June 29, 2022

Such Ke Sath

सच के साथ

भारतीय लोकतंत्र में पनप रहा है ठोकतंत्र

वैचारिक छूआछूत भी दलीय राजनीति में एक दूसरे के दुश्मन पैदा हो गये। अक्सर भाजपा पर कट्टर सिद्धान्तवादी कहकर आरोप लगाया जाता है, ये अपनी वैचारिक खिड़कियों को बंद रखते है। हालांकि वैचारिक लचीलापन भाजपा में जनसंघ के समय से है। पं. दीनदयाल उपाध्याय पश्चिम जीवन पद्धति के कड़े आलोचक थे, तथापि वे स्वीकार करते थे कि पश्चिमी सिद्धान्त मानवीय विचारों में हुई क्रांति का परिणाम है और उनकी उपेक्षा करना उचित नहीं होगा। राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, समाजवाद विश्व शांति के बारे में 60 के दशक में जोरदार बहस हुई, उनके बारे में दीनदयाल जी ने कहा कि ये सभी ऊँचे आदर्श है, जो मनुष्य की उच्च आकांक्षाओं को व्यक्त करते है, लेकिन इन विचारों को पश्चिम में जिस तरह प्रस्तुत किया गया, उससे ऐसा लगता है कि मानो उनमें से प्रत्येक शेष विचारों के विरोध में है। वैचारिक कट्टरता के कारण ही ऐसा नेतृत्व पैदा हुआ, जिसने अपने विचारों को ही ध्वस्त कर अपनी तानाशाही स्थापित कर ली। कम्युनिस्ट विचारों का प्रभाव दुनिया में रहा। माक्र्सवादी विचारों की शासन व्यवस्था सोवियत संघ में स्थापित हुई, लेकिन सर्वहारा के नाम से बनी इस व्यवस्था में ही स्टालिन जैसा तानाशाह पैदा हुआ और उसने अपने पराये के खून से क्रूरता के साथ शासन चलाया। हिटलर के विचार को भी चाहे राष्ट्रवादी कहे लेकिन उसने अपने कट्टर विचारों की दुहाई देते हुए जर्मनी में तानाशाही स्थापित की। तानाशाह वैचारिक कट्टरता में से पैदा होते रहे। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में इंदिराजी 1975 में तानाशाही स्थापित करने में इसलिए सफल हुई कि गांधीवादी विचारों की भूमि पर पनपी कांग्रेस के विचार जब अपने राजनैतिक हित में केन्द्रित हो गये तो फिर लोकतंत्र को भी दफनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। राजनीति के वर्तमान कुरूक्षेत्र में ऐसे योद्धा है जो दूसरे के विचारों का सकारात्मक विरोध की बजाय उन्हेें कुचलना चाहते है, जिस तरह इंदिराजी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र का गला घोट। उसी तरह पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी है, जो सत्ता पर अपना एकाधिकार कायम रखने के लिए विरोध को न केवल बर्दाश्त करती है बल्कि विपक्ष की हर गतिविधि को कुचलने ने का फरमान जारी करती है। अपने उस शौर्य का उन्हें घमंड है कि उनके दम पर ही पं. बंगाल का कम्युनिस्ट किला ध्वस्त हो गया, इसी जोहर शक्ति के कारण उन्हें पं. बंगाल की जनता ने पसंद किया। पं. बंगाल के लोग क्रांतिकारी नेतृत्व को पसंद करते है। बंग भूमि क्रांति की भूमि रही है। अब ममता बेनर्जी के अंदर उस लार्ड कर्जन की आत्मा अवतरित हुई है जिसने बंगाल को बांटने का काम किया। वहां करीब 27 प्रतिशत मुस्लिम वोट है, सब भेड़ बकरियों की तरह मुल्ला, मौलाना के फतवे के डंडे की फटकार से एक मुश्त वोट देते है। इनके वोट बैंक पर कब्जा हो गया है तो फिर उनको कोई चुनौती नहीं दे सकता। न केवल ममजा बेनर्जी केन्द्र सरकार की जनहित की योजनाओं को नकार रही है बल्कि वे मौलाना बरकती जैसे देशद्रोही, जो मुस्लिमों के लिए एक और पाकिस्तान बनाने की बात कहता है, जो हिन्दू धर्म संस्कृति के विरोध में जहर उगतलता है, उसे वे वक्फ बोर्ड का ऑब्जरवर बुनाती है। सेक्यूलर विचार भूमि से पैदा हुआ यह नेतृत्व मुस्लिमों को संतुष्ट करने के लिए दुर्गा पूजा को रोकता है, विजयादशमी, हनुमान जयंती के आयोजनों पर रोक लगाता है। बंग भूमि के कई गांवों में मंदिर तोड़े गये, हिन्दुओं के घर आग के हवाले किये गये, हिन्दुओं को मारा पीटा गया, पलायन के लिए बाध्य किया गया लेकिन ममता बेनर्जी का प्रशासन हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहा। कार्यवाही होती तो दंगाई नाराज हो जाते? यही ममता बेनर्जी की तानाशाही प्रवृत्ति का परिणाम है। रा.स्व. संघ के सरसंघचालक मान. मोहन भागवत के कार्यक्रम की अनुमति नहीं देना। बंगाली लेखक तस्लीम पर पं. बंगाल में आने पर बंदिश लगाना, अब 125 ऐसे विद्यालयों को बंद करने की कार्यवाही कर बच्चों के भविष्य के साथ ऐसे समय खिलवाड़ किया जा रहा है, जब परीक्षा निकट है। ममता सरकर मानती है कि ये रा.स्व. संघ द्वारा संचालित स्कूल है। जबकि पं. बंगाल में ये विद्यालय तीन ट्रस्टों द्वारा संचालित है। कारण यह बताया गया कि इन विद्यालयों के संचालकों ने शासन की औपचारिकता पूरी नहीं। जबकि कोलकत्ता हाइकोर्ट ने ममता प्रशासन की इस कार्यवाही को अवैद्य माना है। जानना होगा कि इन स्कूलों में आदिवासी और 10 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे भी पढ़ते है। चाहे हिन्दू धार्मिक त्यौहारों का आयोजन में रूकावट पैदा करना हो या रा.स्व. संघ और मान. मोहन भागवत के कार्यक्रम को रोकने का आदेश हो, इन सबको हाईकोर्ट गलत करार दे चुकी है। ममता बेनर्जी का मनो वैज्ञानिक नासूर यह है कि वे न किसी की सुनना चाहती है और न ही विरोधी विचार को बर्दाश्त करती है।

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पं. बंगाल में लोगों की पसंद भाजपा के साथ जुड़ रही है, जो उपचुनाव हुए उसमें भाजपा ने जनता की पसंद की दूसरी पार्टी के नाते अपना वर्चस्व स्थापित किया है। इसलिए ममता को दुश्मन नं. एक भाजपा दिखाई दे रही है। यही कारण है कि वे न केवल संघ के शैक्षणिक और सेवा कार्यों को रोक रही हैं बल्कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या शरणार्थियों को संरक्षण देकर उनकी देश विरोधी गतिविरोधियों को भी प्रेरित कर रही है। इस आरोप में काफी कुछ सच्चाई है कि ममता बेनर्जी अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए पं. बंगाल का इस्लामीकरण कर रही है। हिन्दू विरोधी तुष्टीकरण का खुला तांड़व पं. बंगाल में हो रहा है। यदि यह सब जारी रहा तो भारत को अखंडता की कठिन चुनौती का सामना करना होगा। सवाल यह है कि जो केन्द्र सरकार को न माने, जो न्यायालय के निर्णयों को नकार दे और जो मजहबी साम्प्रदायिकता क जुनून से प्रेरित देशद्रोही गतिविधियों को पे्ररित करें, ऐसी ममता बेनर्जी को कैसे रोका जाय? ममता बेनर्जी को यह सबक ध्यान में रखना होगा कि पं. बंगाल के हिन्दुओं का गुस्सा पं. बंगाल में उसी तरह का क्रांतिकारी राजनैतिक बदलाव कर सकता है जिस तरह उन्होंने जमे हुए कम्युनिस्ट सरकार को दफना दिया।

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वर्तमान वैचारिक कट्टरता से उपजी तानाशाही के नायक के एपिसोड की चर्चा करना भी प्रासंगिक होगा। दिल्ली राज्य के मुख्यमंत्री है, अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से पैदा हुए अरविंद केजरीवाल। उनके संघर्ष को दिल्ली की जनता ने पसंद किया और उनके हाथों में दिल्ली सरकार की बागडोर सौंप दी। जो बाते उनके जुझारू नेतृत्व की ऊर्जा थी, उसके विपरित आचरण सत्ता सुख मिलते ही दिखाई दिया। भ्रष्टाचार का विरोध, भ्रष्टाचार की पसंद हो गया। कानून प्रशासन पर आप के ऐसे सपोले कुंडली मारकर बैठ गये, जिससे कानून प्रशासन कराह उठा। लोकतंत्र के लिए वे नहीं बल्कि उनकी चाकरी के लिए लोकतंत्र है, शासन-प्रशासन के कर्मचारी-अधिकारी सहयोगी नहीं उनके नौकर है, इस दूषित प्रवृत्ति का परिणाम यह हुआ कि दिल्ली की जनता ने जिस अरविंद को राम समझकर राज तिलक किया था, उसका स्वरूप रावण का हो गया। रावण ने विभीषण को भरी सभा में लात मारकर उसे लंका त्यागने का आदेश दिया था। उसी तरह रात की बारह बजे अपने सरकारी निवास पर मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को बुलाना। विज्ञापन को जारी करने की बात पर तनातनी होना। अंशु प्रकाश द्वारा सुप्रिम कोर्ट के निर्देश का हवाला देकर अपनी मजबूरी बताने से वहां मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनके विधायक अंशु प्रकाश पर टूट पड़े। उनकी लात घूसो से पिटाई की। उनका चश्मा टूट गया। उनकी मेडिकल रिपोर्ट में भी मारपीट के घाव शरीर पर होना पाया गया। यही नहीं उनके निजी सचिव जैन ने भी बयान दिया कि मुख्य सचिव के साथ केजरीवाल के सामने मारपीट की गई। पुलिस ने आप के दो विधायकों को हिरासत में ले लिया है। राजनीति में वैचारिक कट्टरता से निजशाही के साथ नई पद्धति भी विकसित हो रही है, इसी में अरविंद केजरीवाल ने नया प्रयोग प्रारंभ किया है, जिसे ठोकतंत्र कह सकते है। ठोकपीट से ही शासन चल सकता है।

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इस जिहादी नेतृत्व के विधायक नरेश वाल्यान ने तो ताली पिटवाते हुए सभा में कहा कि जो अधिकारी काम नहीं करते उनकी पिटाई होना चाहिए। उनके इस कथन पर न शर्म है और न दु:ख है। ऐसा लगता है कि ठोकतंत्र पर दिल्ली की केजरीवाल सरकार की मोहर लग गई है। ये लोकतांत्रिक सेक्यूलर जिहादी योद्धा अब जनतंत्र की बजाय ठोकतंत्र के डंडे से अपना राजनैतिक आतंक कायम करना चाहते है। गांधीवादी विचारों के अण्णा हजारे के शुद्ध भ्रष्टाचार विरोधी अहिंसक आंदोलन से पैदा हुआ अरविंद केजरीवाल का नेतृत्व और अब अहिंसा के रसायन में पैदा हुआ ठोकतंत्र राजनीति के छात्रों के लिए शोध का विषय हो सकता। सर्वहारा के नाम से एक दलीय तानाशाही पैदा हुई और लोकतंत्र से पैदा हो रहा है ठोकतंत्र।

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