसेना के विधायकों की बगावत के चलते मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ गई थी. ठीक वैसा ही मामला ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के साथ भी हुआ है. बोरिस जॉनसन ने ब्रिटेन के पीएम पद से इस्तीफा दे दिया है. क्योंकि, बोरिस जॉनसन की कंजर्वेटिव पार्टी के मंत्रियों और सांसदों के उनके खिलाफ बगावत कर दी थी. हालांकि, बोरिस जॉनसन अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर तरह की जुगत लगा रहे थे. लेकिन, वो उनकी अपनी ही कंजर्वेटिव पार्टी के दबाव के आगे काम नहीं आया. वहीं, बोरिस जॉनसन के खिलाफ बगावत का आलम ये था कि उनकी सरकार से दो दिनों के अंदर 40 से ज्यादा इस्तीफे दे दिये गए थे. जिसकी शुरुआत वित्त मंत्री ऋषि सुनक और स्वास्थ्य मंत्री साजिद जाविद के इस्तीफे से हुई थी.

वित्त मंत्री ऋषि सुनक और स्वास्थ्य मंत्री साजिद जाविद ने बोरिस जॉनसन के नेतृत्व को भरोसेमंद न बताते हुए इस्तीफा दिया था. जिसकी वजह से जॉनसन की विश्वसनीयता ही संदिग्ध हो गई थी. ऋषि सुनक ने बोरिस पर आरोप लगाते हुए कहा था कि लोग सरकार से उम्मीद करते हैं कि वो ठीक तरह से काम करेगी. वहीं, साजिद जाविद ने बोरिस जॉनसन पर आरोप लगाया था कि सरकार राष्ट्र हित में काम नहीं कर रही है. इन दोनों इस्तीफों के बाद से ही बोरिस जॉनसन सरकार में इस्तीफों की ताबड़तोड़ झड़ी लग गई थी. खैर, अपनी ही पार्टी के मंत्रियों और सांसदों के दबाव से घिरे बोरिस जॉनसन ने आखिरकार पीएम पद से इस्तीफा दे दिया है. आसान शब्दों में कहा जाए, तो ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉनसन को भी उद्धव ठाकरे बना दिया गया.

 

आइए जानते हैं कि आखिर ये हुआ कैसे और क्यों…

 

बोरिस के खिलाफ क्यों हुई बगावत?

– बोरिस जॉनसन की सरकार के खिलाफ बगावत के पीछे भी महाराष्ट्र की तरह ही एक ‘संजय राउत’ ही थे. इस बगावत की जड़ क्रिस पिंचर थे. क्योंकि, ये बगावत क्रिस पिंचर की इसी साल फरवरी में कंजर्वेटिव पार्टी के डिप्टी चीफ व्हिप के तौर पर की गई नियुक्ति से जुड़ी हुई है. दरअसल, क्रिस पिंचर पर सेक्स स्कैंडल में फंसे थे.

– 30 जून को ब्रिटिश अखबार ‘द सन’ की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि क्रिस पिंचर ने लंदन के एक क्लब में दो युवकों को आपत्तिजनक तरीके से छुआ था. हालांकि, इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद क्रिस पिंचर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन, सारा विवाद इस बात पर था कि ये जानते हुए भी कि क्रिस पिंचर पर यौन शोषण के आरोप हैं, बोरिस जॉनसन ने उन्हें कंजर्वेटिव पार्टी का डिप्टी चीफ व्हिप बना दिया.

– कंजर्वेटिव पार्टी के सांसदों और मंत्रियों ने बोरिस जॉनसन पर आरोप लगाया था कि जॉनसन ने क्रिस पिंचर पर लगे आरोपों की जानकारी के बावजूद उन्हें नियुक्ति दी. वहीं, 1 जुलाई को सरकार की ओर से कहा गया कि पीएम बोरिस जॉनसन को इन आरोपों के बारे में नहीं पता था. जिसके बाद कंजर्वेटिव पार्टी के मंत्रियों और सांसदों ने बोरिस जॉनसन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

– इस अंदरुनी बगावत के बीच 4 जुलाई को सरकार की ओर से एक दूसरा बयान आया. जिसमें कहा गया था कि बोरिस जॉनसन को क्रिस पिंचर पर लगे आरोपों के बारे में पता था. लेकिन, आरोप साबित नहीं हुए थे. तो, नियुक्ति करना गलत नही था. इस बयान के बाद बगावत की आग और तेजी से भड़क गई. क्योंकि, पिंचर पर पहले भी यौन दुराचार के आरोप लगते रहे हैं. और, इसको जानने के बावजूद बोरिस जॉनसन ने क्रिस पिंचर पर कोई कार्रवाई नही की.

– 5 जुलाई को वित्त मंत्री ऋषि सुनक और स्वास्थ्य मंत्री साजिद जाविद ने जॉनसन सरकार में अपने पदों से इस्तीफा दे दिया. और, उनके इस्तीफे के बाद दो दिनों के अंदर ही 40 से ज्यादा नेताओं और मंत्रियों ने इस्तीफों की झड़ी लगा दी.

इस्तीफे के बाद अगला पीएम कौन?

लिखी सी बात है कि बोरिस जॉनसन के इस्तीफे के बाद ब्रिटेन को एक नया प्रधानमंत्री मिलने वाला है. और, ब्रिटेन के पीएम पद की रेस में ऋषि सुनक, ट्रेड मिनिस्टिर पेनी मॉर्डेंट, फॉरेन सेकेट्री लिज ट्रस के नाम सबसे आगे हैं. हालांकि, इन नामों से इतर डिफेंस सेकेट्री बेन वॉलेस, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री साजिद जाविद, वर्तमान वित्त मंत्री नदीम जाहवी, माइकल गोव और जेरेमी हंट के नाम भी चर्चा में बने हुए हैं.

 बोरिस जॉनसन का पतन लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थानों को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं

ब्रिटिश प्रधानमंत्री के रूप में बोरिस जॉनसन का इस्तीफा मात्र एक असाधारण राजनीतिक घटना नहीं है। प्रधानमंत्री कार्यालय में उनका कार्यकाल और जिस तरह से उनका इस्तीफा हुआ, उसकी प्रकृति-लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थानों के बारे में महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं। एक नेता की नैतिक कमियों पर संपूर्ण राजनीतिक संस्कृति की विफलता का दोष मढ़ना हमें ईमानदार महसूस करा सकता है, लेकिन हममें से ज्यादातर लोग जानते हैं कि सड़ांध एक तेज-तर्रार चरित्र की तुलना में कहीं अधिक गहरी है। केवल ब्रिटेन में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लिए जॉनसन के पतन को एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में लिया जा सकता है।

 

कुछ लोगों ने तर्क दिया है कि ब्रेग्जिट जनमत संग्रह से पहले की राजनीतिक बहस पतन की शुरुआत थी, कि जनता की उम्मीदों और आशंकाओं का राजनीतिक नेताओं द्वारा निंदनीय रूप से दोहन किया गया है। ये राजनेता अपने स्वयं के संदेशों के निष्कर्षों पर भी भरोसा नहीं करते थे। जॉनसन के शासन का इसलिए पतन हो गया, क्योंकि ऐसा लग रहा था कि जो सच है और जो राजनीतिक रूप से उपयुक्त है, उनके बीच कोई अंतर नहीं है। एक बार जब यह अंतर समाप्त हो जाता है, तो लोकतांत्रिक बहस अस्थिर हो जाती है और राजनीतिक संचार स्थायी डिकोडिंग का विषय बन जाता है।

 

सत्यनिष्ठा बाध्यकारी संरचनाओं पर निर्भर करती है, जैसे कि आचार संहिता और नैतिक समितियां। यह इरादतन छल, भ्रष्ट आचरण और नफरत फैलाने वाले भाषण के प्रति राजनेताओं एवं नागरिकों की सांस्कृतिक प्रतिबद्धता पर भी निर्भर करती है।

बोरिस जॉनसन का पतन इस बात को स्पष्ट दर्शाने का बेहतर क्षण है कि कोई भी लोकतंत्र मैकियावेली प्रवृत्तियों (किसी भी तरह से सत्ता हासिल करने की प्रवृत्ति) को सहन करने और यहां तक कि पुरस्कृत करने के लिए कितना तैयार है।

जॉनसन का शासनकाल एक लोकप्रिय सरकार और नागरिकों के जीवन में सार्थक बदलाव लाने वाली सरकार के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को उजागर करता है। अक्सर अनियंत्रित चुनौतियों के जवाब में ‘रेड मीट सॉल्यूशन’ (खतरनाक समाधान) का प्रस्ताव भी ध्यान आकर्षित करता है। शरणार्थियों को रवांडा भेजने या ब्रेग्जिट के ‘पूर्ण’ होने की घोषणा करने जैसे कदम तात्कालिक रूप से जबर्दस्त सुर्खियां बटोरने और जनमत सर्वेक्षण को प्रभावित करने के लिए उठाए गए हों, लेकिन ऐसे कदम आम तौर पर केवल प्रतीकात्मक और अक्सर खतरनाक रूप से अनुपयोगी होते हैं।

शासन करने के लिए समय और विचार-विमर्श की जरूरत होती है। और यह ईमानदार मूल्यांकन की मांग करता है, और शासन के जो अंग ठीक से काम नहीं करते हैं, उन्हें ठीक करने के लिए गंभीर प्रयास करने पड़ते हैं। यह प्रोपोगैंडा के जरिये सरकार चलाने से बिल्कुल अलग है, जिसमें हर प्रकट विफलता को सफलता के रूप में वर्णित किया जाता है और आलोचकों को दरकिनार कर दिया जाता है या उनका मजाक उड़ाया जाता है।

 

जनता की ओर से सरकारों को जिम्मेदार ठहराने वाली संसद को अपनी ताकत का एहसास कराने की जरूरत होती है। हो सकता है कि ब्रिटिश संसद ने प्रधानमंत्री को हटाने के लिए कार्य किया हो, जो चुनावी बोझ की तरह लगते थे, लेकिन संसद की ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका उन नीतिगत प्रस्तावों को चुनौती देना है, जिन पर स्पष्ट रूप से विचार नहीं किया गया है या जिन्हें भीड़ को संतुष्ट करने के लिए पेश किया गया है। कई सरलीकृत नीतियों को बढ़ावा देने में जॉनसन सरकार अनूठी नहीं थी। हालांकि लोकलुभावनवाद की नीतिगत बयानबाजी से खेलने में शायद अद्वितीय थी।

बेहतर विमर्श में निश्चित रूप से उन तरीकों पर ध्यान देना भी शामिल है, जिसमें हमारी वर्तमान मीडिया पारिस्थितिकी भी अक्सर सबसे तेज बोलने वाले, सबसे विवादास्पद दुर्जन नेताओं को पुरस्कृत करती है और उन राजनेताओं को सक्षम बनाती है, जो पत्रकारिता की सबसे खराब प्रथाओं को भुनाना जानते हैं।

कंजर्वेटिव पार्टी के 2019 के घोषणापत्र का आवरण, जिसमें जॉनसन की एक तस्वीर और साथ में ‘गेट ब्रेग्जिट डन’ (ब्रेग्जिट को अंजाम दीजिए) लिखा था, ब्रिटेन की क्षमता को उजागर करता है। जॉनसन सरकार सार्थक नीति और भीड़ को खुश करने वाली अदाओं के बीच के अंतर को ही रेखांकित करती है।

एक अंतिम, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकतांत्रिक राजनीति में विभिन्न आवाजों और अनुभवों को कैसे लाया जाए। ब्रिटेन की हाल की घटनाओं में एक हानिकारक लॉबिंग का मामला और महामारी के दौरान राजनेताओं द्वारा लॉकडाउन कानून को तोड़ने के कई खुलासे शामिल हैं। इसके अलावा, जॉनसन शासन का अंत उनकी सरकार के एक वरिष्ठ व्यक्ति के खिलाफ गंभीर यौन दुराचार के आरोपों के तत्काल बाद हुआ है। इन सभी ने वेस्टमिंस्टर धारावाहिक नाटक में कुछ हद तक थके हुए लोकप्रिय हितों को आकर्षित किया होगा। लेकिन कुल मिलाकर, यह निश्चित है कि राजनीति के प्रति पहले से ही मतदाताओं के घटते विश्वास का और क्षरण हो रहा है, जिससे विघटन को नए सिरे से प्रेरणा मिली है।

किसी भी नेता के करियर का अंत इस बात को प्रतिबिंबित करने का एक अवसर है कि हमें अपने लोकतांत्रिक प्रतिनिधियों से क्या उम्मीदें हैं। जॉनसन के कार्यकाल के दौरान, ब्रिटिश जनता क्या करने को तैयार है, इस पर चर्चा करने में बहुत अधिक समय बिताया गया है।

जाहिर है, बोरिस जॉनसन जल्द ही डाउनिंग स्ट्रीट (ब्रिटिश प्रधानमंत्री का आवास एवं कार्यालय) से चले जाएंगे। अब सवाल यह होना चाहिए कि लोग आगे क्या चाहते हैं-और वे इसे कैसे कर सकते हैं?

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Copyright © All rights Reserved with Suchkesath. | Newsphere by AF themes.